चालीसे का दूसरा सप्ताह - शुक्रवार

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पहला पाठ

उत्पत्ति-ग्रन्थ 37:2-4,12-13,17-18

“देखो, वह स्वप्नद्रष्टा आ रहा है। चलो, हम उसे मार दें।”

इस्राएल अपने सब दूसरे पुत्रों से योसेफ़ को अधिक प्यार करता था, क्योंकि वह उसके बुढ़ापे की सन्तान था। उसने योसेफ़ के लिए एक सुन्दर कुरता बनवाया था। उसके भाइयों ने देखा कि उनका पिता हमारे सब भाइयों से योसेफ़ को अधिक प्यार करता है; इसलिए वे उस से बैर करने लगे और उस से अच्छी तरह बात भी नहीं करते थे। योसेफ़ के भाई अपने पिता की भेड़-बकरियाँ चराने सिखेम गये थे। इस्राएल ने योसेफ़ से कहा, “तुम्हारे भाई सिखेम में भेड़ें चरा रहे हैं। मैं तुम को उनके पास भेजना चाहता हूँ।” योसेफ़ अपने भाइयों की खोज में निकला और उसने उन को दोतान में पाया। उन्होंने उसे दूर से आते देखा था और उसके पहुँचने से पहले ही वे उसे मार डालने का षड्यन्त्र रचने लगे। उन्होंने एक दूसरे से कहा, “देखो, वह स्वप्नद्रष्टा आ रहा है। चलो, हम उसे मार कर किसी कुएँ में फेंक दें। हम यह कहेंगे कि कोई हिंस्र पशु उसे खा गया है। तब हम देखेंगे कि उसके स्वप्न उसके किस काम आते हैं।” रूबेन यह सुन कर उसे उनके हाथों से बचाने के उद्देश्य से बोला, “हम उसकी हत्या न करें।” तब रूबेन ने फिर कहा, ''तुम उसका रक्त नहीं बहाओ। उसे मरुभूमि के कुएँ में फेंक दो, किन्तु उस पर हाथ मत लगाओ।” वह उसे उनके हाथों से बचा कर पिता के पास पहुँचा देना चाहता था। इस लिए ज्यों ही योसेफ़ अपने भाइयों के पास पहुँचा, उन्होंने उसका सुन्दर कुरता उतारा और उसे पकड़ कर कूएँ में फेंक दिया। वह कूआँ सूखा हुआ था, उस में पानी नहीं था। इसके बाद वे बैठ कर भोजन करने लगे। उन्होंने आँखें ऊपर उठा कर देखा कि इस्माएलियों का एक कारवाँ गिलआद से आ रहा है। वे ऊँटों पर गोंद, बलसाँ और गंधरस लादे हुए मिस्र देश जा रहे थे। तब यूदा ने अपने भाइयों से कहा, “अपने भाई को मारने और उसका रक्त छिपाने से हमें क्या लाभ होगा ! आओ, हम उसे इस्माएलियों के हाथ बेच दें और उस पर हाथ नहीं लगायें; क्योंकि वह तो हमारा भाई और हमारा रक्तं-सम्बन्धी है।” उसके भाइयों ने उसकी बात मान ली। उस समय मिदयानी व्यापारी उधर से निकले। उन्होंने योसेफ़ को कूएँ में से निकाला और उसे चाँदी के बीस सिक्कों में इस्माएलियों के हाथ बेच दिया और वे योसेफ़ को मिस्र देश ले गये।

प्रभु की वाणी।

भजन : स्तोत्र 104:16-21

अनुवाक्य : प्रभु के अपूर्व कार्य याद रखो।

प्रभु ने उस देश में अकाल पड़ने दिया और जीवन-निर्वाह के सब साधन नष्ट किये। उसने इस से पहले एक मनुष्य को वहाँ भेजा था। योसेफ वहाँ दास के रूप में बिक गया था।

उसके पैरों में बेडियाँ डाली गयीं और उसकी गर्दन में लोहे की जंजीरें। परन्तु उसने जो कहा था, वह समय पर पूरा हो गया। प्रभु ने उसे सच्चा प्रमाणित किया।

