वर्ष का सत्ताईसवाँ सप्ताह, इतवार - वर्ष A

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पहला पाठ

नबी इसायस इस्राएल की तुलना एक दाखबारी से करते हैं। उसके स्वामी ने उत्तम फ़सल की आशा से उसकी अच्छी देख-रेख की थी, किन्तु उसे निराश होना पड़ा। ईश्वर ने बड़े प्रेम से इस्राएल की रक्षा की थी। इस्राएल ने ईश्वर के साथ विश्वासघात किया है, इसलिए ईश्वर अब उसकी रक्षा नहीं करेगा ।

नबी इसायस का ग्रंथ 5:1-7

"विश्वमण्डल के प्रभु की दाखबारी इस्राएल का घराना है।"

मैं अपने मित्र की दाखबारी के विषय में अपने मित्र को एक गीत सुनाऊँगा । उपजाऊ ढाल पर मेरे मित्र की दाखबारी थी । उसने इसकी ज़मीन खुदवायी, इस में से पत्थर निकाल दिये और इस में बढ़िया दाख लगवा दी। उसने इसके बीच में मीनार बनवायी और इस में एक कोल्हू भी खुदवाया। उसे अच्छी फसल की आशा थी, किन्तु उसे खट्टे अंगूर ही मिले । हे येरुसालेम के निवासियो ! हे यूदा के लोगो ! अब, तुम मेरा तथा मेरी दाखबारी के बीच न्याय करो । कौन-सी बात रह गयी थी, जिसे मैं अपनी दाखबारी के लिए कर सकता था और जिसे मैंने उसके लिए नहीं किया? मुझे अच्छी फसल की आशा थी, किन्तु मुझे खट्टे अंगूर ही मिले । अब, मैं तुम्हें बताऊँगा कि अपनी दाखबारी का क्या करूँगा। मैं उसका बाड़ा हटाऊँगा और पशु उसमें चरने आयेंगे । मैं उसकी दीवारें ढाऊँगा और लोग उसे पैरों तले रौंद देंगे। वह उजड़ जायेगी; कोई भी उसे छाँटने या खोदने नहीं आयेगा और उस में झाड़-भंखार उग जायेगा। मैं बादलों को आदेश दूँगा कि वे उस पर पानी नहीं बरसायें । विश्वमण्डल के प्रभु की यह दाखबारी इस्राएल का घराना है और इसके उत्तम पौधे यूदा के लोग हैं। प्रभु को न्याय की आशा थी और भ्रष्टाचार दिखाई दिया। उसे धार्मिकता की आशा थी और अधर्म के कारण हाहाकार सुनाई पड़ा ।

प्रभु की वाणी।

भजन : स्तोत्र 79:9,12-16,19-20

अनुवाक्य : प्रभु की दाखबारी इस्राएल का घराना है।

तू मिस्त्र देश से एक दाखलता लाया । तूने दूसरे राष्ट्रों को भगा कर उसे रोप दिया। वह अपनी डालियाँ समुद्र तक और अपनी टहनियाँ नदी तक फैलाती थी।

तूने उसका बाड़ा क्यों तोड़ डाला? उधर निकलने वाले उसके फल तोड़ लेते हैं। जंगली सूअर उसे उजाड़ते हैं और खेत के पशु उस में चरते हैं।

विश्वमण्डल के प्रभु! स्वर्ग से हम पर दयादृष्टि कर। तूने यह दाखलता लगायी है, आ कर इसकी रक्षा कर।

हम फिर कभी तुझे नहीं छोड़ेंगे। हमें बचाने की कृपा कर, जिससे हम तेरी स्तुति करें । विश्वमण्डल के प्रभु ! हमें वापस बुला । हम पर दयादृष्टि कर और हमारा उद्धार हो जायेगा।

दूसरा पाठ

सन्त पौलुस फिलिप्पियों से अनुरोध करते हैं, कि वे चिन्ता न करें और हर जरूरत में भरोसे के साथ ईश्वर से प्रार्थना करें - ऐसा करने से और पौलुस की शिक्षा के अनुसार चलने से उन्हें ईश्वर की शांति प्राप्त होगी।

