वर्ष का तेईसवाँ सप्ताह, इतवार - वर्ष A

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पहला पाठ

मनुष्य न केवल अपने लिए बल्कि कुछ हद तक अपने भाइयों के लिए भी ज़िम्मेदार है। यह बात विशेष रूप से उन लोगों पर लागू है जिन्हें कोई अधिकार मिला है। यहाँ नबी एज़ेकिएल की जिम्मेदारी की चरचा है।

नबी एज़ेकिएल का ग्रंथ 33:7-9

"यदि तुम कुमार्ग छोड़ने के लिए दुष्ट को चेतावनी नहीं दोगे, तो तुम उसकी मृत्यु के लिए उत्तरदायी होगे।"

प्रभु ने मुझ से यह कहा, "मानव पुत्र ! मैंने तुम को इस्राएल के घराने का पहरेदार नियुक्त किया है। तुम मेरी वाणी सुनोगे और इस्राएलियों को मेरी ओर से चेतावनी दोगे। यदि मैं किसी दुष्ट से कहूँ, 'रे दुष्ट ! तू मर जायेगा,' और तुम कुमार्ग छोड़ने के लिए उसे चेतावनी नहीं दोगे, तो वह अपने पाप के कारण मर जायेगा, किन्तु तुम उसकी मृत्यु के लिए उत्तरदायी होगे। और यदि तुम कुमार्ग छोड़ने के लिए उसे चेतावनी दोगे और वह तुम्हारी बात नहीं मानेगा, तो वह अपने पाप के कारण मर जायेगा, किन्तु तुम्हारा जीवन सुरक्षित रह जायेगा।"

प्रभु की वाणी।

भजन : स्तोत्र 94:1-2,6-9

अनुवाक्य : ओह ! यदि तुम आज उसकी यह वाणी सुनो अपना हृदय कठोर न बनाओ।

आओ ! हम प्रभु के सामने आनन्द मनायें, अपने शक्तिशाली त्राणकर्ता का गुणगान करें। हम स्तुति करते हुए उसके पास जायें भजन गाते हुए धन्य कहें।

आओ ! हम दण्डवत् कर प्रभु की आराधना करें, अपने सृष्टिकर्ता के सामने घुटने टेकें। वही तो हमारा ईश्वर है और हम हैं उसके चरागाह की प्रजा, उसकी अपनी भेड़ें।

ओह ! यदि तुम आज उसकी यह वाणी सुनो, "अपना हृदय कठोर न बनाओ, जैसा कि पहले मरीबा और मस्सा की मरुभूमि में हुआ था। उस दिन तुम्हारे पूर्वजों ने मेरी परीक्षा ली। मेरे कार्यों को देखते हुए भी, उन्होंने मुझ में विश्वास नहीं किया।"

दूसरा पाठ

सुसमाचार तथा प्रेरितों के पत्रों में यह बात बहुत बार दुहरायी गयी है कि ईश्वर की सभी आज्ञाओं का सार है - ईश्वर का प्रेम तथा भ्रातृप्रेम। ईश्वर के प्रति हमारे प्रेम की कसौटी है हमारा भ्रातृप्रेम।

रोमियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 13:8-10

"जो प्यार करता है, वह संहिता के सब नियमों का पालन करता है।"

भ्रातृप्रेम का ऋण छोड़ कर और किसी बात में किसी का ऋणी न बनें। जो दूसरों को प्यार करता है, उसने संहिता के सभी नियमों का पालन किया। 'व्यभिचार मत करो, हत्या मत करो, चोरी मत करो, लालच मत करो'। इनका तथा अन्य सभी दूसरी आज्ञाओं का सारांश यह है- अपने पड़ोसी को अपने समान प्यार करो। प्रेम पड़ोसी के साथ अन्याय नहीं करता। इसलिए जो प्यार करता है, वह संहिता के सभी नियमों का पालन करता है।

प्रभु की वाणी।

जयघोष

अल्लेलूया, अल्लेलूया ! हे पिता ! हे स्वर्ग और पृथ्वी के प्रभु मैं तेरी स्तुति करता हूँ। क्योंकि तूने राज्य के रहस्यों को निरे बच्चों के लिए प्रकट किया है। अल्लेलूया !

