चालीसे का तीसरा सप्ताह, बुधवार

🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥

पहला पाठ

विधि-विवरण ग्रन्थ 4:1,5-9

“नियमों का पालन करो और उन पर चलते रहो।”

मूसा ने लोगों से कहा, “हे इस्राएलियो! मैं जिन नियमों तथा आदेशों की शिक्षा तुम लोगों को आज दे रहा हूँ, उन पर ध्यान दो और उनका पालन करो, ताकि तुम जीवित रह सको और उस देश में प्रवेश कर उसे अपने अधिकार में कर सको, जिसे प्रभु, तुम्हारे पुरखों का ईश्वर तुम लोगों को देने वाला है। देखो, मैं अपने प्रभु-ईश्वर के आदेशानुसार तुम लोगों को नियमों तथा आदेशों की शिक्षा दे रहा हूँ, ताकि तुम उनका उस देश में पालन करो, जिसे तुम अपने अधिकार में कर लोगे। तुम उनका पालन करो तथा उन पर चलते रहो और इस तरह तुम अन्य राष्ट्रों की आँखों में समझदार और बुद्धिमान समझे जाओगे। जब वे उन सब आदेशों की चरचा सुनेंगे, तो बोल उठेंगे, 'उस महान्‌ राष्ट्र के समान समझदार तथा बुद्धिमान्‌ और कोई राष्ट्र नहीं है'। क्योंकि ऐसा महान्‌ राष्ट्र कहाँ हैं, जिसके देवता उनके इतने निकट हैं, जितना हमारा प्रभु-ईश्वर तब हमारे निकट है, जब-जब हम उनकी दुहाई देते हैं? और ऐसा महान्‌ राष्ट्र कहाँ है, जिसके नियम और रीतियाँ इतनी न्यायपूर्ण हैं जितनी 'यह संपूर्ण संहिता, जिसे मैं आज तुम लोगों को दे रहा हूँ। सावधान रहो। जो कुछ तुम ने अपनी आँखों से देखा है, उसे मत भुलाओ, उसे जीवन भर याद रखो और अपने पुत्र-पौत्रों को सिखाओ।”

प्रभु की वाणी।

भजन : स्तोत्र 147:12-13,15-16,19-20

अनुवाक्य : हे येरुसालेम! प्रभु की स्तुति कर।

हे येरसालेम! प्रभु की स्तुति कर। हे सियोन! अपने ईश्वर का गुणगान कर। उसने तेरे फाटकों के छड़ सुदृढ़ बना दिये, उसने तेरे यहाँ के बच्चों को आशीर्वाद दिया।

वह पृथ्वी को अपना आदेश देता है। उसकी वाणी शीघ्र ही फैल जाती हैं। वह ऊन की तरह हिम बरसाता और राख की तरह पाला गिराता है।

वह याकूब को अपना आदेश देता और इस्राएल को अपना विधान तथा नियम बताता है, उसने किसी अन्य राष्ट्र के साथ ऐसा नहीं किया; उसने किसी को अपना नियम नहीं सिखाया।

जयघोष : योहन 6:64,69

हे प्रभु! आपकी शिक्षा आत्मा और जीवन है। आपके ही शब्दों में अनन्त जीवन का संदेश है।

सुसमाचार

मत्ती के अनुसार पवित्र सुसमाचार 5:17-19

“जो नियमों का पालन करता और उन्हें सिखाता है, वह बड़ा समझा जायेगा।”

येसु ने अपने शिष्यों से कहा, “यह न समझो कि मैं संहिता अथवा नबियों के लेखों को रद्द करने आया हूँ। उन्हें रद्द करने नहीं, बल्कि पूरा करने आया हूँ। मैं तुम लोगों से कहे देता हूँ - आकाश और पृथ्वी भले ही टल जायें, किन्तु संहिता को एक मात्रा अथवा एक बिन्दु भी बिना पूरा हुए नहीं टलेगा। इसलिए जो उन छोटी-से-छोटी आज्ञाओं में से एक को भी भंग करता और दूसरों को ऐसा करना सिखाता है, वह स्वर्गराज्य में छोटा समझा जायेगा। जो उनका पालन करता और उन्हें सिखाता है, वह स्वर्गराज्य में बड़ा समझा जायेगा।

प्रभु का सुसमाचार।

📚 मनन-चिंतन

यह न समझो कि मैं संहिता अथवा नबियों के लेखों को रद्द करने आया हूँ। उन्हें रद्द करने नहीं, बल्कि पूरा करने आया हूँ।

