सामान्य काल का पाँचवाँ सप्ताह, इतवार – चक्र A

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📕पहला पाठ

नबी इसायस इस्नाएलियों से अनुरोध करते हैं कि वे दूसरों का उपकार करें - यही सच्ची धार्मिकता की कसौटी है। येसु ने भी भातृ-प्रेम को बहुत अधिक महत्त्व दिया।

नबी इसायस का ग्रंथ 58:7-10

“तुम्हारी ज्योति उषा की तरह फूट निकलेगी।”

प्रभु यह कहता है, अपनी रोटी भूखों के साथ खाओ, बेघर दरिद्रों को अपने यहाँ ठहराओ। जो नंगा है, उसे कपड़े पहनाओ और अपने भाई से मुँह न मोड़ो। तब तुम्हारी ज्योति उषा की तरह फूट निकलेगी और तुम्हारा घाव शीघ्र ही भर जायेगा। तुम्हारी धार्मिकता तुम्हारे आगे-आगे चलेगी और ईश्वर की महिमा तुम्हारे पीछे-पीछे आती रहेगी। यदि तुम पुकारोगे तो ईश्वर उत्तर देगा। यदि तुम दुहाई दोगे तो वह कहेगा - देखो, मैं प्रस्तुत हूँ। यदि तुम अपने बीच में से अत्याचार दूर करोगे, किसी पर अभियोग नहीं लगाओगे और किसी की निन्दा नहीं करोगे, यदि तुम भूखों को अपनी रोटी खिलाओगे और पददलितों को तृप्त करोगे, तो अंधकार में तुम्हारी ज्योति का उदय होगा और तुम्हारा अंधकार दिन का प्रकाश बन जायेगा?

प्रभु की वाणी।

📖भजन : स्तोत्र 111:4-9

अनुवाक्य : भक्त धर्मियों के लिए अंधकार का प्रकाश है। (अथवा : अल्लेलूया।)

1. वह धर्मियों के लिए अंधकार का प्रकाश है। वह दयालु, कोमल-हृदय और न्यायप्रिय है। वह तरस खा कर उधार देता और ईमानदारी से अपना कारबार करता है।

2. वह सन्मार्ग से कभी नहीं भटकेगा। उसकी स्मृति सदा बनी रहेगी। वह विपत्ति के समाचार से नहीं डरता। उसका मन दृढ़ रहता है, वह प्रभु पर भरोसा रखता है।

3. वह न तो घबराता और न डरता है। वह उदारतापूर्वक दरिद्रों को दान देता है। उसकी न्यायप्रियता सदा बनी रहती है। उसकी शक्ति तथा ख्याति बढ़ती जायेगी।

📘दूसरा पाठ

सन्त पौलुस मसीह का प्रचार करते समय मानवीय ज्ञान अथवा सुन्दर शब्दों पर नहीं, बल्कि पवित्र आत्मा की प्रेरणा तथा ईश्वर की शक्ति पर निर्भर रहते हैं।

कुरिंथियों के नाम सन्तत पौलुस का पहला पत्र 2:1-5

“मैंने आप लोगों से येसु मसीह और क्रूस पर उनके मरण के अतिरिक्त किसी और विषय पर बात नहीं की।”

भाइयो ! जब मैं ईश्वर का संदेश सुनाने आप लोगों के यहाँ आया, तो मैंने शब्दाडम्बर अथवा पांडित्य का प्रदर्शन नहीं किया। मैंने निश्चय किया था कि मैं आप लोगों से येसु मसीह और क्रूस पर उनके मरण के अतिरिक्त किसी और विषय पर बात नहीं करूँगा। वास्तव में मैं आप लोगों के बीच रहते समय दुर्बल, संकोची और भीरू था। मेरे प्रवचन तथा मेरे संदेश में विद्वतापूर्ण शब्दों का आकर्षण नहीं, बल्कि आत्मा की शक्ति थी, जिससे आप लोगों का विश्वास मानबीय प्रज्ञा पर नहीं, बल्कि ईश्वर की शक्ति पर आधारित हो।

प्रभु की वाणी।

📒जयघोष : योहन 10:27

अल्लेलूया, अल्लेलूया ! प्रभु कहते हैं, “मेरी भेड़ें मेरे आवाज़ पहचानती हैं। मैं उन्हें जानता हूँ और वे मेरा अनुसरण करती हैं।” अल्लेलूया !

