
यदि तुम चाहते हो, तो आज्ञाओं का पालन कर सकते हो, ईश्वर के प्रति ईमानंदार रहना तुम्हारी इच्छा पर निर्भर है। उसने तुम्हारे सामने अग्नि और जल, दोनों रख दिया, हाथ बढ़ा कर उन में से एक को चुन लो। मनुष्य के सामने जीवन और मरण, दोनों रखे हुए हैं। जिसे मनुष्य चुनता, वही उसे मिल जाता है। ईश्वर की प्रज्ञा अपार है, वह सर्वशक्तिमान् और सर्वत्र है। वह अपने श्रद्धालु भक्तों की देख-रेख करता है। मनुष्य जो भी करते हैं, वह सब देखता रहता है। पाप करने की छूट उसने किसी को नहीं दी है।
प्रभु की वाणी।
अनुवाक्य : धन्य हैं वे, जो प्रभु की संहिता के मार्ग पर चलते हैं।
धन्य हैं वे, जो निर्दोष जीवन बिताते और प्रभु की संहिता के मार्ग पर चलते हैं। धन्य हैं वे, जो उनकी आज्ञाओं का पालन करते और उन्हें हृदय से चाहते हैं।
तूने अपने नियम इसीलिये दिये हैं कि हम उनका पूरा-पूरा पालन करें। ओह ! मैं तेरी इच्छा पूरी करने में सदा ही दृढ़ बना रहूँ।
अपने सेवक को आशिष प्रदान कर और मैं जीता रहूँगा और तेरी आज्ञाओं का पालन करूँगा। मेरी आँखों को ज्योति प्रदान कर, जिससे मैं तेरी संहिता की महिमा देख सकूँ।
हे प्रभु ! मुझे अपनी आज्ञाओं का मार्ग बतला, मैं उस पर सदा चलता रहूँगा। मुझे ऐसी शिक्षा दे कि मैं सारे हृदय से तेरी संहिता का पालन करता रहूँ।
उन लोगों के बीच, जो परिपक्व हो गये हैं, हम प्रज्ञा की बातें करते हैं। यह प्रज्ञा न तो इस संसार की है। और न इस संसार के अधिपतियों की। ये लोग तो समाप्त हो जाने वाले हैं। मैं ईश्वर की उस रहस्यमय प्रज्ञा और उद्देश्य की बातें करता हूँ, जो अब तक गुप्त रहा, जिसे ईश्वर ने संसार की सृष्टि से पहले ही हमारी महिमा के लिए निश्चित किया था, जिसे संसार के अधिपतियों में से किसी ने नहीं जाना। यदि वे लोग उसे जानते तो महिमामय प्रभु को क्रूस पर नहीं चढ़ाते। मैं उन बातों के विषय में बोलता हूँ जिनके संबंध में धर्मग्रंथ यह कहता है - ईश्वर ने अपने भक्तों के लिए जो कुछ तैयार किया है, वह किसी ने कभी देखा नहीं उसके विषय में किसी ने कभी सुना नहीं और कोई उसकी कल्पना कभी नहीं कर पाया। ईश्वर ने अपने आत्मा द्वारा हम पर वही प्रकट किया है, क्योंकि आत्मा सब कुछ की, ईश्वर के रहस्य की भी, थाह लेता है।
प्रभु की वाणी।
अल्लेलूया, अल्लेलूया ! प्रभु कहते हैं, “मार्ग, सत्य और जीवन मैं हूँ। मुझ से होकर गये बिना कोई पिता के पास नहीं आ सकता'“। अल्लेलूया।
येसु ने अपने शिष्यों से कहा,
[“यह न समझो कि मैं संहिता अथवा नबियों के लेखों को रद्द करने आया हूँ। उन्हें रद्द करने नहीं, बल्कि पूरा करने आया हूँ। मैं तुम लोगों से कहे देता हूँ:- आकाश और पृथ्वी भले ही टल जायें, किन्तु संहिता की एक मात्रा अथवा एक बिन्दु भी बिना पूरा हुए नहीं टलेगा। इसलिए जो उन छोटी-से-छोटी आज्ञाओं में से एक को भी भंग करता और दूसरों को ऐसा करना सिखाता है वह स्वर्गराज्य में छोटा समझा जायेगा। जो उनका पालन करता और उन्हें सिखाता है, वह स्वर्गराज्य में बड़ा समझा जायेगा।]
