
तू अपना डण्डा ले कर अपनी प्रजा, अपनी विरासत की भेड़ें चराने की कृपा कर। वे जंगल और बंजर भूमि में अकेली ही पड़ी हुई हैं। प्राचीन काल की तरह उन्हें बाशन तथा गिलआद में चरने दे। जिन दिनों तू हमें मिस्र से निकाल लाया, उन्हीं दिनों की तरह हमें चमत्कार दिखा। तेरे सदृश कौन ऐसा ईश्वर है, जो अपराध हरता और अपनी प्रजा का पाप अनदेखा करता है; जो अपना क्रोध बनाये नहीं रखता, बल्कि दया करना चाहता है ? वह फिर हम पर दया करेगा, हमारे अपराध पैरों तले रौंद देगा और हमारे सभी पाप गहरे समुद्र में फेंकेगा। तू याकूब के लिए अपनी सत्यप्रतिज्ञता और इब्राहीम के लिए अपनी दयालुता प्रदर्शित करेगा, जैसी कि तूने शपथ खा कर हमारे पूर्वजों से प्रतिज्ञा की है।
प्रभु की वाणी।
अनुवाक्य : प्रभु दया तथा अनुकम्पा से परिपूर्ण है!
मेरी आत्मा प्रभु को धन्य कहे, मेरा सर्वस्व उसके पवित्र नाम की स्तुति करे। मेरी आत्मा प्रभु को धन्य कहे और उसके सब वरदानों को कभी नहीं भुलाये।
वह मेरे सब अपराध क्षमा करता और मेरी सारी कमजोरी दूर करता है। वह मुझे सर्वनाश से बचाता और प्रेम तथा अनुकम्पा से मुझे सँभालता है।
उसका क्रोध समाप्त हो जाता और सदा के लिए नहीं बना रहता है। वह न तो हमारे पापों के अनुसार हमारे साथ व्यवहार करता और न हमारे अपराधों के अनुसार हमें दण्ड देता है।
आकाश पृथ्वी के ऊपर जितना ऊँचा है, उतना महान् हैं अपने भक्तों के लिए प्रभु का प्रेम। पूर्व पश्चिम से जितना दूर है, प्रभु हमारे पापों को हम से उतना दूर कर देता है।
मैं उठ कर अपने पिता के घर जाऊँगा और उन से कहूँगा, ''पिता जी ! मैंने स्वर्ग के विरुद्ध और आपके प्रति पाप किया है।
येसु का उपदेश सुनने के लिए नाकेदार और पापी उनके पास आया करते थे। फरीसी और शास्त्री यह कह कर भुनभुनाते थे, “यह मनुष्य पापियों का स्वागत करता है और उनके साथ खाता-पीतां है”। इस पर येसु ने उन को यह दृष्टान्त सुनाया, “किसी सनुष्य के दो पुत्र थे। छोटे ने अपने पिता से कहा, “पिता जी, सम्पत्ति को जो भाग मेरा है, मुझे दे दीजिए', और पिता ने उन में अपनी सम्पत्ति बाँट दी। थोड़े ही दिनों बाद छोटा बेटा अपनी समस्त सम्पत्ति एकत्र कर किसी दूर देश चला गया और वहाँ उसने भोग-विलास में अपनी सम्पत्ति उड़ा दी। जब वह सब कुछ खर्च कर चुका, तो उस देश में भारी अकाल पड़ा और उसकी हालत तंग हो गयी। इसलिए वह उस देश के एक निवासी का नौकर बन गया, जिसने उसे अपने खेतों में सूअर चराने भेजा। जो फलियाँ सूअर खाते थे, उन्हीं से वह अपना पेट भरना चाहता था, पर कोई भी उसे उन में से कुछ नहीं देता था। तब वह होश में आया और यह सोचने लगा - मेरे पिता के घर कितने ही मजदूरों को जरूरत से ज्यादा रोटी मिलती है और मैं यहाँ भूखों मर रहा हूँ। मैं उठ कर अपने पिता के पास जाऊँगा और उन से कहूँगा, 'पिता जी ! मैंने स्वर्ग के विरुद्ध और आपके प्रति पाप किया है। मैं आपका पुत्र कहलाने योग्य नहीं रहा। मुझे अपने मजदूरों में से एक जैसा रख लीजिए।' तब वह उठ कर अपने पिता के घर की ओर चल पड़ा। वह दूर ही था कि उसके पिता ने उसे देख लिया और दया से द्रवित हो उठा। उसने दौड़ कर उसे गले लगा लिया और उसका चुम्बन किया। तब पुत्र ने उस से कहा, 'पिता जी ! मैंने स्वर्ग के विरुद्ध और आपके प्रति पाप किया है। मैं आपका पुत्र कहलाने योग्य नहीं रहा।' परन्तु पिता ने अपने नौकरों से कहा, 'जल्दी अच्छे से अच्छे कपड़े ला कर इसे पहनाओ और इसकी उँगली में अँगूठी और इसके पैरों में जूते पहनाओ। मोटा बछड़ा भी ला कर मारो। हम खायें और आनन्द मनायें; क्योंकि मेरा यह बेटा मर गया था और फिर जी गया है, यह खो गया था और फिर मिल गया है।' और वे आनन्द मनाने लग" “उसका जेठा लड़का खेत में था। जब वह लौट कर घर के निकट पहुँचा, तो उसे गाने-बजाने और नाचने की आवाज सुनाई पड़ी। उसने एक नौकर को बुलाया और इसके विषय में पूछा। इसने कहा, 'आपका भाई आया है और आपके पिता ने मोटा बछड़ा मारा है, क्योंकि उन्होंने उसे भला-चंगा वापस पाया है'। इस पर वह क्रुद्ध हो गया और उसने घर के अन्दर जाना नहीं चाहा। तब उसका पिता बाहर आया और उसे मनाने लगा। पर उसने अपने पिता को उत्तर दिया, “देखिए, मैं इतने बरसों से आपकी सेवा करता आया हूँ। मैंने कभी आपकी आज्ञा का उल्लंघन नहीं किया। फिर भी आपने कभी मुझे बकरी का बच्चा तक नहीं दिया, ताकि मैं अपने मित्रों के साथ आनन्द मनाउँ। पर जैसे ही आपका यह बेटा आया, जिसने वेश्याओं के पीछे आपकी सम्पत्ति उड़ा दी हैं, आपने इसके लिए मोटा बछड़ा मार डाला है।” इस पर पिता ने उस से कहा, “बेटा, तुम तो सदा मेरे साथ रहते हो और जो कुछ मेरा है, वह तुम्हारा है। परन्तु आनन्द मनाना और उल्लसित होना उचित ही था; क्योंकि तुम्हारा यह भाई सर गया था और फिर जी गया है, यह खो गया था और फिर मिल गया है'।”
प्रभु का सुसमाचार।
क्योंकि मेरा यह बेटा मर गया था और फिर जी गया है, यह खो गया था और फिर मिल गया है।
यह “उड़ाऊ पुत्र“ का दृष्टांत ईश्वर की असीम करुणा और प्रेम को दर्शाता है। छोटा बेटा अपने रास्ते से भटक जाता है, अपनी सारी संपत्ति नष्ट कर देता है, और शर्म के साथ लौट आता है-लेकिन उसका पिता उसे खुले हृदय से अपनाता है। बड़ा बेटा, भले ही बाहरी रूप से आज्ञाकारी है, भीतर ही भीतर क्रोध और शिकायत से ग्रस्त है। फिर भी, पिता दोनों बेटों के पास पहुँचते हैं और संबंधों को बहाल करने की इच्छा रखते हैं। ईश्वर का प्रेम हमारे कर्मों के आधार पर नहीं, बल्कि उसकी अपनी स्वभाविक दयालुता और क्षमा पर आधारित है-वह एक ऐसा प्रेमपूर्ण पिता है जिसे तब खुशी होती है जब हम उसकी ओर लौटते हैं। क्या आपके जीवन में कोई ऐसा क्षेत्र है जहाँ आपको ईश्वर के करीब आने की आवश्यकता है? या कोई ऐसा व्यक्ति है जिसे आपको क्षमा करना चाहिए? आज, ईश्वर की दया पर मनन करें। यदि आप छोटे बेटे जैसे हैं, तो वापस लौट आइए। यदि आप बड़े बेटे जैसे हैं, तो अपने अभिमान को छोड़कर दया को अपनाएँ। अपने हृदय को ईश्वर की करुणा का प्रतिबिंब बनने दें।
हे स्वर्गीय पिता, आपकी असीम प्रेम के लिए धन्यवाद। मुझे अपने पूरे हृदय से आपकी ओर लौटने और दूसरों के प्रति वैसी ही दया दिखाने की प्रेरणा दें जैसी आप मेरे प्रति दिखाते हैं। आमेन।
✍ - फादर अल्फ्रेड डिसूजा (भोपाल महाधर्मप्रांत)
"This son of mine was dead and is alive again; he was lost and is found." (Luke 15:24)