📙सुसमाचार

येसु मसीह अपने शिष्यों से कहते हैं कि यदि वे उनकी शिक्षा पर चलेंगे, तो पृथ्वी के नमक तथा संसार की ज्योति बन जायेंगे। जिस तरह नमक खाद्य पदार्थ को बिगड़ जाने से रोकता है, उसी तरह शिष्य लोगों को नैतिक पतन से सुरक्षित रखेंगे।

मत्ती के अनुसार पवित्र सुसमाचार 5:13-16

“तुम संसार की ज्योति हो।”

येसु ने अपने शिष्यों से कहा, “तुम पृथ्वी के नमक हो। यदि नमक फीका पड़ जाये, तो वह किस से नमकीन किया जायेगा? वह किसी काम का नहीं रह जाता। वह बाहर फेंका और मनुष्यों के पैरों तले रौंदा जाता है। तुम संसार की ज्योति हो। पहाड़ पर बसा हुआ नगर छिप नहीं सकता। लोग दीपक जला कर पैमाने के नीचे नहीं, बल्कि दीवट पर रखते हें, जहाँ से वह घर के सब लोगों को प्रकाश देता है। उसी प्रकार तुम्हारी ज्योति मनुष्यों के सामने चमकती रहे, जिससे वे तुम्हारे भले कामों को देख कर, तुम्हारे स्वर्गिक पिता की महिमा करें'!

प्रभु का सुसमाचार।

📚 मनन-चिंतन

आज का सुसमाचार का अंश की व्याख्या हम ख्रीस्तियों के लिए एक आह्वान के रूप में की जा सकती है कि हम दुनिया में एक सकारात्मक प्रभाव डालें और अपने विश्वास को इस तरह से जिएं जो दूसरों को दिखाई दे। नमक के रूपक का उपयोग इस विचार को व्यक्त करने के लिए किया जाता है कि ख्रीस्तीयों को समाज में एक संरक्षक बल होना चाहिए, जिससे यह समाज रहने के लिए एक बेहतर जगह बन सके। प्रकाश के रूपक का उपयोग इस विचार को व्यक्त करने के लिए किया जाता है कि ख्रीस्तीयों को दूसरों के लिए एक ज्योर्तिमय उदाहरण होना चाहिए, उनके अनुसरण का मार्ग प्रशस्त करने के लिए।

यह अ्रंश हमें प्रोत्साहित करता है कि हम अपने कार्यों के माध्यम से अपने विश्वास को चमकने दें, दुनिया में एक सकारात्मक प्रभाव बनें और दूसरों को ईश्वर की ओर मार्गदर्शन करने के लिए एक ज्योति बनें।

-फादर डेन्नीस तिग्गा (भोपाल महाधर्मप्रान्त)


📚 REFLECTION


Today’s Gospel passage can be interpreted as a call to us Christians to be a positive influence in the world and to live out our faith in a way that is visible to others. The metaphor of salt is used to convey the idea that Christians should be a preserving force in society, making it a better place to live. The metaphor of light is used to convey the idea that Christians should be a shining example to others, illuminating the way for them to follow.

This passage encourages us to let our faith shine through our actions, to be a positive influence in the world and to be a light to guide others to God.

