चालीसे का चौथा इतवार - वर्ष C

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(प्रस्तुत पाठों के बदले वर्ष A के पाठ पढ़ कर सुनाये जा सकते हैं )

पहला पाठ

चालीस वर्षों तक मरुभूमि में रहने के बाद इस्राएली, योशुए के नेतृत्व में, प्रतिज्ञात देश में प्रवेश करते हैं और इस अवसर पर प्रभु को धान्यवाद देने के लिए, वे पास्का पर्व मनाते हैं।

योशुआ का ग्रंथ 5:9-12

“ईश्वर की प्रजा ने प्रतिज्ञात देश में प्रवेश करने पर पास्का पर्व मनाया।”

प्रभु ने योशुए से कहा, “आज मैंने तुम लोगों पर से मिस्र का कलंक दूर किया है”। इस्राएलियों ने गिलगाल में पड़ाव डाला और वहाँ, येरिको के मैदान में, महीने के चौदहवें दिन, शाम को, पास्का पर्व मनाया। पास्का के दूसरे दिन ही उन्होंने उस देश की उपज की बेखमीर रोटियाँ और अनाज की भुनी हुई बालें खायीं। जिस दिन उन्होंने उस देश की उपज का अन्न पहले पहल खाया, उसी दिन से मन्ना का गिरना बंद हो गया। मन्ना नहीं मिलने के कारण इस्राएली उस समय से कनान देश की उपज का अन्न खाने लगे।

प्रभु की वाणी।

भजन : स्तोत्र 33:2-7

अनुवाक्य : परख कर देखो कि प्रभु कितना भला है।

मैं सदा ही प्रभु को धन्य कहूँगा, मेरा कंठ निरन्तर उसकी स्तुति करता रहेगा। मेरी आत्मा प्रभु पर गौरव करेगी। विनम्र, सुन कर, आनन्दित हो उठेंगे।

मेरे साथ प्रभु की महिमा का गीत गाओ, हम मिल कर उसके नाम की स्तुति करें। मैंने प्रभु को पुकारा। उसने मेरी सुनी और मुझे हर प्रकार के भय से मुक्त कर दिया।

जो प्रभु की ओर दृष्टि लगाता है, वह आनन्दित होगा - उसे कभी लज्जित नहीं होना पड़ेगा। दीन-हीन ने प्रभु की दुहाई दी। प्रभु ने उसकी सुनी और उसे हर प्रकार की विपत्ति से बचा लिया।

दूसरा पाठ

मसीह स्वयं निष्पाप थे। उन्होंने हमारे पापों का प्रायश्चित किया और ईश्वर से हमारा मेल कराया है। अब ईश्वर की कृपा की सहायता से हम मसीह की पवित्रता के भागी बन सकते हैं।

कुरिंथियों के नाम सन्त पौलुस का दूसरा पत्र 5:17-21

ईश्वर ने मसीह के द्वारा अपने से हमारा मेल कराया है।”

यदि कोई मसीह के साथ एक हो गया है, तो वह नया मनुष्य बन गया है। पुरानी बातें समाप्त हो गयी हैं और सब कुछ नया हो गया है। ईश्वर ने यह सब किया है - उसने मसीह के द्वारा अपने से हमारा मेल कराया है और इस मेल-मिलाप का सेवा-कार्य हम प्रेरितों को सौंपा है। इसका अर्थ यह है कि ईश्वर ने मनुष्यों के अपराध उनके खर्चे में न लिख कर मसीह के द्वारा अपने से संसार का मेल कराया और इस मेल-मिलाप के संदेश का प्रचार हमें सौंपा है। इसलिए हम मसीह के राजदूत हैं, मानों ईश्वर हमारे द्वारा आप लोगों से अनुरोध कर रहा हो। हम मसीह के नाम पर आप लोगों से यह विनती करते हैं, कि आप लोग ईश्वर से मेल कर लें। मसीह का कोई भी पाप नहीं था। फिर भी ईश्वर ने हमारे कल्याण के लिए उन्हें पाप का भागी बना दिया, जिससे हम उनके द्वारा ईश्वर की पवित्रता के भागी बन सकें।

प्रभु की वाणी।

जयघोष : लूकस 15:18

मैं यह जगह छोड़ कर अपने पिता के पास जाउँगा और उन से कहूँगा, “पिता! मैंने स्वर्ग के विरुद्ध और आपके प्रति पाप किया है”।

