
विद्वेष और क्रोध घृणित हैं, तो भी पापी दोनों किया करता है। ईश्वर बदला लेने वाले को दण्ड देगा और उसके पापों का पूरा-पूरा लेखा रखेगा। अपने पड़ोसी का अपराध क्षमा कर दो। और विनय करने पर तुम्हारे पाप क्षमा किये जायेंगे । यदि कोई अपने मन में दूसरों पर क्रोध बनाये रखता हो, तो वह प्रभु से दया की आशा कैसे कर सकता है? यदि वह अपने भाई पर दया नहीं करता, तो वह अपने पापों के लिए क्षमा कैसे माँग सकता है? निरा मनुष्य होते हुए भी यदि वह बैर बनाये रखता हो, तो उसे अपने पापों की क्षमा कैसे मिल सकती है? अंतिम बातों का ध्यान रखो और बैर रखना छोड़ दो। विकृति तथा मृत्यु का ध्यान रखो और आज्ञाओं का पालन करो। आज्ञाओं का ध्यान रखो और अपने पड़ोसी से बैर न रखो । सर्वोच्च ईश्वर के विधान का ध्यान रखो और दूसरों के अपराध क्षमा कर दो।
प्रभु की वाणी।
अनुवाक्य : प्रभु दया तथा अनुकम्पा से परिपूर्ण है, वह सहनशील है और अत्यन्त प्रेममय ।
मेरी आत्मा प्रभु को धन्य कहे, मेरा सर्वस्व उसके पवित्र नाम की स्तुति करे। मेरी आत्मा प्रभु को धन्य कहे और उसके वरदानों को कभी नहीं भुलाये ।
वह मेरे सभी अपराध क्षमा करता और मेरी सारी कमज़ोरी दूर करता है। वह मुझे, सर्वनाश से बचाता और प्रेम तथा अनुकम्पा से मुझे सँभालता है
उसका क्रोध समाप्त हो जाता है और सदा के लिए नहीं बना रहता है। वह न तो हमारे पापों के अनुसार हमारे साथ व्यवहार करता और न हमारे अपराधों के अनुसार हमें दण्ड देता है
आकाश पृथ्वी के ऊपर जितना ऊँचा है उतना महान् है अपने भक्तों के प्रति प्रभु का प्रेम । पूर्व पश्चिम से जितना दूर है, प्रभु हमारे पापों को हम से उतना दूर कर देता है।
हम में से न तो कोई अपने लिए ही जीता है और न अपने लिए ही मरता है। यदि हम जीते रहते हैं तो प्रभु के लिए जीते हैं और यदि मर जाते हैं तो प्रभु के लिए मरते हैं। इस प्रकार हम चाहे जीते रहें या मर जायें, हम प्रभु के ही हैं। मसीह इसलिए मर गये और जी उठे कि वह मृतकों तथा जीवितों, दोनों के प्रभु हो जायें ।
प्रभु की वाणी।
अल्लेलूया, अल्लेलूया ! धन्य है वह राजा जो प्रभु के नाम पर आते हैं। स्वर्ग में शांति सर्वोच्च स्वर्ग में महिमा ! अल्लेलूया !