मैं तुम लोगों से कहता हूँ - यदि तुम्हारी धार्मिकता शास्त्रियों और फ़रीसियों की धार्मिकता से गहरी नहीं हुई, तो तुम स्वर्गराज्य में प्रवेश नहीं करोगे। तुम लोगों ने सुना है कि पूर्वजों से कहा गया है - हत्या मत करो ; यदि कोई हत्या करे, तो वह कचहरी में दण्ड के योग्य ठहराया जायेगा। परन्तु मैं तुम से कहे देता हूँ - जो अपने भाई पर क्रोध करता है, वह कचहरी में दण्ड के योग्य ठहराया जायेगा।
[ यदि वह अपने भाई से कहे, 'रे मूर्ख !' तो वह महासभा में दण्ड के योग्य ठहराया जायेगा। और यदि वह कहे, 'रे नास्तिक !', तो वह नरक की आग के योग्य ठहराया जायेगा। जब तुम बेदी पर अपनी भेंट चढ़ा रहे हो और तुम्हें वहाँ याद आये कि मेरे भाई को मुझ से कोई शिकायत है, तो अपनी भेंट वहीं बेदी के सामने छोड़ कर पहले अपने भाई से मेल करने जाओ, और तब आ कर अपनी भेंट चढ़ाओ। “कचहरी जाते समय रास्ते में ही अपने मुद्दई से समकौता कर लो। कहीं ऐसा न हो कि वह तुम्हें न्यायकर्त्त के हवाले कर दे, न्यायकर्त्ता तुम्हें प्यादे के हवाले कर दे और प्यादा तुम्हें बंदीगृह में डाल दे। में तुम से कहे देता हूँ - जब तक कौड़ी-कौड़ी न चुका दोगे, तब तक वहाँ से नहीं निकल पाओगे”।]
“तुम लोगों ने सुना है कि कहा गया है - व्यभिचार मत करो ; परन्तु मैं तुम से कहता हूँ - जो बुरी इच्छा से किसी स्त्री पर दृष्टि डालता है, वह अपने मन में उसके साथ व्यभिचार कर चुका है।
[ यदि तुम्हारी दाहिनी आँख तुम्हारे लिए पाप का कारण बन जाये तो उसे निकाल कर फेंक दो। अच्छा यही है कि तुम्हारे अंगों में से एक नष्ट हो जाये, किन्तु तुम्हारा सारा शरीर नरक में न डाला जाये। और यदि तुम्हारा दाहिना हाथ तुम्हारे लिए पाप का कारण बन जाये, तो उसे काट कर फेंक दो। अच्छा यही है कि तुम्हारे अंगों में से एक नष्ट हो जाये, किन्तु तुम्हारा सारा शरीर नरक में न जाये। यह भी कहा गया है - जो कोई अपनी पत्नी को त्यागे, वह उसे त्याग-पत्र दे। परन्तु मैं तुम से कहता हूँ - व्यभिचार को छोड़ किसी अन्य कारण से जो अपनी पत्नी को त्याग देता है, वह उस से व्यभिचार कराता है। वह जो त्यागी हुई स्त्री से विवाह करता है वह व्यभिचार करता है। ]
तुम लोगों ने यह भी सुना है कि पूर्वजों से कहा गया है - झूठी शपथ मत खाओ। प्रभु के सामने खायी हुई शपथ को पूरा करो। परन्तु मैं तुम से कहता हूँ - शपथ कभी नहीं खानी चाहिए -
[न तो स्वर्ग की, क्योंकि वह ईश्वर का सिंहासन है; न पृथ्वी की, क्योंकि वह उसका पावदान है; न येरुसलेम की, क्योंकि वह राजाधिराज का नगर है और न अपने सिर की, क्योंकि तुम इसका एक बाल भी सफेद या काला नहीं कर सकते। ]
तुम्हारी बात इतनी हो - हाँ की हाँ, नहीं की नहीं। जो इस से अधिक है, वह बुराई से उत्पन्न होता है”।
प्रभु का सुसमाचार।
आज का सुसमाचार पर्वत उपदेश से है, जहाँ येसु अपने अनुयायियों को धार्मिकता और संहिता के बारे में सिखाते है। इस अनुच्छेद में, येसु केवल संहिता के अक्षर के बजाय, संहिता की भावना को पूरा करने के महत्व पर बल देते है। वे सिर्फ बाहरी आज्ञाकारिता के बजाय आंतरिक धार्मिकता के महत्व के बारे में भी सिखाते है। इस सन्दर्भ को इस तरह समझा जा सकता है कि येसु ने अपने समय के धार्मिक नेताओं द्वारा सिखाई गई शिक्षा की तुलना में धार्मिकता के लिए एक उच्च स्तर स्थापित किया है।