The parable of the Prodigal Son reveals the boundless mercy of God. The younger son strays, wastes everything, and returns in shame—but the father welcomes him with open arms. The older son, though outwardly obedient, struggles with resentment. Yet the father reaches out to both, longing to restore relationship. God’s love is not based on what we deserve but on who He is—a loving, forgiving Father who rejoices when we return to Him. Is there an area in your life where you need to return to God? Or someone you need to forgive? Today, reflect on the Father’s mercy. If you're like the younger son, come back home. If you're like the older son, let go of pride and embrace mercy. Let your heart mirror the compassion of God.
Heavenly Father, thank You for Your unconditional love. Help me to return to You with all my heart and to show the same mercy to others that You show to me. Amen.
✍ -Fr. Alfred D’Souza (Archdiocese of Bhopal)
यह सही कहा गया है, ‘देर आए, दुरुस्त आए’। मनुष्य के जीवन में कई बार ऐसा होता है कि हम किसी कार्य को करते हुए मार्ग भटक जाते हैं, जो निस्संदेह हमारे लिए ईश्वर द्वारा निर्धारित होता है। भले ही हमें यह ज्ञात हो कि यह कार्य हमें ईश्वर ने सौंपा है, फिर भी हम उसमें ठहराव महसूस करने लगते हैं। ऐसे समय में समय-सीमा बहुत शीघ्र आ जाती है, और चिंता इस स्तर तक बढ़ जाती है कि शेष कार्य भी कठिन लगने लगता है। ऐसी असफलता का बोझ हमें धीरे-धीरे नीचे गिरा देता है, और समय के साथ हम सौंपे गए कार्य का आधा भी पूरा नहीं कर पाते। यह और कुछ नहीं, बल्कि ईश्वर के प्रेम और शक्ति को कम आंकने का परिणाम है। आज का सुसमाचार हमें पूर्ण विश्वास के साथ ईश्वर के प्रेम में बने रहने के लिए प्रेरित करता है। जिस प्रकार उड़ाऊ पुत्र ने अपने सबसे बुरे समय में भी अपने पिता के प्रेम पर भरोसा किया, उसी प्रकार हमें भी ईश्वर पर दृढ़ विश्वास रखना चाहिए। हमें यह मानना होगा कि समस्याएँ, कमजोरियाँ, असफलताएँ और चिंताएँ ईश्वर से बड़ी नहीं हैं। ईश्वर सबसे महान हैं, और उनका प्रेम भी सबसे महान है।
✍ - ब्रदर सुमन खलखो (भोपाल महाधर्मप्रान्त)
It is rightly said ‘Better late than sorry’. In human life many times it happens that we lose our way in the middle of perusing a thing that is definitely meant for us, even after knowing that this has been given by God to do it. In such situations, the deadline reaches very fast, and the anxiety peaks in a way that the remaining work also becomes difficult to complete. The guilt of such a failure pulls us down slowly and in due course of time we fail to complete even half of the assigned task. This is nothing but our underestimation of God’s love and strength. Today’s Gospel exhorts us to firmly trust in the love of God as the prodigal even in his worst of times relied on his father’s love. We need to believe that problems, shortcomings, failure, and anxiety are no bigger than God. God is above all and so is His love.