पेत्रुस ने पास आकर येसु से कहा, "प्रभु ! यदि मेरा भाई मेरे विरुद्ध अपराध करता जाये, तो मैं कितनी बार उसे क्षमा करूँ? सात बार तक?" येसु ने उत्तर दिया, "मैं तुम से नहीं कहता - सात बार तक, बल्कि सत्तर-गुना सात बार तक । "यही कारण है कि स्वर्ग का राज्य उस राजा के सदृश है, जो अपने सेवकों से लेखा लेना चाहता था। जब वह लेखा लेने लगा, तो उसका लाखों रुपये का एक कर्जदार उसके सामने पेश किया गया। अदा करने के लिए उसके पास कुछ भी नहीं था, इसलिए स्वामी ने आदेश दिया कि उसे, उसकी पत्नी, उसके बच्चों और उसकी सारी जायदाद को बेच दिया जाये और ऋण अदा कर लिया जाये । इस पर वह सेवक उसके पैरों पर गिर कर अनुनय-विनय करने लगा, 'मुझे समय दीजिए और मैं आप को सब चुका दूँगा'। उस सेवक के स्वामी को तरस आया और उसने उसे जाने दिया और उसका कर्ज माफ़ कर दिया। जब वह सेवक बाहर निकला तो वह अपने एक सह-सेवक से मिला, जो उसका लगभग एक सौ दीनार का कर्जदार था। उसने उसे पकड़ लिया और उसका गला घोंट कर कहा, 'अपना कर्ज़ चुका दो' । सह-सेवक उसके पैरों पर गिर पड़ा और यह कह कर अनुनय-विनय करने लगा, 'मुझे समय दीजिए और मैं आप को चुका दूँगा।' परन्तु उसने नहीं माना और जा कर उसे तब तक के लिए बंदीगृह में डलवा दिया जब तक वह अपना कर्ज़ न चुका दे। यह सब देख कर उसके दूसरे सह-सेवक बहुत दुःखी हो गये और उन्होंने स्वामी के पास जा कर सारी बातें बता दीं। तब स्वामी ने उस सेवक को बुला कर कहा, 'रे दुष्ट सेवक ! तुम्हारी अनुनय-विनय पर मैंने तुम्हारा वह सारा कर्ज माफ़ कर दिया था; तो जिस प्रकार मैंने तुम पर दया की, क्या उसी प्रकार तुम्हें भी अपने सह-सेवक पर दया नहीं करनी चाहिए थी?' और स्वामी ने क्रुद्ध हो कर उसे तब तक के लिए जल्लादों के हवाले कर दिया जब तक वह कौड़ी-कौड़ी न चुका दे। यदि तुम में हर एक अपने भाई को पूरे हृदय से क्षमा नहीं करेगा तो मेरा स्वर्गिक पिता भी तुम्हारे साथ ऐसा ही करेगा।"
प्रभु का सुसमाचार।
आज के सुसमाचार में, येसु कहते हैं, "यदि तुम में से हर एक अपने भाई या बहिन को मन से क्षमा न करेगा, तो मेरा पिता जो स्वर्ग में है, तुम से भी वैसा ही करेगा।" हम इस दुनिया में कर्जदार के रूप में रहते हैं। संत पौलुस सवाल करते हैं, "कौन आप को दूसरों की अपेक्षा अधिक महत्व देता है? आपके पास क्या है, जो आपको न दिया गया है? और यदि आप को सब कुछ दान में मिला है, तो इस पर गर्व क्यों करते हैं, मानो यह आप को न दिया गया हो?” (1 कुरिन्थियों 4:7) हम जो कुछ भी हैं और हमारे पास जो कुछ भी हैं उन सब के लिए हम ईश्वर के ऋणी हैं। अय्यूब यह जानता था। इसलिए वह कह सका, “मैं नंगा ही माता के गर्भ से निकला और नंगा ही पृथ्वी के गर्भ में लौट जाऊँगा! प्रभु ने दिया था, प्रभु ने ले लिया। धन्य है प्रभु का नाम!" (अय्यूब 1:21) जब हम दूसरों के साथ व्यवहार करते हैं तो हमें हमेशा ईश्वर के प्रति इस भारी ऋण के बारे में सचेत रहना चाहिए। जब हम विनम्रता से बोलते हैं, विनय से कार्य करते हैं, उदारता से क्षमा करते हं् और प्यार से मदद करते हैं तब हम केवल अपने निर्माता और पिता का यह ऋण चुका रहे हैं। हम पुरस्कार या पारितोषिक का दावा करने के लिए कुछ नहीं कर रहे हैं। संत याकूब