पदसंख्या 17 में, येसु कहते है कि वे संहिता को रद्द करने नहीं, परन्तु उसे पूरा करने आये है। इसके बाद वह इस बात का उदाहरण देते हैं कि संहिता को कैसे समझा जाना चाहिए और इसे अधिक गहरे, अधिक सार्थक तरीके से लागू किया जाना चाहिए। उदाहरण के लिए, पदसंख्याएॅं 21-22 में, येसु सिखाते है कि क्रोध हत्या के विरुद्ध आज्ञा का उतना ही उल्लंघन है जितना वास्तव में हत्या करना।
इसी तरह, पदसंख्या 27-28 में, येसु सिखाते हैं कि एक महिला को वासना से देखना व्यभिचार के विरुद्ध आज्ञा का उतना ही उल्लंघन है जितना कि वास्तव में व्यभिचार करना। इस तरह, येसु नियम या संहिता के प्रति केवल बाहरी आज्ञाकारिता के बजाय आंतरिक धार्मिकता के महत्व पर बल दे रहे है।
पदसंख्या 31-32 और 33-37 में, येसु अपने वादों को निभाने और विवाह की पवित्रता के महत्व के बारे में भी सिखाते है। वह हमारे संबंधों में पूरी तरह से प्रतिबद्ध और विश्वासयोग्य होने के महत्व पर बल देते है, न कि केवल अधुनिक चलन या सरल राह की ओर चलने के बजाय।
पर्वत उपदेश का यह अंश हमें नियम या संहिता की भावना को पूरा करने के महत्व और आंतरिक धार्मिकता के महत्व के बारे में सिखाता है। यह हमें याद दिलाता है कि सच्ची धार्मिकता केवल नियमों का पालन करने के बारे में नहीं है, बल्कि येसु की शिक्षाओं का पालन करने के बारे में है जो संहिता की भावना के अनुरूप है।
✍ -फादर डेन्नीस तिग्गा (भोपाल महाधर्मप्रान्त)
Today’s gospel passage is from the Sermon on the Mount, where Jesus teaches his followers about righteousness and the law. In this passage, Jesus emphasizes the importance of fulfilling the spirit of the law, rather than just the letter of the law. He also teaches about the importance of inner righteousness, rather than just outward obedience. This passage can be understood as Jesus setting a higher standard for righteousness than what was taught by the religious leaders of his time.
In verse 17, Jesus states that he has not come to abolish the law, but to fulfill it. He then goes on to give examples of how the law should be understood and applied in a deeper, more meaningful way. For example, in verse 21-22, Jesus teaches that anger is as much of a violation of the commandment against murder as actually committing murder.
Similarly, in verse 27-28, Jesus teaches that looking at a woman with lust is as much of a violation of the commandment against adultery as actually committing adultery. In this way, Jesus is emphasizing the importance of inner righteousness, rather than just outward obedience to the law.
In verses 31-32 and 33-37, Jesus also teaches about the importance of keeping one's promises and the sanctity of marriage. He emphasizes the importance of being completely committed and faithful in our relationships, rather than just going through the motions or taking the easy way out.
