
जब तक प्रभु मिल सकता है, तब तक उसके पास चले जाओ, जब तक वह निकट है, तब तक उसकी दुहाई देते रहो । पापी अपना मार्ग छोड़ दे और दुष्ट अपने बुरे विचार त्याग दे। वह प्रभु के पास लौट आए और वह उस पर दया करेगा, क्योंकि हमारा ईश्वर दयासागर है । प्रभु यह कहता है, "तुम लोगों के विचार मेरे विचार नहीं हैं और मेरे मार्ग तुम लोगों के मार्ग नहीं हैं। जिस तरह आकाश पृथ्वी के ऊपर बहुत ऊँचा है, उसी तरह मेरे मार्ग तुम्हारे मार्गों से और मेरे विचार तुम्हारे विचारों से ऊँचे हैं।"
प्रभु की वाणी।
अनुवाक्य : प्रभु उन सबों के निकट है, जो उसका नाम लेते हैं।
मैं दिन-प्रतिदिन तुझे धन्य कहूँगा, मैं सदा-सर्वदा तेरे नाम की स्तुति करूँगा। प्रभु महान् और अत्यन्त प्रशंसनीय है। उसकी महिमा की सीमा नहीं
प्रभु दया और अनुकम्पा से परिपूर्ण है, वह सहनशील और अत्यन्त प्रेममय है। वह सबों का कल्याण करता है, वह अपनी सारी सृष्टि पर दया करता है
प्रभु जो कुछ करता है, अच्छा ही करता है। वह जो कुछ करता है, प्रेम से करता है। वह उन सबों के निकट है, जो उसका नाम लेते हैं, जो सच्चे हृदय से उस से विनती करते हैं।
मसीह मुझ में महिमान्वित होंगे, चाहे मैं जीता रहूँ या मर जाऊँ। मेरे लिए तो जीवन है - मसीह । और मृत्यु है उनकी पूर्ण प्राप्ति । किन्तु यदि मैं जीवित रहूँ, तो सफल परिश्रम कर सकता हूँ, इसलिए मैं नहीं समझता कि क्या चुन लूँ। मैं दोनों ओर खिंचा हुआ हूँ। मैं तो चला जाना और मसीह के साथ रहना चाहता हूँ – यह निश्चय ही सर्वोत्तम है, किन्तु मेरे शरीर में विद्यमान रहना आप लोगों के लिए अधिक हितकर है। आप लोग एक बात पर ध्यान रखें योग्य हो।
प्रभु की वाणी।
अल्लेलूया, अल्लेलूया! शब्द ने शरीर धारण कर हमारे बीच निवास किया। जितनों ने उसे अपनाया उन सबों को उसने ईश्वर की सन्तति बनने का अधिकार दिया है। अल्लेलूया!
येसु ने अपने शिष्यों से कहा, "स्वर्ग का राज्य उस ज़मीनदार के सदृश है, जो अपनी दाखबारी में मज़दूरों को लगाने के लिए बहुत सबेरे घर से निकला। उसने मज़दूरों के साथ एक दीनार का रोजाना तय किया और उन्हें अपनी दाखबारी भेजा । लगभग पहले पहर वह बाहर निकला और उसने दूसरों को चौक में बेकार खड़ा देख कर कहा, 'तुम लोग भी मेरी दाखबारी जाओ; मैं तुम्हें उचित मज़दूरी दे दूंगा; और वे वहाँ गये। लगभग दूसरे और तीसरे पहर भी उसने बाहर निकल कर ऐसा ही किया। वह एक घंटा दिन रहे फिर बाहर निकला और वहाँ दूसरों को खड़ा देख कर उनसे बोला, 'तुम लोग यहाँ दिन भर क्यों बेकार खड़े हो?' उन्होंने उत्तर दिया, 'इसलिए कि किसी ने हमें मज़दूरी में नहीं लगाया' । उसने उन से कहा, 'तुम लोग भी मेरी दाखबारी में जाओ'। संध्या होने पर दाखबारी के मालिक ने अपने कारिन्दे से कहा, 'मज़दूरों को बुलाओ; बाद में आने वालों से ले कर पहले आने वालों को, सब को मज़दूरी दे दो। जब वे मज़दूर आये, जो एक घंटा दिन रहे काम पर लगाये गये थे, तो उन्हें एक-एक दीनार मिला । जब पहले मज़दूर आये, तो वे समझ रहे थे कि उन्हें अधिक मिलेगा; लेकिन उन्हें भी एक-एक दीनार ही मिला । उसे पा कर वे जमींदार के विरुद्ध भुनभुनाने लगे और बोले, 'इन पिछले मज़दूरों ने केवल घंटे भर काम किया। तब भी आपने इन्हें हमारे बराबर बना दिया, जो दिन भर कठोर परिश्रम करते और धूप सहते रहे'। उसने उन में से एक को यह कह कर उत्तर दिया, भई ! मैं तुम्हारे साथ अन्याय नहीं कर रहा हूँ। क्या तुमने मेरे साथ एक दीनार नहीं तय किया था? अपनी मज़दूरी ले लो और जाओ। मैं इस पिछले मज़दूर को भी तुम्हारे जितना देना चाहता हूँ। क्या मैं अपनी ही इच्छा के अनुसार अपनी सम्पत्ति का उपयोग नहीं कर सकता? तुम मेरी उदारता पर क्यों जलते हो?' इस प्रकार जो पिछले हैं, वे अगले हो जायेंगे और जो अगले हैं, वे पिछले हो जायेंगे" ।
