
प्रभु यह कहता है, “मैं तुम्हारी कब्रों को खोल दूँगा। हे मेरी प्रजा! मैं तुम लोगों को कब्रों से निकाल कर इस्राएल की धरती पर वापस ले जाऊँगा। हे मेरी प्रजा! जब मैं तुम्हारी कब्रों को खोल कर तुम लोगों को उन में से निकालूँगा, तो तुम जान जाओगे कि मैं ही प्रभु हूँ। मैं तुम्हें अपना आत्मा प्रदान करूँगा और तुम में जीवन आ जायेगा। मैं तुम्हें तुम्हारी अपनी धरती पर बसाऊँगा और तुम लोग जान जाओगे कि मैंने, जो प्रभु हूँ, यह कहा और पूरा भी किया है। यह प्रभु का कहना है”।
प्रभु की वाणी।
अनुवाक्य : दयासागर प्रभु उदारतापूर्वक मुक्ति प्रदान करता है।
हे प्रभु! मैं गहरे गर्त में से तेरी दुहाई देता हूँ। हे प्रभु! तू मेरी पुकार सुन और मेरी विनती पर ध्यान देने की कृपा कर।
हे प्रभु! यदि तू हमारे अपराधों को याद रखेगा, तो कौन टिक सकेगा? तुझ से पापों की क्षमा मिलती ही है, इसलिए लोग तुझ पर श्रद्धा रखते हैं।
प्रभु ही मेरा आसरा है। मेरी आत्मां उसकी प्रतिज्ञा पर भरोसा रखती है। भोर की प्रतीक्षा करने वाले पहरेदारों से भी अधिक मेरी आत्मा प्रभु की राह देखती है। भोर की प्रतीक्षा करने वाले पहरेदारों से भी अधिक इस्राएल प्रभु की राह देखता रहे।
क्योंकि दयासागर प्रभु उदारतापूर्वक मुक्ति प्रदान करता है। वह इस्राएल को सब अपराधों से मुक्त करेगा।
जो लोग शरीर की वासनाओं से संचालित हैं, उन पर ईश्वर प्रसन्न नहीं होता। यदि ईश्वर का आत्मा सचमुच आप लोगों में निवास करता है, तो आप शरीर की वासनाओं से नहीं, बल्कि आत्मा से संचालित हैं। जिस मनुष्य में मसीह का आत्मा निवास नहीं करता, वह मसीह का नहीं। यदि मसीह आप में निवास करते हैं, तो पाप के फलस्वरूप शरीर भले ही मर जाये, किन्तु पाप-मुक्ति के फलस्वरूप आत्मा को जीवन प्राप्त है। जिसने येसु को मृतकों में से जिलाया, यदि उसका आत्मा आप लोगों में निवास करता है, तो जिसने येसु मसीह को मृतकों में से जिलाया है, वह अपने आत्मा द्वारा, जो आप में निवास करता हैं, आपके नश्वर शरीरों को भी जीवन प्रदान करेगा।
प्रभु की वाणी।
प्रभु कहते हैं - पुनरुत्थान और जीवन मैं हूँ। जो मुझ में विश्वास करता है, वह कभी नहीं मरेगा।
[बेथानिया का रहने वाला लाजरुस नामक व्यक्ति बीमार पड़ गया। बेथानिया मरियम और उसकी बहन मरथा का गाँव था। यह वहीं मरियम थी, जिसने इत्र से प्रभु का लेपन किया और अपने केशों से उनके चरण पोंछे । उसी का भाई लाजरुस बीमार था।]
मरथा और मरियम ने येसु को कहला भेजा, “प्रभु! देखिए, जिसे आप प्यार करते हैं, वह बीमार है”। येसु ने यह सुन कर कहा, “यह बीमारी मृत्यु के लिए नहीं, बल्कि ईश्वर की महिमा के लिए आयी है। इसके द्वारा ईश्वर का पुत्र महिमान्वित हो जायेगा”। येसु मरथा को, उसकी बहन मरियम और लाजरुस को प्यार करते थे। यह सुन कर कि लाजरुस बीमार है, वह जहाँ थे, वहाँ दो दिन और रह गये; किन्तु इसके बाद उन्होंने अपने शिष्यों से कहा, “आओ!. हम फिर यहूदिया चलें'।