फिलिप्पियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 4:6-9

"ईश्वर की शांति आप लोगों के साथ होगी।"

किसी बात की चिन्ता मत कीजिए। हर जरूरत में प्रार्थना कीजिए और विनय तथा धन्यवाद के साथ ईश्वर के सामने अपने निवेदन प्रस्तुत कीजिए। और ईश्वर की शांति, जो हमारी समझ से परे है, आपके हृदयों और विचारों को येसु मसीह में सुरक्षित रखेगी । भाइयो ! अन्त में यह जो कुछ सच है, आदरणीय है, जो कुछ न्यायसंगत है, निर्दोष है, जो कुछ प्रीतिकर है, मनोहर है, जो कुछ भी उत्तम है, प्रशंसनीय है ऐसी बातों का मनन किया करें। आप लोगों ने मुझ से जो सीखा, ग्रहण सत्ताईसवाँ सप्ताह - इतवार किया, सुन लिया और मुझ में देखा, उसी के अनुसार आचरण करें। और शांति का ईश्वर, आप लोगों के साथ रहेगा।

प्रभु की वाणी।

जयघोष

अल्लेलूया, अल्लेलूया ! प्रभु कहते हैं, "संसार की ज्योति मैं हूँ। जो मेरा अनुसरण करता है, उसे जीवन की ज्योति प्राप्त होगी ।" अल्लेलूया !

सुसमाचार

येसु नबी इसायस की तरह दाखबारी के विषय में एक दृष्टान्त प्रस्तुत करते हैं। जमींदार ईश्वर है, दाखबारी इस्राएल है, असामी यहूदी नेता हैं, नौकर नबी हैं, पुत्र मसीह हैं और दूसरे असामी गैर-यहूदी हैं। यहूदियों ने मसीह को ठुकरा दिया, इसलिए ईश्वर ने उनका सर्वनाश कर दिया ।

मत्ती के अनुसार पवित्र सुसमाचार 21:33-43

"वह अपनी दाखबारी का पट्टा दूसरे असामियों को देगा ।"

येसु ने महायाजकों और जनता के नेताओं से कहा, "एक दूसरा दृष्टान्त सुनो। किसी जमींदार ने एक दाखबारी लगवायी, उसके चारों ओर घेरा बनवाया, उस में रस का कुण्ड खुदवाया और पक्का मकान बनवाया। तब उसे असामियों को पट्टे पर दे कर वह परदेश चला गया। फसल का समय आने पर उसने असामियों के पास अपने नौकरों को भेजा, जिससे वे फसल का हिस्सा वसूल करें। किन्तु असामियों ने उसके नौकरों को पकड़ कर उन में से किसी को मारा-पीटा, किसी की हत्या कर दी और किसी को पत्थर से मार डाला। इसके बाद उसने पहले से अधिक नौकरों को भेजा और असामियों ने उनके साथ भी वैसा ही किया। अंत में उसने यह सोच कर अपने पुत्र को उनके पास भेजा कि वे मेरे पुत्र का आदर करेंगे। किन्तु पुत्र को देख कर असामियों ने एक दूसरे से कहा, 'यह उत्तराधिकारी है। चलो, हम इसे मार डालें । और इसकी विरासत पर कब्जा कर लें ।' उन्होंने उसे पकड़ लिया और दाखबारी से बाहर निकाल कर मार डाला। जब दाखबारी का स्वामी लौटेगा तो वह उन असामियों का क्या करेगा?" उन्होंने येसु से कहा, "वह उन दुष्टों का सर्वनाश करेगा और अपनी दाखबारी का पट्टा दूसरे असामियों को देगा, जो समय पर फसल का हिस्सा देते रहेंगे"। येसु ने उन से कहा, "क्या तुम लोगों ने धर्मग्रंथ में कभी यह नहीं पढ़ा? कारीगरों ने जिस पत्थर को बेकार समझ कर निकाल दिया था, वही कोने का पत्थर बन गया है। यह प्रभु का कार्य है। यह हमारी दृष्टि में अपूर्व है। इसलिए मैं तुम लोगों से कहता हूँ स्वर्ग का राज्य तुम से ले लिया जायेगा और ऐसे राष्ट्र को दिया जायेगा, जो इसका उचित फल उत्पन्न करेगा"।