प्रभु का सुसमाचार।
दाखबारी में मजदूरों का दृष्टान्त मुख्यतः ईश्वर की उदारता पर प्रकाश डालता है। ईश्वर न्यायी और दयालु है। ईश्वर का न्याय दयालु न्याय है। प्रभु ईश्वर किसी को उसके न्यायसंगत हक से वंचित नहीं करते हैं। यही उनके न्याय का प्रमाण है। परन्तु अपनी दया से, वे बहुतों को उनके वास्तविक योग्यता से कहीं अधिक देते हैं। दृष्टान्त में, हम देखते हैं कि स्वामी किसी के साथ अन्याय नहीं करता। पहले से काम करने वाले सामान्य दैनिक वेतन के लिए सहमत हो गए थे। यहाँ दो बातें स्पष्ट हैं। ज़मींदार ने किसी भी मज़दूर के साथ बहस कर उसे सामान्य दैनिक मज़दूरी से कम मज़दूरी पर काम करने के लिए मजबूर नहीं किया। दूसरी बात यह है कि जो सब से पहले आये थे, वे मजदूर सामान्य दिहाड़ी पर काम करने को राजी हो गए थे। उस समय उन्होंने अधिक वेतन की मांग नहीं की थी। जिस पर सहमति बनी थी और जो सामान्य था, उन्हें दे दिया गया है। इसलिए उनके साथ कोई अन्याय नहीं हुआ है। यह सच है कि अन्य मजदूरों पर स्वामी ने दया दिखाई। उस स्वामी की तरह प्रभु ईश्वर हमारे साथ ऐसे ही करते हैं। वे किसी के साथ अन्याय नहीं करते हैं; लेकिन किसी-किसी पर दया तो अवश्य दिखाते हैं। इब्रानियों के नाम पत्र में हम पढ़ते हैं, “ईश्वर अन्याय नहीं करता। आप लोगों ने उसके प्रेम से प्रेरित हो कर जो कष्ट उठाया, सन्तों की सेवा की और अब भी कर रहे हैं, ईश्वर वह सब नहीं भुला सकता।" (इब्रानियों 6:10)। विधि-विवरण 32:4 कहता है, "ईश्वर सत्यप्रतिज्ञ है, उसमें अन्याय नहीं, वह न्यायी और निष्कपट है।" शोकगीत 3:22-23 में हम पढ़ते हैं, “प्रभु की कृपा बनी हुई है, उसकी अनुकम्पा समाप्त नहीं हुई है - वह हर सबेरे नयी हो जाती है। उसकी सत्यप्रतिज्ञता अपूर्व है”। संत पेत्रुस कहते हैं, “धन्य है ईश्वर, हमारे प्रभु ईसा मसीह का पिता! मृतकों में से ईसा मसीह के पुनरुत्थान द्वारा उसने अपनी महती दया से हमें जीवन्त आशा से परिपूर्ण नवजीवन प्रदान किया।” (1 पेत्रुस 1:3) हम अपनी ईर्ष्या में, कभी-कभी उन लोगों से ईर्ष्या करते हैं जो हम से अधिक ईश्वर की दया का अनुभव करते हैं। आइए हम उन अवसरों के लिए प्रभु की क्षमा की याचना करें।
✍ - फ़ादर फादर फ्रांसिस स्करिया
The parable of the labourers in the vineyard is primarily about the generosity of God. God is just and merciful. God’s justice is merciful justice. God does not deny anyone what he deserves. That is the proof of his justice. But in his mercy, he gives to many much more than what they actually deserve. In the parable, we see that the master is not unjust to anyone. Those who worked from the first had agreed for the usual daily wage. Two things are clear. The landowner did not argue with the labourers to force them to work for a wage