सुसमाचार

भ्रातृप्रेम का एक कर्त्तव्य यह है कि हम अपने भाई के सुधार का ध्यान रखें और जहाँ तक हम से बन पड़े, उसे प्रेमपूर्वक समझायें। हमारे भ्रातृप्रेम का एक दूसरा पहलू यह भी है कि हम एकमत हो कर प्रार्थना करें, क्योंकि जहाँ दो या तीन व्यक्ति येसु के नाम पर इकट्ठे हैं, वहाँ वह उनके बीच विद्यमान हो जाते हैं।

मत्ती के अनुसार पवित्र सुसमाचार 18:15-20

"यदि वह तुम्हारी बात मान जाता है, तो तुमने अपने भाई को बचा लिया।"

येसु ने अपने शिष्यों से कहा, "यदि तुम्हारा भाई कोई अपराध करता है, तो जा कर उसे अकेले में समझाओ। यदि वह तुम्हारी बात मान जाता है, तो तुमने भाई को बचा लिया। यदि वह तुम्हारी बात नहीं मानता, तो और दो-एक व्यक्तियों को साथ ले जाओ। ताकि दो या तीन गवाहों के सहारे सब कुछ प्रमाणित हो जाये। यदि वह उनकी भी नहीं सुनता, तो कलीसिया को बता दो। और यदि वह कलीसिया की भी नहीं सुनता, तो उसे गैर-यहूदी और नाकेदार जैसा समझो। "मैं तुम से कहे देता हूँ : तुम लोग पृथ्वी पर जिसका निषेध करोगे, स्वर्ग में भी उसका निषेध रहेगा; और पृथ्वी पर जिसको अनुमति दोगे, स्वर्ग में भी उसकी अनुमति रहेगी। "मैं तुम से वह भी कहे देता हूँ : यदि पृथ्वी पर तुम लोगों में से दो व्यक्ति एकमत हो कर कुछ भी माँगेंगे, तो वह उन्हें मेरे स्वर्गिक पिता की ओर से निश्चय ही मिलेगा, क्योंकि जहाँ दो या तीन मेरे नाम पर इकट्ठे होते हैं, वहाँ मैं उनके बीच उपस्थित रहता हूँ।"

प्रभु का सुसमाचार।


📚 मनन-चिंतन

आज का सुसमाचार मेल-मिलाप के लिए विभिन्न स्तरों के प्रयासों को नियोजित करने की आवश्यकता के बारे में हमें समझाता है। प्रभु ईश्वर पापी के प्रति दयालु हैं। निर्गमन 34:6-7 में, हम पढ़ते हैं, "प्रभु एक करूणामय तथा कृपालु ईश्वर है। वह देर से क्रोध करता और अनुकम्पा तथा सत्यप्रतिज्ञता का धनी है। वह हजार पीढ़ियों तक अपनी कृपा बनाये रखता और बुराई, अपराध और पाप क्षमा करता है।" प्रभु भला गडरिया है जो खोई हुई भेड़ को खोजता और वापस लाता है। कभी-कभी पापी वापस न लौटने की स्थिति तक पहुँच जाता है, हठी और पाप में डटा रहता है। येसु ने कई तरीकों से यूदस को यह संकेत देने की कोशिश की कि जिस विश्वासघात की उसने योजना बनाई थी, उससे बचा जा सकता है। फिर भी यूदस ने यह सब अनसुना कर दिया। येरूसालेम पर येसु का विलाप भी एक निराशाजनक स्थिति को दर्शाता है। “येरूसालेम! येरूसालेम! तू नबियों की हत्या करता और अपने पास भेजे हुए लोगों को पत्थरों से मार देता है। मैंने कितनी बार चाहा कि तेरी सन्तान को एकत्र कर लूँ, जैसे मुर्गी अपने चूज़ों को अपने डैनों के नीचे एकत्र कर लेती है, परन्तु तुम लोगों ने इनकार कर दिया।” (लूकस 13:34)। मसीह ही विश्वासियों को एक बनाता है। विश्वासियों की संयुक्तता में प्रभु येसु अपने आपको प्रकट करते हैं। विभाजित होने के कारण, हम मसीह को संसार के सामने प्रस्तुत करने में असफल होते हैं। कलीसिया की संयुक्तता केवल आसान प्रशासन के लिए नहीं है बल्कि यह उसके अस्तित्व के लिए आवश्यक है। जब विश्वासियों के समुदाय में कोई संयुक्तता नहीं होती है तो कलीसिया का अस्तित्व नहीं हो सकता है, क्योंकि ऐसे समूहों में उनके बीच मसीह नहीं रहता है।