सुसमाचार

ईश्वर दयालु है। जब हम पाप के कारण उस से दूर भटकते हैं, तो वह उड़ाऊ लड़के के पिता की तरह हमारे लौटने की राह देखता है। हमारा हदय परिवर्तन उसके लिए आनन्द का अवसर बन जाता है।

लूकस के अनुसार पवित्र सुसमाचार 15:1-3,11-32

“तुम्हारा यह भाई मर गया था और फिर जी गया है।”

येसु का उपदेश सुनने के लिए नाकेदार और पापी उनके पास आया करते थे। फरीसी और शास्त्री यह कह कर भुनभुनाते थे, “यह मनुष्य पापियों का स्वागत करता है और उनके साथ खाता-पीता है”। इस पर येसु ने उन को यह दृष्टान्त सुनाया, “किसी मनुष्य के दो पुत्र थे। छोटे ने अपने पिता से कहा, 'पिता जी! सम्पत्ति का जो भाग मेरा है, मुझे दे दीजिए'। और पिता ने उन में अपनी सम्पत्ति बाँट दी। थोड़े ही दिनों बाद छोटा बेटा समस्त सम्पत्ति एकत्र कर किसी दूर देश चला गया और वहाँ उसने भोग-विलास में अपनी सम्पत्ति उड़ा दी। जब वह सब कुछ खर्च कर चुका, तो उस देश में भारी अकाल पड़ा और उसकी हालत तंग हो गयी। इसलिए वह उस देश के एक निवासी का नौकर बन गया। जिसने उसे अपने खेतों में सूअर चराने भेजा। जो फलियाँ सूअर खाते थे, उन्हीं से वह अपना पेट भरना चाहता था; पर कोई भी उसे उन में से कुछ नहीं देता था। तब वह होश में आया और यह सोचने लगा - मेरे पिता के घर कितने ही मजदूरों को जरूरत से ज्यादा रोटी मिलती है और मैं यहाँ भूखों मर रहा हूँ। मैं उठ कर अपने पिता के पास जाउँगा और उन से कहूँगा, 'पिता जी! मैंने स्वर्ग के विरुद्ध और आपके प्रति पाप किया है। मैं आपका पुत्र कहलाने योग्य नहीं रहा। मुझे अपने मजदूरों में से एक जैसा रख लीजिए!। तब वह उठ कर अपने पिता के घर की ओर चल पड़ा। वह दूर ही था कि उसके पिता ने उसे देख लिया और दया से द्रवित हो उठा। उसने दौड़ कर उसे गले लगा लिया और उसका चुम्बन किया। तब पुत्र ने उस से कहा, 'पिता जी! मैंने स्वर्ग के विरुद्ध और आपके प्रति पाप किया है। मैं आपका पुत्र कहलाने योग्य नहीं रहा'। परन्तु पिता ने अपने नौकरों से कहा, “जल्दी अच्छे से अच्छे कपड़े ला कर इसे पहनाओं और इसकी उँगली में अँगूठी और इसके पैरों में जूते पहनाओ। मोटा बछड़ा भी ला कर मारो। हम खायें और आनन्द मनायें; क्योंकि मेरा यह बेटा मर गया था और फिर जी गया है, यह खो गया था और फिर मिल गया है”। और वे आनन्द मनाने लगे। “उसका जेठा लड़का खेत में था। जब वह लौट कर घर के निकट पहुँचा, तो उसे गाने-बजाने और नाचने की आवाज सुनाई पड़ी। उसने एक नौकर को बुलाया और इसके विषय में पूछा। इसने कहा, “आपका भाई आया है और आपके पिता ने मोटा बछड़ा मारा है, क्योंकि उन्होंने उसे भला-चंगा वापस पाया है”। इस पर वह कुद्ध हो गया और उसने घर के अन्दर जाना नहीं चाहा। तब उसका पिता बाहर आया और उसे मनाने लगा। पर उसने अपने पिता को उत्तर दिया, 'देखिए, मैं इतने बरसों से आपकी सेवा करता आया हूँ। मैंने कभी आपकी आज्ञा का उल्लंघन नहीं किया। फिर भी आपने कभी मुझे बकरी का बच्चा तक नहीं दिया ताकि मैं अपने मित्रों के साथ आनन्द मनाउँ। पर जैसे ही आपका यह बेटा आया, जिसने वेश्याओं के पीछे आपकी सम्पत्ति उड़ा दी है, आपने इसके लिए मोटा बछड़ा मार डाला है'। इस पर पिता ने उस से कहा, “बेटा, तुम तो सदा मेरे साथ रहते हो और जो कुछ मेरा है, वह तुम्हारा है। परन्तु आनन्द मनाना और उल्लसित होना उचित ही था; क्योंकि तुम्हारा यह भाई मर गया था और फिर जी गया है, यह खो गया था और फिर मिल गया है'।”

