
मैं ही प्रभु हूँ, कोई दूसरा नहीं है। मुझे छोड़ कर कोई दूसरा ईश्वर नहीं है। मैं प्रकाश और अन्धकार, दोनों की सृष्टि करता हूँ। मैं सुख भी देता और दुःख भी भेजता हूँ। मैं, प्रभु, यह सब करता हूँ। स्वर्ग ! धार्मिकता बरसाओ - ओस की बूँदों की तरह, बादलों के जल की तरह। धरती खुल कर उसे ग्रहण करे - मुक्ति का अंकुर फूट निकले और धार्मिकता फले-फूले। मैं प्रभु ने इसकी सृष्टि की है। प्रभु-ईश्वर, आकाश के सृष्टिकर्त्ता ने पृथ्वी को गढ़ कर बनाया और उसकी सुदृढ़ नींव डाली है। उसने उसे इसलिए नहीं बनाया कि वह उजाड़ रहे, बल्कि इसलिए कि लोग उस पर बस जायें। वही प्रभु कहता है- मैं ही प्रभु हूँ, कोई दूसरा नहीं है। क्या मैं प्रभु नहीं हूँ? मुझे छोड़ कर कोई दूसरा ईश्वर नहीं है। मुझे छोड़ कर कोई न्यायी और उद्धारकर्त्ता ईश्वर नहीं है। पृथ्वी के सीमान्तों से मेरे पास आओ और तुम मुक्ति प्राप्त करोगे, क्योंकि मुझे छोड़ कर कोई ईश्वर नहीं। मेरे मुख से निकलने वाला शब्द सच्चा और अपरिवर्तनीय है। मैं शपथ खा कर यह कहता हूँ : हर घुटना मेरे सामने झुकेगा, हर कंठ मेरे नाम की शपथ लेगा। सब लोग मेरे विषय में कहेंगे- प्रभु ही में न्याय दिलाने का सामर्थ्य है। जो उस से बैर करते थे, वे सब लज्जित हो कर उसके पास आयेंगे। इस्राएल की समस्त प्रजा प्रभु द्वारा विजयी होगी और प्रभु पर गौरव करेगी।
प्रभु की वाणी।
अनुवाक्य : धार्मिकता उतरे आकाश की ओस की तरह, बादलों की वर्षा की तरह। (इसा० 45:8)
1. प्रभु - ईश्वर जो कुछ कहता है, मैं उसे ध्यान से सुनूँगा। वह अपनी प्रजा को, अपने भक्तों को शांति का संदेश सुनाता हैI जो उस पर श्रद्धा रखते हैं, उनके लिए मुक्ति निकट है। उसकी महिमा हमारे देश में निवास करेगी।
2. दया और सच्चाई, न्याय और शांति- ये एक दूसरे से मिल जायेंगे। सच्चाई पृथ्वी पर पनपने लगेगी और न्याय स्वर्ग से हम पर दयादृष्टि करेगा।
3. प्रभु हमें सुख-शांति प्रदान करेगा और पृथ्वी फल उत्पन्न करेगी। न्याय उसके आगे-आगे चलेगा और शांति उसके पीछे-पीछे आती रहेगी।
अल्लेलूया ! शुभ संदेश सुनाने वाले ! अपनी आवाज ऊँचा कर दो। प्रभु ईश्वर सामर्थ्य के साथ आ रहा है। अल्लेलूया !
योहन ने अपने दो शिष्यों को बुला कर येसु के पास यह पूछने भेजा, "क्या आप ही वह हैं, जो आने वाले हैं या हम किसी दूसरे की प्रतीक्षा करें?" इन दो शिष्यों ने येसु के पास आ कर कहा, "योहन बपतिस्ता ने हमें आपके पास यह पूछने भेजा है - क्या आप ही वह हैं, जो आने वाले हैं या हम किसी दूसरे की प्रतीक्षा करें?" उसी समय येसु बहुतों को बीमारियों, कष्टों और अपदूतों से मुक्त कर रहे थे और बहुत-से अंधों को दृष्टि प्रदान कर रहे थे। उन्होंने योहन के शिष्यों से कहा, "जाओ, जो कुछ तुमने सुना और देखा है, उसे योहन को बता दो - अंधे देखते हैं, लँगड़े चलते हैं, कोढ़ी शुद्ध किये जाते हैं, बहरे सुनते हैं, मुरदे जिलाये जाते हैं, दरिद्रों को सुसमाचार सुनाया जाता है और धन्य है वह जिसका विश्वास मुझ पर से नहीं उठता !"