- फ़ादर फादर फ्रांसिस स्करिया


📚 REFLECTION

Today’s Gospel passage speaks about the need to employ various levels of attempt for reconciliation. God is compassionate towards the sinner. In Ex 34:6-7, we read, “The Lord, the Lord, a God merciful and gracious, slow to anger, and abounding in steadfast love and faithfulness, keeping steadfast love for the thousandth generation”. The Lord is the Good Shepherd who seeks and brings back the lost sheep. Sometimes the sinner reaches a point of no return, stubborn and persisting in sin. Jesus tried to indicate to Judas in many ways that the betrayal he planned could be avoided. Yet Judas turned a deaf ear to it all. Jesus’ lament over Jerusalem also depicts a disheartening situation. “Jerusalem, Jerusalem, the city that kills the prophets and stones those who are sent to it! How often have I desired to gather your children together as a hen gathers her brood under her wings, and you were not willing!” (Lk 13:34). For the believers the uniting factor is Christ himself. He is made present in their communion. By being divided, we fail to present Christ to the world. The communion of the Church is not just meant for easy administration but it is essential for its very being. When there is no communion, the Church cannot exist, because in such groups there is no Christ in their midst.

-Fr. Francis Scaria

📚 मनन-चिंतन-2

आज के सुसमाचार में प्रभु येसु ने हमें भाई के सुधार के विषय में बताया है। जब आपक किसी का सुधार करते हैं और वह आपकी मानने को तैयार नहीं होता है तो, दो या तीन व्यक्तियों को बुलाके समझाओ, फिर भी ना समझे तो कलीसिया को बता दो। यह सब कहकर येसु अपने शिष्यों से कह रहे थे की किसी को सही मार्ग पर लाने का भरपूर प्रयास करना चाहिए। यह आवश्यक नहीं कि आपके एक बार कहने पर कोई तुरंत सही मार्ग पर आ जाये।

हम चाहे तो बहुतों को स्वर्ग राज्य में ला सकते हैं और इसके विपरीत हम बहुतों को स्वर्ग राज्य से दूर या वंचित भी कर सकते हैं। हम सब से अंत में हिसाब माँगा जायेगा। जैसा की उत्पत्ति 4:9 में प्रभु ने काईन से पूछा "तुम्हारा भाई हाबिल कहाँ है ? इस पर उसने उत्तर दिया क्या मैं अपने भाई का रखवाला हूँ?" प्रभु हमसे पूछेगा की तुम्हारा भाई, तुम्हारी बहन कहाँ है, वे पाप के किन रास्तों पर भटक रहे हैं? तो हम काईन की तरह यह नहीं कह सकते की क्या मैं उसका रखवाला हूँ? नहीं कदापि नहीं। मैं ज़रूर अपने भाई, अपनी बहन का रखवाला हूँ। मैं अपने भाई और बहन के लिए, उनकी ज़िन्दगी के लिए ज़िम्मेदार हूँ।

