
प्रभु ने अपने अभिषिक्त सीरुस का दाहिना हाथ सँभाला है। उसने राष्ट्रों को सीरुस के अधीन कर दिया और राजाओं के शस्त्र ले लिये । प्रभु ने उसके लिए फाटकों को तोड़ दिया। अब उसके सामने कोई भी द्वार बन्द नहीं रहा । प्रभु उसी सीरुस से यह कहता है - मैंने अपने सेवक याकूब तथा अपने कृपापात्र इस्राएल के कारण तुम को नाम ले कर बुलाया और महान् बना दिया है, यद्यपि तुम मुझे नहीं जानते। मैं ही प्रभु हूँ, कोई दूसरा नहीं है। मुझे छोड़ कर कोई अन्य ईश्वर नहीं है। यद्यपि तुम मुझे नहीं जानते, तो भी मैंने तुम्हें शस्त्र प्रदान किये, जिससे पूर्व से पश्चिम तक सभी लोग यह जान जायें कि मुझे छोड़ कर कोई दूसरा नहीं ।
प्रभु की वाणी।
अनुवाक्य : प्रभु की महिमा तथा शक्ति का बखान करो ।
प्रभु के आदर में नया गीत गाओ। समस्त पृथ्वी प्रभु का भजन सुनाये। सभी राष्ट्रों में उसकी महिमा का बखान करो । सभी लोगों को उसके अपूर्व कार्यों का गीत सुनाओ
प्रभु महान् है और अत्यन्त प्रशंसनीय । अन्य राष्ट्रों के देवता निस्सार हैं- हमारा प्रभु ही परम श्रद्धेय है। प्रभु ने आकाश का निर्माण किया है
पृथ्वी की सभी जातियो ! प्रभु की महिमा का तथा शक्ति का बखान करो। उसके नाम की महिमा का गीत सुनाओ । चढ़ावा ले कर प्रभु के प्रांगण में प्रवेश करो
प्रभु के मंदिर में उसकी आराधना करो। समस्त पृथ्वी उसके सामने काँप उठे। राष्ट्रों को यह घोषित करो - "प्रभु ही राजा हैं। वह न्यायपूर्वक सभी लोगों का विचार करेगा"।
प्रभु की वाणी।
अल्लेलूया, अल्लेलूया ! प्रभु कहते हैं, "मार्ग, सत्य और जीवन मैं हूँ। मुझ से हो कर गये बिना कोई पिता के पास नहीं आ सकता ।" अल्लेलूया !
येसु के शत्रु उन्हें फँसाना चाहते हैं। क्या वह इस्राएल के शत्रुओं का पक्ष लेते हैं अथवा उनका विरोध करते हैं? येसु अपने उत्तर द्वारा यह दिखलाते हैं कि इस दुनिया की समस्याओं में उलझ कर हमें ईश्वर को नहीं भुलाना चाहिए ।
फ़रीसी आपस में परामर्श करने लगे कि हम किस प्रकार येसु को उनकी अपनी बात के फन्दे में फँसायें । इन्होंने हेरोदियों के साथ अपने शिष्यों को यह प्रश्न पूछने येसु के पास भेजा, "गुरुवर ! हम जानते हैं कि आप सत्य बोलते हैं और सच्चाई से ईश्वर का मार्ग सिखलाते हैं। आप को किसी की परवाह नहीं। आप मुँह-देखी बातें नहीं करते । इसलिए हमें बताइए, आपका क्या विचार है - कैसर को कर देना उचित है या नहीं?" उनकी धूर्तता भाँप कर येसु ने कहा, "रे ढोंगियो ! मेरी परीक्षा क्यों लेते हो? कर का सिक्का मुझे दिखलाओ।" जब उन्होंने एक दीनार प्रस्तुत किया तो येसु ने उन से कहा, "यह किसका चेहरा और किसका लेख है?" उन्होंने उत्तर दिया, "कैसर का।" इस पर येसु ने उन से कहा, "तो, जो कैसर का है, उसे कैसर को दो और जो ईश्वर का है, उसे ईश्वर को।"