प्रभु का सुसमाचार।


📚 मनन-चिंतन

आज का सुसमाचार हमें बताता है कि ईश्वर ने इस्राएल को हर लाभ देने के लिए हर संभव प्रयास किया है। उसने उनके साथ एक चिरस्थायी व्यवस्थान स्थापित की, अच्छे और बुरे समय में उनकी अगुवाई की, उन्हें उनकी विरासत के रूप में प्रतिज्ञात देश प्रदान किया, उन्हें उनका मार्गदर्शन करने के लिए नियम और नबी दिया हैं। इन वाक्य संख्याओं में "फल" पर जोर इस सुसमाचार में शब्द के महत्व को दर्शाता है (मत्ती (३:८; ३:१०; ७:१७-१८, १२:३३; १३-२३ और २१:१९)। संत मत्ती के लिए, फल किसी के जीवन की उपज को दर्शाता है। यहूदी नेतृत्व, जो अच्छे फल पैदा करने में विफल रहा, उन्हें अधिकार से वंचित कर, दाखबारी कलीसिया को दिया जा रहा है, जो अच्छे फल पैदा करेगी। आज, सभी से बढ़कर ईश्वर ने हमें, "नए इज़राइल" को चुना है, ताकि सभी लोगों के लिए ईश्वरीय कृपा बन सके।आज हमें ईश्वर के दाखबारी में फल उत्पन करना है। ईश्वर के दाखबारी में असामी बनकर प्रचुर मात्रा में फल पैदा करना कितने सौभाग्य की बात है।

फादर संजय कुजूर एस.वी.डी.

📚 REFLECTION


The gospel of the day tells us that God has done everything possible to give Israel every advantage. He has established an everlasting covenant with them—has led them through good times and bad—has given them the Promised Land as their inheritance—has given them the law and prophets to guide them. The triple emphasis on “fruit” in these verses reflects the importance of the word throughout this Gospel (3:8; 3:10; 7:17-18; 12:33; 13:23 and 21:19). For Matthew, fruit connotes the produce of one’s life. The Jewish leadership, which failed to produce good fruit, is being disenfranchised, and the vineyard is being given to the church, which will produce good fruit. Today, the God over all has chosen us, the “new Israel”, to be his blessing to all people. Today is our day to “produce the fruits” of God’s vineyard. What a privilege to be a tenant in God’s vineyard and to bring Him His fruits!

-Fr. Sanjay Kujur SVD

📚 मनन-चिंतन-2

ईश्वर हमसे प्यार करता है।

यह आज के पाठों से स्पष्ट है जिसमें इसराइल के प्रति ईश्वर के प्रेम को दिखाया गया है। पहला पाठ में नबी इसयास दाखबारी के प्रतीक के माध्यम से अपने लोगों के लिए ईश्वर का प्रेम और संरक्षण का वर्णन करता है। ईश्वर ने इसराइल को अपनी निजी प्रजा के में रूप में चुना, उन्हें सभी दुश्मनों से बचाया और उनकी देखभाल चमत्कारिक तरीके से की। आज का अनुवाक्य इस बात का स्मरण दिलाता है - "प्रभु की दाखबारी इस्राएल का घराना है"।

इस तरह के प्यार के बावजूद इस्राएली लोगों ने न्याय और निष्ठा के बजाय ईश्वर की इच्छाओं के खिलफ कुकर्म करते रहे। हम पढ़ते हैं, "उसे अच्छी फसल की आशा थी, किंतु उसे खट्टे अंगूर ही मिले"।

आज का सुसमाचार दाखबारी और असामियों का दृष्टांत का वर्णन है। यह ईश्वर के निरंतर प्रेम और मानव के कृतघ्नता और अपराधों को चित्रित करता है। दाखबारी का दृष्टान्त वास्तव में इज़राइल की कहानी है। यह दिखाता है कि कैसे ईश्वर ने अपने दूतों-नबियों के माध्यम से उनको सिखाना और उनका मार्गदर्शन करना जारी रखा। असामियों का व्यवहार इसराइल का व्यवहार की कहानी है - कैसे उन्होंने ईश्वर के दूतों के साथ बुरा व्यवहार किया और उन्हें मार डाला।