येसु अपने श्रोताओं को यह भरोसा दिलाते हैं कि वे ईश्वर की संहिता को रद्द करने नहीं, बल्कि उसे पूरा करने आए हैं-न केवल कठोर नियमों का पालन करके, बल्कि उसकी आत्मा को जी कर, जो प्रेम, दया और आज्ञाकारिता में प्रकट होती है। वे यह सिखाते हैं कि ईश्वर की हर आज्ञा अर्थपूर्ण और मूल्यवान है, और जो लोग उन्हें न केवल मानते हैं बल्कि दूसरों को भी उन्हें अपनाने की प्रेरणा देते हैं, वे स्वर्ग के राज्य में महान माने जाएँगे। यह पाठ हमें बाहरी धार्मिकता से आगे बढ़कर आंतरिक समर्पण की ओर बुलाता है-ऐसे जीवन की ओर जो सच्चाई, प्रेम और विश्वास के साथ जिया जाए। आज आप ईश्वर की आज्ञाओं को कैसे देखते हैं? क्या वे केवल पालन के लिए नियम हैं, या प्रेम में गहराई से चलने के मार्गदर्शक? ईश्वर की आज्ञाओं के पीछे की भावना-जैसे ईमानदारी, क्षमा और नम्रता-को अपनाने का प्रयास करें। जब आप इन गुणों को अपने जीवन में जीते हैं, तो आप दूसरों के लिए एक जीवित गवाह बनते हैं।

प्रभु येसु, कृपया मुझे केवल आपके वचनों का पालन करने वाला नहीं, बल्कि उनकी आत्मा के अनुसार जीने वाला बनाएँ। मुझे अपने सत्य में चलने और प्रेम के माध्यम से दूसरों का मार्गदर्शन करने की शक्ति दें। आमेन।

- फादर अल्फ्रेड डिसूजा (भोपाल महाधर्मप्रांत)


📚 REFLECTION

"Do not think that I have come to abolish the Law or the Prophets; I have come not to abolish but to fulfill." (Matthew 5:17)

Jesus assures His listeners that He respects and fulfills the Law of God—not by strict legalism, but by living its true spirit: love, mercy, and obedience. He teaches that every command of God has meaning and value, and that those who live by them and teach others to do so will be called great in the Kingdom. This passage calls us to go deeper—not just to follow rules outwardly, but to live God's Word with sincerity, love, and integrity. Today, reflect on your attitude toward God’s commandments. Are they just rules to follow, or a guide to love more deeply? Try to live the spirit behind the commandment—whether it's honesty, forgiveness, or humility—and be a witness to others by your example.

Lord Jesus, help me to live not just by the letter of Your law, but by its spirit. Teach me to walk in Your truth and to lead others by my example of love and faithfulness. Amen.

-Fr. Alfred D’Souza (Archdiocese of Bhopal)

📚 मनन-चिंतन

आज की पीढ़ी के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि उन्हें किसी नियम और व्यवस्था के अधीन रखा जाए। अधिकांश युवा यह तर्क देते हैं कि ऐसे नियम उनकी स्वतंत्रता को बाधित करते हैं और उन्हें एक निश्चित ढंग से जीवन जीने के लिए मजबूर करते हैं। मनुष्य एक विवेकशील प्राणी है, फिर भी उसमें एक पशुता का अंश विद्यमान रहता है। इसलिए, सच्चे अर्थों में मानव बनने की प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है। यही कारण है कि किसी भी व्यक्ति के जीवन में कुछ नियमों और व्यवस्थाओं की आवश्यकता होती है। चाहे वह एक बड़ी संस्था हो या संपूर्ण राष्ट्र, वहाँ पर व्यवस्था बनाए रखने के लिए नियम और कानून आवश्यक होते हैं। जब येसु अपने मिशन को पूरा कर रहे थे, तब कई बार उन्हें यह कहकर दोषी ठहराया गया कि वे यहूदी व्यवस्था का पालन नहीं कर रहे हैं। परंतु सच्चाई यह थी कि येसु स्वयं उन सभी नियमों और भविष्यवाणियों की पूर्णता थे, जो उनके विषय में पुराने नियम में की गई थीं। आज का सुसमाचार हमें स्मरण दिलाता है कि हम सभी का एक महान उद्देश्य है - हमारे भीतर सच्चा मनुष्य बनना। और यह तभी संभव है जब हम उन नियमों और व्यवस्थाओं को अपनाएँ, जो हमें येसु के जीवन में दृष्टिगोचर होती हैं।