प्रभु का सुसमाचार।

📚 मनन-चिंतन

मनुष्य का जीवन खोजने और खोने की निरंतर प्रक्रिया है। जीवन के विभिन्न चरणों में, जब हम भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में चुनौतियों का सामना करते हैं, तो कभी-कभी हम अपने अस्तित्व का एक भाग खो देते हैं, क्योंकि हम असफल हो जाते हैं। लेकिन जब हम अपनी असफलता से उठते हैं, तो हम स्वयं को पुनः पा लेते हैं। इस यात्रा में हमारा गिरना और उठना मुख्य रूप से हमारी आत्म-जागरूकता और अपनी स्थिति को स्वीकार करने की क्षमता पर निर्भर करता है। हमारी पुनः स्थापना इस बात पर निर्भर करती है कि क्या हम अपनी स्थिति से बाहर निकलने के लिए प्रयास और इच्छाशक्ति रखते हैं। आज के सुसमाचार में हम देखते हैं कि उड़ाऊ पुत्र अपने पिता की पूरी संपत्ति सांसारिक भोग-विलास में खर्च कर देता है और अत्यंत दयनीय स्थिति में पहुँच जाता है। यदि उसने अपने पापों को नहीं पहचाना होता और यह स्वीकार नहीं किया होता कि उसके पिता का प्रेम उसकी गलतियों से कहीं अधिक महान है, तो वह कभी लौटकर नहीं आता। एक बार जब उसने अपनी असफलता को स्वीकार कर लिया, तो वह फिर से उठ सका। इसलिए हमें भी चाहिए कि हम अपनी असफलताओं को स्वीकार करें, बजाय इसके कि हम उन कारणों पर विलाप करें जिन्होंने हमें रुलाया। हमें ईश्वर के प्रेम पर पूर्ण विश्वास रखते हुए पुनः उठने का प्रयास करना चाहिए, क्योंकि ईश्वर का प्रेम हमारी किसी भी गलती से बड़ा है।

- ब्रदर सुमन खलखो (भोपाल महाधर्मप्रान्त)


📚 REFLECTION

Human life is a continuous process of finding and losing part of oneself. At various junctures of life when we face different challenges in different situations, we get to lose a part of ourselves as we fail and later in life we get up from the failure to find it. In such a journey our failing and rising depends a lot on our awareness and acceptance of our condition. The rising and getting back original state relies a lot on one’s initiative and desire to get back. In today’s gospel, we see the poor condition of the prodigal son who spent all of his Father’s money on worldly things. He would not have returned if he had not realized his mistakes and accepted that his father’s love was greater than his mistakes. Once he accepted his failure, he was able to rise again. Therefore, we shall try to accept our failure instead of crying the causes that made us cry and try to rise again by keeping up trust in the love of God.

-Bro. Suman Khalkho (Archdiocese of Bhopal)

मनन-चिंतन

आज हमें उड़ाऊ पुत्र के दृष्टान्त पर चिंतन करने का आह्वान किया गया है। प्रभु येसु ने यह दृष्टान्त दो प्रकार के लोगों के सामने सुनाया था। एक तरफ नाकेदार और पापी हैं जिन्होंने अपने पिछले जीवन में की गई बुराईयों के लिए खेद महसूस किया और पश्चाताप के साथ प्रभु की ओर अभिमुख होते हैं। दूसरी ओर शास्त्री और फरीसी हैं जो न केवल खुद को धर्मी मानते थे, बल्कि दूसरों में दोष ही दोष ही पाते थे। यह आत्म-धार्मिक रवैया अपने आप में बुरा था। उड़ाऊ पुत्र और उसका बड़ा भाई लोगों के इन दो समूहों का प्रतिनिधित्व करते हैं। उड़ाऊ पुत्र, यद्यपि वह पिता के घर से बहुत दूर चला गया और कुछ समय के लिए पाप में भटकता रहा, उसे पिता की कृपा और दयालु प्रेम का एहसास होता है और वह पिता के घर वापस आ जाता है। बड़ा भाई यद्यपि शारीरिक रूप से पिता के घर के क्षेत्र में रह रहा था, वह मानसिक रूप से पिता से बहुत दूर था। ख्रीस्तीय विश्वासियों की बुलाहट केवल हानिरहित बनने की ही नहीं, बल्कि अपने स्वर्गीय पिता के प्रेम का आनंद लेने और उस प्रेम को दूसरों के साथ साझा करने की भी है। एक सच्चा पवित्र व्यक्ति दूसरों में दोष खोजने के बजाय स्वयं के दोषों को खोजता है और उन्हें सुधारता है। एक सच्चा पवित्र व्यक्ति, निराशावादी और उदास होने से दूर, प्रेम, आनंद और शांति फैलाता है।