[शिष्य बोले, “गुरुवर! कुछ ही दिन पहने तो यहूदी लोग आप को पत्थरों से मार डालना चाहते थे और आप फिर वहीं जा रहे हैं?” येसु ने उत्तर दिया, “क्या दिन के बारह घंटे नहीं होते? जो दिन में चलता है, वह ठोकर नहीं खाता, क्योंकि वह इस दुनिया का प्रकाश देखता है। परन्तु जो रात में चलतां है, वह ठोकर खाता है, क्योंकि उसे प्रकाश नहीं मिलता”। इतना कहने के बाद वह फिर उनसे बोले, “हमारा मित्र लाजरुस सो रहा है। मैं उसे जगाने जा रहा हूँ।” शिष्यों ने कहा, “प्रभु! यदि वह सो रहा है, तो अच्छा हो जायेगा”। येसु ने यह उसकी मृत्यु के विषय में कहा था, लेकिन उनके शिष्य यह समझे कि वह नींद के विश्राम के विषय में कह रहे हैं। इसलिए येसु ने उन से स्पष्ट शब्दों में कहा, “लाजरुस मर गया है। मैं तुम्हारे कारण प्रसन्न हूँ कि मैं वहाँ नहीं था, जिससे तुम लोग विश्वास कर सको। आओ, हम उसके पास चलें”। इस पर थोमस ने, जो यमल कहलाता था, अपने सह-शिष्यों से कहा, “हम भी चलें और इनके साथ ही मर जायें”।]
वहाँ पहुँचने पर येसु को पता चला कि लाजरुस चार दिनों से कब्र में है।
[बेथामिया येरुसालेम से दो मील से भी कम दूर था, इसलिए भाई की मृत्यु पर संवेदना प्रकट करने के लिए बहुत-से यहूदी मरथा और मरियम से मिलने आये थे।]
ज्यों ही मरथा ने यह सुना कि येसु आ रहे हैं, वह उन से मिलने गयी। मरियम घर में ही बैठी रही। मरथा ने येसु से कहा, “प्रभु! यदि आप यहाँ होते, तो मेरा भाई नहीं मरता; और मैं जानती हूँ कि अब भी आप ईश्वर से जो कुछ माँगेंगे, ईश्वर आप को वही प्रदान करेगा”। येसु ने उस से कहा, “तुम्हारा भाई जी उठेगा”। मरथा ने उत्तर दिया, "मैं जानती हूँ कि अंतिम दिन के पुनरुत्थान में जी उठेगा”। येसु ने कहा, “पुनरुत्थान और जीवन मैं हूँ। जो मुझ में विश्वास करता है, वह मरने पर भी जीवित रहेगा और जो कोई मुझमें विश्वास करते हुए जीता है, वह कभी नहीं मरेगा। क्या तुम इस बात पर विश्वास करती हो?” उसने उत्तर दिया, “हाँ, प्रभु! मैं दुढ़ विश्वास करती हूँ कि आप वह मसीह, ईश्वर के पुत्र हैं, जो संसार में आने वाले थे”।
[वह यह कह कर चली गयी, और अपनी बहन मरियम को बुला कर उसने चुपके से उस से कहा, “गुरुवर आ गये हैं; तुम को बुलाते हैं”। वह यह सुनते ही उठ खड़ी हुई और येसु से मिलने गयी। येसु अब तक गाँव में नहीं पहुँचे थे। वह उसी स्थान पर थे, जहाँ मरथा उन से मिली थी। जो यहूदी लोग संवेदना प्रकट करने के लिए मरियम के साथ घर में थे, वे यह देख कर कि वह अचानक उठ कर बाहर चली गयी, उसके पीछे हो लिये; क्योंकि वे समझते थे वह कब्र पर रोने जा रही है। मरियम उस जगह पहुँची, जहाँ येसु थे। उन्हें देखते ही वह उनके चरणों पर गिर पड़ी और बोली, “प्रभु! यदि आप यहाँ होते, तो मेरा भाई नहीं मरता”। उसे और उसके साथ आये हुए यहूदियों को रोते देख कर,]
येसु बहुत ही व्याकुल हो उठे और आह भर कर बोले, “तुम लोगों ने उसे कहाँ रखा है?” उन्होंने कहा, “प्रभु! आइए और देखिए”। येसु रो पड़े। इस पर यहूदियों ने कहा, “देखो! यह उसे कितना प्यार करते थे”; किन्तु कुछ लोगों ने कहा, “उन्होंने तो अंधों को आँखें दी हैं। क्या यह उस को मृत्यु से नहीं बचा सकते थे?” कब्र के पास पहुँच कर येसु फिर बहुत व्याकुल हो उठे। वह कब्र एक गुफा थी, जिसके मुँह पर एक बड़ा पत्थर