less than the usual daily wage. Secondly, when they were hired, the labourers who came first had agreed to work for the usual daily wage. They did not demand a higher wage. What was agree upon and what was usual is given to them. Hence, there is no injustice done to them. To all other labourers the landowner showed different degrees of mercy. In the Letter to the Hebrews we read, “For God is not unjust; he will not overlook your work and the love that you showed for his sake in serving the saints, as you still do” (Heb 6:10). Deut 32:4 says, “A faithful God, without deceit, just and upright is he”. In Lam 3:22-23 we read, “The steadfast love of the Lord never ceases, his mercies never come to an end; they are new every morning; great is your faithfulness”. St. Peter says, “Blessed be the God and Father of our Lord Jesus Christ! By his great mercy he has given us a new birth into a living hope through the resurrection of Jesus Christ from the dead” (1 Pet 1:3). We in our jealousy, are sometimes envious of those who experience greater mercy of God.
✍ -Fr. Francis Scaria
दाखखबारी में मज़दूरों को काम देने वाले मालिक के दृष्टांत में हम देखते हैं कि वह करीबन शाम के समय काम पर लगे लोगों के प्रति उदारता दिखता है और उन्हें भी उन लोगों के बराबर ही मज़दूरी देता है जो सुबह से काम कर रहे थे। इस पर जो पहले आये थे वे इसपर आपत्ति उठाते हैं। उन्हें मालिक की उदारता अन्यायपूर्ण लगती हैं।
यह दृष्टांत मुझे ऊडाऊ पुत्र के दृष्टांत की याद दिलाता है, जहाँ पर पिता अपने छोटे वाले बेटे के प्रति बड़ी दया व उदारता दिखता है। तब बड़े बेटे को इस पर आपत्ति होती है। इन दृष्टांतों में पहले आये मज़दूर और बड़ा बेटा दोनों धर्मी लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं, और बाद में आये मज़दूर तथा छोटा बेटा पापियों का। दोनों ही दृष्टांतो में पापियों के प्रति मालिक या पिताजी बहुत ही उदारता दिखाते हैं। ऐसी उदारता जिसके वे वास्तव में हकदार नहीं हैं। उन्हें जो मिलना चाहिए था उससे अधिक उन्हें दिया जाता है। उड़ाऊ बेटा यह सोचकर वापस जाता है कि उसका पिता उसे एक नौकर की तरह रख लें। और वे मज़दूर शाम तक चौक पर इसलिए नहीं खड़े थे कि कोई उन्हें पूरी मज़दूरी देकर काम पर लगाए। पर उन्हें उनकी उम्मीद से कहीं ज़्यादा ही मिल जाता है।
यहाँ पर हम ईश्वर के राज्य के मापदंड और दुनिया के मापदंड के बीच एक सपष्ट अंतर पाते हैं। दुनिया की धारणा यह है कि केवल धर्मी ही ईश्वर के प्यार के हकदार हैं। पर बाइबिल का ईश्वर यह स्पष्ट करता है कि उनकी रूचि पापियों में अधिक है। वे कहते हैं - "मैं धर्मियों को नहीं, पापियों को पश्चाताप के लिए बुलाने आया हूँ।" (लूकस 5:32)
हम पर इतनी दया और करुणा दिखने वाला ईश्वर हमारी ज़िन्दगी की शाम होने तक हमारे लौटने का इंतज़ार करता है। और हम सब को वही पुरस्कार देने को तैयार है जिसे उन्होंने याकूब, अब्राहम, मूसा, पेत्रुस, पौलुस, और संत फ्राँसिस असीसी आदि को दिया है। हम बिना वक्त जाया करे हमारे प्रभु के पास लौट आएं और उनकी उदारता से मुक्ति का उपहार प्राप्त करें.