प्रभु प्रभु का सुसमाचार।
आज के सुसमाचार में येसु के खिलाफ एक जानबूझकर साजिश रची गई थी। उनका लक्ष्य येसु के प्रभाव को ख़तम करना था। आज का सुसमाचार परिच्छेद उन तीन प्रश्नों में से पहला है जिनके द्वारा यहूदी नेतृत्व येसु को बदनाम करने का प्रयास करता है। कैसर को कर चुकाने के बारे में उनके प्रश्न पर येसु का उत्तर उत्कृष्ट था। यह हमें ईश्वर के प्रति अपनी प्रतिबद्धता की समीक्षा करने और उसे नवीनीकृत करने के लिए कहता है। येसु दुनिया को दो क्षेत्रों में विभाजित नहीं करते है। वे कैसर के प्रति हमारे दायित्वों और ईश्वर के प्रति हमारे दायित्वों के बीच की सीमाओं को स्पष्ट रूप से परिभाषित करते हैं। उनका जवाब, देश के प्रति हमारे दायित्व को स्वीकार करता, लेकिन ईश्वर के प्रति हमारे बड़े दायित्व की पुष्टि करता है। कैसर की छवि वाले सिक्के कैसर के हो सकते हैं, लेकिन सिक्के, कैसर, रोम, ग्रह, पृथ्वी, ब्रह्मांड जैसी सभी चीजें ईश्वर के हैं और ईश्वर के प्रभुत्व के अधीन में हैं। प्रत्येक मनुष्य अपने अंदर एक और छवि रखता है, ईश्वर क। इसलिए प्रत्येक मनुष्य का अस्तित्व उसके प्रति और केवल उसी के प्रति है। कलीसिया कि मिशन मूलतः ईश्वर के बारे में बात करना और उसकी संप्रभुता को याद रखना है।हम किसके प्रति अपनी निष्ठा रखते हैं?
✍फादर संजय कुजूर एस.वी.डी.There was a deliberate plot against Jesus in the Gospel today. Their goal was to destroy Jesus’ influence. Today’s gospel passage is the first of three questions with which the Jewish leadership attempts to discredit Jesus. Jesus’ reply to their question about paying tax to Caesar was masterful. It calls us to review and to renew our commitment to God. Jesus does not divide the world into two equal realms, clearly defining the boundaries between our obligations to Caesar and our obligations to God. Rather, his answer acknowledges our obligation to the state, but affirms our larger obligation to God. Coins bearing Caesar’s image may belong to Caesar, but all things like coins, Caesar, Rome, the planet earth, the universe come from the mind of God and are under God’s dominion. Caesar’s realm is but a speck within God’s realm. The days of Caesar’s realm are numbered, but God’s realm is eternal. Every person carries in him or herself another image, that of God, and therefore it is to him and to him alone that each one owes his or her existence. The mission of the Church is essentially to speak of God and to remember his sovereignty. Whom do we owe our allegiance?