रखा हुआ था। येसु ने कहा, “पत्थर हटा दो”। मृतक की बहन मरथा ने उन से कहा, “प्रभु! अब तो दुर्गन्ध आती होगी। आज चौथा दिन है”। येसु ने उसे उत्तर दिया, “क्या मैंने तुमसे नहीं कहा कि यदि तुम विश्वास करोगी, तो ईश्वर की महिमा देखोगी?” इस पर लोगों ने पत्थर हटा दिया। येसु ने आँखें ऊपर उठा कर कहा, “हे पिता! मैं तुझे धन्यवाद देता हूँ; तूने मेरी सुन ली है। मैं तो जानता ही था कि तू सदा मेरी सुनता है। मैंने आसपास खड़े लोगों के कारण ही ऐसा कहा, जिससे वे विश्वास करें कि तूने मुझे भेजा है”। इतना कहने के बाद येसु ने ऊँचे स्वर से पुकारा, “लाजरुस! बाहर निकल आओ! मृतक बाहर निकला। उसके हाथ और पैर पट्टीयों से बँधे हुए थे और उसके मुँह पर अँगोछा लपेटा हुआ था। येसु ने लोगों से कहा, “इसके बंधन खोल दो और इसे चलने-फिरने दो”। जो यहूदी मरियम से मिलने आये थे और जिन्होंने येसु का यह चमत्कार देखा, उन में से बहुतों ने उन पर विश्वास किया।
प्रभु का सुसमाचार।
ईसा ने कहा, पुनरुत्थान और जीवन मैं हूँ।
येसु ने लाजरूस को मृतकों में से जीवित किया, मृत्यु पर अपनी शक्ति दिखाते हुए और खुद को अनन्त जीवन के स्रोत के रूप में प्रकट करते हुए। येसु ने मरियम और मारथा से उनके दुःख में मुलाकात की, इस चमत्कार को करने से पहले उनके दुःख को साझा किया। उनकी करुणा और शक्ति सबसे अंधकारमय क्षणों में भी आशा देती है। यह अंश हमें याद दिलाता है कि चाहे कोई भी स्थिति कितनी भी निराशाजनक क्यों न लगे, येसु नया जीवन और आशा लेकर आते हैं। क्या आपके जीवन में या आपके प्रियजनों के जीवन में ऐसे क्षेत्र हैं जो मृत या निराशाजनक महसूस करते हैं? नए जीवन के येसु के वादे पर भरोसा करें। अपनी चिंताओं और दुःख को उसके पास ले जाएँ, और उसके पुनर्स्थापना के लिए खुले रहें।
प्रभु येसु, आप पुनरुत्थान और जीवन हैं। निराशा के समय में आप पर भरोसा करने में मेरी मदद करें। मुझे नया जीवन लाने की आपकी शक्ति पर विश्वास करने की आशा और विश्वास दें। आमेन।
✍ - फादर अल्फ्रेड डिसूजा (भोपाल महाधर्मप्रांत)
"I am the resurrection and the life. Whoever believes in me, though he die, yet shall he live." (John 11:25)
Jesus raises Lazarus from the dead, showing His power over death and revealing Himself as the source of eternal life. Jesus meets Mary and Martha in their grief, sharing in their sorrow before performing this miracle. His compassion and power give hope even in the darkest moments. This passage reminds us that no matter how hopeless a situation seems, Jesus brings new life and hope. Are there areas in your life or the lives of those you love that feel “dead” or hopeless? Trust in Jesus’ promise of new life. Bring your worries and grief to Him, and be open to His healing and restoration.
Lord Jesus, You are the resurrection and the life. Help me to trust You in times of loss and despair. Give me hope and faith to believe in Your power to bring new life. Amen.