ईश्वर हमसे उम्मीद करता है कि हम उनके बच्चों जैसे फल उत्पन्न करे । जैसा कि येसु ने कहा है, एक वृक्ष अपने फल से पहचाना जाता है। इस बात पर मनन-चिंतन करना अच्छा होगा - "प्रभु की दाखबारी ने कैसे अयोग्य फल पैदा की?" वह इसलिए है की वे अन्य देवताओं के पीछे गए और ईश्वर की आज्ञाओं को त्याग दिया।

इज़राइल की कहानी प्रत्येक विश्वासी की भी कहानी है। पिता ईश्वर ने "संसार की सृष्टि से पहले मसीह में हमको चुना जिससे हम मसीह से संयुक्त होकर उसकी दृष्टि में पवित्र तथा निष्कलंक बने" (इफिसियों १: ४)। वह अपने वचन और संस्कारों से हमारा पोषण करता है और हमारी रक्षा करता है। उन्होंने हम में से प्रत्येक को एक जीवन-मिशन सौंपा है। ईश्वर की इच्छा के अनुसार व्यतीत एक जीवन आध्यात्मिक फलों से पहचाना जाता है।

कलीसिया ईश्वर की दाखबारी होने में आनंद मानती है। साथ ही कलीसिया में आत्मा-मंथन और प्रार्थना के कई कारण है। क्या मुझे एहसास है कि मैं ईश्वर के चुने हुए लोगों का सदस्य हूं? क्या मैं उसकी आज्ञाओं और शिक्षाओं को सुनता हूँ? सुसमाचार सेवकों के साथ मेरा कैसा व्यवहार है? मैं अपने जीवन में क्या फल उत्पन्न करता हुँ? मेरा जीवन-मिशन के प्रति मैं कितना ईमानदार हुँ?

आमीन

- फादर जोली जोन (इन्दौर धर्मप्रांत)


📚 REFLECTION

God loves us.

This is clear from today’s readings which show the love of the Lord for Israel. In the first reading prophet Isaiah, through the symbolism of the vineyard, describes the care and concern of God for his people. God chose Israel to be his people, protected them from all their enemies and cared for them in miraculous ways. This is emphasised in the responsorial psalm in which we pray, “the vineyard of the Lord is the house of Israel”.

In spite of such love the people acted against God’s desires by bloodshed and cries of distress instead of justice and integrity. As the passage says, “they yielded wild grapes instead of good ones”.

The gospel narrates the parable of the vineyard and the tenants. It portrays God’s steadfast love and human beings’ ingratitude and transgressions. The parable of the vineyard is in fact the story of Israel. It shows how God continued to teach and guide them through his messengers the prophets. The behaviour of the tenants is the story of Israel’s behaviour - how they did not listen to the prophets, God’s messengers and ill-treated and killed them.

God expects us to produce fruits that befit his children. As Jesus said, a tree is known by its fruits. It is good to ask the question, “How did the vineyard of the Lord produce unworthy fruits?” It is because they went after other gods and abandoned God’s commandments.

The story of Israel is also the story of each believer. Go chose us in Jesus Christ before the foundation of the world to be holy and blameless before him (Ephesian1:4). He continues to nourish and protect us with his word and sacraments. He has entrusted to each one of us a life-mission. A life lived in accordance with the will of God can be identified by the spiritual fruits that it bears.

The Church rejoices in being the vineyard of the lord. At the same time we have cause for much soul-searching and prayer. Do I realize that I am a member of the chosen people of God? Do I listen to his commands and teachings? How do I treat his messengers, who bring the good news to me? What fruits do I produce in my life? How responsible am I towards the life-mission that God has entrusted me?

Amen.

