
विश्वमण्डल का प्रभु महल प्रबंधक शेबना से यह कहता है मैं तुमको तुम्हारे पद से निकालूँगा, मैं तुमको तुम्हारे स्थान से हटा दूँगा। मैं उसी दिन हिजकियाह के पुत्र एलियाकीम को बुलाऊँगा। मैं उसे तुम्हारा परिधान और तुम्हारा कमरबन्द पहनाऊँगा। मैं उसे तुम्हारा अधिकार प्रदान करूँगा। वह येरुसालेम के निवासियों का तथा यूदा के घराने का पिता हो जायेगा। मैं दाऊद के घराने की कुंजी उसके कंधो पर रख दूँगा। यदि वह खोलेगा, तो कोई बन्द नहीं कर सकेगा। यदि वह बन्द करेगा, तो कोई नहीं खोल सकेगा। मैं उसे खूँटे की तरह एक ठोस जगह पर गाड़ दूँगा। वह अपने पिता के घर में एक महिमामय सिंहासन बन जायेगा।
अनुवाक्य : हे प्रभु ! तेरा प्रेम चिरस्थायी है। अपनी सृष्टि को सँभालने की कृपा कर।
हे प्रभु ! मैं सारे हृदय से तुझे धन्यवाद देता हूँ; क्योंकि तूने मेरी सुनी है। मैं स्वर्गदूतों के सामने तेरा गुणगान करूँगा और तेरे पवित्र मंदिर को दण्डवत् करूँगा।
तेरे अपूर्व प्रेम और सत्यप्रतिज्ञता के कारण मैं तुझे धन्यवाद देता रहूँगा। जिस दिन मैंने तुझे पुकारा, उसी दिन तूने मेरी सुनी और मुझे आत्मबल प्रदान किया।
प्रभु महान् है। वह दीनों पर दयादृष्टि करता और घमंडियों से मुँह फेर लेता है। हे प्रभु ! तेरा प्रेम चिरस्थायी है। अपनी सृष्टि को सुरक्षित रखने की कृपा कर।
कितना अगाध है ईश्वर का वैभव, प्रज्ञा और ज्ञान ! कितने दुर्बोध हैं उसके निर्णय ! कितने रहस्यमय हैं उसके मार्ग ! कौन प्रभु का मन जान सकता है? कौन उसका परामर्शदाता हुआ? किसने ईश्वर को कभी कुछ दिया है और इस प्रकार वह बदले में कुछ पाने को दावा कर सकता है? ईश्वर सब कुछ का मूल कारण, प्रेरणा-स्रोत तथा लक्ष्य है उसी को अनन्तकाल तक महिमा ! आमेन !
अल्लेलूया, अल्लेलूया ! हे पिता ! हे स्वर्ग और पृथ्वी के प्रभु ! मैं तेरी स्तुति करता हूँ क्योंकि तूने राज्य के रहस्यों को निरे बच्चों के लिए प्रकट किया है। अल्लेलूया !
येसु ने कैसेरिया फ़िलिपी प्रदेश पहुँच कर अपने शिष्यों से पूछा, "मानव पुत्र कौन है, इसके विषय में लोग क्या कहते हैं?" उन्होंने उत्तर दिया, "कुछ लोग कहते हैं- योहन बपतिस्ता; कुछ कहते हैं- एलियस; और कुछ लोग कहते हैं – येरेमियस, अथवा नबियों में से कोई।" इस पर येसु ने कहा, "और तुम क्या कहते हो कि मैं कौन हूँ?" सिमोन पेत्रुस ने उत्तर दिया, "आप मसीह हैं, आप जीवन्त ईश्वर के पुत्र हैं।" इस पर येसु ने उस से कहा, "सिमोन, योनस के पुत्र ! तुम धन्य हो, क्योंकि किसी निरे मनुष्य ने नहीं, बल्कि मेरे स्वर्गिक पिता ने तुम पर यह प्रकट किया है। मैं तुम से कहता हूँ कि तुम पेत्रुस अर्थात् चट्टान हो और इस चट्टान पर मैं अपनी कलीसिया बनाऊँगा और अधोलोक के फाटक उसके सामने टिक नहीं सकेंगे। मैं तुम्हें स्वर्गराज्य की कुंजियाँ प्रदान करूँगा। तुम पृथ्वी पर जिसका निषेध करोगे, स्वर्ग में भी उसका निषेध रहेगा और पृथ्वी पर जिसकी अनुमति दोगे, स्वर्ग में भी उसकी अनुमति रहेगी।" इसके बाद येसु ने अपने शिष्यों को कड़ी चेतावनी दी कि तुम लोग किसी को भी यह न बताओ कि मैं मसीह हूँ।
प्रभु का सुसमाचार।
येसु हमारे लिए कौन है? यह प्रश्न हम सभी के लिए एक व्यक्तिगत प्रश्न है। येसु के बारे में हमने कई लोगों से सुना होगा- हमारे माता पिता से, पुरोहित-धर्मबहनों से, केटिकिसम शिक्षक से या किसी और से परंतु हमारे लिए वास्तव में येसु कौन है? इसका उत्तर केवल हमारा प्रभु के साथ व्यक्तिगत अनुभव ही दे पायेगा। और यह उत्तर और उस उत्तर की वास्तविकता ही हमें येसु के करीब आने और उसकी आराधना करने के लिए प्रेरित करेगी। आज हम सब के लिए विशेष रूप से सभी ख्रीस्तीयों के लिए यह अनुभव करना जरूरी है कि वास्तव में येसु मेरे लिए कौन है?
