वर्ष का अट्ठाईसवाँ सप्ताह, इतवार - वर्ष C

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📕पहला पाठ

एलीसय के कहने पर गैर-यहूदी नामन ने यर्दन नदी में सात बार डुबकी लगायी। इसके फलस्वरूप वह अपने रोग से मुक्त हो गया और इस्राएल के ईश्वर में विश्वास करने लगा। वह अपने यहाँ वेदी बनाने के लिए इस्राएल की मिट्टी अपने साथ ले गया ।

राजाओं का दूसरा ग्रंथ 5:14-17

"नामन ने एलीसय के पास लौट कर प्रभु को स्वीकार किया।"

नामन नामक कोढ़ी ने जा कर यर्दन नदी में सात बार डुबकी लगायी, जैसा कि एलीसय ने उस से कहा था, और उसका शरीर फिर छोटे बालक के शरीर जैसा स्वच्छ हो गया। वह अपने सब परिजनों के साथ एलीसय के यहाँ लौटा। वह भीतर जा कर उसके सामने खड़ा हो गया और बोला, "अब मैं जान गया हूँ कि इस्राएल को छोड़ कर और कहीं पृथ्वी पर कोई देवता नहीं है। अब मेरा निवेदन है कि आप अपने सेवक से कोई उपहार स्वीकार करें"। एलीसय ने उत्तर दिया, "उस प्रभु की शपथ, जिसकी मैं सेवा करता हूँ; मैं कुछ भी स्वीकार नहीं करूँगा"। नामन के अनुरोध करने पर भी उसने स्वीकार नहीं किया । तब नामन ने कहा, "जैसा आप चाहते हैं। आज्ञा दीजिए कि मुझे दो खच्चरों का बोझ मिट्टी मिल जाये, क्योंकि मैं अब से प्रभु को छोड़ कर किसी और देवता को होम अथवा बलि नहीं चढ़ाउँगा"।

प्रभु की वाणी।

📖भजन : स्तोत्र 97:1-4

अनुवाक्य : प्रभु ने अपना मुक्ति-विधान प्रकट किया है।

1. प्रभु के आदर में नया गीत गाओ; क्योंकि उसने अपूर्व कार्य किये हैं। उसके दाहिने हाथ और उसकी पवित्र भुजा ने हमारा उद्धार किया है

2. प्रभु ने अपना मुक्ति-विधान प्रकट किया और सभी राष्ट्रों को अपना न्याय दिखाया है। उसने अपनी प्रतिज्ञा का ध्यान रख कर इस्राएल के घराने की सुध ली है

3. पृथ्वी के कोने-कोने में हमारे ईश्वर का मुक्ति-विधान प्रकट हुआ है। समस्त पृथ्वी आनन्द मनाये । और ईश्वर की स्तुति करे।

📘दूसरा पाठ

सन्त पौलुस सुसमाचार के प्रचार के कारण बन्दी हैं, किन्तु वह अत्याचार के कारण हार नहीं मानते। वह बन्दीगृह में भी मसीह का साक्ष्य देते रहते हैं, क्योंकि जैसा कि वह स्वयं कहते हैं- ईश्वर का वचन बन्दी नहीं है। सन्त पौलुस की तरह हम यह विश्वास करें कि "यदि हम दृढ़ रहें, तो उनके साथ राज्य करेंगे"।

तिमथी के नाम सन्त पौलुस का दूसरा पत्र 2:8-13

"यदि हम दृढ़ रहें, तो हम मसीह के साथ राज्य करेंगे।"

दाऊद के वंशज येसु मसीह को बराबर याद रखो, जो मेरे सुसमाचार के अनुसार मृतकों में से जी उठे हैं। इस सुसमाचार की सेवा में मैं कष्ट पाता हूँ और अपराधी की तरह बन्दी हूँ। परन्तु ईश्वर का वचन बन्दी नहीं होता। मैं चुने हुए लोगों के लिए सब कुछ सह लेता हूँ, जिससे वे भी येसु मसीह के द्वारा मुक्ति तथा सदा बनी रहने वाली महिमा प्राप्त करें। यह कथन सुनिश्चित है - यदि हम उनके साथ मर गये, तो हम उनके साथ जीवन भी प्राप्त करेंगे; यदि हम दृढ़ रहें, तो उनके साथ राज्य करेंगे; यदि हम उन्हें अस्वीकार करेंगे, तो वह भी हमें अस्वीकार करेंगे; यदि हम मुकर जायेंगे, तो भी वह सत्यप्रतिज्ञ बने रहते हैं, क्योंकि वह अपने स्वभाव के विरुद्ध नहीं जा सकते।