✍ -Fr. Alfred D’Souza (Archdiocese of Bhopal)
हम अपनी कमजोरी एवं पाप के कारण न केवल शारीरिक रूप से बल्कि आध्यात्मिक रूप से भी मर जाते हैं। मृत्यु और जीवन प्रकृति के नियम हैं, हकीकत हैं। अगर हमने जन्म लिया हैं तो मरना भी निश्चित हैं। हम भले ही शारीरिक रूप से मर जाये पर हम आत्मिक रूप से जीवित रहेंगे। हमारे पाप हमें आत्मिक रूप से भी मार सकते हैं।
नबी एजेकिएल कहते हैं, “मैं तुम्हारी कब्रों का खोल दूँगा”। यानी प्रभु हमारे अनंत जीवन का मार्ग का द्वार खोल देगा। वह हमें अपना आत्मा प्रदान करेगा जो हमें अनंत जीवन देगा। संत पौलूस कहते हैं, “यदि मसीह आप में निवास करे, तो पाप के फल स्वरूप शरीर भले ही मर जाये किन्तु पाप-मुक्ति के फलस्वरूप आत्मा को जीवन प्राप्त है।
प्रभु येसु पुनरूथान और जीवन हैं; जो उसमे विश्वास करता है, वह कभी नहीं मरेगा। लाजरूस के मरे कब्र में चार दिन हो गये थे। शरीर गल रहा होगा और बदबू भी आ रही होगी। प्रभु येसु पर मारथा और मरियम को पूरा विश्वास था कि प्रभु येसु मृतकों को भी जिंदा कर सकते हैं। प्रभु ने लाजरूस को कब्र से बाहर बुलाया। बहुतों ने इस घटना को देख प्रभु पर विश्वास किया। हमारी समस्या कितनी भी गंभीर क्यों न हो, प्रभु येसु हमें उसका समाधान दे सकते हैं। क्या मैं इस पर विश्वास कर सकता हूँ?
✍ - फादर साइमन मोहता (इंदौर धर्मप्रांत)
We die not only physically but also spiritually because of our weakness and sin. Death and life are laws of nature, they are realities. If we have taken birth then it is also certain that we shall die. We may die physically but we will live spiritually. Our sins can kill us also spiritually.<\p>
The prophet Ezekiel says, "I will open your tombs". That is, the Lord will open the door to the way of our eternal life. He will give us his Spirit who will give us eternal life. Saint Paul says, “If Christ lives in you, the body may die as a result of sin, but the soul has life as a result of redemption.”<\p>
The Lord Jesus is the resurrection and the life; He who believes in him will never die. Lazarus had been dead in the tomb for four days. The body must have been rotting and the stinking. Martha and Mary had full faith in Lord Jesus that he can revive even the dead. The Lord called Lazarus out of the tomb. Many believed in the Lord after seeing this incident. No matter how serious our problem is, Lord Jesus can give us the solution. Can I believe this?
✍ -Fr. Simon Mohta (Indore Diocese)
कलीसिया चाहती है कि आज हम लाज़रुस के जीवन-दान पर मनन्-चिंतन करें। पवित्र वचन कहता है कि लाज़रुस के गंभीर रूप से बीमार होने के बारे में सुनने के दो दिन बाद ही येसु उससे मिलने के लिए निकलते हैं। दो बातें स्पष्ट हो जाती हैं। पहली, देरी का मतलब यह नहीं है कि प्रभु हमारा ख्याल नहीं करते हैं; इसके विपरीत वे एक बड़े चमत्कार की योजना बना रहे हैं। दूसरी, प्रभु ईश्वर के कार्य करने के अपने समय होते हैं। हमें उम्मीद के साथ उनका इंतजार करते रहना होगा।
