
प्रभु यह कहता है, "जिस तरह पानी और बर्फ आकाश से उतर कर भूमि सींचे बित्ता, उसे उपजाऊ बनाये और हरियाली से ढके बिना, वहाँ नहीं लौटते, जिससे भूमि बीज बोने वाले को बीज और खाने वाले को अनाज दे सके; उसी तरह मेरी वाणी मेरे मुख से निकल कर व्यर्थ ही मेरे पास नहीं लौटती। जो मैं चाहता था, वह उसे कर डालती है और मेरा उद्देश्य पूरा करने के बाद ही वह मेरे पास लौट आती है"।
प्रभु की वाणी।
अनुवाक्य : कुछ बीज अच्छी भूमि में गिरे वे उग कर सौ-गुना फल लाये।
तू पृथ्वी की सुधि लेता है, तू उसे सींचता और उपज से भर देता है। ईश्वर की नदियाँ उमड़ती और पृथ्वी को उपजाऊ बना देती हैं।
तू जोती हुई भूमि सींचता है, उसे बराबर करता, पानी बरसा कर नरम बनाता और उसके अंकुरों को आशिष देता है - इस प्रकार तू भूमि का संभरण करता है।
तू वर्ष भर वरदान देता रहता है, तेरी प्रजा की भूमि उपजाऊ है, मरुभूमि के चरागाह हरे-भरे हैं।
पहाड़ियों में आनन्द के गीत गूंजते रहते हैं, चरागाह भेड़-बकरियों से भरे हैं, घाटियाँ अनाज की फसल से ढकी हुई हैं, और आनन्द तथा उल्लास के गीत गाती हैं।
मैं समझता हूँ कि जो महिमा हम में प्रकट होने को है, उसकी तुलना में इस समय का दुःख नगण्य है। क्योंकि समस्त सृष्टि उत्कंठा से उस दिन की प्रतीक्षा कर रही है, जब ईश्वर के पुत्र प्रकट हो जायेंगे। यह सृष्टि तो इस संसार की असारता के अधीन हो गयी है- अपनी इच्छा से नहीं, बल्कि उसकी इच्छा से जिसने उसे अधीन बना दिया है किन्तु यह आशा भी बनी रही कि वह असारता की दासता से मुक्त हो जायेगी और ईश्वर के पुत्रों की महिमामय स्वतंत्रता की सहभागी बनेगी। हम जानते हैं कि समस्त सृष्टि अब तक मानो प्रसव पीड़ा में कराहती रही है। और सृष्टि ही नहीं, हम भी भीतर ही भीतर कराहते हैं। हमें तो पवित्र आत्मा के पहले कृपादान मिल चुके हैं, किन्तु हम ईश्वर की सन्तान होने के नाते अपने शरीर की मुक्ति की राह देख रहे हैं।
प्रभु की वाणी।
अल्लेलूया, अल्लेलूया ! यदि कोई मुझे प्यार करेगा, तो वह मेरी शिक्षा पर चलेगा। मेरा पिता उसे प्यार करेगा और हम उसके पास आ कर उस में निवास करेंगे । अल्लेलूया !