प्रभु का सुसमाचार।
योहन बपतिस्ता को प्रभु येसु के बारे में सब कुछ पता होना चाहिए था, वह प्रभु येसु के कार्यों और उनकी पहचान को लेकर संशय में पड़ जाता है। आने वाले मुक्तिदाता के बारे में अलग-अलग लोगों की अलग-अलग सोच थी। कोई चाहता था कि आने वाला मसीह उनके लिए युद्ध लड़ेंगे और उनके दुश्मनों का सर्वनाश कर देंगे। वहीं कुछ लोगों का सोचना था कि मसीह धार्मिक क्षेत्र में बड़े बदलाव करेंगे और उन्हें धर्म के आडम्बरों से छुटकारा मिलेगा। कुछ लोगों का मानना था कि मसीह सामाजिक परिवर्तन लाएंगे, कमजोर और तिरस्कृत लोगों को उनकी पहचान वापस दिलाएंगे।
प्रभु येसु कहते हैं, “प्रत्येक पेड़ की पहचान उसके फलों से होती है” (देखिए लूकस 6:44)। यदि हमें प्रभु येसु की वास्तविक पहचान के बारे में पता करना है तो, उनके कार्यों को देखना और उनके वचनों को सुनना होगा। प्रभु येसु योहन के शिष्यों को कार्यों से उनके बारे में पता करने के लिए कहते हैं। उन्होंने उनके सवाल का सीधा जवाब नहीं दिया लेकिन सब जानते थे कि जो महान कार्य प्रभु येसु कर रहें हैं, वे और कोई नहीं कर सकता। प्रभु येसु के शिष्य होने के नाते आज हम ही इस दुनिया के लिए प्रभु येसु की पहचान हैं। क्या हमारे वचन और कार्य हमें प्रभु येसु के शिष्य दर्शाते हैं? क्या हम वही अच्छा पेड़ हैं जिसकी पहचान उसके अच्छे फलों से होती है?
✍ -फ़ादर जॉन्सन बी. मरिया (ग्वालियर धर्मप्रान्त)
John the Baptist who was supposed to know Jesus well, is confused by his identity and his works. Different people had different expectations from the coming messiah. There were people were expecting a Messiah who would fight wars for them and destroy their enemies. There were people who expected a Messiah who would bring renewal in decaying religious practices and ritualism. There were people who expected a Messiah who would bring a complete social reform, who restore the weak and downtrodden to their proper human dignity.
Jesus says, “each tree is known by its own fruit” (Lk 6:44). If we have to know true identity of Jesus, we have to see his deeds and hear his words. Jesus tells the disciples of John to find by his actions whether he is the promised messiah. He did not give a direct answer to their question but everyone knew what Jesus did, nobody else could do that. As the followers of Jesus, today we are the face of Jesus for the world. Do our actions and words reveal our true identity as the committed disciples of Jesus? Are we the good tree, known by the fruits?
✍ -Fr. Johnson B. Maria (Gwalior Diocese)
नाज़रेत के सभागृह में, प्रभु येसु ने अपना घोषणापत्र नबी इसायाह के अध्याय 61 पढ़ कर प्रस्तुत किया जहाँ लिखा है, “प्रभु का आत्मा मुझ पर छाया रहता है, क्योंकि उसने मेरा अभिशेक किया है। उसने मुझे भेजा है, जिससे मैं दरिद्रों को सुसमाचार सुनाऊँ, बन्दियों को मुक्ति का और अन्धों को दृष्टिदान का सन्देश दूँ, दलितों को स्वतन्त्र करूँ और प्रभु के अनुग्रह का वर्ष घोषित करूँ।" (लूकस 4:18-19)। उसके बाद “धर्मग्रन्थ का यह कथन आज तुम लोगों के सामने पूरा हो गया है” कहकर प्रभु येसु ने स्वयं को मसीह के रूप में प्रस्तुत किया। मसीह के बारे में नबी इसायाह की ये भविष्यवाणियाँ प्रभु के जीवन में पूरी हुईं। इसलिए वे संत योहन बपतिस्ता के शिष्यों से कहते हैं, "जाओ, तुमने जो सुना और देखा है, उसे योहन को बता दो- अन्धे देखते हैं, लंगड़े चलते हैं, कोढ़ी शुद्ध किये जाते हैं, बहरे सुनते हैं, मुर्दे जिलाये जाते हैं, दरिद्रों को सुसमाचार सुनाया जाता है और धन्य है वह, जिसका, विश्वास मुझ पर से नहीं उठता!" दूसरे शब्दों में कहा जाये तो प्रभु मसीहा के रूप में अपनी पहचान को स्पष्ट रूप से प्रकट करते हैं। मेरी पहचान क्या है? क्या मैं अपनी इस पहचान के प्रति वफादार हूं?
✍ - फादर फ्रांसिस स्करिया
At the Synagogue of Nazareth, Jesus had presented his manifesto by reading from Is 61 where it is written, “The Spirit of the Lord is upon me, because he has anointed me to bring good news to the poor. He has sent me to proclaim release to the captives and recovery of sight to the blind, to let the oppressed go free, to proclaim the year of the Lord’s favor.” (Lk 4:18-19). By saying “Today this scripture has been fulfilled in your hearing”, Jesus showed himself as the Messiah. These prophecies of Prophet Isaiah about the Messiah were fulfilled in the life of Jesus. That is why he could say to the disciples of John the Baptist who came to inquire whether he was the Messiah, “Go back and tell John what you have seen and heard”. In other words, Jesus was faithful to his identity as the Messiah. What is my identity? Am I faithful to my God-given identity?
✍ -Fr. Francis Scaria