- ब्रदर सुमन खलखो (भोपाल महाधर्मप्रान्त)


📚 REFLECTION

The greatest challenge for today’s generation is to bind them to a set of rules and regulations. Most of the youth question the freedom of an individual contrary to such rules that bind them to live life in a particular way. Human beings are rational beings but still have a part of animality in them and becoming human is always a continuous process. Therefore, some regulations are needed for an individual. Even in big corporations to a great nation, laws, rules, and regulations are meant for a harmonious order. When Jesus was doing his earthly ministry, He was often condemned that He was not keeping up the Jewish law. But the reality was that Jesus himself was the fulfillment of all the laws and prophecies made about Him in the Old Testament. Today’s Gospel reminds us that we all have an objective goal to become human within us which is to be achieved by a set of laws and regulations found in the life of Jesus.

-Bro. Suman Khalkho (Archdiocese of Bhopal)

मनन-चिंतन

येसु ने पुराने विधान की शिक्षाओं को समाप्त नहीं किया, परन्तु उन्होंने उन्हें पूर्ण किया। पुराने विधान ने लोगों से कहा कि वे एक सीमा से अधिक प्रतिशोध न लें जबकि नया नियम सभी को बदला लेने से मना करता है। पुराना नियम हमें लोगों को उनका हक देने के लिए कहता है, लेकिन नए नियम में येसु की शिक्षाएं हमें बताती हैं कि हम दूसरों को उससे अधिक दें जितना पाने के लिए वे हकदार हैं। यह भले सामरी के दृष्टांत में बहुत स्पष्ट है जहाँ येसु ने दया दिखाने वाले की प्रशंसा की और अपने श्रोताओं से भी ऐसा ही करने को कहा। येसु चाहते हैं कि हम देने, प्रेम करने और क्षमा करने में उदार बनें। जब वे हमें एक अतिरिक्त मील चलना सिखाते हैं तो वे हमें रिश्तों में माप और गणना से परे जाने के लिए कह रहे हैं। जब हम किसी से प्यार करते हैं, तो हमारी बाधाएं तथा सीमाएं टूट जाती हैं। येसु नहीं चाहते कि हम "संहिता तथा नबियों" का तिरस्कार करें। इसके बजाय वे चाहते हैं कि हम संहिता तथा नबियों में निर्धारित बातों से आगे बढ़ें और स्वर्गिक पिता के समान उदार बनें।

- - फादर फ्रांसिस स्करिया


REFLECTION

Jesus did not abolish the Old Testament teachings, but he perfected them. The Old Testament asked the people not to take revenge beyond a limit while the New Testament rules out revenge all together. The Old Testament tells us to give people their due, but the teachings of Jesus in the New Testament tell us to give others more than what they deserve. This is very clear in the parable of the Good Samaritan where Jesus praised the one who showed mercy and asked his listeners to do likewise. Jesus wants us to be generous in giving, in loving and in forgiving. When he teaches us to walk an extra mile he is asking us to go beyond measurements and calculations in relationships. When we love, our barriers break. Jesus does not want us to throw away “the Law and the Prophets”. Instead he wants us to go beyond what is prescribed in the Law and the Prophets and become generous like the heavenly father..