लाज़रुस को एक बार फिर सांसारिक जीवन में वापस लाया गया। वह पुनरुत्थान नहीं थी बल्कि सांसारिक जीवन में वापस लौटना था। उसके सांसारिक जीवन का समय बढ़ाया गया। कुछ वर्षों के बाद लाज़रुस की फिर से मृत्यु हो गई। लेकिन येसु ने उस मौके का इस्तेमाल लोगों को मृतकों के पुनरुत्थान के बारे में सिखाने के लिए किया जब हम अनंत जीवन में प्रवेश करेंगे। 1कुरिन्थियों 15 में, संत पौलुस पुनरुत्थान के बाद के जीवन का वर्णन करते हैं। हमारी चिंता सांसारिक जीवन की आयु बढ़ाने की नहीं, बल्कि संतों और स्वर्गदूतों के साथ शाश्वत जीवन प्राप्त करने की होनी चाहिए। फिलिप्पियों 1: 21-24 में संत पौलुस कहते हैं, " मेरे लिए तो जीवन है-मसीह, और मृत्यु है उनकी पूर्ण प्राप्ति। किन्तु यदि मैं जीवित रहूँ, तो सफल परिश्रम कर सकता हूँ, इसलिए मैं नहीं समझ पाता कि क्या चुनूँ। मैं दोनों ओर खिंचा हुआ हूँ। मैं तो चल देना और मसीह के साथ रहना चाहता हूँ। यह निश्चय ही सर्वोत्तम है; किन्तु शरीर में मेरा विद्यमान रहना आप लोगों के लिए अधिक हितकर है।”
एक और संदेश हमें आज ग्रहण करना चाहिए कि प्रभु के लिए कोई स्थिति निराशाजनक नहीं है। लाज़रुस को दफनाने के चार दिन बाद जीवन में वापस लाया गया था। स्तोत्रकार कहता है, “मैं प्रभु की प्रतीक्षा करता रहा; उसने झुक कर मेरी पुकार सुनी। उसने मुझे विनाश के गर्त से, दलदल से कीच से निकाला। उसने मेरे पैर चट्टान पर टिकाकर मुझे दृढ़ कदमों से आगे बढ़ने दिया।“ (स्तोत्र 40:1-2)
आइए हम प्रभु में हमारी आशा की पुन: पुष्टि करें और हम में से प्रत्येक के लिए उनके पूर्वप्रबंध में आनन्दित हों।
✍ -फादर फ्रांसिस स्करिया
Today the Church wants us to reflect over the raising of Lazarus. The first point that strikes anyone is the delay in Jesus’ visit to the family he loved. Even after getting the news of the serious illness of Lazarus Jesus stayed on where he was for two more days. Two things become clear to us here. First, delay does not mean that God is not bothered; on the contrary He is planning a greater miracle. Second, God has His own time to intervene. We need to wait on him with undying hope.
Lazarus was brought back to earthly life once again. That was not resurrection but resuscitation. His earthly life was prolonged. After a few years Lazarus died again. But Jesus used that occasion to teach the people about the resurrection from the dead when we shall enter into eternal life. In 1Cor 15, St. Paul describes life after resurrection. Our concern should not be to prolong the earthly life, but to attain the eternal life with the saints and the angels. In Phil 1:21-24 St. Paul says, “For to me, living is Christ and dying is gain. If I am to live in the flesh, that means fruitful labor for me; and I do not know which I prefer. I am hard pressed between the two: my desire is to depart and be with Christ, for that is far better; but to remain in the flesh is more necessary for you.”
Another message we should take home today is that there is no hopeless situation for God. Lazarus was brought back to life four days after his burial. The Psalmist says, “I waited patiently for the Lord; he inclined to me and heard my cry. He drew me up from the desolate pit, out of the miry bog, and set my feet upon a rock, making my steps secure.” (Ps 40:1-2).
Let us reaffirm our hope in the Lord and rejoice in his concern for each one of us.