कहते हैं, "सभी उत्तम दान और सभी पूर्ण वरदान ऊपर के हैं और नक्षत्रों के उस सृष्टिकर्ता के यहाँ से उतरते हैं, जिसमें न तो कोई परिवर्तन है और न परिक्रमा के कारण कोई अन्धकार।" (याकूब 1:17)। हर बार जब हम दूसरों से नाराज़ या आहत होते हैं, आइए हम इस बात से अवगत रहें कि यह हमारे लिए बड़े पैमाने पर हमारे स्वर्गिक पिता के कर्ज चुकाने का एक मौका है, जो हम पर दया करते रहे हैं। एक कर्जदार गर्व नहीं कर सकता। संत पेत्रुस कहते हैं, "आप शक्तिशाली ईश्वर के सामने विनम्र बने रहें, जिससे वह आप को उपयुक्त समय में ऊपर उठाये। " (1 पेत्रुस 5:6)।
✍ - फ़ादर फादर फ्रांसिस स्करिया
In today’s Gospel, Jesus says, “So my heavenly Father will also do to every one of you, if you do not forgive your brother or sister from your heart.” We live in this world as debtors. St. Paul asks, “What do you have that you did not receive? And if you received it, why do you boast as if it were not a gift?” (1 Cor 4:7). We are indebted to God for all that we are and all that we have. Job knew that. That is why he could say, “Naked I came from my mother’s womb, and naked shall I return there; the Lord gave, and the Lord has taken away; blessed be the name of the Lord.” (Job 1:21) When we deal with others we should always be aware of this enormous indebtedness to God. When we speak politely, act humbly, forgive generously and help lovingly we are only paying back this debt to our creator and father. We are not doing anything to claim a reward or remuneration. St. James says, “Every generous act of giving, with every perfect gift, is from above, coming down from the Father of lights, with whom there is no variation or shadow due to change” (Jam 1:17). Every time we are offended or hurt by others, let us be aware that it is a chance for us to pay back the massive debt due to our heavenly father who has been merciful to us. A debtor cannot be proud. St. Peter says, “Humble yourselves therefore under the mighty hand of God, so that he may exalt you in due time” (1 Pet 5:6).
✍ -Fr. Francis Scaria
आज के सुसमाचार में येसु ने एक निर्दय सेवक के बारे में बताया जो अपने स्वामी से क्षमा का उपहार प्राप्त करता है, लेकिन वह अपने सह- सेवक को क्षमा करने से इंकार कर देता है। यह दृष्टान्त जहाँ एक ओर ईश्वर की क्षमाशीलता को दर्शाता है, वहीँ हमें अपने अपराधियों को क्षमा करने के लिए आह्वान करता है।
हमारे जीवन में हम देखते हैं कि जब हमारी बारी आती है, तो हम औरों से हमारी बड़ी से बड़ी गलती की भी क्षमा की उम्मीद करते हैं पर जब दूसरों को क्षमा देने की बात आती है तो फिर हमें वहाँ पर न्याय चाहिए होता है। यही माविय प्रवृति है। अगर ईश्वर हमारे हर-एक गुनाह के अनुसार हमारे साथ बर्ताव करता तो बताओ कौन उनके सामने टिक सकता जैसा के भजन संहिंता 130:3 में हम पढ़ते है - "प्रभु! यदि तू हमारे अपराधों को याद रखेगा, तो कौन टिका रहेगा?"