- Fr. Francis Scaria

मनन-चिंतन -2

प्रारंभ से ही ईश्वर ने मनुष्य को आज्ञाएं प्रदान की जिसके पालन से वह जीवित रहे तथा जीवन की सारी खुशियों और कृपाओं को प्राप्त कर सके। ईश्वर ने आदम और हेवा से एक वृक्ष के फल नहीं खाने को कहा था जिससे वे जीवित रहे। ईश्वर ने कहा था, ’’किन्तु भले-बुरे के ज्ञान के वृक्ष का फल नहीं खाना क्योंकि जिस दिन तुम उसका फल खाओगे, तुम अवश्य मर जाओगे’’। (उत्पति 2ः17) किन्तु उन्होंने ईश्वर की आज्ञा तोडी और वर्जित फल खाया जिससे संसार में मृत्यु का प्रवेश हुआ। (1कुरि.15ः21) मूसा के द्वारा ईश्वर ने उन्हें दस आज्ञायें एवं संहिता प्रदान की जिसके पालन से वे एक राष्ट्र के रूप में फले-फूले। ’’देखो, मैं अपने प्रभु-ईश्वर के आदेश के अनुसार तुम लोगों को नियमों तथा आदेशों की शिक्षा दे चुका हूँ। ...उनका अक्षरषः पालन करो और इस तरह तुम अन्य राष्ट्रों की दृष्टि में समझदार और बुद्धिमान समझे जाओगे। जब वे उन सब आदेशों की चर्चा सुनेंगे, तो बोल उठेंगे ’उस महान् राष्ट्र के समान समझदार तथा बुद्धिमान और कोई राष्ट्र नहीं है’।’’ (विधिविवरण 4ः5-7) लेकिन उन्होंने विद्रोह किया और मरूभूमि में ही मर गये। न्यायकर्ताओ और नबियों के द्वारा ईश्वर ने उन्हें सही मार्ग दिखाया किन्तु उन्होंने उनकी हत्याएं की।

ईश्वर की संहिता मनुष्य की भलाई के लिये थी लेकिन मनुष्य ने या तो उसको माना नहीं और दूसरा यदि माना भी तो अपनी मन-मर्जी से। येसु इस संहिता के पालन के लिये आये थे। इब्रानियों के नाम पत्र इस बात का साक्ष्य देता है, ं’’इसलिए मसीह ने संसार में आ कर यह कहा, ईश्वर! मैं तेरी इच्छा पूरी करने आया हूँ, जैसा कि धर्मग्रन्थ में मेरे विषय में लिखा हुआ है।’’ (इब्रानियों 10ः5,7) येसु न सिर्फ संहिता के पालन के लिये आये बल्कि उसे योग्य रीति से पूरा करने भी आये। संहिता का उद्देश्य मनुष्य तथा उसके पडोसी का भला था। येसु ने उसका सारांक्ष देते हुये कहा, ’’अपने प्रभु-ईश्वर को... प्यार करो। तथा अपने पड़ोसी को अपने समान प्यार करो। इनसे बड़ी कोई आज्ञा नहीं।“ (मारकुस 12ः30-31) धर्म मेरे और ईश्वर का संबंध न हो एक त्रिकोणीय सच्चाई बन गया, मैं ईश्वर और मेरा पडोसी। येसु ने अपने जीवन के द्वारा संहिता को पूर्णता प्रदान की जब उन्होंने सभी को उनके सामाजिक बंधनों, लिंग, जाति, पूर्वाग्रहों, धन, गरीबी आदि के परे जाकर प्रेम किया।

- - फादर रोनाल्ड वाँन


REFLECTION

From the very beginning God gave his commands so that by obeying it man will have life with all its happiness and blessings. God told Adam and Eve not to eat the fruit of a particular tree so that they may live forever, “but of the tree of the knowledge of good and evil you shall not eat, for in the day that you eat of it you shall die.” (Genesis 2:17) However, they broke the command and ‘death came into the world.’ (1 Cor. 15:21) Through Moses God gave them 10 commandments and the Law so that they may flourish as a nation, “See, just as the Lord my God has charged me, I now teach you statutes and ordinances… You must observe them diligently, for this will show your wisdom and discernment to the peoples, who, when they hear all these statutes, will say, ‘Surely this great nation is a wise and discerning people!’ For what other great nation has a god so near to it as the Lord our God is whenever we call to him? (Deut. 4:5-7) But they constantly rebelled against God’s command and perished in the wilderness. Similarly, the Judges, Prophets etc. thought them to obey God commands but they killed them.

God’s law was for the good of man but either man defied it or fulfilled it as it pleases him. Jesus came to fulfil the Law, Letter to Hebrews testifies about Jesus, “Consequently, when Christ came into the world, he said, ……“See, God, I have come to do your will, O God” (in the scroll of the book it is written of me).” (Hb. 10:5,7) Jesus not only came to fulfil but to do it in the true spirit of the law. The purpose of the law was the good of man and good of the neighbour. Jesus rightly summarized it, “You shall love the Lord your God,…and “You shall love your neighbour as yourself.” (Mark 12:30-31) The religion was no longer between I and my God but between I, God and what I do to my neighbour. Through his life Jesus profusely displayed the love of God, cutting across all the barriers of gender, social inhibition, prejudices, wealth and poverty etc.

- Fr. Ronald Vaughan