✍ -Fr. Sanjay Kujur SVD
"मैं प्रस्तुत हूँ, मुझ को भेज!" यह है संत पापा फ्रांसिस द्वारा इस वर्ष के मिशन रविवार के लिए चुना गया विषय। यह पिछले वर्ष अक्टूबर के विशेष मिशनरी महीने के कार्यक्रम को जारी रखता है, जिसका विषय था, "अभिषिक्त और प्रेषित: कलीसिया दुनिया में मिशन पर"।
मिशन इतवार के दौरान हमें पिता ईश्वर की ओर से येसु के मिशन की याद दिलाई जाती है, जिसमें कलीसिया और हर एक विश्वासी का मिशन का स्रोत है। अपने पुनरुत्थान के बाद येसु ने उनके शिष्यों से कहा, " जिस प्रकार पिता ने मुझे भेजा, उसी प्रकार मैं तुम्हें भेजता हूँ" (Jn 20:21)। अपने स्वर्गारोहण के पहले येसु उन्हें आज्ञा दी, "संसार के कोने-कोने में जा कर साडी सृष्टि को सुसमाचार सुनाओ" (Mk 16:15)।
येसु स्वर्गीय पिता के मिशनरी हैं: हमारे प्रति उनके प्यार के कारण ईश्वर ने अपने पुत्र येसु को हमारे मुक्तिदाता के रूप में भेजा (cf. Jn 3:16)। येसु का जीवन और सेवाकार्य पिता की इच्छा के प्रति उसकी पूर्ण आज्ञाकारिता को प्रकट करती है (cf. Jn 4:34; 6:38; 8: 12-30; Heb 10: 5-10)। क्रूसित और पुनर्जीवित येसु हमें उसके प्रेम के मिशन में शामिल करता है। अपना आत्मा की शक्ति से कलीसिया उनकी संतानों को अपना मिशन में शामिल करता है।
मिशन ईश्वर की पुकार पर हमारा स्वतंत्र और सचेत प्रत्युत्तर है। ईश्वर पूछता है, "मैं किसे भेजूं?"। हम इस आह्वान को तभी स्वीकार करते हैं जब हम विश्वासियों का समूह कलीसिया में उपस्थित येसु के साथ प्रेम का व्यक्तिगत संबंध रखते हैं। सुसमाचार कार्य संबंधों से शुरू होता है; एक दूसरे के साथ संबंध, और मसीह के साथ संबंध।
हम अपने आप से पूछें:
क्या हम अपने रोजमर्रा की जिंदगी की घटनाओं में मिशन की पुकार को सुनने के लिए पवित्र आत्मा की उपस्थिति का स्वागत करने के लिए तैयार हैं, चाहे हम विवाहित जीवन जीते हो, या समर्पित जीवन जीते हो?
क्या हम किसी भी समय या जगह पर भेजे जाने के लिए तैयार हैं, ताकि हम ईश्वर के प्रेम और दयालुता के गवाह बनें, येसु मसीह के सुसमाचार की घोषणा करें, और पवित्र आत्मा की शक्ति में कलीसिया का निर्माण करें?
क्या हम माता मरियम की तरह पूर्ण रूप से ईश्वर की इच्छा पूरी करने के लिए तैयार हैं (cf. Lk 1:38)? यह आंतरिक मनोभाव आवश्यक है अगर हम ईश्वर से कहें: "मैं प्रस्तुत हूँ, मुझ को भेज।"
इस वर्ष का मिशन रविवार और मिशनरी यात्रा कोविद -19 महामारी द्वारा उत्पन्न कष्टों और चुनौतियों से प्रभावित है। ईश्वर का निमंत्रण, "मैं किसे भेजूं?", वर्तमान विश्व संकट में कलीसिया और पुरो मानव जाती चुनौती देता है। पूरी दुनिया इस महामारी से प्रभावित है। सुसमाचार में शिष्यों की तरह हम एक अप्रत्याशित, अशांत तूफान से बिना कोई पूर्व तैयारी से पकड़े गए हैं।
महामारी के इस समय ईश्वर हमसे क्या कह रहा है यह समझना कलीसिया के मिशन के लिए एक चुनौती है। बीमारी, पीड़ा, भय और अलगाव हमें चुनौती देते हैं। अकेले मरने वालों की अवस्था, तिरस्कृत लोग, अपनी नौकरी और आय खोये हुए लोग, बेघर और जिनके पास भोजन की कमी है, वे सब हमारे लिए चुनौती हैं। सामाजिक दूरी रखने और घर पर रहने के लिए मजबूर होना हमें इस बात को याद दिलाती है कि हमें सामाजिक रिश्तों के साथ-साथ ईश्वर के साथ अपने सामूहिक संबंधों की कितनी जरूरत है। अविश्वास और उदासीनता को बढ़ावा देने के बजाय लॉक डाउन की इस स्थिति को हमें दूसरों से निकट सम्बन्ध बनाये रखने के लिए