येसु घर से निकल कर समुद्र के किनारे जा बैठे । उनके पास इतनी बड़ी भीड़ इकट्ठी हो गयी कि वह नाव पर चढ़ कर बैठ गये और सारी भीड़ तट पर बनी रही । वह दृष्टान्तों द्वारा उन्हें बहुत-सी बातें समझाने लगे। उन्होने कहा, "सुनो ! कोई बोने वाला बीज बोने निकला । बोते-बोते कुछ बीज रास्ते के किनारे गिरे और आकाश के पक्षियों ने आ कर उन्हें चुग लिया। कुछ बीज पथरीली भूमि पर गिरे, जहाँ उन्हें अधिक मिट्टी नहीं मिली। वे जल्दी ही उग गये, क्योंकि उनकी मिट्टी गहरी नहीं थी। सूरज चढ़ने पर वे झुलस गये और जड़ न होने के कारण सूख गये। कुछ बीज काँटों में गिरे और काँटों ने बढ़ कर उन्हें दबा दिया। कुछ बीज अच्छी भूमि में गिरे और फल लाये कुछ तीस-गुना, कुछ साठ-गुना और कुछ सौ-गुना। जिसके सुनने के कान हों, वह सुन ले" ।
[ येसु के शिष्यों ने आ कर उन से कहा, "आप क्यों लोगों को दृष्टान्तों में शिक्षा देते हैं?" उन्होंने उत्तर दिया, "यह इसलिए है कि स्वर्गराज्य का भेद जानने का वरदान तुम्हें दिया गया है, उन लोगों को नहीं। क्योंकि जिसके पास कुछ है, उसी को और दिया जायेगा और उसके पास बहुत हो जायेगा। लेकिन जिसके पास कुछ नहीं है, उस से वह भी ले लिया जायेगा, जो उसके पास है। मैं उन्हें दृष्टान्तों में शिक्षा देता हूँ क्योंकि वे देखते हुए भी नहीं देखते और सुनते हुए भी न तो सुनते और न समझते हैं। इसायस की यह भविष्यवाणी उन लोगों पर पूरी उतरती है तुम सुनते रहोगे परन्तु नहीं समझोगे; तुम देखते रहोगे परन्तु तुम्हें नहीं दीखेगा। क्योंकि इन लोगों की बुद्धि मारी गयी है; ये कानों से सुनना नहीं चाहते; इन्होंने अपनी आँखों को बन्द कर लिया है। कहीं ऐसा न हो कि ये आँखों से देख लें, कानों से सुन लें, बुद्धि से समझ लें, मेरी ओर लौट आयें और मैं उन्हें भला-चंगा कर दूँ। परन्तु धन्य हैं तुम्हारी आँखें, क्योंकि वे देखती हैं और धन्य हैं तुम्हारे कान, क्योंकि वे सुनते हैं। मैं तुम लोगों से कहे देता हूँ - तुम जो बातें देख रहे हो उन्हें कितने ही नबी और धर्मात्मा देखना चाहते थे, परन्तु उन्होंने उनको देखा नहीं और तुम जो बातें सुन रहे हो उन्हें वे सुनना चाहते थे, परन्तु उन्होंने उनको सुना नहीं। "अब तुम लोग बोने वाले का दृष्टान्त सुनो। यदि कोई राज्य का वचन सुनता है लेकिन समझता नहीं, तब जो उसके मन में बोया गया था, उसे शैतान आ कर ले जाता है: यह वह है, जो रास्ते के किनारे बोया गया है। जो पथरीली भूमि में बोया गया है: यह वह है, जो वचन सुनते ही प्रसन्नता से ग्रहण करता है; परन्तु उस में जड़ नहीं है और वह थोड़े ही दिन दृढ़ रहता है। वचन के कारण संकट या अत्याचार आ पड़ने पर वह तुरन्त विचलित हो जाता है। जो काँटों में बोया गया है: यह वह है जो वचन सुनता है, परन्तु संसार की चिन्ता और धन का मोह वचन को दबा देता है और वह फल नहीं लाता। जो अच्छी भूमि में बोया गया है: यह वह है जो वचन सुनता और समझता है और फल लाता है कोई सौ-गुना, कोई साठ-गुना और कोई तीस-गुना"।]
प्रभु का सुसमाचार।
उत्पत्ति ग्रन्थ में हम पढ़ते हैं कि ईश्वर के मुख से शब्द निकले और उन्होंने साकार रूप लिया। ईश्वर ने कहा ‘प्रकाश हो जाए’ तो प्रकाश हो गया। इसी तरह से सारी सृष्टि की रचना ईश्वर के मुख से निकले वचन से हुई। ईश्वर की वाणी अपना कार्य किए बगैर वापस नहीं लौटती। यह हृदय के अंतरतम को भी भेद देती है, और हृदयों के रहस्य प्रकट करती है। आज प्रभु येसु ईश वचन के बारे में बड़ा ही दिलचश्प दृष्टांत सुनाते हैं और उसकी व्याख्या भी करते हैं। ईश्वर का वचन अगर उपजाऊ बीज के समान है तो हमारा हृदय भूमि के समान है जिसमें वह वचन फलप्रद बनता है। जिस तरह से हमारे हृदय की मिट्टी है उसी तरह का विकास ईश्वर के वचन का होगा।
हमारे हृदय रूपी मिट्टी को तैयार करने के लिए हमारे आस-पास की परिस्थितियाँ भी कुछ हद तक जिम्मेदार हैं। जब हमारे जीवन में दुख-संकट हैं, चिंताएं हैं तो उन सबके बीच ईश्वर का वचन कैसे फल-फूल सकता है? लेकिन हम भूल जाते हैं कि ईश्वर का वचन ही हमें उस दुख-चिंताओं और परेशानियों से लड़ने में मदद करता है, नई राह दिखाता है, शक्ति देता है। हमारे हृदय रूपी मिट्टी चाहे जैसी भी हो, लेकिन अगर हम खुले हृदय से अपने जीवन में उसकी इच्छा पूरी करने के लिए तैयार हैं तो ईश्वर का वचन अपना असर जरूर दिखाएगा। प्रभु येसु भी वही देहधारी वचन हैं जिन्होंने ईश्वर की इच्छा पूरी करने के लिए स्वयं को क्रूस पर बलिदान कर दिया। क्या मेरे हृदय रूपी भूमि ईश वचन रूपी बीज को ग्रहण करने के लिए तैयार है?