-Fr. Jolly John (Indore Diocese)

मनन्-चिंतन

‘‘ईश्वर ने संसार से इतना प्यार किया कि उसने उसके लिए अपने एकलौते पुत्र को अर्पित कर दिया, जिससे जो उस में विश्वास करता है, उसका सर्वनाश न हो, बल्कि अनन्त जीवन प्राप्त करे’’(योहन 3:16)। प्रभु येसु अपने कार्य और भेजे जाने के मकसद को अच्छे से जानते थे। ‘‘जिसने मुझे भेजा, उसकी इच्छा पर चलना और उसका कार्य पूरा करना, यही मेरा भोजन है’’(योहन 4:34)। प्रभु येसु ईश्वरीय प्रेम को समझाने, बाँटने और फैलाने का कार्य करते थे। ‘‘जिस प्रकार मैने तुम लोगो को प्यार किया, उसी प्रकार तुम भी एक दूसरे को प्यार करो’’(योहन 13:34)। पिता ईश्वर संसार की सृष्टि के समय से इस पूरे संसार को प्रेम करते आये हैं और उनके प्रेम की पराकाष्ठा प्रभु येसु के आने पर हुई। उस पिता के असीम प्रेम को समझाने के लिए प्रभु येसु ने यह दृष्टांत सुनाया।

हम सब प्रभु के प्रतिरूप बनाये गये हैं ‘‘ईश्वर ने मनुष्य को अपना प्रतिरूप बनाया’’(उत्पत्ति 1:27)। ‘‘ईश्वर प्रेम है और जो प्रेम में दृढ़ रहता है, वह ईश्वर में निवास करता है और ईश्वर उस में’’(1 योहन 4:16)। अर्थात् हम सब प्रेम के प्रतिरूप बनाये गये हैं परन्तु जब जब हम ईश्वर की इच्छा के विरुद्ध कार्य करते हैं या पाप करते हैं तब हम उनके प्रेम से दूर होते जाते हैं। यह तब होता है जब हम ईश्वर को छोड़ दुनिया के पीछे भागते हैं। ‘‘जो संसार को प्यार करता है, उसमें पिता का प्रेम नहीं’’(1 योहन 2:15)। हम सब सर्वप्रथम प्रभु से प्रेम करने के लिए बनाये गये हैं। ‘‘जो अपने पिता या अपनी माता को मुझ से अधिक प्यार करता है, वह मेरे योग्य नहीं। जो अपने पुत्र या अपनी पुत्री को मुझ से अधिक प्यार करता है, वह मेरे योग्य नही’’(मत्ती 10:37)। और यह संसार के सृष्टि से है। परन्तु मनुष्य इस बात को भूलकर दूसरी ओर कदम बढ़ाने लगा। प्रभु ने इस प्रेम को समझाने के लिए और लोगो को वापस बुलाने के लिए विभिन्न व्यक्तियों, नबियों, प्रभु भक्तों का सहारा लिया जैसे इब्राहीम, मूसा, योशुआ, न्यायकर्ताओं - ओतनीएल, एहूद, शमगर, दबोरा, बाराक, गिदओन, अबीमेलेक और यिफ्तह। परन्तु लोगो ने इनकी नही सुनी। फिर ईश्वर ने नबियों को भेजा - समूएल, इसायाह, यिमियाह, दानिएल, एज़ेकिएल, आमोस, होशुआ, योएल इत्यादि परन्तु लोगो ने इन्हें मारा, पीटा और इनकी नही सुना। अंत में ईश्वर ने स्वयं अपने पुत्र को भेजा परन्तु उन्होंने पुत्र के साथ भी वही व्यवहार किया। ‘‘वह अपने यहाँ आया और उसके अपने लोगों ने उसे नहीं अपनाया’’(योहन 1:11)। अंततः जो अनुग्रह उन लोगों पर था, उनसे ले लिया गया और उन लोगो को दिया गया जो ईश्वर के लिए तत्पर थे और इन अनुग्रह के सही हकदार थे।