अधिक चौकस बनाना चाहिए। और प्रार्थना, जिसमें ईश्वर हमारे दिलों को छूता है और प्रभावित करता है, हमें अपने भाई-बहनों की ज़रूरतों के लिए संवेदनशील बनाना चाहिए, साथ ही साथ सारी सृष्टि की देखभाल करने की हमारी ज़िम्मेदार भी महसूस कराना चाहिए। पवित्र यूखरिस्त मनाने के लिए सामूहिक रूप में इकट्ठा होने की असंभवता ने हमें कई ईसाई समुदायों के अनुभव को साझा करने के लिए प्रेरित किया है जो हर रविवार को पवित्र यूखरिस्त नहीं मना सकते हैं। इन सब में, ईश्वर का प्रश्न: "मैं किसे भेजूँ?" हमें एक बार और संबोधित किया जाता है और एक उदार और ठोस प्रत्युत्तर का इंतजार करता है: "मैं प्रस्तुत हूँ, मुझ को भेज!" (इसायस 6: 8)। ईश्वर उन लोगों की तलाश में है जो दुनिया में और राष्ट्रों के बीच उसके प्रेम और मुक्ति के सन्देश के गवाह बन सकें।
संत पिता फ्रांसिस इस महामारी के दौरान मिशन के तीन विशिष्ट रूपों का प्रस्ताव करता है: वे हैं, शेयरिंग, सेवा और मध्यस्थ प्रार्थना। अपने संसाधनों, प्रतिभाओं और अनुभवों को साझा करना मिशन का एक तरीका है। जरूरतमंद लोगों की सेवा करना, विशेष रूप से महामारी के कारण उत्पन्न गरीबी के नए रूपों से पीड़ित लोगों की सेवा करना सुसमाचार की एक सामयिक और प्रासंगिक गवाही होगी। दूसरों की जरूरतों के लिए प्रार्थना करना कलीसिया के मिशन में भाग लेने का एक निश्चित तरीका है।
प्रार्थना कीजिये की प्रभु का मिशन का आह्वान सुनने और यह प्रत्युत्तर देने के लिए आपको कृपा मिले:"मैं प्रस्तुत हूँ, मुझ को भेज!"
✍ - फादर जोली जोन (इन्दौर धर्मप्रांत)
The theme chosen by Pope Francis for his year’s Mission Sunday is, “Here am I, send me (Is 6:8).” This is in continuation of the Extraordinary Missionary Month of last October which had the theme, “Baptized and Sent: the Church of Christ on Mission in the World”.
During the mission Sunday celebration we are reminded of the mission of Jesus from the Father, from which springs the mission of the Church and that of every baptized. After the resurrection Jesus told his disciples, “As the Father sent me, so am I sending you” (Jn 20:21). He commanded them, “Go out to the whole world, and proclaim the gospel to the whole creation” (Mk 16:15).
Jesus is the Father’s Missionary: Out of his love for us, God the Father sent his Son Jesus (cf. Jn 3:16). The life and ministry of Jesus reveal his total obedience to the Father’s will (cf. Jn 4:34; 6:38; 8:12-30; Heb 10:5-10). Jesus, crucified and risen for us, draws us in turn into his mission of love. With his Spirit Jesus enlivens the Church, he makes us his disciples and sends us on a mission to the world and to its peoples.
Mission is a free and conscious response to God’s call, who asks, “Whom shall I send?” We discern this call only when we have a personal relationship of love with Jesus present in his Church. Let us ask ourselves:
Are we prepared to welcome the presence of the Holy Spirit in our lives, to listen to the call to mission, whether in our life as married couples or as consecrated persons or those called to the ordained ministry, and in all the everyday events of life?