✍ - फादर प्रीतम वसुनिया (इन्दौर धर्मप्रांत)
In the parable of the employer who employs the workers in his vineyard, we see that he shows a lot of generosity to the people, who join the work late at evening hours, and they are given wages equal to those who were working since morning. Those who had worked the whole day object to this. They find the boss's generosity unjust.
This parable reminds me of the parable of the prodigal son, where the father shows great kindness and generosity to his younger son. Then the elder son objected to this. In these parables both the first workers and the elder son represent the righteous, and the workers and the younger son represent the sinners. In both instances, the owner or the father is very generous towards sinners. The prodigal son goes back thinking that his father should keep him as a servant and in the similar way the workers were not standing till evening with the expectation of being haired and paid the full wages at that point of time. But they get much more than they expected.
Here we find a clear distinction between the criteria of the kingdom of God and the criteria of the world. The belief of the world is that only the righteous are entitled to the love of God. But the God of the Bible makes it clear that He is more interested in sinners. He says - "I have come to call the sinners to repentance, not the righteous." (Luke 5:32)
The God, who looks upon us with so much compassion and awaits our return till the evening of our life; and is ready to give the same award to us which He have gave to Jacob, Abraham, Moses, Peter, Paul, and Saint, Augustine and Francis Assisi and all the saints etc. We go back to our Lord without delay and get the gift of salvation from His generosity. Amen.
✍ -Fr. Preetam Vasuniya (Indore Diocese)
ईर्ष्या एवं आपसी प्रतिस्पर्धा की भावना ने अनेक मानवीय त्रासदियों को जन्म दिया है। दूसरों को प्राप्त उपहारों एवं वरदानों के कारण मनुष्य ईर्ष्या की भावना से भर जाता है तथा इस दुर्भावना से प्रेरित उसके सोच विचार उसके पतन का कारण बनते हैं। यह मानवीय स्वाभाव हम हमारे आदि माता-पिता की संतानों में भी पाते हैं। जब ईश्वर ने हाबिल का चढावा स्वीकार किया तो काइन ईर्ष्या से भर गया। ’’प्रभु ने हाबिल पर प्रसन्न होकर उसकी भेंट स्वीकार की, किन्तु उसने काइन और उसकी भेंट को अस्वीकार किया। काइन बहुत कुद्ध हुआ और उसका चेहरा उतर गया।’’ (उत्पत्ति 4:4-5) इस दुर्भावना से प्रेरित होकर उसने हाबिल की हत्या कर दी। ईश्वर द्वारा ठुकराया जाना तथा अपने भाई की भेंट सुग्राहय पाये जाने के कारण काइन बहुत उत्तेजित हो जाता है। ईश्वर ने काइन को यह कहकर समझाने की कोशिश की, ’’तुम क्यों क्रोध करते हो और तुम्हारा चेहरा उतरा हुआ क्यों है? जब तुम भला करोगे, तो प्रसन्न होगे। (उत्पत्ति 4:6-7) हालॅाकि ईश्वर द्वारा काइन का चढावा अस्वीकार करने के लिए हाबिल जिम्मेदार नहीं था, फिर भी काइन ने अपने इस अपमान, ईर्ष्या और क्रोध को हाबिल पर उतारा।