तब राजा ने उसे छोड़ देने का आदेश दिया, राष्ट्रों के शासक ने उसे मुक्त किया और उसे अपने घराने का अधिपति तथा अपनी सारी सम्पत्ति का प्रबन्धक बनाया

जयघोष : योहन 3:16

ईश्वर ने संसार को इतना प्यार किया कि उसने उसके लिए अपने एकलौते पुत्र को अर्पित कर दिया, जिससे जो कोई उस में विश्वास करे, वह अनन्त जीवन प्राप्त करे।

सुसमाचार

मत्ती के अनुसार पवित्र सुसमाचार 21:33-43,45-46

“यह तो उत्तराधिकारी है। चलो, हम इसे मार डालें।”

येसु ने महायाजकों और जनता के नेताओं से कहा, ''एक दूसरा दृष्टान्त सुनो। किसी ज़मींदार ने दाख की बारी लगवायी, उसके चारों ओर घेरा बनवाया, उस में रस का कुण्ड खुदवाया और पक्का मचान बनवाया। तब उसे असामियों को पट्टे पर दे कर वह परदेश चला गया। फसल का समय आने पर उसने असामियों के पास अपने नौकरों को भेजा, जिससे वे फसल का हिस्सा बसूल करें। किन्तु असामियों ने उसके नौकरों को पकड़ कर उन में से किसी को मारा-पीटा, किसी की हत्या कर दी और किसी को पत्थरों से मार डाला। इसके बाद उसने पहले से अधिक नौकरों को भेजा और असामियों ने उनके साथ भी वैसा ही किया। अंत में उसने यह सोच कर अपने पुत्र को उनके पास भेजा कि वे मेरे पुत्र का आदर करेंगे। किन्तु पुत्र को देख कर असामियों ने एक दूसरे से कहा, ' यह तो उत्तराधिकारी है। चलो, हम इसे मार डालें और इसकी विरासत पर कब्जा कर लें।' उन्होंने उसे पकड़ लिया और दाखबारी से बाहर निकाल कर मार डाला। जब दाखबारी का स्वामी लौटेगा, तो वह उन असामियों का क्या करेगा ?'' उन्होंने येसु से कहा, “वह उन दुष्टों का सर्वनाश करेगा और अपनी दाखबारी का पट्टा दूसरे असामियों को देगा, जो समय पर फसल का हिस्सा देते रहेंगे।” येसु ने उन से कहा, '' क्या तुम लोगों ने धर्मग्रन्थ में कभी यह नहीं पढ़ा ? - कारीगरों ने जिस पत्थर को बेकार समझ कर निकाल दिया था, वही कोने का पत्थर बन गया है। यह प्रभु का कार्य है। यह हमारी दृष्टि में अपूर्व है। इसलिए मैं तुम लोगों से कहता हूँ - स्वर्ग का राज्य तुम से ले लिया जायेगा और ऐसे राष्ट्र को दिया जायेगा, जो इसका उचित फल उत्पन्न करेगा।” महायाजक और फरीसी उनके दृष्टान्त सुन कर समझ गये कि वह हमारे विषय में कह रहे हैं। वे उन्हें गिरफ्तार करने का उपाय ढूँढ़ने लगे, किन्तु वे जनता से डरते थे, क्योंकि वह येसु को नबी मानती थी।