✍फादर डेन्नीस तिग्गाWho is Jesus to us? This question is a personal question for all of us. We may have heard about Jesus from many people - from our parents, from the priest-sisters, from the catechism teacher or from anyone else but who is Jesus really for us? Only our personal experience with the Lord can answer this. And it is this answer and the reality of that answer that will lead us to draw closer to Jesus and worship him. Today it is important for all of us, especially for all Christians, to realize who Jesus really is for me.
✍ -Fr. Dennis Tigga
हमारा देश बहुत से साधु-महात्माओं और ईश्वर को खोजने वाले ऋषि-मुनियों के उदाहरणों से भरा पड़ा है। हर देश में ईश्वर को खोजने वाले ऐसे लोग होते हैं। हम सन्त अगस्टिन की उस कहानी से परिचित हैं, जब वह ईश्वर के रहस्य को समझने की कोशिश कर रहे थे, और इसी कोशिश के दौरान एक बार जब वह अकेले समुंदर के किनारे गहन मनन-चिंतन में मगन टहल रहे थे, तभी उन्होंने देखा कि एक छोटा सा बालक अपने नन्हे-नन्हे हाथों से समुंदर के पानी को भरकर किनारे पर बालू में बने एक छोटे से गड्डे में भरने की चेष्टा कर रहा था। वह पानी लाने के लिए बहुत कठिन प्रयास कर रहा थे, लेकिन कुछ नहीं हो पा रहा था। उसके अथक प्रयास को देखते हुए, सन्त अगस्टिन ने उससे पूछा, “क्या कर रहे हो मुन्ना?” बच्चे ने कहा, “मैं इस समुंदर के सारे पानी को इस छोटे से गड्डे में भर रहा हूँ।” सन्त अगस्टिन उस नन्हे बालक की अज्ञानता पर हँस पड़े और बोले, “बेटे इतने बड़े समुंदर को तुम इतने छोटे से गड्डे में कैसे भर सकते हो?” बच्चे ने उत्तर दिया, “वही तो आप कर रहे हैं।” संत अगस्टिन अपने छोटे से दिमाग़ में अनंत ईश्वर के रहस्य को समाने का असम्भव प्रयास कर रहे थे। बाद में उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ। हमारे छोटे से मस्तिष्क में जिसे खुद ईश्वर ने बनाया है, उसी ईश्वर का रहस्य कैसे समा सकता है? कोई भी ईश्वर के रहस्य को पूरी तरह से नहीं जान सकता, क्योंकि हम उसी के हाथों की रचना हैं।
लेकिन आज हम देखते हैं कि प्रभु येसु यह पता लगाना चाहते थे कि क्या उनके शिष्य उन्हें जानते हैं। उन्होंने प्रभु येसु के बारे में दूसरों की राय बतायी। अक्सर हम स्वयं ईश्वर को जाने और अनुभव किए बिना दूसरों के अनुभव और ज्ञान में आनंद मनाते हैं, दूसरों का ईश्वरीय अनुभव और ज्ञान क्या है, और कैसा है। प्रभु येसु के बारे में दूसरों का ज्ञान भी पूर्ण नहीं था। कुछ लोगों ने प्रभु येसु को योहन बप्तिस्ता समझ लिया, शायद इसलिए कि प्रभु येसु में संत योहन से मिलती-जुलती कुछ समानताएँ थीं। उन्होंने सत्य बोला, ग़लत रास्ते पर जाने वाले लोगों को सही राह पर लाने का प्रयास किया, और उसने राजा को लौमडी कहकर पुकारा, क्योंकि वह उससे नहीं डरता था, उसने मौलिक जीवन जिया। लेकिन यह उसका असली परिचय नहीं था।
कुछ लोगों ने उसे महान नबी येरेमियाह अथवा नबी एलियस समझा, उनमें भी प्रभु येसु से मिलती-जुलती समानताएँ थीं, लेकिन वह भी उसका असली परिचय नहीं था। और अंततः प्रभु येसु अपने शिष्यों से उनके व्यक्तिगत अनुभव के बारे में पूछते हैं, और संत पेत्रुस जवाब देने के लिए आगे आते हैं। आज प्रभु येसु हममें से प्रत्येक को वहीं सवाल पूछते हैं, “तुम क्या कहते हो कि मैं कौन हूँ?” मेरा उत्तर क्या होगा? मेरे व्यक्तिगत जीवन में प्रभु येसु को कैसे अनुभव किया है? ईश्वर या प्रभु येसु का मेरा अपना क्या अनुभव है? क्या वह मेरे मुक्तिदाता हैं, चंगाई दाता या चमत्कार करने वाला? एक मित्र या एक सान्त्वनादाता है? इसका जवाब पाने के लिए अपने मन में झांककर देखें।