Are we willing to be sent forth at any time or place to witness to our faith in God the merciful Father, to proclaim the Gospel of salvation in Jesus Christ, to share the divine life of the Holy Spirit by building up the Church?
Are we, like Mary, the Mother of Jesus, ready to be completely at the service of God’s will (cf. Lk 1:38)? This interior openness is essential if we are to say to God: “Here am I, Lord, send me” (cf. Is 6:8).
The Mission Sunday and missionary journey of the Church this year is marked by the suffering and challenges created by the Covid-19 pandemic. The invitation from God, “whom shall I send?,” challenges both the Church and humanity as a whole in the current world crisis. The whole world is affected by the pandemic. “Like the disciples in the Gospel we were caught unprepared by an unexpected, turbulent storm.”
Understanding what God is saying to us at this time of pandemic represents a challenge for the Church’s mission. Illness, suffering, fear and isolation challenge us. The poverty of those who die alone, the abandoned, those who have lost their jobs and income, the homeless and those who lack food challenge us. Being forced to observe social distancing and to stay at home invites us to rediscover that we need social relationships as well as our communal relationship with God. Instead of increasing mistrust and indifference, this situation should make us even more attentive to our way of relating to others. And prayer, in which God touches and moves our hearts, should make us ever more open to the need of our brothers and sisters, as well as our responsibility to care for all creation. The impossibility of gathering as a Church to celebrate the Eucharist has led us to share the experience of the many Christian communities that cannot celebrate Mass every Sunday. In all of these, God’s question: “Whom shall I send?” is addressed once more to us and awaits a generous and convincing response: “Here am I, send me!” (Is 6:8). God continues to look for those whom he can send forth into the world and to the nations to bear witness to his love, his deliverance from sin and death, his liberation from evil (cf. Mt 9:35-38; Lk 10:1-12).
The Holy Father proposes three specific forms of mission during this pandemic: sharing, service and intercessory prayer. Sharing your resources, talents and experiences is a way of mission. Serving those in need, especially those in new forms of poverty caused by the pandemic is a powerful way of bearing witness to the gospel. Praying for the needs of others is a sure way of participating in the mission of the Church.
May you have the grace to respond to the Lord’s invitation, saying “Here I am, send me!”
✍ -Fr. Jolly John (Indore Diocese)