प्रभु का सुसमाचार।

📚 मनन-चिंतन

आज येसु हमें एक और दृष्टांत सुनाते हैं। यह दृष्टांत एक जमींदार और उसकी दाख-बारी के विषय में है। उस जमींदार ने दाख-बारी लगाई, फिर उसे जानवरों से बचाने के लिए उसके चारों ओर दीवार बनाई। उसने रस निकालने के लिए हौद भी खोदा और एक मीनार भी बनवाई। जब सब कुछ तैयार हो गया, तब उसने अपनी जमीन और फसल कुछ स्थानीय किसानों को पट्टे पर दे दी। वे दाख-बारी और उसके घर की देखभाल के लिए जिम्मेदार थे। इसके बाद मालिक कई महीनों के लिए बाहर चला गया। जब येसु यह दृष्टांत अपने श्रोताओं को सुना रहे थे, तब वे जानते थे कि यही परिस्थिति उनके अपने जीवन में भी घटित होने वाली है। वे समझ रहे थे कि फरीसी उनके विरुद्ध षड्यंत्र रच रहे हैं और संभवतः उन्हें मार डालने की योजना बना रहे हैं। यह दृष्टांत आने वाली घटनाओं की एक पूर्व-छाया (संकेत) था। क्या फरीसी येसु के प्रश्नों से चकित रह गए होंगे? क्या वे इस बात से आश्चर्यचकित हुए होंगे कि येसु ने उन्हें इस प्रकार सीधे चुनौती दी?

यदि हम येसु की जगह होते, तो क्या हमारे पास भी इतना साहस और विश्वास होता कि हम अपनी यात्रा पर डटे रहते? यह सुसमाचार स्पष्ट करता है कि येसु जानते थे कि उन्हें मार दिया जाएगा, फिर भी वे अपनी बुलाहट के प्रति सच्चे बने रहे। वे निरंतर उपदेश देते और शिक्षा देते रहे। आज हम भी येसु से शक्ति प्राप्त करें कि हम अपनी बुलाहट के प्रति सच्चे रहेंकृवह चाहे जो भी हो। येसु हमारे साथ चलेंगे, हमारा मार्गदर्शन करेंगे और हमें सामर्थ्य देंगे। आओ, आज और हर दिन हम येसु के साथ चलें! आमेन

- फादर अल्फ्रेड डिसूजा (भोपाल महाधर्मप्रांत)


📚 REFLECTION

Today Jesus is telling us another parable. This parable is about the landowner and his vineyard. The landowner planted the vineyard and then he built a wall to protect it from the animals. He also dug a winepress and built a tower. After he had all of this completed, he leased his property and crops to some of the local farmers. They were responsible for tending the vineyard and his home. Then the owner left and was gone for several months. As Jesus was telling his listeners this parable, he knew that this scenario would be played out in his own life. He realized that the Pharisees were plotting against him and most likely, they were planning on killing him. This parable was a foreshadowing of what was to come. Were the Pharisees taken aback by Jesus’ questions? Were they surprised that Jesus confronted them as he did?

If we were in Jesus’ shoes, would we have the courage and trust to continue on his journey? This gospel makes it clear that Jesus knew that he would be killed, yet he stayed true to his call. He continued to preach and teach. Today may we draw the strength from Jesus to be true to our call---whatever that might be! Jesus will walk with us, guide us and strengthen us! May we walk with Jesus today and every day!

-Fr. Alfred D’Souza (Archdiocese of Bhopal)

📚 मनन-चिंतन

कंपनियों में हम अक्सर सुनते हैं कि कर्मचारियों को अचानक निकाल दिया जाता है। इसका कारण प्रायः यह होता है कि वे अपने दायित्वों को पूर्ण करने में असफल रहते हैं या जिन कार्यों को करने के लिए उन्हें नियुक्त किया गया था, उन्हें पूरा नहीं कर पाते। हमारे दैनिक जीवन में भी हमें इस प्रकार की परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है, चाहे वह छोटी हो या बड़ी। हम कई बार अपने दायित्वों को पूरा करने में असफल हो जाते हैं क्योंकि हम उनकी बहुमूल्यता को नहीं पहचानते। ये दायित्व हमारे लिए ईश्वर का वरदान होते हैं, परंतु हम उन्हें अपनी प्राथमिकताओं की सूची में बाद में रखने योग्य समझते हैं। ऐसे महत्वपूर्ण और बहुमूल्य दायित्व हमें अनुग्रह के रूप में प्रदान किए जाते हैं और ये हमारे उद्धार का साधन बनते हैं, जैसे कि बच्चों का उचित रूप से लालन-पालन करना। जब हम इन अनुग्रहों से भरे दायित्वों को प्राथमिकता नहीं देते, तो हम जीवन में अनुग्रह से वंचित रह जाते हैं । आज के सुसमाचार में हम देखते हैं कि आसामी भूमि के स्वामी के सामर्थ्य और अधिकार को पहचानने में असफल रहे। अपनी लोभ-लालसा के कारण, उन्होंने एक छोटे से भूखंड के लिए ही अपने प्राणों को विनाश के गड्ढे में डाल दिया। इसी प्रकार, जब हम ईश्वर की दी हुई ज़िम्मेदारियों को नहीं पहचानते और अपने सांसारिक इच्छाओं को प्राथमिकता देते हैं, तो हम भी आत्मिक विनाश की ओर बढ़ते हैं। अतः आज पवित्र कलीसिया हमें आमंत्रित करती है कि हम अपनी प्राथमिकताओं को सही करें और ईश्वर द्वारा प्रदत्त अनुग्रह को पूर्ण निष्ठा से स्वीकारें।