-Fr. Dennis Tigga (Bhopal Archdiocese)

📚 मनन-चिंतन - 2

नमक खाने को स्वादिष्ट बनाता है। फिर भी यह गुप्त रहता है। नमक एक परिरक्षक भी है। वह कई चीज़ों को खराब होने से बचाता है। नमक खाद के रूप में भी काम करता है। यह बहुत तेजी से अपने आप को खो देता है। यह अपने आस-पास की सामग्री का हिस्सा बन जाता है और अंत में अपनी सेवा में अपनी व्यष्टित्व खो देता है। जब भी नमक नही रहता या कम या अधिक होता है - लोग उस पर ध्यान रखते हैं। जब यह पर्याप्त मात्रा में होता है तो लोग वास्तव में इसकी उपस्थिति पर ध्यान ही नहीं देते हैं। येसु हमें याद दिलाते हैं कि हमें पृथ्वी के लिए नमक बनना चाहिए। ख्रीस्तीय विश्वासियों को समाज का अंत:करण बनना चाहिए। उनका कर्तव्य है कि वे समाज की अच्छाई को बचाए रखें, उन सभी समुदायों और संगठनों को स्वादिष्ट बनायें जहां वे मौजूद हैं। उन्हें हर समाज में अच्छाई का पोषण करना चाहिए। वे दूसरों के लिए जीने में अपनी सार्थकता पाते हैं। आइए हम लगातार इस उदात्त बुलाहट के बारे में अवगत हो कर आगे बढ़ते जायें।

-फादर फ्रांसिस स्करिया


📚 REFLECTION

Salt adds taste to food. Yet it remains unseen. It is a preservative. It acts as manure too. It gets diluted very fast. It becomes part of the material around it and finally loses its individuality in its service. Whenever it is absent or less or more – people take note of it. When it is in adequate quantity people do not really take note of its presence. Jesus reminds us that we are to be salt for the earth. Christians are to be the conscience of the society. They have a duty to preserve the goodness of the society, to add taste to the all communities and organizations where they are present. They are to nurture the goodness in every society. They become meaningful in being for others. Let us constantly be aware of this sublime vocation.

-Fr. Francis Scaria

प्रवचन

आज के वचन के केन्द्र बिंदु है अंधकार और प्रकाश। अंधकार और प्रकाश करीब-करीब संसार के सभी दर्शनों, विचारों और धर्मों की विषय- वस्तु रहा है। चाहे भारतीय दर्शन हो या फिर यूनानी दर्शन, सुमेरो-अकार्डियन साहित्य हो या फिर एशिया के समता धर्म के सिद्धांत हो प्रकाश और अंधकार के विरोधाभास का वर्णन अवश्य मिलता है। पवित्र बाइबिल में यह विषय उत्पत्ति ग्रन्थ से लेकर प्रकाशना ग्रंथ तक अपना वर्चस्व बनाये रखता है। अलग-अलग विचारकों के अनुसार इन दोनों चीजों को लेकर मान्यतायें भिन्न-भिन्न हैं। हम पवित्र बाइबल के प्रकाश में इस विषय के ऊपर चर्चा करेंगे।

पवित्र बाइबल में अंधकार को हमेशा ईश्वर और अच्छाई का विरोधी बताया गया है। शैतान और उसके कार्यों की तुलना अंधकार से की गई है। वहीं ईश्वर की तुलना ज्योति अथवा प्रकाश से की गई है। जहॉं प्रकाश होता है वहॉं अंधकार नहीं रह सकता। अतः प्रकाश का आभाव ही अंधकार है। जो अंधकार के कार्य करता है वह प्रकाश अथवा ज्योति का परित्याग करता है।