पवित्र बाइबल हमें सिखलाती है कि हम खुद के उद्धार के साथ ही साथ दूसरों के उद्धार के लिए भी जिम्मेदार हैं। आज के पहले पाठ में प्रभु कहते हैं कि यदि हमने अपने किसी भाई को बुराई के मार्ग पर चलते देखा और उसे प्रभु के मार्ग की शिक्षा नहीं दी, उसे चेतावनी नहीं दी, उसे अपने मार्ग सुधारने को नहीं कहा तो वह व्यक्ति अपने पाप में मर जाएगा। याने उसे उद्धार नहीं मिलेगा। और प्रभु इसके लिए मुझे दोषी मानेगा। किन्तु यदि मैं किसी को उसके कुकर्मों से मन फिराकर सही मार्ग पर आने की शिक्षा दूँ और वह व्यक्ति मेरी बात ना माने तो वो अपनी बुराई में ही मर जायेगा उसका सर्वनाश होगा परन्तु मेरा जीवन बचा रहेगा।

- फादर प्रीतम वसुनिया (इन्दौर धर्मप्रांत)


📚 REFLECTION

In today's gospel, Lord Jesus tells us about correct our fellow brothers and sisters. If the person does not listen to your admonition, then call two or three persons and try to make the person understand. If still he/she does not understand then bring his/her case to the Church authority. The point Jesus wants make here is that we have to take all the measures possible in order to reprove and bring back one of our lost brother/sisters. It is not necessary that once you correct someone and immediately that person would come to the right path.

If we want, we can bring many people to the kingdom of heaven and on the contrary, we can also take away or deprive many of them from the kingdom of heaven. We will have to give an account of what we have done for our fellow brothers and sisters. As in Genesis 4: 9, the Lord asked Cain "Where is your brother Abel? To this he replied, Am I my brother's keeper?" The Lord will ask us, where is your brother, where is your sister, on which way are they wandering in their sinfulness? So we cannot say like Cain- Am I his guardian? No, not at all. I am definitely my brother’s/sister's keeper. I am responsible for my life as well as for my brothers’ and sisters’.

The Holy Bible teaches us that we are responsible for the salvation of ourselves as well as the salvation of others. In the first reading today, God says that if we’ve seen one of our brothers walking on the path of evil and did not teach him the way of the Lord, did not warn him, did not ask him to improve his path, then that person would die in his sin. God will hold me responsible for this. But if I teach someone to repent from his/her misdeeds and come to the right path and if that person does not listen to me, then he will die in his own evil, he will perish, but my soul will be safe.

-Fr. Preetam Vasuniya (Indore Diocese)

मनन-चिंतन -3

संत मारकुस के सुसमाचार अध्याय 12 में हम एक घटना देखते हैं जिस में प्रभु येसु मंदिर के खजाने के सामने बैठे हैं और लोगों को उस में सिक्के डालते हुए देखते हैं। बहुत से धनी व्यक्तियों ने उस खजाने में अपना दान डाला। एक कंगाल विधवा भी वहाँ आयी और उस ने दो अधेले अर्थात एक पैसा उस खजाने में डाल दिया। इस पर प्रभु ने उस विधवा की प्रशंसा करते हुए अपने शिष्यों से कहा कि खज़ाने में पैसे डालने वालों में से इस विधवा ने सब से अधिक डाला है क्योंकि सब ने अपनी समृद्धि के अनुसार बड़ी-बड़ी राशि डाली परन्तु इस विधवा ने गरीबी एवं तंगी का जीवन जीते हुए भी अपनी जीविका के लिए जो कुछ था वह सब कुछ दे डाला।

इस घटना की एक विशेषता यह है कि प्रभु ने उस महिला के दान पर ध्यान देते हुए उसकी प्रशंसा की। शायद प्रभु के शिष्यों और वहाँ उपस्थित लोगों ने इस गरीब विधवा तथा उसके दान पर ध्यान ही नहीं दिया होगा। लेकिन प्रभु ने उस विधवा एवं उसके दान को देखा और उसके इस कार्य के लिए उसकी प्रशंसा भी की।

