वर्ष का चौदहवाँ सप्ताह, इतवार – वर्ष A

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पहला पाठ

नबी जकर्या मसीह की विनम्रता का वर्णन करते हुए कहते हैं कि वह महान् राजा और विजेता की तरह नहीं जो सेना के साथ आया करते हैं बल्कि गदहे पर सवार हो कर येरुसालेम में प्रवेश करेंगे।

नबी ज़कर्या का ग्रंथ 9:9-10

"तेरे राजा तेरे पास आ रहे हैं"

प्रभु यह कहता है हे सियोन की पुत्री ! आनन्द मना ! हे येरुसालेम की पुत्री ! जयकार कर ! देख ! तेरे राजा तेरे पास आ रहे हैं। वह न्यायी और विजयी हैं। वह विनम्र हैं। वह गदहे पर, बछेड़े पर, गदही के बच्चे पर सवारं हैं। वह एफ्राईम से रथ दूर कर देंगे और येरुसालेम से युद्ध के घोड़ों को। योद्धा के धनुष का बहिष्कार कर दिया जायेगा। वह राष्ट्रों के लिए शांति घोषित करेंगे। उनका शासन समुद्र से समुद्र तक और नदी से पृथ्वी के सीमान्तों तक फैल जायेगा।

प्रभु की वाणी।

भजन : स्तोत्र 144:1-2,8-11,13-14

अनुवाक्य : हे मेरे ईश्वर ! मेरे राजा ! मैं सदा-सर्वदा तेरा नाम धन्य कहूँगा। (अथवा : अल्लेलूया !)

हे मेरे ईश्वर ! मेरे राजा ! मैं तेरी स्तुति करूँगा। मैं सदा-सर्वदा तेरा नाम धन्य कहूँगा। मैं दिन-प्रतिदिन तुझे धन्य कहूँगा, मैं सदा-सर्वदा तेरे नाम की स्तुति करूँगा।

प्रभु दया और अनुकम्पा से परिपूर्ण है, वह सहनशील और अत्यन्त प्रेममय है। प्रभु सबों का कल्याण करता है। वह अपनी सारी सृष्टि पर दया करता है।

हे प्रभु तेरी सारी सृष्टि तेरा धन्यवाद करे; तेरे भक्त तुझे धन्य कहें। वे तेरे राज्य की महिमा गायें। और तेरे सामर्थ्य का बखान करें।

प्रभु अपनी सब प्रतिज्ञाएँ पूरी करता है। उसके समस्त कार्य उसके प्रेम से पूर्ण हैं। प्रभु निर्बल को सँभालता और फुके हुए को सीधा करता है।

दूसरा पाठ

बपतिस्मा के फलस्वरूप ईश्वर का आत्मा हम में निवास करता है। इसलिए हमें पाप का मार्ग छोड़ कर आत्मा की प्रेरणा पर चलना चाहिए। इस तरह हम पुनरुत्थान के योग्य बन जायेंगे।

रोमियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 8:9,11-13

"यदि आप आत्मा की प्रेरणा से शरीर की वासनाओं का दमन करेंगे, तो आप को जीवन प्राप्त होगा"

यदि ईश्वर का आत्मा सचमुच आप लोगों में निवास करता है, तो आप शरीर की वासनाओं से नहीं, बल्कि आत्मा से संचालित हैं। जिस मनुष्य में मसीह का आत्मा निवास नहीं करता, वह मसीह का नहीं। जिसने येसु को मृतकों में से जिलाया, यदि उसका आत्मा आप लोगों में निवास करता है, तो जिसने येसु मसीह को मृतकों में से जिलाया है, वह अपने आत्मा द्वारा, जो आप में निवास करता है, आपके नश्वर शरीरों को भी जीवन प्रदान करेगा। इसलिए, भाइयो ! शरीर की वासनाओं का हम पर कोई अधिकार नहीं। हम उनके अधीन रह कर जीवन न बितायें। यदि आप शरीर की वासनाओं के अधीन रह कर जीवन बितायेंगे, तो अवश्य मर जायेंगे। लेकिन यदि आप आत्मा की प्रेरणा से शरीर की वासनाओं का दमन करेंगे, तो आप को जीवन प्राप्त होगा।

प्रभु की वाणी।

जयघोष

अल्लेलूया, अल्लेलूया ! हे पिता ! हे स्वर्ग और पृथ्वी के प्रभु ! मैं तेरी स्तुति करता हूँ, क्योंकि तूने राज्य के रहस्यों को निरे बच्चों के लिए प्रकट किया है। अल्लेलूया !