✍ -Bro. Suman Khalkho (Archdiocese of Bhopal)
उडाउॅ पुत्र का दृष्टांत तीन लोगों के स्वाभाव तथा उनकी स्थिति के बारे में बताता है। पिता का दोनों पुत्रों के प्रति जागरूकता, सक्रियता तथा बिना शर्त प्रेम ईश्वर का प्रतिनिधित्व करता है। उडाउॅ पुत्र नाकेदारों तथा पापियों का प्रतीक है जिन्होंने जीवन में पाप किया तथा उसका फल भुगता। लेकिन उन्होंने अपनी दयनीयता में पहचाना कि वे पापी है, ’’मैंने स्वर्ग के विरूद्ध और आपके विरूद्ध पाप किया है’’ (लूकस 15:21) तथा इस स्थिति से निकलने का प्रयास किया, ’’मैं उठकर अपने पिता के पास जाउॅगा’’ (लूकस 15:18)
उसक जेठा लडका फरीसियों और शास्त्रियों को चिन्हित करता है। वास्तव में येसु ने उन फरीसियों के लिये ही यह दृष्टांत सुनाया था। ’’फरीसी और शास्त्री यह कहते हुए भुनभुनाते थे, ’यह मनुष्य पापियों का स्वागत करता है और उनके साथ खाता-पीता हैष्। इस पर ईसा ने उन को यह दृष्टान्त सुनाया,’’ (लूकस 15:2-3) फरीसियों और शास्त्रियों ने अपने आप को धर्मी माना। येसु के दूसरों के प्रति दयालु तथा अपनापन दिखाने के कारण वे उनसे ईर्ष्या किया करते थे। उनकी मूर्खता न सिर्फ इस बात तक सीमित है वे स्वयं को आत्म-धर्मी मानते थे बल्कि इसमें भी की वे दूसरों तुच्छ तथा पापी मानते थे।
इसके द्वारा येसु सिखाते हैं कि ईश्वर के दया द्वार सभी के लिये हर समय खुले हैं। ईश्वर सभी का ध्यान रखता है। उडाउॅ के वापस लौटने पर वह उसका स्वागत करता है उसी प्रकार ईर्ष्यालु बडे पुत्र को समझाने के लिये उसके पीछे-पीछे भी जाता है। लेकिन इस बात निर्णय हरेक व्यक्ति को लेना कि उसे क्या भूमिका चुननी है। ईश्वर के राज्य में न ही हठधर्मिता के लिये जगह है और न ही दूसरों पर दोष लगाने के लिये। आइये हम भी उसकी दया पर विश्वास करे और अपने पापों को पहचान कर अपने पिता की ओर वापस लौटे।
- - फादर रोनाल्ड वाँन
Through the parable of ‘the Prodigal son’ Jesus explains the status or the nature of the three people. Father represents God, his watchful, proactive and unconditional love towards both the sons. Prodigal son is the symbol of the tax collectors, sinners etc. who have wronged in their life and suffered miserably. They have floundered the freedom and resources on themselves. However, in their suffering they recognized their sinfulness, ‘I have sinned against heaven’s and earth’ and are willing to make a return journey homeward, “I shall rise up and go to my father’s house”.
The elder son is stark example of the pharisees and the scribes. In the fact it is for them Jesus narrates the parable, “And the Pharisees and the scribes were grumbling and saying, ‘This fellow welcomes sinners and eats with them.’ So he told them this parable:”(Luke 15:2-3)” The Pharisees saw themselves as righteous people. Like the elder son they were sulking at the kind of acceptance and promises Jesus is providing them. Their folly lays not only in being wrong and considering themselves right but in considering others as condemned lot.
Through his parable Jesus makes it abundantly clear that God’s doors of mercy are always open to everyone. The father welcomes the prodigal son as well as goes behind to assuage the sulking son. Nonetheless, it is the choice of individual to decide and make a homeward journey. There is neither a place for a judgemental attitude towards others nor a self-assumed righteousness in the kingdom.
- Fr. Ronald Vaughan