✍ - फादर जॉन्सन बी. मरिया (ग्वालियर धर्मप्रान्त)
India is a land known for its number of sages and seekers of God. In every land there are people having quest for knowing God. We are well familiar with the story of St. Augustine who was trying to understand God and in this pursuit, one day he was spending sometime walking and reflecting about understanding God. He was trying very hard and using his mind to understand God and then he saw a small child who was trying to fill water with his hands in a small pit that he had made in the sand. He was trying very hard to bring water but it was all in vain. Seeing how desperate he was, Augustine asked him, “What are you doing, child?” He said, “I am going to fill the whole water of this ocean into this small hole.” Augustine laughed at his ignorance and said, “How can you fill such a vast ocean into this small tiny hole?” The child replied, “That’s what you are doing.” St. Augustine was trying to understand the mystery of God with tiny small mind. How can our tiny brain contain such a vast mystery? No one can know God fully, we are just creation of his hands.
But today we see Jesus, trying to find out whether the disciples know him. They replied about what others said about Jesus. Very often instead of knowing and experiencing God for ourselves, we try to feast on others experience and explanation of God, what and how others understand God. Even others had not understood Jesus fully. Some understood Jesus as John the Baptist, perhaps because Jesus had some similarities with John. He spoke truth, he corrected those who went on wrong path, he was not afraid of the king whom he called ‘fox’, and he lived a radical life. But that was not his real identity.
Others understood him to be some great prophet like Elijah or Jeremiah, they both also had similarities that matched with Jesus, but that either was not his real identity. Then finally Jesus asks their personal experience of him and Peter comes forward with the answer. Today Jesus asks each one of us the same question “Who do you say that I am?” what will be my answer? How have I experienced Jesus in my personal life? What is my personal experience of God or Jesus? Is he a saviour for me? A healer, a miracle worker? A friend, a consoler? Let us ask ourselves.
✍ -Fr. Johnson B.Maria (Gwalior)
प्रभु येसु ने अपने जीवन काल में शिष्यों को शिक्षा दी, उनके साथ समय बिताया, उनके विश्वास को दृढ़ बनाया तथा अपने दुखभोग, मरण तथा पुनरुत्थान के बारे में उन्हें समझाया ताकि शिष्य भविष्य में निडर हो कर दृढ़तापूर्वक ईश्वर के राज्य की घोषणा कर सकें।
आज के सुसमाचार में हम देखते हैं कि प्रभु शिष्यों की परीक्षा लेते हैं। वे जानना चाहते हैं कि शिष्यों ने इतने वर्षों में क्या सीखा, क्या समझा और क्या अनुभव किया। इसलिए प्रभु येसु अपने शिष्यों से प्रश्न करते हैं कि ’मैं कौन हूँ’ इस विषय में लोग क्या कहते हैं। तुरन्त ही वे उन्हें बताने लगते हैं कि कुछ लोग आपको योहन बपतिस्ता, कुछ एलियस, कुछ यिरमियाह और कुछ नबियों में से कोई कहते हैं। फिर वे उनसे एक व्यक्तिगत प्रश्न करने लगते हैं कि तुम क्या कहते हो कि मैं कौन हूँ। इसका उत्तर देने में शिष्य सोच में पड जाते हैं। सिर्फ पेत्रुस उत्तर देते हैं, “आप मसीह हैं, आप जीवन्त ईश्वर के पुत्र हैं।”