जिस तरह से ईश्वर हमारे साथ बर्ताव करता है, हम कितना दूसरों के साथ वैसा ही बर्ताव कर पाते हैं। हम तो हमारी स्वार्थी प्रवृति के शिकार हैं और सिर्फ खुद का भला सोचते हैं। पर हमें याद रहे कि ऐसी प्रवृति तो सांसारिक है, और हम सांसारिक नहीं स्वर्गिक हैं। इसलिए हमारे मनोभाव स्वर्ग के मुताबिक होने चाहिए। संत मत्ती 5:48 में येसु कहते हैं - "इसलिए तुम पूर्ण बनो, जैसे तुम्हारा स्वर्गिक पिता पूर्ण है।" और संत लूकस इसी बात को थोड़ा सा अलग रूप में पेश करते हैं - "अपने स्वर्गिक पिता-जैसे दयालु बनो।" पूर्णता का आह्वान ईश्वर के समान उदार और प्रेममय क्षमा करने का आह्वान है। प्रभु हमें सिर्फ पूर्णता के जीवन का आह्वान ही नहीं देते, पर इस आह्वान को अपने जीवन में साकार करने के लिए साधन भी मुहैया कराते हैं और वह साधन, निश्चित रूप से, पवित्र आत्मा है, जिसे संत पौलुस ईश्वर के प्रेम का आत्मा कहता है, जिसे ईश्वर ने हमारे दिलों में रोपित किया है।
जब हम आत्मा से संचालित जीवन जियेंगे, तो हम हमारे स्वर्गिक पिता जैसा प्यार और क्षमा दूसरों को दिखा पाएंगे।
✍ - फादर प्रीतम वसुनिया (इन्दौर धर्मप्रांत)
In today's gospel, Jesus tells of an unforgiving servant who receives the gift of forgiveness from his master, but refuses to forgive his co-servant. While this parable shows God's forgiveness on the one hand, it calls on us to forgive our fellow brothers or sisters on the other hand.
In our lives we see that when it is our turn, we expect forgiveness of even our biggest mistake from others, but when it comes to forgiving others, and then we need justice there. This is the social trend. If God treats us according to our every wrongdoing, then, who can stand in front of Him, as we read in Psalm 130: 3 - "Lord! If you remember our sins, then who will stand?"
How much are we able to treat others as God treats us? We are victims of our selfish tendencies and think only of ourselves. But let us remember that such a tendency is worldly and we are heavenly, not earthly. Therefore our attitude should be in accordance with heaven. In St. Matthew 5:48, Jesus says - "Therefore, be perfect, as your heavenly Father is perfect." And Saint Luke presents this in a slightly different form- "Be merciful as your heavenly Father is merciful."
The call to perfection is a call to generous and loving forgiveness like God. The Lord not only gives us the call to a life of perfection, but also provides the means to make this call come true in our lives and that means, of course, is the Holy Spirit, which Saint Paul calls the Spirit of God's love, Which God has planted in our hearts.
When we live a spirit-driven life, we will be able to show to others the love and forgiveness like our Heavenly Father.
✍ -Fr. Preetam Vasuniya (Indore Diocese)