प्रभु की वाणी।

📒जयघोष

अल्लेलूया, अल्लेलूया ! हे प्रभु ! तेरी शिक्षा आत्मा और जीवन है। तेरे ही शब्दों में अनन्त जीवन का संदेश है। अल्लेलूया !

📙सुसमाचार

दस कोढ़ियों में एक ही गैर-यहूदी था और वही येसु को धन्यवाद देने के लिए लौटा। हमें भी ईश्वर के सब कृपादानों के लिए धन्यवाद देते रहना चाहिए ।

लूकस के अनुसार पवित्र सुसमाचार 17:11-19

"इस परदेशी को छोड़ कोई नहीं मिला जो लौट कर ईश्वर की स्तुति करे?"

येसु येरुसालेम की यात्रा करते हुए समारिया और गलीलिया के सीमा-क्षेत्रों से हो कर जा रहे थे। किसी गाँव में प्रवेश करते समय उन्हें दस कोढ़ी मिले। वे दूर खड़े हो कर ऊँचे स्वर से पुकारने लगे, "हे येसु ! हे गुरु ! हम पर दया कीजिए"। येसु ने उन्हें देख कर कहा, "जाओ और अपने को याजकों को दिखलाओ" और ऐसा हुआ कि वे रास्ते में ही नीरोग हो गये । तब उन में से एक यह देख कर कि मैं नीरोग हो गया हूँ, ऊँचे स्वर से ईश्वर की स्तुति करते हुए लौटा। वह येसु को धन्यवाद देते हुए उनके चरणों पर मुँह के बल गिर पड़ा, और वह समारी था। येसु ने कहा, "क्या दसों नीरोग नहीं हुए? तो बाकी नौ कहाँ हैं? क्या इस परदेशी को छोड़ और कोई नहीं मिला, जो लौट कर ईश्वर की स्तुति करे?" तब उन्होंने उस से कहा, "उठो, जाओ । तुम्हारे विश्वास ने तुम्हारा उद्धार किया है"।

प्रभु का सुसमाचार।


📚 मनन-चिंतन

आज की पूजनविधि हमें ईश्वर की भलाई और उदारता को पहचानने और उसके प्रति कृतज्ञ बने रहकर संसार के सामने उसकी घोषणा करनी है, जैसे कि माता मरियम पवित्र बाइबल में बहुत सी महान हस्तियों ने किया। पहले पाठ में हम देखते हैं कि किस प्रकार नामान सिरियन अपने जीवन में हुए चमत्कार के लिए ईश्वर के प्रति कृतज्ञ था और लौटकर प्रभु के नबी को धन्यवाद देने के लिए आया। आज का सुसमाचार भी हमें ईश्वर के महान कार्यों के लिए कृतज्ञता प्रकट करने का आह्वान करता है। दस कोढ़ियों में से सिर्फ़ ही कोढ़ी चंगा होने पर वापस लौटकर प्रभु येसु को धन्यवाद देने आया, अन्य नौ कोढ़ियों ने ईश्वर के प्रति धन्यवाद प्रकट करना उचित भी नहीं समझा।