- ब्रदर सुमन खलखो (भोपाल महाधर्मप्रान्त)


📚 REFLECTION

In corporate offices we often hear about employees being suddenly fired. The reason for being fired is usually found to be the failure in not fulfilling the needs or the work that the employers assigned to do. In our day-to-day life we often face such situations in tiny to mega facets. We often fail to do our responsibilities because we are not aware about the preciousness of the responsibility, gift given to us due which we keep such objectively important things as later things in our priority-list. Such important and precious responsibilities are placed on our shoulders as a means of grace or a medium to reach our welfare, for example raising up of children responsibly. Due to our failure to prioritise such grace-filled responsibilities, we lose grace in our life. In today’s gospel, we see that the tenants failed to recognise and acknowledge the might and power of the landowner. They were greedy for small part of the land and as a result they fall into the pit of death. Therefore, today Church invites us to set our priorities right.

-Bro. Suman Khalkho (Archdiocese of Bhopal)

मनन-चिंतन

यहूदी लोग ईश्वर के चुने हुए लोग थे क्योंकि ईश्वर का पुत्र दुनिया के सभी लोगों में से उनके बीच में मानव शरीर में आया था। वे न केवल उन्हें पहचानने में विफल रहे, बल्कि उन्होंने उनकी निंदा की और उनके ऊपर झूठे आरोप लगा कर, उन्हें मौत की सजा दिला कर उनके साथ बुरा व्यवहार भी किया। बहुत से नबी और धर्मी लोग मसीह के दिनों को देखने के लिए तरसते थे परन्तु वे देख नहीं पाये थे (देखें मत्ती 13:17)। ईश्वर के राज्य के बीज यहूदियों में बोए गए, परन्तु वे फल देने में असफल रहे। इसलिए राज्य उनसे छीन लिया गया और उन्हें दिया गया जो फल पैदा करेंगे। यह बात येसु दुष्ट असामियों के दृष्टांत के माध्यम से लोगों को बताना चाहते थे। प्रभु हमसे फल पैदा करने की उम्मीद करते हैं। प्रभु हम में अच्छाई के बीज बोते रहते हैं। हमें उन बीजो के अंकुरित होने तथ विकसित होने में समर्थन देने और उन्हें फल पैदा करने में सक्षम बनाने के लिए प्रयत्न करते रहना चाहिए। हमें हर प्रतिभा पर मेहनत करने की जरूरत है और हमें आशीर्वाद दिया जाता है ताकि वह फल पैदा करे।

- - फादर फ्रांसिस स्करिया


REFLECTION

The Jewish people were in a privileged position because the Son of God came in human flesh in their midst out of all the people in the world. They not only failed to recognize him, but also ill treated him by falsely accusing to have him condemned and sentenced to death. Many prophets and righteous people longed to see the days of the Messiah but could not see (cf. Mt 13:17). The seeds of the kingdom of God were sown among the Jews, but they failed to produce fruits. So the Kingdom was taken away from them and given to others who would produce fruits. This is what Jesus wanted to communicate to the people through the parable of the wicked tenants. God expects us to produce fruits. God keeps sowing goodness in us. We need to support its growth and enable it to produce fruits. We need to work on every talent and blessing given to us so that it produces fruits.