✍ -Fr. Francis Scaria
यूगोस्लाविया की एक शहर साराजेवो को नरक की राजधानी नाम दिया गया था। इसलिए कि यहॉं 1992 ई. में सेनाओं द्वारा हर दिन हिंसात्मक अक्रमण होता रहा और शहर के केन्द्र में ही हर दिन हत्याकाण्ड हो रहा था। पौल सुलीवियन, ग्रामी अवार्ड जीतने वाले अमेरिका के पियानो बजाने वाले व संगीत रचने वाले रीडरस डाइज़ेस्ट के एक लेख में अपनी यह कहानी बताते हैं।
27 मई 1992 को साराजेवो में कुछ ही बेकरी भूख से मरते व युद्ध के शिकार हुए लोगों के लिए पावरोटी वितरण कर रही थी। करीब शाम चार बजे गलियों में लोगों की लम्बी कतारें लगी थी। अचानक तोप से एक भारी गोला सीधे उन्हीं पर जा गिरी। 22 लोग मारे गये। चारो तरफ मांस, हड्डी, खून व मलबा फैल गयी। कुछ ही दूरी में एक 35 वर्ष वेदरान स्माइलोविक नाम का एक संगीतज्ञ रहता था। युद्ध के पूर्व वह सुप्रसिद्ध साराज़ेवो संगीत में उसका वायलिनवादक के रूप में पेशा था। इस पर वह पुनः वापस आना चाह रहा था। परन्तु जब उसने अपनी खिड़की के बाहर झांका तो देखा कि हत्याकाण्ड हो रहा है। यह सब उसके सहन-शक्ति के बाहर था। उसे रहा नहीं गया। दुखित होकर उसने कुछ ऐसा करने का संकल्प लिया जिसे वह अच्छी तरह से कर सकता था। उसने एक ऐसा संगीत रचा, लोक-संगीत, साहसिक संगीत, युद्ध मैदान में संगीत।आस-पास की अंधकार से अपने जीवन की उजाला को धोमिल मत होने दो।
घमासान युद्ध चल रही मैदान के बगल जहॉं तोप से चली भारी गोला से 22 लोगों की मृत्यु हो गई थी और उस जगह में बड़ा गड्ढा बन गया था स्माइलोविक उस गड्ढे के बगल में प्लाटिक कुर्सी में बैठ जाता और अगले 22 दिन तक उस संगीत को बजाता रहा। वह मृत अलबिनोनि के यादगार में यह बजाता रहा। यह बहुत ही शोकपूर्ण संगीत था।
वह इस संगीत को क्षतिग्रस्त हुए मकानों, गलियों में बजाता रहा। जहॉं लोग गोलाबारी के खौफ से छुपे हुए थे। उसके इर्द-गिर्द गोलाबारी हो रही थी। उसने मानवीय मान-मर्यादा के लिए, युद्ध में हारे हुए लोगों के, मानव सभ्यता के लिए, मानवीय दया एवं शान्ति और सान्त्वना के लिए, लोगों में आशा व उम्मीद जगाने के लिए, लोगों में यह विश्वास जगाने कि लिए कि अब भी उनका जीवन बाकी है, यह साहसिक कार्य किया।
आज के प्रथम पाठ व सुसमाचार में हम इसी तरह की स्थिति पाते हैं। अत्यधिक निराशाजनक स्थिति में भी आशा रखना, जहॉं उम्मीद करने की कोई गुनजाइस न हो वहाँ भी उम्मीद रखना, नमुमकिनता एवं असंभावता में विश्वास करना।
आज के प्रथम पाठ में नबी एज़ेकिएल इस्राएलियों को ऐसी ही निराशमय, उदासीन एवं मायुसी हालत में आशा एवं उम्मीद देते हैं। इस्राएली जनता की निर्वासित हुए लगभग पचास वर्ष पूरे हो चुके हैं। इन पचास वर्षों की दास्ता में अपने घर, अपना देश वापस होने की उम्मीद नहीं रह गई है। अब तो उन्हें अपने पहचान व अस्तित्व में भी संदेह हो रहा है। वे अपना घर जमीन-जदान, मंदिर सब कुछ खो दिये हैं। अपना घर व अपना देश वापस आना उनके लिए एक तरह से आशा के पार आशा के भॉंति है। उम्मीद के विरूद्ध उम्मीद रखने के भॉंति है। ऐसे परिवेश में नबी एजे़किएल उन्हें आश्वासन देते हैं कि ईश्वर ने उन्हें नहीं त्यागा है। अतः ईश्वर उन्हें उनकी दास्ता से मुक्त कर उन्हें अपनी धरती पर बसायेगा। वे अपने घर व देश वापस आयेंगे। उन्हें उनका मंदिर प्राप्त होगा। वे पूर्ण अजादी में जियेगें। नबी एजे़किएल सूखी हड्डी की जिक्र करते हैं। सूखी हड्डियों में मांस रक्त भरने की बात कहते हैं। उनमें फिर से प्राण आने की बात कहते हैं। इस्राएलियों की घर-वापसी, अपनी धरती पर पुनः बसना एवं मंदिर का निर्माण करना, यह सब उनके लिए एक तरह से नवजीवन के भॉंति था। यह उनके लिए पुनरूत्थान के भॉंति था।