हम जानते हैं कि हमें ईश्वर से इतने वरदान और कृपाएँ मिलीं हैं जिनके हम योग्य भी नहीं हैं। ईश्वर ने ही हमें जीवन दिया है, जिसने अपने प्राण हम में फूंक दिए हैं ताकि हम जीवित रह सकें। वह हमारी रक्षा करता है और उसी ने इस पृथ्वी को हमें अपने निवास स्थान के रूप में दिया है। वह हम पर नज़र रखता है ताकि हम ठोकर खाकर गिर ना पड़ें। जब हम बीमारी में कमजोर हो जाते हैं तो ईश्वर हमें शक्ति और चंगाई प्रदान करता है, जब हम जीवन में भटक जाते हैं, तो ईश्वर हमें सही राह दिखाता है, नई आशा प्रदान करता है और हमारा मार्ग, सत्य और जीवन बन जाता है। पवित्र बाइबल हमें सिखाती है कि ईश्वर सदा से हमें अपने मार्ग पर ले जाना चाहता है। मुक्ति विधान ऐसे अनेक उदाहरणों से भरा पड़ा है जो ईश्वर के अपार प्रेम को दर्शाते हैं और यह बताते हैं कि ईश्वर हमारी देख-भाल करता है।

अंततः उसने इस दुनिया में अपने एकलौते पुत्र को भेज दिया जो हमारे प्रति ईश्वर के असीम प्रेम का अचूक प्रमाण है। प्रभु येसु ने हमें पिता ईश्वर के दर्शन कराए। उन्होंने बीमारों को चंगा किया, मुर्दों को जिलाया, पापियों को क्षमा दिलायी एवं मानवता को ईश्वर की ओर उन्मुख किया। उसने हमारे पापों को अपने ऊपर ले लिया और स्वयं क्रूस की कष्टकारी मृत्यु को अपनाया। ये सब किसके लिए? हमारे लिए! अगर हमने प्रभु में बपतिस्मा लिया है, तो हम उनके उत्तराधिकारी बन गए हैं, क्रूस पर मृत्यु के फल के सहभागी बन गए हैं। आज भी वह हमें हमारे भोजन के रूप में अपना शरीर और रक्त प्रदान करते हैं। क्या मैं अपने प्रति ईश्वर की उदारता एवं प्रेम के लिए कृतज्ञ हूँ?

यदि मैं अपने प्रति ईश्वर के प्रेम के लिए कृतज्ञ हूँ तो उस असीम प्रेम को मुझे दूसरों के साथ बाँटना है। हर वह व्यक्ति जिसने प्रभु येसु को मुक्तिदाता के रूप में स्वीकार किया है, उसके लिए यह अनिवार्य है कि वह संसार के लिए ईश्वर की ओर से मिले मुक्ति रूपी उपहार की घोषणा करे। आज यदि हम संसार के सामने प्रभु येसु को अपना मुक्तिदाता स्वीकार करते हैं तो प्रभु येसु भी अपने स्वर्गीय पिता और स्वर्गदूतों के समक्ष अपने प्रिय शिष्यों के रूप में स्वीकार करेंगे। इससे बढ़कर आनंद की बात हमारे लिए और क्या हो सकती है हम पिता ईश्वर और प्रभु येसु की नज़रों में उनके प्रेम के योग्य पाए जाएँ! यदि मैं ईश्वर के प्रति कृतज्ञ हूँ तो मुझे उसके प्रेम की घोषणा भी करनी है। ईश्वर हमें कृपा प्रदान करे कि हम उसके वरदानों के प्रति कृतज्ञ बनें और उसके असीम प्रेम की घोषणा संसार के सामने कर सकें।

- फ़ादर जॉन्सन बी. मरिया (ग्वालियर धर्मप्रान्त)


📚 REFLECTION

Today’s liturgy of the word invites us to acknowledge God’s goodness and generosity towards us and express our gratitude, proclaim his kindness to whole world as mother Mary and many other Biblical personalities proclaimed it. The first reading describes about how Naaman the Syrian was grateful to God of Israel and came back to thank the prophet. The gospel of the day also gives us a similar message of expressing the gratitude. Only one leper out of 10 came to thank Jesus for getting healed.

We know we have received from God much more than we deserve. God is the one who has given us life, who has breathed his spirit within us, so that we can live. He protects us and has given us the Earth as our home. He watches over us so that we do not fall. When we are sick, God gives us strength and healing, when we are lost in life God shows us new path, gives us new hope and becomes our way, truth and life. The holy Bible teaches us that God has been always trying to call us to his paths. The salvation history is full of innumerable proofs that God loves us unconditionally and takes care of us.