- Fr. Francis Scaria

मनन-चिंतन -2

हिंसक आसामियों का दृष्टांत इस्राएलियों के इतिहास का संक्षिप्त चित्रण है। ईश्वर ने स्वयं पहल कर उनके साथ विधान की स्थापना की थी। दृष्टांत के दाखबारी के भूमिधर जिसने दाखबारी स्थापित करने के लिये सभी बारीक से बारीक बातों का ध्यान रखा था ईश्वर ने भी इस्राएलियों को अपनी प्रजा बनाने के लिये ऐसा ही किया था। उसने उन्हें गुलामी की दासता से मुक्त कर एक राष्ट्र के रूप में स्थापित किया था। ईश्वर ने उनके साथ ऐसा किया क्योंकि वे चाहते थे उनकी प्रजा उनके प्रति वफादार रहेगी तथा फल उत्पन्न करेगी।

निर्गमन ग्रंथ में इस बात का उल्लेख मिलता है, ’’प्रभु ने मूसा से कहा, ’फिराउन के यहाँ जा कर उस से कहो कि इब्रानियों का ईश्वर प्रभु कहता है कि मेरे लोगों को चले जाने दो, जिससे वे मेरी पूजा कर सकें।’’ (निर्गमन 9ः1) किन्तु इस्राएली न सिर्फ विश्वाघाती बल्कि विद्रोही प्रजा भी सिद्ध हुये। नबी आमोस उनके इस व्यवहार पर सवाल उठाते हुये पूछते हैं, ’’इस्राएल के घराने! क्या तुमने उन चालीस वर्षों में, मरुभूमि में कभी मुझे बलि और नैवेद्य चढाते थे? कदापि नहीं।’’ (आमोस 5ः25)

उन्होंने ईश्वर की वाणी को नजरअंदाज किया तथा उसके नबियों की हत्या की। यह दृष्टांत भविष्य की तीन बातों को बताता है, पहला पुत्र की हत्या, सजा तथा दाखबारी को यहूदियों से वापस लेना।

दृष्टांत हरेक की व्यक्तिगत कहानी है। ईश्वर पहल करता तथा हमें सबकुछ प्रदान करता है। वह हमारे दोषपूर्ण आचरण को सहता ताकि हम एक दिन उसके ओर अभिमुख हो। वह हमें एक के बाद अनेक अवसर प्रदान करता है तथा धैर्य के साथ हमारा इंतजार करता है। लेकिन एक दिन न्याय का दिन भी आयेगा। यदि हम ईश्वर की चेतावनी एवं उसके धैर्य की परीक्षा लेते रहेंगे तो नरक की सजा हमारा अंत होगा।

- - फादर रोनाल्ड वाँन


REFLECTION

The parable of the wicked tenants is a history in a glance of the people of Israel. It was God who took initiative and established convent with them. Like the landowner in parable who takes care of the minutest details of the vineyard God took care of the people of Israel. He set them free of the slavery and established them as a nation. God did all these so that they would be faithful to him in producing fruits.

As in the book of Exodus we see, “Then the Lord said to Moses, ‘Go to Pharaoh and say to him, “Thus says the Lord: Let my people go, so that they may worship me.” (Exodus 8:1) However, they proved not only infidel but also rebellious. Prophet Amos would recount the infidelity of Israelites in the wilderness and ask, “Did you bring to me sacrifices and offerings the forty years in the wilderness, O house of Israel? (Amos 5:25)

They brushed aside God’s message and killed the prophets. The parable indicates three futurist things. The killing of the son, punishment and the taking away of the vineyard from the Jews.

This parable is a story of every individual. God takes initiative and provides everything. He bears our infidelity so that one day we may turn to him. He keeps waiting for us patiently and generously. However, there would be a day of reckoning. If we continue to neglect his love and warning then the eternal condemnation will be our fate.

- Fr. Ronald Vaughan