सुसमाचार

नबी जकर्या ने एक विनम्र मसीह की भविष्यवाणी की थी। येसु का स्वभाव ऐसा ही था। वह स्वयं कहते हैं कि "मैं स्वभाव से नम्र और विनीत हूँ"। उनकी आज्ञाएँ कठोर नहीं हैं। वह कहते हैं, "मेरा जूआ सहज है और मेरा बोझ हलका"; क्योंकि उनकी आज्ञाओं का सार है ईश्वर के प्रति प्रेम और भ्रातृप्रेम।

मत्ती के अनुसार पवित्र सुसमाचार 11:25-30

"मैं स्वभाव से नम्र और विनीत हूँ।"

येसु ने कहा, "हे पिता ! हे स्वर्ग और पृथ्वी के प्रभु! मैं तेरी स्तुति करता हूँ, क्योंकि तूने इन सब बातों को ज्ञानियों और समझदारों से छिपा कर निरे बच्चों के लिए प्रकट किया है। हाँ, पिता ! यही तुझे अच्छा लगा। मेरे पिता ने मुझे सब कुछ सौंपा है। पिता को छोड़ कर कोई भी पुत्र को नहीं जानता, इसी तरह पिता को कोई नहीं जानता, केवल पुत्र जानता है। और वही, जिसके लिए पुत्र उसे प्रकट करने की कृपा करे। "थके-माँदे और बोझ से दबे हुए लोगो ! तुम सब के सब मेरे पास आओ, मैं तुम्हें विश्राम दूँगा। मेरा जूआ अपने ऊपर ले लो। और मुझ से सीखो। मैं स्वभाव से नम्र और विनीत हूँ। इस तरह तुम अपनी आत्मा के लिए शांति पाओगे, क्योंकि मेरा जूआ सहज है और मेरा बोझ हलका"।

प्रभु का सुसमाचार।

📚 मनन-चिंतन -2

ईश्वरीय रहस्यों को जानने के लिए हमें बच्चों जैसे निष्कलंक तथा निर्दोष बनना चाहिए। जो अपनी बुध्दि तथा क्षमता पर निर्भर रहते हैं, वे ईश्वरीय रहस्यों को जान नहीं पाते हैं। पुराने बिधान का यूसुफ़ बचपन से ही ईश्वरीय रहस्यों को जान पाता था। बालक समुएल को प्रभु ने अपने रहस्य प्रकट किये। बालक दाऊद को ईश्वर ने अपनी शक्ति का परिचय दिया। 1 कुरिन्थियों 1:27 में संत पौलुस कहते हैं, “ज्ञानियों को लज्जित करने के लिए ईश्वर ने उन लोगों को चुना है, जो दुनिया की दृष्टि में मूर्ख हैं। शक्तिशालियों को लज्जित करने के लिए उसने उन लोगों को चुना है, जो दुनिया की दृष्टि में दुर्बल हैं।” बच्चों में जिज्ञासा होती है और वे जानने की इच्छा रखते हैं। यिरमियाह 29:13-14 में पवित्र वचन कहता है, “यदि तुम मुझे सम्पूर्ण हृदय से ढूँढ़ोगे, तो मैं तुम्हे मिल जाऊँगा“- यह प्रभु की वाणी है- “और मैं तुम्हारा भाग्य पलट दूँगा।“ सूक्ति 8:17 में प्रभु कहते हैं, “जो मुझे ढूँढ़ते हैं, वे मुझे पायेंगे।” हम बच्चों के समान ईश्वरीय रहस्यों की खोज करें और पायें।

-फादर फ्रांसिस स्करिया


📚 REFLECTION

To know divine mysteries, we must become blameless and innocent like children. Those who rely on their own intellect and capability are unable to know divine mysteries. Joseph of the Old Testament was able to know divine mysteries right from his childhood. The Lord revealed His secrets to the child Samuel. God introduced His power to the child David. In 1 Corinthians 1:27, Saint Paul says, “But God chose what is foolish in the world to shame the wise; God chose what is weak in the world to shame the strong.” Children possess curiosity and a desire to know. In Jeremiah 29:13-14, the Word of God says, “If you seek me with all your heart, you will find me”—this is the word of the Lord—“and I will restore your fortune.” In Proverbs 8:17, the Lord says, “Those who seek me diligently find me.” Like children, let us seek and find divine mysteries.