This passage from the Sermon on the Mount teaches us about the importance of fulfilling the spirit of the law and about the importance of inner righteousness. It reminds us that true righteousness is not just about following rules, but about following the teachings of Jesus in a way that is true to the spirit of the law.
✍ -Fr. Dennis Tigga (Bhopal Archdiocese)
आज के सुसमाचार में, प्रभु येसु घोषणा करते हैं कि वे संहिता और नबियों को पूर्ण करने के लिए आये हैं। सुसमाचार हमें इस बात के उदाहरण भी देता है कि वे कैसे संहिता और नबियों को पूरा करते हैं। पुराने विधान ने हत्या न करने का आदेश दिया, जबकि नये विधान ने दूसरों से नाराज होने या शब्दों के साथ भी उनका अनादर करने से मना किया। येसु अपने शिष्यों को यह भी सिखाते हैं कि पवित्रता जो प्रभु के सामने आने के योग्य होने के लिए आवश्यक है, वह केवल शारीरिक पवित्रता या स्वच्छता नहीं है, बल्कि एक आंतरिक पवित्रता है जो मांग करती है कि किसी और के प्रति कोई बुरा व्यवहार नहीं होना चाहिए। अगर कोई व्यक्ति आपके खिलाफ कुछ भावना रखता है, वह आपको प्रभु की वेदी पर कोई भी बलिदान चढ़ाने के लिए अयोग्य बना सकता है। पुराने नियम ने व्यभिचार को मना किया था, लेकिन नए नियम की मांग है कि हम बुरे विचारों से भी बचें। इस प्रकार येसु नैतिकता को हमेशा नई ऊंचाइयों पर ले जाते हैं। इस प्रकार येसु पुराने विधान की पुष्टि कर उसे पूर्णता तक ले जाते हैं। क्या हम नए नियम की आध्यात्मिकता की पूर्णता तक पहुँच गए हैं?
✍ -फादर फ्रांसिस स्करिया
In today’s gospel, Jesus declares that he has come to complete and perfect the Law and the Prophets. The gospel also gives us examples of how he completes the Law and the Prophets. The Old Testament Law forbade killing while the New Testament Law forbids one to be angry with others or to abuse them even with words. Jesus also teaches his disciples that purity that is required for being found worthy to come before the Lord is not just physical purity or external cleanliness but an internal purity which demands that there should be no ill-feeling in our hearts against anyone else. Another person having something against you can make you unworthy to offer any sacrifice at the altar of the Lord. The Old Testament Law had forbidden adultery, but the New Testament Law demands that we avoid even lustful thoughts. Thus Jesus takes morality and ethics to ever new heights. Thus Jesus perfects the Law and the Prophets. Have we reached the perfection of the New Testament Spirituality?
✍ -Fr. Francis Scaria
मनुष्य ईश्वर की सर्वोच्च सृष्टि है। कई दृष्टिकोणों से इंसान को अन्य सारे जीवों से भिन्न बनाया है। कैथोलिक कलीसिया की धर्मशिक्षा के अनुच्छेद 1730 में हम पढ़ते हैं - ईश्वर ने मनुष्य को एक तर्कसंगत प्राणी बनाया, उसे उसने ऐसी गरिमा प्रदान की, जिसकी बदौलत वह अपने कार्यों को स्वयंआरंभ और नियंत्रित कर सकता है। "ईश्वर ने मनुष्य को अपने लिए निर्णय करने की स्वतंत्रता खुद मनुष्य के हाथ में छोड़ दी, ताकि वह अपने स्वयं के सृष्टिकर्ता की तलाश कर सके और स्वतंत्र रूप ईश्वर में अपनी पूर्णता प्राप्त कर सके।"