Finally he sent his only son into this world as the greatest proof of his love. Jesus showed us the true face of God. He healed the sick, raised the dead, forgave the sinners, and turned the face of humanity towards God. He took all our iniquities upon himself and died a painful and shameful death on the cross. All for us! If we have been baptised in him, then we have become his heirs, we have become the beneficiaries of his sacrifice on the cross. Even today he nourishes us with his own body and blood. Am I grateful to God for all his goodness and love to me?

If I am grateful towards God’s love for me, then I must share it with others. Every Christian who has accepted Jesus as the saviour, also has the obligation to proclaim the great gift of salvation to the whole world. Today if we proclaim Jesus as our saviour before the world, then he also will proclaim us as his loving disciples before the heavenly father, and imagine what is more joyful than to be loved and accepted by Father and the son in heaven! If I am grateful to God then I must proclaim him. May God grant us strength to express our gratitude to him and proclaim it before the world.

-Fr. Johnson B. Maria (Gwalior Diocese)

📚 मनन-चिंतन -2

प्रभु ईश्वर के उपहारों के बारे में हमारी क्या प्रतिक्रिया है? आज के सुसमाचार में, हम दस कोढ़ियों को देखते हैं जो चंगे हो गए थे। उनमें से केवल एक ही प्रभु को धन्यवाद देने के लिए वापस आता है। उसकी प्रतिक्रिया स्पष्ट रूप से बाइबल में दर्ज है। “उन में से एक यह देख कर कि वह नीरोग हो गया है, ऊँचे स्वर से ईश्वर की स्तुति करते हुए लौटा। वह ईसा को धन्यवाद देते हुए उनके चरणों पर मुँह के बल गिर पड़ा।“ (लूकस 17:15-16) उसने प्रभु को विपुलता से धन्यवाद दिया। दस चंगे हो गए। नौ जश्न मनाने जाते हैं; केवल एक ईश्वर को धन्यवाद देने के लिए वापस आता है। क्या यह आज हमारे जीवन की भी वास्तविकता नहीं है? धन्यवाद उपहार की स्वीकृति है। एक उपहार केवल तभी पूरा होता है जब उसे किसी के द्वारा कृतज्ञता के साथ स्वीकार किया जाता है। जब समारी कोढ़ी ईश्वर का शुक्रिया अदा करने के लिए वापस आता है, तब उसे एक अतिरिक्त आशीर्वाद मिलता है, जो दूसरों को नहीं मिलता – “उठो, जाओ। तुम्हारे विश्वास ने तुम्हारा उद्धार किया है” (लूकस 17:19)। पवित्र मिस्सा बलिदान में हम यह स्वीकार करते हैं कि प्रभु को हमारी प्रशंसा की कोई आवश्यकता नहीं है; फिर भी हमारा धन्यवाद करने की इच्छा भी उनका उपहार है। स्तोत्रकार कहता है, “प्रभु के सब उपकारों के लिए मैं उसे क्या दे सकता हूँ? मैं मुक्ति का प्याला उठा कर प्रभु का नाम लूँगा।“ (स्तोत्र 116:12-13) एक अन्य सन्दर्भ में वह कहता है, “मैं हर समय प्रभु को धन्य कहूँगा; मेरा कण्ठ निरन्तर उसकी स्तुति करेगा” (स्तोत्र 34:1)। उसका यह भी कहना है – “प्रभु! मैं सारे हृदय से तुझे धन्यवाद दूँगा। मैं तेरे सब अपूर्व कार्यों का बखान करूँगा”(स्तोत्र 9:1)। हमारे इश्वर एक अद्भुत ईश्वर हैं जो अपने विस्मयकारी उपहारों से हमें लगातार आश्चर्यचकित करते रहते हैं। क्या हमें हर पल उनके प्रति कृतज्ञ नहीं बने रहना चाहिए?