-Fr. Francis Scaria

📚 मनन-चिंतन

सन्त पौलुस हमें याद दिलाते हैं कि हमें शरीर की वासनाओं से नहीं बल्कि हमारे अन्दर निवास करने वाले आत्मा की प्रेरणा से जीवन जीना है। हमारी वासनाएं हमें विनाश की ओर ले जाती हैं जबकि आत्मा की प्रेरणा हमें अनंत जीवन की ओर ले जाती है। जो व्यक्ति आत्मा की प्रेरणा से नहीं जीता है वह सांसारिकता में फँसता जाता है, पाप के बोझ के तले दबता जाता है। एक तरफ उसे सांसारिकता उसे अपनी ओर खींचती है वहीं दूसरी ओर स्वर्गीय पिता की संतान होने की जिम्मेदारी उसे स्वर्ग की खोज में लगे रहने की ओर खींचती है। इस खींचा-तानी में इंसान थकेगा नहीं तो और क्या होगा। प्रभु येसु आज हम थके-माँदे और बोझ से दबे हुए लोगों को बुलाते हैं ताकि वे हमारे बोझ से हमें मुक्ति दिलाएं और हमारी थकान में हमें नवस्फूर्ति प्रदान करें।

प्रभु येसु हमें अपना जुआ अपने ऊपर लेने का निमंत्रण देते हैं। अगर हमने जुआ देखा है तो हमें पता होगा कि जुए में दो बैलों का होना जरूरी है। अकेला बैल उस जुए को नहीं खींच सकता। जुए में जुतने वाले दोनों बैलों को आपसी ताल-मेल बनाकर चलना पड़ेगा नहीं तो उनका आगे बढ़ना असंभव है। हमारे जीवन के जुए में प्रभु येसु हमारे साथ आना चाहते हैं, हमें अपने साथ लेना चाहते हैं। प्रभु जीवन के हर क्षण कदम से कदम मिलाकर हमारे साथ चलना चाहते हैं। क्या मैं अपने जीवन की थकान मिटाने के लिए प्रभु के साये में जीने के लिए तैयार हूँ? क्या मैं शरीर की वासनाओं को त्यागकर प्रभु के वचन के अनुसार जीवन जीने के लिए तैयार हूँ?

- फ़ादर जॉन्सन बी. मरिया (ग्वालियर धर्मप्रान्त)


📚 REFLECTION

St. Paul reminds us that we need not to be guided by the desires of flesh but by the guidance of the Holy Spirit that dwells within each one of us. The desires of the flesh lead us towards our destruction whereas the Spirit leads us to eternal life. One who does not live by the Spirit, is trapped into the attractions of the world and gets crushed under the burden of sinfulness. On the one hand he is pulled by the desires of the flesh and on the hand the call to be worthy children of God inspires him to the other side. The person will certainly be exhausted fighting with the desires of the flesh and keeping up with the Spirit. Jesus invites those who labour and are heavily laden, to get rest from Jesus. He ready to refresh our soul and give us new strength.

Jesus invites us to take up his yoke. If we have seen a yoke we would know that a yoke requires two oxen to work. A single ox cannot be used to carry that yoke. The oxen that are carrying the yoke, must work in harmony or else they cannot move forward properly. Jesus wants to join us in carrying the yoke of our life, he wants to take us with him. Jesus wants us to walk with him harmony, together. Am I ready to come to Jesus and unload my burdens and get some rest? Am I ready to give us the desires of the flesh and live according to the Spirit?

-Fr. Johnson B. Maria (Gwalior Diocese)

📚 मनन-चिंतन -2

आधुनिक दुनिया में बहुत से लोग एक अव्यवस्थित जीवन जीते हैं। उन्हें जीवन की ज़रूरी और गैर-जरूरी चीजों का अंतर समझना कठिन लगता है। ड्राइवर को गाडी चलानी चाहिए। अगर गाडी ही ड्राइवर को चलाने की कोशिश करती है, तो क्या होगा? फिर भी बहुत बार आधुनिक मानव की वास्तविकता गाडी द्वारा चालक को चलाने की कहानी से भिन्न नही है। हम विभिन्न प्रकार की लत में फंस जाते हैं। आधुनिक काल में मोबाइल और सोशल मीडिया की लत हमें जीवन की सादगी से दूर रखती है। आज, कई युवाओं ने भ्रामक विचारों और चिंताओं के साथ अपने दिमाग को जकड़ लिया है। इससे पहले कि हम वास्तव में एक सार्थक जीवन जी सकें, हमें अपने जीवन में अव्यवस्था को खत्म करने की आवश्यकता है। सरलीकरण जीवन को हल्का और स्पष्ट बनाने की प्रक्रिया है। दुनिया के निर्देश अक्सर ईश्वर के निर्देशों के बिलकुल विपरीत होते हैं। हम बहुत कम समय में बहुत सी चीजें हासिल करना चाहते हैं। हम उस पौधे की तलाश करते हैं जो एक साल के भीतर फल देना शुरू कर देगा। हम इंस्टेंट कॉफी और इंस्टेंट सूप की तलाश करते रहते हैं। अजीब बात है कि हम एक ही समय बहुत सी दिशाओं में जाना चाहते हैं। अति आवश्यक चीज़ों के बारे हमें याद दिलाते हुए प्रभु कहते हैं, “इन सब चीजों की खोज में गैर-यहूदी लगे रहते हैं। तुम्हारा स्वर्गिक पिता जानता है कि तुम्हें इन सभी चीजों की ज़रूरत है। तुम सब से पहले ईश्वर के राज्य और उसकी धार्मिकता की खोज में लगे रहो और ये सब चीजें, तुम्हें यों ही मिल जायेंगी।” (मत्ती 6: 32-33) ईश्व्र के राज्य पर एकाग्रता येसु की सरलता है। हममें से अधिकत्तर लोग अपने स्वयं के राज्यों के निर्माण में लगे हैं। हमें इस प्रक्रिया को त्याग कर ईश्वर के राज्य पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है। इब्रानियों के पत्र में प्रभु का वचन कहता है, "हम हर प्रकार की बाधा दूर कर अपने को उलझाने वाले पाप को छोड़ कर और ईसा पर अपनी दृष्टि लगा कर, धैर्य के साथ उस दौड़ में आगे बढ़ते जायें, जिस में हमारा नाम लिखा गया है। ईसा हमारे विश्वास के प्रवर्तक हैं और उसे पूर्णता तक पहुँचाते हैं। उन्होंने भविष्य में प्राप्त होने वाले आनन्द के लिए क्रूस पर कष्ट स्वीकार किया और उसके कलंक की कोई परवाह नहीं की। अब वह ईश्वर के सिंहासन के दाहिने विराजमान हैं।“ (इब्रानियों 12: 1-2)। हमें एक सार्थक जीवन जीने के लिए जागरूक विकल्प और प्राथमिकताएँ बनानी होंगी।