आज के सुसमाचार के दृष्टांत में दाखबारी का स्वामी सबको पूर्वनिश्चित एक समान मजदूरी देता हैं। किन्तु जिन मजदूरों ने पहले पहर से काम किया था जब उन्होंने देखा कि सभी को एक समान मजदूरी दी गयी है तो वे कुडकुडाने लगे। वे समय के अनुपात में मजदूरी चाहते थे जिससे उन्हें दूसरों से ज्यादा मिले या फिर दूसरों को उनसे कम मिले। इस दृष्टांत के माध्यम से येसु ने स्पष्ट कर दिया कि सर्वप्रथम, ईश्वर किसी के साथ अन्याय नहीं करते तथा सभी को उनका हक प्रदान करते हैं। दूसरा, ईश्वर का प्रेम सभी मानवीय गणनाओं से परे है। तीसरा, हमें पाये हुए उपहारों के लिए ईश्वर को धन्यवाद देना चाहिए तथा दूसरों को क्या हो रहा है या मिल रहा है इस बात को आधार बनाकर अपनी खुशी का निर्धारण नहीं करना चाहिए।
लगभग ऐसी ही भावना हम पेत्रुस में भी पाते है। येसु ने पेत्रुस को उनकी रेवड की देखभाल का महान कार्य सौंपा था। ’’मेरी भेडों को चराओ।’’ (देखिए योहन 21:15-17) किन्तु उसके तुरन्त बाद ’’पेत्रुस ने मुड कर उस शिष्य को पीछे-पीछे आते देखा, जिसे ईसा प्यार करते थे...’’। पेत्रुस को योहन का इस प्रकार प्रभु के पीछे खडा होना शायद अच्छा नहीं लगा हो या फिर ईर्ष्या की भावना उत्पन्न हुई होगी इसलिए वे प्रभु से पूछते है, ’’प्रभु! इनका क्या होगा!’’ इस प्रश्न से प्रभु येसु प्रसन्न नहीं होते। इस कारण वे पेत्रुस की बात का उत्तर न देकर उलटा उससे पूछते हैं, ’’यदि मैं चाहता हूँ कि यह मेरे आने तक रह जाये, तो इससे तुम्हें क्या? तुम मेरा अनुसरण करो। (योहन 21:21-22) दूसरों के जीवन पर नज़रे गडाये रखने से हम अपने जीवन के दानों को नज़रअंदाज कर देते हैं। पेत्रुस के साथ भी यही परेशानी थी।
नबी योना ने ईश्वर के निर्देश पर निनीवे के लोगों को पश्चात्ताप का उपदेश दिया। लोगों ने उसके उपदेश पर विश्वास करके घोर पश्चात्ताप किया। इस पर ईश्वर द्रवित हो गये और उन्होंने जिस विपत्ति की धमकी दी थी, उसे उन पर नहीं आने दिया। योना को यह बात बहुत बुरी लगी। प्रभु की इस दया के कारण योना रूठ जाता है क्योंकि ईश्वर ने निनीवे को नष्ट नहीं किया। योना के इस व्यवहार पर ईश्वर योना से पूछते हैं, ’’क्या तुम्हारा क्रोध उचित है?’’ ईश्वर योना को एक कुंडरू लता के द्वारा परिस्थितियों की वास्तविकता समझाते हैं। जब योना तेज धूप में बैठा था तो प्रभु ने उसे आराम पहुँचाने के उद्देष्य से एक कुंडरू लता उगायी। वह लता तुरंत ही उस छप्पर पर फैल गयी जिसके नीचे योना बैठा हुआ था। इससे योना को बहुत आराम पहुँचा। दूसरे दिन एक कीडा लता को काट देता है जिससे वह सूख जाती है। इससे भयंकर गर्मी पडने लगती तथा योना बेहोश हो जाता है। वह बहुत क्रोधित होकर कहता है, ’’जीवित रहने की अपेक्षा मेरे लिए मर जाना कहीं अच्छा है।’’(योना 4:8) ईश्वर योना से कहते हैं, ’’तुम तो उस लता की चिन्ता करते हो। तुमने उसके लिए कोई परिश्रम नहीं किया। तुमने उसे नहीं उगाया। वह एक रात में उग गयी और एक रात में नष्ट हो गयी। तो क्या मैं इस महान् नगर निनीवे की चिन्ता नहीं करूँ? उस में एक लाख बीस हजार से अधिक ऐसे मनुष्य रहते हैं, जो अपने दाहिने तथा बायें हाथ का अंतर नहीं जानते, और असंख्य जानवर भी।’’ (योना 4:10-11) इस प्रकार हम देखते हैं कि योना नबी होकर भी दूसरों के लिए की गयी प्रभु की दया एवं वरदानों पर ईर्ष्या करता था।