- - फादर फ्रांसिस स्करिया


REFLECTION

Today we are called upon to reflect over the parable of the prodigal son. Jesus told this parable before two types of people. On the one side we have the tax collectors and sinners who felt sorry about the evil they committed in their past life and turned to God with repentance. On the other hand we have the scribes and Pharisees who not only considered themselves as righteous, but also found fault with others. This self-righteous attitude itself was evil. The prodigal son and his elder brother represent these two groups of people. The prodigal son, although he went far away from the father’s house and wandered about in sin for some time, he comes to realize the father’s graciousness and merciful love and is drawn back to the father’s house. The heart of the elder brother, although he was staying geographically within the area of the house of the father, was far away from the father. As Christians we are called not only to be harmless people, but also to relish the love of our heavenly father and share that love with others with ever-grateful hearts. A truly holy person would find one’s own faults and correct them instead of finding fault with others. A truly holy person, far from being pessimistic and melancholic, radiates love, joy and peace.

- Fr. Francis Scaria

मनन-चिंतन - 2

उडाऊँ पुत्र का दृष्टांत पुत्र की दुष्टता से अधिक पिता की सहद्यता एवं दयालुता पर केंद्रित दृष्टांत हैं। पुत्र का अपने पिता से संपत्ति का हिस्सा मांगना न सिर्फ परंपरा के प्रतिकूल था बल्कि एक प्रकार की उद्दण्डता भी थी। किन्तु पिता पुत्र की अयोग्यता को जानते हुये भी उसे सम्पति का हिस्सा दे देता है। पुत्र जल्द ही अपनी सम्पत्ति का हिस्सा भोग-विलास में उडा देता है तथा अत्यंत दयनीय तथा दरिद्रता का जीवन जीने लगता है। उसे पराये देश में सेवक की नौकरी करनी पडती हैं। वहॉ उसे सूअरों की देखभाल करने का कार्य दिया जाता है। उस देश में अकाल पडा था इसलिये वह सूअर का खाना खाकर “अपना पेट भरना चाहता था, लेकिन कोई उसे उन में से कुछ नहीं देता था” (लूकस 15:16)। तब जाकर वह सोचता है कि उसके पिता के सेवकों के साथ कितना अच्छा व्यवहार किया जाता है। अतः वह सेवक के रूप में ही पिता के घर लौटना चाहता है। हैरानी की बात है कि वह अपने पिता को उसका इंतजार करते हुये पाता है। पिता बिना किसी हिचकिचाहट से उसका स्वागत करता है तथा उसे पुत्र का दर्जा पुनः प्रदान करता है। पिता और पुत्र का व्यवहार निम्नलिखित बातें प्रदर्शित करता है।

1. उडाऊँ पुत्र का रवैया हमे सिखलाता है कि जब हम अपनी स्वतंत्रता का दुरूपयोग करते हैं तो पाप करते हैं तथा इस परिणामस्वरूप सदैव कष्ट उठाते हैं। संत पौलुस कहते हैं, “पाप का वेतन मृत्यु है” (रोमियों 6:23)। आदम और हेवा को ईश्वर ने सबकुछ के साथ उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता भी प्रदान की थी। किन्तु जब उन्होंने अपनी स्वतंत्रता का मनमाना इस्तेमाल किया तो उन्होंने पाप किया तथा वे ईश्वर से दूर हो गये। धर्मग्रंथ हमें इस विषय में चेतावनी देता है, “भाइयो! आप जानते हैं कि आप लोग स्वतंत्र होने के लिए बुलाये गये हैं। आप सावधान रहें, नहीं तो यह स्वतन्त्रता भोग-विलास का कारण बन जायेगी।” (गलातियों 5:13) तथा “आप लोग स्वतन्त्र व्यक्तियों की तरह आचरण करें, किन्तु स्वतन्त्रता की आड् में बुराई न करें।” (1 पेत्रुस 2:16) उडाऊँ पुत्र के पिता ने जो स्वतंत्रता उसे प्रदान की थी उसका दुरूपयोग कर वह पिता से सम्पत्ति का बंटवारा करने को कहता है।