-फादर फ्रांसिस स्करिया


📚 SHORT REFLECTION

What is our response to God’s gifts? In today’s Gospel, we have ten lepers who were healed. Only one of them comes back to thank the Lord. His response is vividly recorded in the Bible. “When he saw that he was healed, (he) turned back, praising God with a loud voice. He prostrated himself at Jesus’ feet and thanked him.” (Lk 17:15-16) He profusely thanked the Lord. Ten were healed. Nine go to celebrate; only one comes back to God to thank Him. Is this not also a reality of our lives today? Thanksgiving is an acknowledgement of the gift. A gift is complete only when it is gratefully received and acknowledged by someone. When the Samaritan leper comes back to thank God, he receives an additional blessing which others do not – “Get up and go on your way; your faith has made you well” (Lk 17:19). In the Holy Mass acknowledge that the Lord has no need of our praise; yet our desire to thank him is itself his gift. The Psalmist says, “What shall I return to the Lord for all his bounty to me? I will lift up the cup of salvation and call on the name of the Lord,” (Ps 116:12-13). Elsewhere, he says, “I will bless the Lord at all times; his praise shall continually be in my mouth” (Ps 34:1). He also says, “I will give thanks to the Lord with my whole heart; I will tell of all your wonderful deeds” (Ps 9:1). We have an amazing God who continually amazes us with his wonderful gifts. Should not every moment be lived in gratefulness towards Him?

-Fr. Francis Scaria

प्रवचन

हम बच्चों को धन्यवाद देना सिखलाते हैं। यह कार्य हम उन्हें न सिर्फ शिष्टाचार वश सिखाते बल्कि इसलिये भी कि उनमें कृतज्ञता की भावना बनी रहे। वे यह समझ सकें कि जो कुछ भी उनका है तथा उनके लिये किया जाता है उसके प्रति उन्हें कृतज्ञता व्यक्त करनी चाहिये। यह भावना बच्चों में विनम्रता की प्रवृति जागृत करती है। धन्यवाद देने के लिये व्यक्ति को समझना चाहिये कि उसने क्या पाया है। अधिकांश लोग केवल इसलिए धन्यवाद देने की नही सोचते कि उन्हें इस बात का अहसास तक नहीं कि उनके साथ जाने अनजाने में कितनी भलाई हो रही है और इस भलाई के लिए कोई जिम्मेदार भी है।

हम बाइबिल में अनेक धन्यवाद स्तोत्र, प्रार्थनायें एवं ज्ञापनों को पाते हैं। यह उन लोगों की ईश्वर के उनके जीवन में किये गये कार्यों के प्रति स्वीकृति तथा कृतज्ञता थी जैसे मूसा का विजय-गान (विधि-विवरण 32:1-42), अन्ना का भजन (1 समूएल 2:1.11) दाऊद का स्तोत्र (2 समूएल 22:2-51), टोबीत का स्तुतिगान (टोबीत 13:1-18), यूदीत का विजय-गान (यूदीत 16:1-17), मरियम का भजन (लूकस 1:46-55), जकरियस का भजन (लूकस 1:68-79) आदि।

जब प्रभु दस कुष्ठ रोगियों को चंगाई प्रदान करते हैं तो उनमें से केवल एक ही व्यक्ति जो समारी था ईश्वर को धन्यवाद देने वापस आता है। प्रभु को समारी का इस प्रकार लौट कर ईश्वर की स्तुति करना तथा उन्हें धन्यवाद देना अच्छा लगा। और प्रभु का यह पूछना कि ’’और कोई नहीं मिला, जो लौट कर ईश्वर की स्तुति करे’’ इस बात को प्रकट करता है कि ईश्वर को कृतज्ञता एवं धन्यवाद प्रिय है तथा येसु को उनकी असीम दया के प्रतिउत्तर में धन्यवाद देना सर्वोत्तम तरीका है।