क्या आपने कभी इस बात पर ध्यान दिया है कि येसु को सरल बातें प्रिय थीं – बोनेवाला, खेत के फूल, आकाश के पक्षी, मंदिर के खजाने में दो सिक्के डालने वाली विधवा, छोटे बच्चे। उन्हें यह सरलता अपने पिता से विरासत में मिली थी। इसीलिए, आज के सुसमाचार में, वे कहते हैं, "पिता! स्वर्ग और पृथ्वी के प्रभु! मैं तेरी स्तुति करता हूँ; क्योंकि तूने इन सब बातों को ज्ञानियों और समझदारों से छिपा कर निरे बच्चों पर प्रकट किया है। हाँ, पिता! यही तुझे अच्छा लगा।” कोई आश्चर्य नहीं, लियोनार्डो दा विंची ने कहा है, "सादगी परम परिष्कार है"। लेकिन यह बात भी सच है कि सादगी उन लोगों के लिए बोझ बन सकती है जिन्होंने इसकी सुंदरता की खोज नहीं की है।

-फादर फ्रांसिस स्करिया


📚 REFLECTION

Many people in the post modern world live a cluttered life. They find it difficult to distinguish between the essentials and non-essentials of life. The driver should drive the car. The car should not drive the driver. Yet very often the reality of the modern man is a story of car driving the driver. We end up with addictions. Modern day mobile and social media addictions keep us away from the simplicity of life. Today, many young people have cluttered their minds with confusing thoughts and worries. We need to clear out the clutter in our life, before we can really live a meaningful life. Simplification is about making life lighter and clearer. The directives of the world are often opposed to the directives of God. We want to achieve too many things in too short a time. We look for a plant that will begin to give fruits within a year. We look for instant coffee and instant soup. Strangely, we want to move in too many directions at the same time. The Lord reminds us of what is essential when he says, “it is the Gentiles who strive for all these things; and indeed your heavenly Father knows that you need all these things. But strive first for the kingdom of God and his righteousness, and all these things will be given to you as well” (Mt 6:32-33). This single-minded focus on the Kingdom of God is the simplicity Jesus desires in us. Far from building our own kingdoms, we need to focus on God’s Kingdom. The Letter to the Hebrews says, “let us also lay aside every weight and the sin that clings so closely, and let us run with perseverance the race that is set before us, looking to Jesus the pioneer and perfecter of our faith” (Heb 12:1-2). We have to make conscious choices and preferences to live a meaningful life.

Have you ever paid attention to the fact that Jesus had a special love for the simple – the lilies of the field, the birds of the air, the poor widow at the temple treasury, the little children. He inherited this simplicity from His Father. That is why, in today’s Gospel, he says, “I thank you, Father, Lord of heaven and earth, because you have hidden these things from the wise and the intelligent and have revealed them to infants; yes, Father, for such was your gracious will”. No wonder, Leonardo da Vinci seems to have said, “Simplicity is the ultimate sophistication”.

There needs to be a word of caution. Simplicity can become a burden for those who have not discovered its beauty.

-Fr. Francis Scaria