उडाऊँ पुत्र के दृष्टांत में जब पिता अपने पुत्र के लौटने पर बडे समारोह का आयोजन करता है तो उसके बडे लडके का दृष्टिकोण भी काइन, पेत्रुस, योना के समान होता है क्योंकि वह कहता है, ’’देखिए, मैं इतने बरसों से आपकी सेवा करता आया हूँ। मैंने कभी आपकी आज्ञा का उल्लंघन नहीं किया। फिर भी आपने कभी मुझे बकरी का बच्चा तक नहीं दिया, ताकि मैं अपने मित्रों के साथ आनन्द मनाऊँ। पर जैसे ही आपका यह बेटा आया, जिसने वेश्याओं के पीछे आपकी सम्पत्ति उड़ा दी है, आपने उसके लिए मोटा बछड़ा मार डाला है।’’ (लूकस 15:29-30) बडे लडके को परेशानी तब होती है जब उसके भाई के लिए आनन्द मनाया जा रहा है। इससे उसकी अपने भाई के प्रति ईर्ष्या की दुर्भावना प्रदर्षित होती है।
संत पौलुस इस असमानता को ईश्वर की स्वतंत्रता तथा प्रज्ञा बताते हुये कहते हैं, ’’अरे भई! तुम कौन हो, जो ईश्वर से विवाद करते हो? क्या प्रतिमा अपने गढ़ने वाले से कहती है, ’तुमने मुझे ऐसा क्यों बनाया?’ क्या कुम्हार को यह अधिकार नहीं कि वह मिट्टी के एक ही लौंदे से एक पात्र ऊँचे प्रयोजन के लिए बनाये और दूसरा पात्र साधारण प्रयोजन के लिए? यदि ईश्वर ने अपना क्रोध प्रदर्शित करने तथा अपना सामर्थ्य प्रकट करने के उद्देश्य से बहुत समय तक कोप के उन पात्रों को सहन किया, जो विनाश के लिए तैयार थे, तो कौन आपत्ति कर सकता है? उसने ऐसा इसलिए किया कि वह दया के उन पात्रों पर अपनी महिमा का वैभव प्रकट करना चाहता है, जिन्हें अपने प्रारम्भ से ही उस महिमा के लिए तैयार किया था।’’ (रोमियों 9:20-23)
जब योहन बपतिस्ता के शिष्यों ने उनसे कहा, ‘‘गुरुवर! देखिए, जो यर्दन के उस पार आपके साथ थे और जिनके विषय में आपने साक्ष्य दिया, वह बपतिस्मा देते हैं और सब लोग उनके पास जाते हैं’’। तब योहन इस बात में ईश्वर की प्रज्ञा तथा योजना को समझते हुए कहते हैं, ‘‘मनुष्य को वही प्राप्त हो सकता हे, जो उसे स्वर्ग की ओर से दिया जाये।’’ (योहन 3:26-27) हमें भी जीवन में दूसरों की उन्नति को ईश्वर की योजना का हिस्सा मानकर ईश्वर को इसके लिए धन्यवाद देना चाहिए न कि ईर्ष्या। धर्मग्रंथ हमें सिखाता है कि ईश्वर को यह ईर्ष्या पंसद नहीं है। जैसे कि नबी इसायाह के द्वारा ईश्वर कहते हैं, ’’तुम लोगों के विचार मेरे विचार नहीं हैं और मेरे मार्ग तुम लोगों के मार्ग नहीं हैं। जिस तरह आकश पृथ्वी के ऊपर बहुत ऊँचा है, उसी तरह मेरे मार्ग तुम्हारे मार्गों से और मेरे विचार तुम्हारे विचारों से ऊँचे हैं।’’ (इसायाह 55:8-9) आइये हम भी दूसरों के प्रति अपने जीवन के दृष्टिकोण को बदले तथा उन्हें ईश्वर के विचार के अनुसार ढालें। ऐसा करने से हमारा जीवन भी शांत, सौम्य एवं सरल बन जायेगा।
- फादर रोनाल्ड वाँन