समारी की इस धन्यता के पीछे कई कारण है। एक कुष्ठ रोगी के लिये चंगाई असंभव सी बात थी। ईसा के पूर्व पुराने विधान में कुष्ठ रोग से चंगाई की ही मात्र दो घटनायें है। गणना ग्रंथ 12:1-15 में मिरयम तथा 2 राजाओं 5:1-15 में नामान के कुष्ठ रोग से चंगाई की घटनायें। ऐसी विरल परिस्थतियों में यदि कुष्ठ रोगी चंगा हो जाये तो वह स्वाभाविक तौर पर अपने परिवार के पास दौडेगा। किन्तु इन सब भावनाओं को नजरअंदाज कर वह ईश्वर की स्तुति करते हुये सर्वप्रथम ईसा को धन्यवाद देने लौट कर आता है। इस प्रकार का त्याग तथा ईश्वर को प्राथमिकता उसके इस कार्य को अनुकरणीय एवं आदर्श बनाता है।

समारी रोगी दो प्रकार की अस्पर्शता का शिकार था। पहला तो वह कुष्ठ रोगी था; इस कारण उसे समाज की मुख्यधारा से दूर एकांत में अन्य कुष्ठ रोगियों के साथ अलग रहना पडता था। दूसरा वह समारी था। समारी लोगों को यहूदी लोग दोयम दर्जे का मानते थे। प्रभु की चंगाई के कारण वह कुष्ठ रोगी अपने शारारिक तथा सामाजिक अछूतेपन से मुक्त हो गया था। येसु में उसने एक ऐसे व्यक्ति को पाया जो बिना किसी भेदभाव के उसे शुद्धता का उपहार देते हैं तथा उसकी अस्पर्शता का दरकिनार कर उसे अपनाते हैं। जब सिमोन फरीसी के घर पापिनी स्त्री प्रभु के चरणों को ऑसुओं से धोकर, केशों से पोंछ कर तथा इत्र लगाती है तो वहॉ उपस्थित जनों को यह कार्य लज्जाजनक लगता है। किन्तु येसु कहते हैं, ’’इसके बहुत से पाप क्षमा हो गये हैं, क्योंकि इसने बहुत प्यार दिखाया है। पर जिसे कम क्षमा किया गया, वह कम प्यार दिखाता है।’’ (लूकस 7:47)

पापिनी स्त्री की अभिव्यक्ति हम इस समारी के कृतज्ञता भावों को समझ सकते हैं। वह अपने को धन्य समझता है क्योंकि उसमें इस चंगाई के लिये कोई योग्यता नहीं थी। यह येसु ने उसे मुफत में प्रदान किया था। इन सब भावों का सार मन में लिये उसमें सर्वप्रथम ईश्वर और येसु को धन्यवाद देने का उत्साह उमड पडा। समूएल के दूसरे ग्रंथ में दाऊद राजा होते हुये भी साधारण मनुष्य के समान छालटी के अधोवस्त्र पहने ईश्वर की मंजूषा के सामने नाचते हैं। जब उनकी पत्नी मीकल उन्हें इस बात के लिये शर्मिंदा करती है तो वे गर्व से कहते है, ’’प्रभु ने तुम्हारे पिता और तुम्हारे सारे घराने की अपेक्षा मुझे चुना है और मुझे प्रभु की प्रजा, इस्राएल का शासक बनाया है। मैं उसी प्रभु के सामने नाचता रहा और नाचूँगा।’’ (2 समूएल 6:21) राजा दाऊद की ईश्वर के प्रति इस कृतज्ञता का कारण ईश्वर द्वारा उन्हें चरवाहे के कार्य उपर उठाकर इस्राएल का राजा बनाना था। दाऊद तो एक साधारण चरवाहा था। ईश्वर ने उसे राजा बनाया था। इसलिये वह भी ईश्वर को धन्यवाद देते समय अपनी सुध-बुध खो देना सम्मान का विषय मानता है।

मूसा, एस्तेर, अन्ना, मरियम, जकारियस आदि ने भी ईश्वर के प्रति कृतज्ञता प्रकट की। हमें भी चाहिये हम सदैव प्रभु को धन्य कहें। संत पौलुस कहते हैं, “आप लोग हर समय प्रसन्न रहें, निरन्तर प्रार्थना करते रहें, सब बातों के लिए ईश्वर को धन्यवाद दें क्योंकि ईसा मसीह के अनुसार आप लोगों के विषय में ईश्वर की इच्छा यही है। (2 थेस्से. 5:16-18)

-फादर रोनाल्ड मेलकम वॉन