ईश्वर ने हम सबको माता के गर्भ में बड़े प्रेम से गढ़ा, हमारा नाम लेकर पुकारा और जो हमारे लिए जरूरी है वह सब हमें प्रदान किया है। यहाँ तक कि हमें बड़े बड़े खतरों से, संकटो से बचाया है जिन्हें हम जानते या नही भी जानते हों। वह हर क्षण हमारे साथ रह कर हमारी रक्षा करता है। ‘‘मै संसार के अंत तक सदा तुम्हारे साथ हूँ’’ (मत्ती 28:20)। प्रभु येसु हमें पिता ईश्वर के साथ मेल कराना चाहते हैं जिससे हम ईश्वर से प्रेम करना सीखें जिसके लिए हम बने हैं। और हम न केवल ईश्वर से प्रेम करें परन्तु उस प्रेम को फैलायें अर्थात् उस प्रेम का सही फल उत्पन्न करें। ‘‘मैंने तुम्हें इसलिए चुना और नियुक्त किया कि तुम जा कर फल उत्पन्न करो .......... मैं तुम लोगों को यह आज्ञा देता हूँ- एक दूसरे को प्यार करो।’’ (योहन 16:17)

जब उन्होने हमारे लिए इतना सब किया है तो वे आशा भी रखते हैं कि हम फल उत्पन्न करें। लेकिन संसार ने क्या किया? संसार ने उसी ज्योति को ठुकरा दिया, उसे नही अपनाया (योहन 1:11)। ‘‘कौन बात ऐसी थी, जो मैं अपनी दाखबारी के लिए कर सकता था और जिसे मैंने उसके लिए नहीं किया? मुझे अच्छी फसल की आशा थी, उसने खट्टे अंगूर क्यों पैदा किये?’’ (इसायाह 5:4) यह बात केवल यहुदियो के लिए ही नही, परन्तु हम मसीहियों के लिए भी बहुत हद तक समान है। कई बार हम अपने मन, वचन और कर्मों से उस ज्योति को ठुकरा देते है।

अगर हम उस प्रेम का सही फल उत्पन्न नही कर पा रहें है तो इसका मतलब हम ईश्वर से पूर्ण रूप से नहीं जुड़े हैं ‘‘मै दाखलता हूँ और तुम डालियाँ हो। जो मुझ में रहता है और मैं जिस में रहता हूँ, वही बहुत फलता है; क्योंकि मुझ से अलग रह कर तुम कुछ भी नहीं कर सकते।’’ (योहन 15:5)।

बपतिस्मा के द्वारा हम सबको वह अनमोल उपहार मिला है। मसीह का अनुसरण करने का अवसर मिला। परन्तु क्या हम मसीह के समान जीवन व्यतीत करते है? क्या हम उस उपहार का या उस विश्वास का फल उत्पन्न करते हैं? फल उत्पन्न करने का मतलब यहाँ पर प्रभु के वचन के अनुसार कार्य करना है। प्रभु का वचन सशक्त और किसी भी दुधारी तलवार से भी तेज है (इब्रानियों 4:12)। ईश्वर का वचन हमे प्रेम करने, क्षमा करने, दीन बनने, अपना क्रूस उठाने, अपने को छोटा बनाने तथा प्रभु में बने रहने को कहता है। इन सबसे बढ़ कर ईश्वर का वचन हमें ईश्वर को सारे हृदय से, सारे मन, सारी शक्ति से प्रेम करने और अपने पड़ोसियों को अपने समान प्रेम करने को कहता है। परन्तु क्या हम इनका अनुसरण करते है? कई बार हमारे गलत उदाहरण के कारण लोगों का हमसे विश्वास उठ जाता है। इसी कारण महात्मा गांधी ने कहा कि वह ख्रीस्त को पसंद करते हैं लेकिन ख्रीस्तीयों को नहीं, क्योंकि ख्रीस्तीय ख्रीस्त से बिल्कुल अलग हैं। यही कारण है कि हमारे जीवन द्वारा कोई फल उत्पन्न नहीं हो रहा है। आइये हम सब सच्चे ख्रीस्तीय या सच्चे मसीही बने। हम केवल वचनों से ही नहीं परन्तु कर्मों से येसु का अनुसरण करें।

फादर डेन्नीस तिग्गा