आज के पहले पाठ में प्रभु का वचन हमारे सामने इसी बात को रखता है। वचन कहता है – “उसने अपनी आज्ञायें एवं आदेश प्रकट किये और अपनी इच्छा प्रकट की है। यदि तुम चाहते हो, तो आज्ञाओं का पालन कर सकते हो; ... मनुष्य के सामने जीवन और मृत्यु दानों रखे हुए हैं, जिसे मनुष्य चुनता, वही उसे मिलता है।" प्रारम्भ से ही ईश्वर ने यह व्यवस्था मनुष्य के लिए बनाई और हमारे आदि माता-पिता को जीवन और मृत्यु के बीच चुनने को कहा। उत्पत्ति 2:17 में प्रभु ने मनुष्य से कहा- ‘‘तुम वाटिका के सभी वृक्षों के फल खा सकते हो, किंतु भले-बुरे के ज्ञान के वृक्ष का फल नहीं खाना; क्योंकि जिस दिन तुम उसका फल खाओगे, तुम अवश्य मर जाओगे।” उन्होंने क्या चुना? मृत्यु। ईश्वर ये कभी नहीं चाहता था कि इंसान ईश्वर का सान्निध्य छोडकर अपने हमेशा के विनाश का मार्ग चुनेंगे। विधि-विवरण 30:19 में प्रभु इस बात को स्पष्ट करते हैं – “आज मैं तुम लोगों के सामने जीवन और मृत्यु, भलाई और बुराई दोनों रख रहा हूँ तुम लोग जीवन को चुन लो।” दो विकल्पों में से एक चुनने की आजादी के पीछे ईश्वर की ख़्वाहिश हमेशा यही रहती है कि हम जीवन को चुनें। एज़ेकिएल 18:23 में प्रभु का वचन कहता है - क्या मैं दुष्ट की मृत्यु से प्रसन्न हूँ? क्या मैं यह नहीं चाहता कि वह अपना मार्ग छोड दे और जीवित रहे?” और वचन 31 में प्रभु बहुत ही व्याकुल होकर कहते हैं – “अपने पुराने पापों का भार फेंक दो। एक नया हृदय और एक नया मनोभाव धारण करो। प्रभु ईश्वर यह कहता है - हे इस्राएलियों! तुम क्यों मरना चाहते हो?”
मनुष्य शैतान के झूठे बहकावों में आकर इस सत्य को पहचान नहीं पाता और अपने दैनिक जीवन में ऐसे चुनाव करता है जो कि उसे अनन्त जीवन से दूर करते हैं। संत योहन 10:10 में प्रभु येसु कहते हैं - चोर याने शैतान चुराने मारने और नष्ट करने आता है, परन्तु येसु इसलिए आये कि हम बहुतायत का जीवन पायें। जी हाँ ईश्वर हमें जीवन देना चाहते हैं। परमपिता ईश्वर ने हमें इतना प्यार किया है कि उसने हमारे लिए अपने एकलौते पुत्र को अर्पित कर दिया ताकि उन पर विश्वास करने वाले अनंत जीवन पा सकें।
जी, हाँ प्रिय विश्वासियों , येसु हमें हमेशा का जीवन देने के लिए आये हैं। उन्होंने हमें अपने उपदेशों औरशिक्षाओं के द्वारा, उस अनन्त जीवन को चुनने का रास्ता हमें बताया है, जैसा कि आज के सुसमाचार में हमने उनकी शिक्षाओं को सुना है। उन्होंने पुरानी शिक्षाओं को एक नए नज़रिये से देखना व छोटी से छोटी गलतियों व पापों को गंभीरता से लेने व धार्मिकता के मार्ग पर चलने हमें सिखाया है| क्या हम प्रभु के वचनों को अपने जीवन में सर्वोच्च स्थान देते हैं जैसा कि संत पेत्रुस ने अपने जीवन में येसु के वचनों की महत्ता को समझकर प्रभु येसु से कहा था - प्रभु हम किस के पास जायें, आपके ही शब्दों में अनन्त जीवन का सन्देश है।
तो आईये हम प्रभु के वचनों को सुनें, उन पर चलें और अपने दैनिक जीवन में ईश्वर को चुनें, अनंत जीवन को चुनें, मृत्यु को नहीं। आमेन।
✍ -फादर प्रीतम वसुनिया - इन्दौर धर्मप्रांत