आज के सुसमाचार में प्रभु कहते हैं, “जो कैसर का है, उसे कैसर को दो और जो ईश्वर का है, उसे ईश्वर को” (मत्ती 22:21। यहाँ पर एक प्रकार से ईश्वर और राजा या कैसर की तुलना की गयी है। हमें इस बात पर मनन-चिंतन करना चाहिए कि ईश्वर का क्या है और कैसर का क्या है। 1 कुरिन्थियों 4:7 में संत पौलुस कहते हैं, “आपके पास क्या है, जो आपको न दिया गया है? और यदि आप को सब कुछ दान में मिला है, तो इस पर गर्व क्यों करते हैं, मानो यह आप को न दिया गया हो?” अब सवाल उठता है कि हमारे पास जो कुछ है, वह सब किसका दिया हुआ है। इब्रानियों 2:10 हमें बताता है कि ईश्वर के कारण और ईश्वर के द्वारा ही सब कुछ होता है। स्तोत्र 24:1 कहता है – “पृथ्वी और जो कुछ उस में है, संसार और उसके निवासी-सब प्रभु का है”। विधि-विवरण 10:14 में वचन कहता है – “आकाश, सर्वोच्च आकाश, पृथ्वी और जो कुछ उस में है - यह सब तुम्हारे प्रभु ईश्वर का है।”
अब आती है, राजाओं की बात। स्तोत्र 47:8-10 में हम पढ़ते हैं - “ईश्वर समस्त पृथ्वी का राजा है। उसके आदर में शिक्षा-गीत सुनाओ। ईश्वर सभी राष्ट्रों पर राज्य करता है। वह अपने सिंहासन पर विराजमान है। अन्य राष्ट्रों के शासक इब्राहीम के ईश्वर की प्रजा से मेल करते हैं। पृथ्वी के शासक ईश्वर के अधीन है। ईश्वर सबों पर राज्य करता है।” ईश्वर राजाओं का राजा और प्रभुओं का प्रभु हैं “जो अमरता का एकमात्र स्रोत है, जो अगम्य ज्योति में निवास करता है, जिसे न तो किसी मनुष्य ने कभी देखा है और न कोई देख सकता है। उसे सम्मान तथा अनन्त काल तक बना रहने वाला सामर्थ्य!” (1 तिमथी 6:15-16, देखिए प्रकाशना 17:14)
इसके साथ-साथ पवित्र वचन हमें यह भी समझाता है कि अधिकारियों की व्यवस्था ईश्वर द्वारा की गयी है। प्रभु येसु पिलातुस से कहते हैं, “यदि आप को ऊपर से अधिकार न दिया गया होता तो आपका मुझ पर कोई अधिकार नहीं होता”। नबी दानिएल राजा नबूकदनेज़र को संबोधित करते हुए कहते हैं, “राजा! आप राजाओं के राजा हैं। स्वर्ग के ईश्वर ने आप को राजत्व, अधिकार, सामर्थ्य और सम्मान प्रदान किया। उसने मनुष्यों, मैदान के पशुओं और आकाश के पक्षियों को- वे चाहें कहीं भी निवास करें- आपके हाथों सौंपा और आप को सब का अधिपति बना दिया। संत पौलुस कहते हैं,“प्रत्येक व्यक्ति अधिकारियों के अधीन रहे, क्येांकि ऐसा कोई अधिकार नहीं, जो ईश्वर का दिया हुआ न हो। वर्तमान अधिकारियों की व्यवस्था ईश्वर द्वारा की गयी है।“ (रोमियों 13:1) वे यह भी समझाते हैं, कि “न केवल दण्ड से बचने के लिए, बल्कि अन्तःकरण के कारण भी अधिकारियों के अधीन रहना चाहिए। आप इसीलिए राजकर चुकाते हैं। अधिकारीगण ईश्वर के सेवक हैं और वे अपने कर्तव्य में लगे रहते हैं।“ (रोमियों 13:1-6)
इस दुनिया में रहते समय हरेक व्यक्ति की अधिकारों तथा जिम्मेदारियों को निभाने हेतु कुछ व्यवस्था की ज़रूरत है। यह शांतिमय वातावरण तथा प्रगति के लिए भी जरूरी है। शासन की व्यवस्था भी इसी मतलब से बनायी गयी है। इसलिए संत पौलुस हमसे अधिकारियों तथा शासकों के लिए प्रार्थना करने को कहते हैं। “मैं सब से पहले यह अनुरोध करता हूँ कि सभी मनुष्यों के लिए, विशेष रूप से राजाओं और अधिकारियों के लिए, अनुनय-विनय, प्रार्थना निवेदन तथा धन्यवाद अर्पित किया जाये, जिससे हम भक्ति तथा मर्यादा के साथ निर्विघ्न तथा शान्त जीवन बिता सकें। यह उचित भी है और हमारे मुक्तिदाता ईश्वर को प्रिय भी” (1 तिमथी 2:1-3)।
इस प्रकार ख्रीस्तीय शिक्षा के अनुसार विश्वासियों को राजाओं के राजा और प्रभुओं के प्रभु ईश्वर को प्रथम स्थान देने के साथ-साथ राष्ट्र-निर्माण के लिए अपना सहयोग देना चाहिए। सभी विश्वासी ईश्वर के राज्य की स्थापना करने के साथ-साथ समाज की प्रगति तथा कल्याण के लिए भी प्रयत्न करते रहें। उनका कर्तव्य है कि वे सभी देशवासियों के साथ मिल कर मानवता तथा स्वतंत्रता के हित में कार्य करें।
- फ़ादर डेन्नीस तिग्गा