✍ - फ़ादर जॉन्सन बी. मरिया (ग्वालियर धर्मप्रान्त)
In the book of Genesis we read that God uttered words and they caused things to come into existence. God said, ‘let there be light’ and there was light. Whole creation and all creatures came into existence through the word of God. The words uttered by God do not go unfruitful. It pierces the bottom of heart and causes the mysteries to be revealed. Jesus puts forward an interesting parable and also he himself explains it. If God’s word is like seeds that fell than our hearts are the soil where those seeds grow and flourish. The seeds will grow and flourish according to the nature of the soil of our hearts.
The situations and environment around us is responsible to great extent for the growth of the word of God. How would the seeds grow when we are surrounded by the worries and problems in our life? But we forget that the Word of God can help us to face those worries and challenges and come out of them safe. It leads us to God, gives strength and inspiration. Whatever may be the soil of hearts but if we are open and ready to do the will of God in our life, then it will certainly bear much fruit. Jesus is that word made flesh, who was obedient unto death on a cross and set an example before us. Is the soil of my heart ready for the seeds of the word of God?
✍ -Fr. Johnson B. Maria (Gwalior Diocese)
सन्त मत्ती (13: 1-9, 18-23), सन्त मारकुस (4: 1-9, 13-20) और संत लूकस (8: 4-8, 11-15) एक दृष्टान्त का वर्णन करते हैं जिसका शीर्षक है ’बोनेवाले का दृष्टान्त’। हालाँकि दृष्टांत का शीर्षक ’बोनेवाले का दृष्टान्त’ है, इसके अन्दर्गत हमें बोने वाले पर ध्यान केंद्रित करने वाला कोई संदेश नहीं मिलता है। इस में बोने वाले के व्यक्तित्व पर प्रकाश नहीं डाला गया है। इसके बजाय, दृष्टांत के साथ-साथ स्पष्टीकरण भी विभिन्न प्रकार की मिट्टी या खेतों पर ध्यान केंद्रित करता है – रास्ते के किनारे की ज़मीन, चट्टानी जमीन, कांटेदार जमीन और अच्छी ज़मीन।
दृष्टान्त के अनुसार चार प्रकार की ज़मीन हैं। इन चारों में से तीन कुछ भी उत्पादन करने में विफल रहती हैं। इन चारों में से केवल एक को 'अच्छी मिट्टी' कहा जाता है। हमारे लिए इस तथ्य पर ध्यान देना भी महत्वपूर्ण है कि जहां एक क्षेत्र को अच्छा ’करार दिया जाता है, वहीं अन्य को ’बुरा’, या ’कुछ अच्छा ’ या ’बहुत बुरा’ के रूप में नहीं बताया गया है, जिस प्रकार के विकल्प हम कुछ सर्वेक्षणों में पाते हैं।
दृष्टांत से स्पष्ट है कि येसु चाहते हैं कि हम प्रेम और लगन के साथ ईशवचन को स्वीकार करें। हमें अपनी आंखों से प्रभु को खोजना चाहिए, अपने कानों को उनकी ओर लगाना है, उनके वचनों को समझने के लिए दिमाग का उपयोग करना चहिए और दिल से उनके वचनों को प्यार करना चाहिए। इन सभी के साथ, हमें अपने दिलों में बोए गए वचन को पोषित करने के लिए निरन्तर प्रयास करने की आवश्यकता है। तब हमें अच्छी फसल मिलेगी।
यिरमियाह 4: 3-4 में, प्रभु कहते हैं, " अपनी पड़ती ज़मीन को जोतो और काँटों में बीज मत बोओ। यूदा के लोगों और येरूसालेम के निवासियों! प्रभु के लिए अपने शरीर और अपने हृदय का ख़तना करो। नहीं तो तुम्हारे कुकर्मों के कारण मेरा क्रोध आग की तरह भड़क उठेगा और कोई उसे बुझाने में समर्थ नहीं होगा।“ यहाँ यह स्पष्ट है कि विषय-वस्तु मानव हृदय है। नबी होशेआ कहते हैं, “तुम धार्मिकता बोओ, तो भक्ति लुनोगे। अपनी परती भूमि जोतो, क्योंकि समय आ गया है। प्रभु को तब तक खोजते रहो, जब तक वह आ कर धार्मिकता न बरसाये” (होशेआ 10:12)। नबी एज़्रा के बारे में कहा गया है कि उन्होंने “ प्रभु की संहिता के अध्ययन में, उसके पालन और इस्राएल की विधियों और रीति-रिवाजों की शिक्षा में मन लगाया था" (एज्रा 7:10)।
✍ -फादर फ्रांसिस स्करिया