आज के सुसमाचार में हम सुनते हैं कि लाज़रूस गंभीर रूप से बिमार थे। सुसमाचार कहता है कि मरथा और मरियम ने यह खबर येसु तक पहुंचवाया था। लेकिन येसु यह जानते हुए कि लाज़रूस मरने पर हैं शीघ्रता से जाने के वजाय और दो दिन जहॉं थे वहीं रूक गये। फिर दो दिन पश्चात् वे अपने शिष्यों के साथ गये। पर अब काफी देर हो चुका था। लाज़रूस मर चुके थे। उसे कब्र में रख दिया गया था। अब तो लाज़रूस को कब्र में होने के चार दिन बीत गये थे। इसमें कोई संदेह नहीं कि लाज़रूस के मृत शरीर से बदबू आ रही थी होगी। मारथा का भी यही कहना था कि अब दुर्गन्ध आ रही होगी। लेकिन येसु विश्वास करने पर बल देते हैं। यहॉं ऐसी परिस्थिति है जहॉं किसी प्रकार की आशा या उम्मीद नहीं है। परिस्थिति ऐसी है कि येसु के वचनों में विश्वास कर पाना भी मुश्किल प्रतित होता है। लेकिन फिर भी येसु विश्वास करने की बात कहते हैं। उम्मीद के परे, आशा के विरूद्ध आशा करने की बात कहते हैं। यह नहीं कि येसु अब तक मृतकों को नहीं जिलाये हैं। उसने विधवा के बेटे को जिलाया है। फिर एक अधिकारी की बेटी को पुनजीवित किया है। लेकिन आज के सुसमाचार में लाज़रूस की मृत्यु के चार दिन गुज़र गये हैं। सबसे बड़ी आश्वासन वाली बात ये है कि येसु ही पुनरूत्थान और जीवन हैं। येसु ही जीवन और मृत्यु के स्वामी हैं। यदि कोई इस बात पर विश्वास करता है तो वह मरने पर भी जीवित रहेगा। येसु के आदेशों का पालण करना यह दर्शाता है कि लोगों ने येसु पर विश्वास किया। और इसलिए येसु जो भी कहते गये लोगों ने उसका पालण किया। परिणाम यह हुआ कि लाज़रूस को पुर्नजीवन मिल गया। लाज़रूस जिलाये गये।
येसु ने लाज़रूस के बीमार होने की बात को जानकर कहा था -‘‘यह बीमारी मृत्यु के लिए नहीं, बल्कि ईश्वर की महिमा के लिए आयी है। इसके द्वारा ईश्वर का पुत्र महिमान्वित हो जायेगा।’’ दूसरे शब्दों में कहा जाये तो मनुष्य की निर्बलता में ईश्वर की शक्ति संचार होती है। संत पौलुस भी इस तथ्य को अपने पत्र में व्यक्त करते है। वे कहते है कि वे अपने कमजोरी में ईश्वर की समर्थ्य को महसूस करते हैं। इस प्रकार हम यह देख सकते हैं कि मनुष्य की दुर्दशा, असफलता, कमजोरी, बीमारी यहॉं तक कि मृत्यु में भी ईश्वर की महिमा प्रकट होती है। इन सभी परिस्थितियों में यदि मनुष्य ईश्वर पर पूर्ण भरोसा व विश्वास करता है तो असंभव संभव होती जाती है और चमत्कारिक घटना घटती है। पर मनुष्यों की ओर से आवश्यकता है कि वे ईश्वर पर पूर्ण भरोसा व विश्वास करें। दूरभाग्य कि बात है कि ऐसी दशा में हमारा विश्वास व भरोसा उठने व टूटने लगता है। जबकि इसके विपरीत ऐसी स्थिति में हमारी आशा, भरोसा एवं विश्वास मजबूत होनी चाहिए।
तो आइये प्रिय भाइयो-बहनों हम आज के इस पूज़न समारोह में प्रार्थना करें कि हमारी बीमारी, हमारी कठिनाई, हमारे जीवन नकारात्मक घटना हमारे विश्वास को मजबूत करे।
✍ -फादर जीवन किशोर तिर्की