हम संत लूकस के सुसमाचार अध्याय 15 में ईश्वरीय प्रेम और क्षमा पर आधारित उडाऊ पुत्र का दृष्टान्त पढ़ते हैं । इस दृष्टान्त से हम सब परिचित है । एक पिता के दो पुत्र थे । छोटे पुत्र ने अपने पिता से कहा कि सम्पत्ति का जो हिस्सा मेरा है वह मुझे दे दीजिए और पिता ने दोनों में अपनी सम्पत्ति का बटॅंवारा कर दिया । इस तरह छोटा बेटा अपनी सम्पत्ति लेकर अपने पिता और घर से दूर चला जाता है और वहाँ घोर पापमय जीवन जीता है और अपनी धन-सम्पत्ति का दुरुपयोग करता है और सब कुछ समाप्त होने के बाद, पश्चात्ताप करते हुए वह घर लौटता है । तब पिता उसके अपराधों को क्षमा करते हुए घर में उसका स्वागत करते हैं। यह दृष्टान्त हम मनुष्यों के पाप, पश्चाताप और पिता परमेश्वर के प्रेम और क्षमा पर आधारित है। इस दृष्टान्त से हम सब भली भांति परिचित है। हम इस कहानी के दूसरे भाग के बारे में भी कल्पना कर सकते हैं। कल्पना कीजिए कि इस प्रकार घर आने के बाद वह उडाऊ पुत्र अपने पिता के साथ खुशी से रहता है और कुछ समय बाद उसका विवाह होता है। विवाह के पश्चात अपने पिता के ही समान उसके भी दो पुत्र होते हैं, पुत्रों के बड़े होने पर जैसा कि उडाऊ पुत्र ने अपने पिता के साथ किया, ठीक वैसे ही उसका पुत्र भी उसके साथ करता है। वह सम्पत्ति का हिस्सा माँगता है और अपने पिता व घर से दूर चला जाता है, पिता की सम्पत्ति का दुरूपयोग करता है, पापमय जीवन जीता है और सब कुछ समाप्त होने के पश्चात, पश्चाताप करते हुए अपने पिता के पास लौट आता है। घर लौटने पर क्या उडाऊ पुत्र अपने बेटे को अपने पिता के समान स्वीकार करेगा या नहीं? यदि वह अपने पिता के समान अपने पुत्र का स्वागत करता है तो वह अपने पिता के समान बन जाता है। परन्तु यदि वह अपने पिता के विपरीत अपने पुत्र का स्वागत नहीं करता है तो वह अपने पिता के साथ रहने के बावजूद भी अपने पिता से दूर है। हमारी बुलाहट पिता के समान बनने के लिए है। प्रभु कहते हैं कि हमें स्वर्गीय पिता के समान दयालु और परिपूर्ण बनना चहिए।
उडाऊ पुत्र के दृष्टान्त के द्वारा पुत्र के पश्चाताप और पिता के घर में वापस लौटने पर जोर दिया गया है। अपनी गलतियों के लिए क्षमा माँगते हुए ईश्वर के पास आना हमारी आत्मीय यात्रा की शुरूआत हैं । आत्मीय जीवन में हमारा लक्ष्य पिता परमेश्वर के समान बनना हैं इसलिए हमारी बुलाहट में दया, क्षमा, प्रेम आदि होना चाहिए ताकि हम पिता परमेश्वर के समान बन सकें।
आज के सुसमाचार में हमने सुना कि जब सेवक अपने मालिक से दया की याचना करता है, तो उसे दया मिल जाती हैं। लेकिन वही सेवक अपने सह कर्मियों के साथ विपरीत व्यवहार करता है। उसने अपने मालिक से दया व क्षमा प्राप्त की है परन्तु फिर भी वह मालिक के समान नही बन पाया क्योंकि उसमें दयालुता की भावना नही है। इसी कारण उसे दंड भी मिलता है ।
हम पिता ईश्वर से दया व क्षमा की प्रार्थना करते हैं और वे हमारे अपराधों केा क्षमा भी करते हैं। क्या हम क्षमा प्राप्त करने के पश्चात प्रभु के समान बनने की कोशिश करते हैं या नहीं? प्रभु चाहते है कि हम पिता के समान बने जिन्होंने हमें अपनी असीम दया और क्षमा प्रदान की है।
उत्पत्ति ग्रंथ अध्याय 33 में याकूब को अपने भाई से मिलते इुए हम देखते हैं। याकूब ने अपने भाई को धोखा दिया था तथा उसके इस धोखे के कारण ही उसका बडा भाई एसाव अपने जीवन में पिता की आशिष से वंचित रह गया था। कई सालों के बाद याकूब एसाव से मिलने जाता है। उस समय वह बहुत डरा हुआ था लेकिन उसकी सोच के विपरीत एसाव उसके पास स्नेह से आता है और उसे गले लगाता है। तब याकूब अपने भाई से कहता है, ”मेरे लिए आपके दर्शन ईश्वर के दर्शनों के तुल्य है”। जो कोई भी दूसरों के अपराधों को क्षमा करता है व दया दिखाता है वह प्रभु के समान बन जाता है। इसलिए हमें भी प्रभु के समान बनने की कोशिश करना चाहिए। हम प्रभु से प्रार्थना करें कि हम प्रभु के समान क्षमाशील व दयावान बनें ताकि दूसरों के अपराधो व गुनाहों को माफ कर सकें और प्रभु के नजदीक जा सकें ।
-फादर वर्गीस पल्लिपरम्पिल