One of the parables described by all Synoptics (Mt 13:1-9, 18-23 Mk 4:1-9, 13-20; Lk 8:4-8, 11-15) is titled “The Parable of the Sower”. Although the title of the parable is the Parable of the Sower, in the explanation we do not find a message concentrating on the sower. The personality of the sower is not highlighted. Instead, the parable as well as the explanation concentrate on different kinds of soil or fields - foot-path, rocky ground, thorny ground and good soil.
According to the parable there are four types of fields. Three out of these four fields fail to produce anything. Only one out of these four fields is referred to as ‘good soil’. It is also important for us to pay attention to the fact that while one field is termed as ‘good’, others are not termed ‘bad’, ‘somewhat good’, ‘very bad’ as we find options in some surveys conducted.
It is clear from the parable that Jesus wants us to receive the Word of with love. We need to seek the Lord with our eyes. We need to tune our ears to him. We should have a mind prepared to understand His words and a heart to love the Word. Added to all these, we need to make efforts to nurture the Word sown in our hearts. Then we shall find the great harvest.
In Jer 4:3-4, the Lord says, “Break up your fallow ground, and do not sow among thorns. Circumcise yourselves to the Lord, remove the foreskin of your hearts, O people of Judah and inhabitants of Jerusalem, or else my wrath will go forth like fire, and burn with no one to quench it, because of the evil of your doings.” It is evident here that the reference is to the human heart. Prophet Hosea says, “Sow for yourselves righteousness; reap steadfast love; break up your fallow ground; for it is time to seek the Lord, that he may come and rain righteousness upon you.” (Hos 10:12).
About Ezra, it is said that he “had set his heart to study the law of the Lord, and to do it, and to teach the statutes and ordinances in Israel” (Ezra 7:10).
✍ -Fr. Francis Scaria
कौन ऐसा कृषक है, जो बीज अपने हाथ में लेते ही अपने मन में उसको अंकुरित हो कर पौधा बनता और फल देता नहीं देखता? जब कोई बोने के लिए गेहूँ के बीज अपने हाथ में लेता है, उसे वे बीज नहीं बल्कि अंकुरित होने वाले पौधे और उस में लगे दाने दिखने लगते हैं। बडी सावधानी से बीज डालने के बाद वह बेसब्री से इंतजार करता है। दूसरे ही दिन वह बडे सबेरे उठ कर बडी उत्कण्ठा से खेत में जाता है यह देखने के लिए कि मैंने कल जो बीज डाले थे क्या वे अंकुरित हुए या नहीं। शायद उसे और थोडा इंतजार करना पडेगा। दूसरे दिन वह फिर खेत में जाता है और वह यह देख कर खुश हो जाता है कि लगभग पूरे-पूरे बीज अंकुरित हुए हैं। वह इस खुशी को अपनी पत्नी और बच्चों के साथ बाँटता है। जैसे-जैसे बीज उगते और पौधे बन जाते हैं, वह अपने खेत की कई बार परिक्रमा करता है और यह मालूम कर लेता है कि मेरे हाथों से बडी उम्मीदों के साथ डाले गये बीजों की क्या स्थिति है। कभी-कभी अपने लाडले बच्चे को प्यार से स्पर्श करने वाली माँ की तरह अपने पौधों को स्पर्श कर वह अकथनीय आनन्द महसूस करने लगता है।
जैसे ही पौधों पर फूल लगते हैं और फिर दाने, उस के चेहरे पर रौनक आती है और वह अपने घर के आँगन की ठण्डी हवा से ज्यादा अपने खेत की लू को पसन्द करने लगता है। दाने पकने पर वह अपने और अपनों के उज्ज्वल भविष्य के न जाने कितने सपने देखते लगता है। अगर प्राकृतिक आपदाओं, कीड़े-मकोड़ों के आक्रमण, पानी की कमी या खाद के अभाव के कारण पौधे फल उत्पन्न करने योग्य नहीं बनते हैं तो कृषक को कितनी ठेस पहुँचती है? कभी-कभी सब कुछ ठीक रहता है, परन्तु कटनी पर यह मालूम होता है कि बालों में दाने नहीं हैं। इस खोखलेपन से किसान कितना दुखी होता होगा!