पवित्र बाइबिल में हमें पढ़ने को मिलता है कि लोगों ने अपने अनुभव के आधार पर प्रभु येसु के बारे में कुछ न कुछ कहा। जैसे फरीसियों ने उन्हें बढई का बेटा माना, समारी स्त्री ने उन्हें नबी कहा और निकोदेमुस ने उन्हें गुरू तथा इस्राएल का राजा कहा। इस प्रकार अलग-अलग लोगों ने अपने-अपने अनुभव के आधार पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की।
आज प्रभु येसु हम से भी व्यक्तिगत प्रश्न करते हैं कि तुम क्या कहते हो कि मैं कौन हूँ? हम सब इस प्रश्न का जवाब अपने ख्रीस्तीय जीवन के अनुभव के द्वारा ही दे सकते हैं। हम सबों के उत्तर शायद भिन्न-भिन्न होंगे। किसी के लिए वे चंगाईदाता हैं, तो किसी के लिए शांतिदाता या दयासागर, प्रेमी पिता या मित्र । अगर किसी व्यक्ति ने अपने जीवन में येसु को करीब से अनुभव नहीं किया हो, तो उसके लिए इस प्रश्न का जवाब देना असंभव है।
जब पेत्रुस ने कहा, “आप मसीह हैं, आप जीवन्त ईश्वर के पुत्र हैं” तब येसु पेत्रुस से कहते हैं, “सिमोन, योनस के पुत्र, तुम धन्य हो, क्योंकि किसी निरे मनुष्य ने नहीं, बल्कि मेरे स्वर्गिक पिता ने तुम पर यह प्रकट किया है”। इसका यह मतलब है कि जब तक ईश्वर अपने आप को प्रकट नहीं करते हैं, तब तक हम उन्हें नहीं जान सकते हैं।
आज के पहले पाठ में संत पौलुस कहते हैं, “कितना अगाध है ईश्वर का वैभव, प्रज्ञा और ज्ञान! कितने दुर्बोध हैं उसके निर्णय! कितने रहस्यमय हैं उसके मार्ग! प्रभु का मन कौन जान सका?” (रोमियों 11:33-34)
हालाँकि हम ईश्वर का अनुभव कर सकते हैं और उस अनुभव के आधार पर उन के विषय में कुछ न कुछ कह सकते हैं, वह सब ज्ञान गहरा नहीं हो सकता जब तक ईश्वर स्वयं अपने आप को हमारे लिए प्रकट करने की कृपा न करें। ईश्वर को प्यार करने वालों को और उनके समक्ष बच्चों जैसा बनने वालों के सामने ईश्वर अपने आप को प्रकट करते हैं। मत्ती 11:25-27 में प्रभु येसु कहते हैं, “पिता! स्वर्ग और पृथ्वी के प्रभु! मैं तेरी स्तुति करता हूँ; क्योंकि तूने इन सब बातों को ज्ञानियों और समझदारों से छिपा कर निरे बच्चों पर प्रकट किया है। हाँ, पिता! यही तुझे अच्छा लगा। मेरे पिता ने मुझे सब कुछ सौंपा है। पिता को छोड़ कर कोई भी पुत्र को नहीं जानता। इसी तरह पिता को कोई भी नहीं जानता, केवल पुत्र जानता है और वही, जिस पर पुत्र उसे प्रकट करने की कृपा करे।”
इस से हम यह समझ सकते हैं कि हम अपने दिमाग से ईश्वर का पक्का ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकते हैं। हमें ईश्वरीय ज्ञान के लिए ईश्वर से ही गिडगिडा कर याचना करना चाहिए। सूक्ति 2:1-6 में प्रभु का वचन कहता है, “पुत्र! यदि तुम मेरे शब्दों पर ध्यान दोगे, मेरी आज्ञाओं का पालन करोगे, प्रज्ञा की बातें कान लगा कर सुनोगे और सत्य में मन लगाओगे; यदि तुम विवेक की शरण लोगे और सद्बुद्धि के लिए प्रार्थना करोगे; यदि तुम उसे चाँदी की तरह ढूँढ़ते रहोगे और खजाना खोजने वाले की तरह उसके लिए खुदाई करोगे, तो तुम प्रभु-भक्ति का मर्म समझोगे और तुम्हें ईश्वर का ज्ञान प्राप्त होगा; क्योंकि प्रभु ही प्रज्ञा प्रदान करता और ज्ञान तथा विवेक की शिक्षा देता है।”
नबी दानिएल कहते हैं “ईश्वर का नाम सदा-सर्वदा धन्य है, प्रज्ञा और शक्ति उसी की है; काल और ऋतु उसी के हाथ में हैं; वही राजाओं की प्रतिष्ठा करता और उनके सिंहासन उलटता है। वही विद्वानों को प्रज्ञा देता है और समझदारों को समझ। वही गूढ़ रहस्यों को प्रकट करता है, वही अंधकार में छिपे भेद जानता है, क्योंकि उस में ज्योति का निवास है। (दानिएल 2:20-22)
- फादर विपिन तिग्गा