सुसमाचारों में हम देखते हैं कि प्रभु मनुष्यों की छोटी सी छोटी भलाई पर भी ध्यान देते हैं और उसकी प्रशंसा करते हैं विशेषकर जब लोग इन भलाइयों को अनदेखा करते हैं।

आज के सुसमाचार व पहले पाठ में ईश्वर का वचन हमें पापियों को गलत मार्गों से छुड़ाने और उन्हें ईश्वर के वचनों के आधार पर चलने में मदद करने के हमारे कर्तव्य की याद दिलाते हैं। संत याकूब 5:19-20 में वचन कहते है जो किसी पापी को कुमार्ग से वापस ले आता है वह उसकी आत्मा को मृत्यु से बचाता है और बहुत से पाप ढाँक देता है। पापियों को गलत मार्गों अथार्त पाप-मार्ग से छुड़ाना और उन्हें ईश्वर के वचनों के आधार पर चलने में सहायता देना सभी विश्वासियों का कर्तव्य है। प्रभु येसु ने अपने जीवन काल में हमेशा यही किया है। सुसमाचार की एक घटना के आधार पर हम देख सकते हैं कि प्रभु कैसे लोगों को पापों से दूर व ईश्वर के करीब लाते हैं।

संत लूकस के सुसमाचार अध्याय 7 में हम प्रभु येसु को एक फरीसी के घर में भोजन करते हुए देखते हैं। वहाँ एक स्त्री आती हैं और अपने आँसुओं से उनके चरण भिगोने लगती है और अपने केशों से उसे पोछती है। वहाँ जितने भी लोग उपस्थित थे वे सभी उस स्त्री से परिचित थे क्योंकि वह एक पापिनी स्त्री थी। इसे देख कर सभी आश्चर्यचकित थे क्योंकि प्रभु ने एक पापिनी स्त्री को अपने पास आने दिया। सब लोग इस स्त्री के बारे में जानते थे। लेकिन उन सभी लोगों से ज़्यादा प्रभु उस स्त्री के पापों को जानते थे फिर भी प्रभु ने लोगों को उसके पापों के बारे में नही बताया बल्कि उनके प्रति उसके प्यार की प्रशंसा की। सभी ने उस स्त्री में बुराइयाँ देखीं परन्तु प्रभु ने उसकी भलाई को देखा। प्रभु लोगों में उनकी भलाई को देखते हैं भले ही वह भलाई छोटी ही क्यों न हो और उनकी प्रशंसा भी करते हैं। यह बात लोगों को पापों से दूर जाने और प्रभु के करीब रहने की प्रेरणा एवं कृपा देती है।

उड़ाऊ पुत्र के दृष्टान्त में भी हम यही देखते हैं कि उड़ाउ पुत्र का भाई अपने पिता से उड़ाऊ पुत्र की गलतियों व पापों के बारे में कहता है। लेकिन पिता, पुत्र की गलतियों व कमज़ोरियों को नहीं बल्कि उसकी अच्छाइयों को देखता है और खुश है कि वह घर वापस आया है। बहुत सारी गलतियों के बावजूद पिता अपने पुत्र की प्रशंसा करता है।

संत लूकस के सुसमाचार अध्याय 10 में हम एक दृष्टान्त पढ़ते हैं, जिसमें दो लोग प्रार्थना करने के लिए मंदिर में जाते हैं। एक फरीसी और एक नाकेदार। फरीसी उस नाकेदार में बहुत-सी गलतियाँ व कमियाँ देखता है, लेकिन प्रभु उस नाकेदार में भी भलाई देखते हैं और उस नाकेदार की प्रशंसा करते हैं।

हम भी अक्सर एक-दूसरें में गलतियों को ढूँढते हैं और उसकी चर्चा भी लोगों से करने लगते हैं। लोगों की भलाई देखने में हम भी अक्सर चूक जाते हैं। आज हम प्रभु से दूसरों की भलाई देखने की कृपा माँगे ताकि हम भी प्रभु के समान लोगों को पापों से दूर और प्रभु के करीब लाने में सफल हो जाएं।

-फादर वर्गीस पल्लिपरम्पिल