आज संसार में अंधकार और अंधकार के कार्यों का बोल-बाला है। विभिन्न प्रकार की बुराईयों का काला जाल आज मानवता को अपने आगोश में लिए जा रहा है। प्रभु येसु इस अंधकारमय संसार में ज्योति बनकर आये हैं। संत योहन 8:12 में वे कहते हैं - ‘‘संसार की ज्योति मैं हूँ। जो मेरा अनुसरण करता है, वह अंधकार में भटकता नहीं रहेगा। उसे जीवन की ज्योति प्राप्त होगी।’’ ईश्वर ज्योति है और वह इस संसार से अंधकार को हमेशा के लिए दूर करने आये है। संत योहन का पहला पत्र 3:8 में प्रभु का वचन कहता है - ‘‘जो पाप करता है वह शैतान की संतान है। क्योंकि शैतान हमेशा से पाप करता आया है। ईश्वर का पुत्र इसीलिए प्रकट हुआ कि वह शैतान के कार्यों को समाप्त कर दे।’’ येसु तो इसीलिए इस दुनिया में आये हैं। और वे चाहते हैं कि हर एक के जीवन से शैतान के अंधकार का राज्य समाप्त हो जाये। परन्तु यह मुझे और आपको चुनना है कि हम अंधकार से मुक्ति पाना चाहते हैं या फिर नहीं। हम किसको पसंद करते हैं संसार की ज्योति प्रभु येसु को या फिर अंधकार के नायक शैतान को। संत योहन 3:19 में प्रभु का वचन कहता है - ‘‘ज्योति संसार में आयी है और मनुष्यों ने ज्योति की अपेक्षा अंधकार को अधिक पसन्द किया, क्योंकि उनके कर्म बुरे थे। जो बुराई करता है, वह ज्योति से बैर करता है और ज्योति के पास इसलिए नहीं आता कि कहीं उसके कर्म प्रकट न हो जायें। किंतु जो सत्य पर चलता है, वह ज्योति के पास आता है, जिससे यह प्रकट हो कि उसके कर्म ईश्वर की प्रेरणा से हुए हैं।’’

आज हम अपने जीवन में झॉंक कर देखें कि हमारे कर्म किससे प्रेरित हैं, अंधकार के अधिपति शैतान से या फिर जीवन की ज्योति येसु ख्रीस्त से। यदि हमारे कर्म ईश्वर द्वारा प्रेरित हैं तो हम आज के पहले पाठ में जैसा बताया गया है वैसा आचरण करेंगे। हम अपनी रोटी भूखों के साथ खायेंगे, बेघर दरिद्रों को अपने यहॉं ठहरायेंगे, निर्वस्त्रों को पहनायेंगे, और अपने भाई से मुँह नहीं मोडेंगे। ऐसा करने पर आज के वचन में प्रभु कहते हैं - ‘‘तब तुम्हारी ज्योति उषा की तरह फूट निकलेगी...यदि तुम भूखों को अपनी रोटी खिलाओगे और पददलितों को तृप्त करोगे, तो अंधकार में तुम्हारी ज्योति का उदय होगा और तुम्हारा अंधकार दिन का प्रकाश बन जायेगा।

जी हॉं! यदि हम बुराईयों का पूर्ण परित्याग कर देंगे तो पाप के अंधकार से हम ईश्वर की ज्योति में आ जायेंगे। प्रभु येसु आज के सुसमाचार में हम सब को ज्योति बनने के लिए आह्वान करते हुए कहते हैं - तुम्हारी ज्योति मनुष्यों के सामने जलती रहे, जिससे वे तुम्हारे भले कामों को देख कर तुम्हारे स्वर्गिक पिता की महिमा करें। जि हॉं हम हमारे भले कार्यों के द्वारा अपने जीवन में ज्योति बनकर चमक सकते हैं।

तो आईये हम अंधकार के सब कार्यों को त्यागकर भले व प्रेममय कार्यों को अपनायें व मसीह की ज्योति में चलने वाले बनें। ताकि हम स्वयं मसीह की ज्योति बनकर इस संसार के पापों में भटक रही मानवता को प्रभु के पास ले जा सकें। आमेन।

-फादर प्रीतम वसुनिया - इन्दौर धर्मप्रांत