2. पुत्र का व्यवहार बताता है कि जब उसने अपनी स्वतंत्रता का दुरूपयोग किया तो वह प्रारंभिक दौर में तो भोग-विलास का आनन्द उठाता है किन्तु बाद में उसे घोर यंत्रणा उठानी पडती हैं। ईश्वर से दूर जाकर, उनकी आज्ञाओं का उल्लंघन कर शुरूआत में तो हमें स्वतंत्रता का अहसास होता है किन्तु जल्द ही हम अनेक बातों, वस्तुओं, परिस्थितियों या व्यक्तियों के गुलाम बन जाते हैं जो हमारे तिरसकार एवं पतन का कारण बन जाता है।

3. पुत्र अपना सबकुछ लुटाने के बाद भी अपने पिता के घर लौटने में देर करता है। पहले उसे किसी बैगाने देश में सेवक बनना पडता है। फिर उसे सूअरों की देखभाल करने का कार्य दिया जाता है। इसके बाद भी उसे पिता के घर लौटने की याद नहीं आती। फिर उसे सूअरों का खाना खाकर अपना जीवन गुजारना पडता है। इतनी दयनीय स्थिति से गुजरने के बाद वह अपने पिता के घर लौटने की सोचता है। एक पापी के रूप में जब हम ईश्वर से दूर हो जाते हैं तो हमारा जीवन भी विभिन्न दुखमयी परिस्थितियों से गुजरता है। हम सांसारिक ’जुगाड’ लगाकर टाल मटोल का रवैया अपनाते हैं। ईश्वर की ओर लौटने के बजाय जब तक हम मजबूर नहीं होते या टूट नहीं जाते हैं तब तक शायद हम ईश्वर की ओर न लौटे। उडाऊँ पुत्र का व्यवहार हमें शिक्षा देता है कि जब हम जीवन में ईश्वर से दूर हो जायें तो यह कहने में “मैं उठकर अपने पिता के पास जाऊँगा...” देर न करें।

4. उडाऊँ पुत्र का अपने जीवन को सही मार्ग पर लाने का एकमात्र रास्ता पश्चातापी हृदय से अपने पिता के घर लौटने का था। इस बात को समझने में उसे बहुत कष्ट उठाना पडता है तथा समय लगता है। यदि हम ईश्वर से दूर है तो हमें भी पश्चाताप कर ईश्वर की ओर लौटना चाहिये क्योंकि बचने का यही एकमात्र उपाय है।

5. पिता का व्यवहार ईश्वर का मानव के प्रति दृष्टिकोण को प्रदर्शित करता है। जब पुत्र ने पिता से अलग हो जाना चाहा तो पिता ने यह जानते हुये भी कि पुत्र की मांग मर्यादा के अनुरूप नहीं है उसकी स्वतंत्रता के अनुसार निर्णय करने देता है।

6. जब पुत्र लौटता है तब वह पिता को उसका इंतजार करते हुये पाता है। पिता का उसे इस प्रकार दूर से ही देख लेना एक संयोग मात्र नहीं था बल्कि पिता रोजाना ही अपने पुत्र की राह देखता रहता था। ईश्वर भी हमारे लौटने के प्रति आशावादी है तथा हमारे सही मार्ग पर लौटने की प्रतीक्षा करते हैं।

7. पिता अपने पुत्र का बिना शर्त स्वागत करता है। वह उसे न तो डांटता है और न ही उसमें ग्लानि का भाव उत्पन्न कराने के लिए कुछ कहता है। बल्कि वह उसे पुत्र के रूप में स्वीकार कर उसका स्वागत करता है। वह उसे पुत्र के वस्त्र एवं अॅगूठी पुनः प्रदान कर उसे पहली जैसी गरिमा प्रदान करता है।

8. जब बडा लडका पिता के इस व्यवहार पर कडी आपत्ति उठाता है तथा घर में आने से इंकार कर देता है तो पिता अपनी उदारता न्यायोचित बताता है। वह बडे बेटे को मनाने के लिए बहाना नहीं बनाता बल्कि प्रदर्शित करता है कि पिता की उदारता पश्चातापी पुत्र के लिए सदैव बनी रहती है।

- -फादर रोनाल्ड मेलकम वॉन