मेरा विचार है कि इस प्रक्रिया के प्रथम चरण में मिट्टी बीज को चाहती है और उसे ग्रहण करने के लिए अपने को तैयार करती है। किसान ज़मीन को फाडता है। इस दर्द-भरे अनुभव से मिट्टी को गुजरना ही पडता है। इस के बिना ज़मीन के काँटे दूर नहीं होंगे, मिट्टी में पौधों की जड़ नहीं घुस सकेंगी। तत्पश्चात वह मिट्टी बेसब्री से बीज का इंतजार करती है। जैसे ही बीज बोया जाता है, मिट्टी उस को अपनाती है। उसी के साथ-साथ मिट्टी और बीज के बीच एक प्रकार की साझेदारी शुरू होती है। मिट्टी पौधे की जड़ों को स्वीकार कर लेती है और उसे हृदयंगम कर लेती है। जड़ें मिट्टी की गहराई तक पहुँच जाती हैं और पौधे को मजबूती और ताकत प्रदान करती हैं। कभी-कभी मिट्टी में इतनी नरमी होती है कि पौधे को बारिश की प्रतीक्षा भी नहीं करनी पड़ती है और न हीं सिंचाई की जरूरत होती है। अच्छे फलों को देख कर गौरवान्वित होने वाले कृषक के पुण्य चरण-स्पर्श अनुभव करते ही मिट्टी पुलकित हो उठती है।
बाइबिल के पन्ने पलटते समय हमें ईश्वर में इसी प्रकार का किसान दिखायी देता है। पूरा धर्मग्रन्थ खेत और बीजो के दृष्टान्तों से भरा पड़ा है। हमारे हृदयों में ईश्वर स्वर्गराज्य के बीज बोते जाते हैं और उम्मीद करते हैं कि वे अंकुरित होकर हमारे अन्तरतम में जड़ पकडकर फल उत्पन्न करेंगे। हमारे जीवन में वचन रूपी बीजों को बड़ी लगन तथा तत्परता से ग्रहण करने हेतु हमें अपने हृदयों को तैयार करना चाहिए। पवित्र ग्रन्थ कहता है, “अपनी पडती ज़मीन को जोतो और काटों में बीज मत बोओ” (यिरमियाह 4:3)। हमें अपने हृदयों से पापों के कँटीले झाडों को उखाड कर फेंकना चाहिए। फिर हमें पवित्र आत्मा रूपी पावन जल से हमारे हृदयों को सींचना चाहिए। हमें दुरात्मा रूपी कीडे-मकोडों से हमारे आध्यात्मिक पौधों को बचाना चाहिए। सार्वजनिक सद्भाव से ईश्वर रूपी सूरज सभी लोगों पर बरसाने वाले किरणों का लाभ उठा कर हमें अपने पौधों को बडी आशा प्रदान करना चाहिए। इस प्रकार के दृढ़संकल्प एवं मेहनत के उपरान्त हम फल खोजनेवाले स्वामी के चरण-स्पर्श के लिए उत्कण्ठा से प्रतीक्षा कर सकते हैं।
✍ -फादर फ्रांसिस स्करिया