पवित्र परिवार का पर्व - वर्ष A

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📕पहला पाठ

बाइबिल के अनुसार परिवार का सुखमय जीवन इन दो बातों पर निर्भर रहता है - श्रद्धा और प्रेम। प्रवक्ता-ग्रंथ के इस उद्धरण में सन्तान के कर्त्तव्य पर बल दिया जाता है।

प्रवक्ता-ग्रंथ 3:2-6.12-14

"प्रभु पर श्रद्धा रखने वाला अपने माता-पिता का आदर करता है।"

प्रभु का आदेश है कि सन्तान अपने पिता का आदर करे; उसने माता को अपने बच्चों पर अधिकार दिया है। जो अपने पिता पर श्रद्धा रखता है, वह अपने पापों का प्रायश्चित्त करता है और जो अपनी माता का आदर करता है, वह मानो धन का संचय करता है। जो अपने पिता का सम्मान करता है, उसे अपनी ही सन्तान से सुख मिलेगा और जब वह प्रार्थना करता है, तो ईश्वर उसकी सुन लेगा। जो अपने पिता का आदर करता है, वह दीर्घायु होगा। जो अपनी माता को सुख देता है, वह प्रभु का आज्ञाकारी है। पुत्र ! अपने बूढ़े पिता की सेवा करो, जब तक वह जीता रहता है, उसे उदास मत करो। यदि उसका मन दुर्बल हो जाये, तो उस से सहानुभूति रखो। अपने स्वास्थ्य की उमंग में उसका अनादर मत करो। क्योंकि पिता की सेवा-शुश्रूषा नहीं भुलायी जायेगी, वह तुम्हारे पापों का प्रायश्चित्त समझी जायगी।

प्रभु की वाणी।

📖भजन : स्तोत्र 127:1-5

अनुवाक्य : धन्य हैं वे सब, जो प्रभु पर श्रद्धा रखते हैं और उसके मार्ग पर चलते हैं।

1. धन्य हो तुम, जो प्रभु पर श्रद्धा रखते हो और उसके मार्ग पर चलते हो। तुम अपने हाथ की कमाई से सुखपूर्वक जीवन बताओगे।

2. तुम्हारी पत्नी तुम्हारे घर के आँगन में दाखलता की भाँति फलेगी - फूलेगी। तुम्हारी सन्तान जैतून की टहनियों की भाँति तुम्हारे, चौके की शोभा बढ़ायेगी।

3. जो ईश्वर पर भरोसा रखता है, उसे वही आशिष प्राप्त होगी। ईश्वर सियोन पर्वत पर से तुम्हें आशीर्वाद प्रदान करे, जिससे तुम जीवन-भर येरुसालेम का कुशल-मंगल देख पाओ।

📘दूसरा पाठ

हमारे धर्म की सब बड़ी आज्ञा यह है कि हम ईश्वर को और अपने पड़ोसी को प्यार करें। पड़ोसी प्रेम की यह आज्ञा सर्वप्रथम अपने परिवार पर लागू करनी चाहिए।

कलोसियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 3:12-21

"प्रभु की इच्छा के अनुसार घरेलू जीवन।"

आप लोग ईश्वर की पवित्र एवं परमप्रिय चुनी हुई प्रजा हैं। इसलिए आप लोगों को अनुकम्पा, सहानुभूति, विनम्रता, कोमलता और सहनशीलता को धारण कर लेना चाहिए। आप एक दूसरे को सहन करें और यदि किसी को किसी से कोई शिकायत हो, तो एक दूसरे को क्षमा करें। प्रभु ने आप लोगों को क्षमा कर दिया है; आप लोग भी ऐसा ही करें। इसके अतिरिक्त आपस में प्रेम-भाव बनाये रखें। वह सब कुछ एकता में बाँध कर पूर्णता तक पहुँचा देता है। मसीह की शांति आपके हृदयों में राज्य करे। इसी शांति के लिए आप लोग, एक शरीर के अंग बन कर बुलाये गये हैं। आप लोग कृतज्ञ बने रहें। मसीह की शिक्षा अपनी परिपूर्णता में आप लोगों में निवास करे। आप बड़ी समझदारी से एक दूसरे को शिक्षा और उपदेश दिया करें। आप कृतज्ञतापूर्ण हृदय से ईश्वर के आदर में भजन, स्तोत्र और आध्यात्मिक गीत गाया करें। आप जो कुछ भी कहें या करें, वह सब प्रभु येसु के नाम पर किया करें। उन्हीं के द्वारा आप लोग पिता परमेश्वर को धन्यवाद देते रहें। जैसा कि प्रभु भक्तों के लिए उचित है, पत्नियाँ अपने पतियों के अधीन रहें। पति अपनी पत्नियों को प्यार करें और उसके साथ कठोर व्यवहार नहीं करें। बच्चे सभी बातों में अपने माता-पिता की आज्ञा मानें, क्योंकि प्रभु इस से प्रसन्न होता है। पिता अपने बच्चों को खिझाया नहीं करें; कहीं ऐसा न हो कि उनका दिल टूट जाये।

प्रभु की वाणी।

📒जयघोष : कलो० 3:15,16

अल्लेलूया, अल्लेलूया ! मसीह की शांति आपके हृदयों में राज्य करे; मसीह की शिक्षा अपनी परिपूर्णता में आप लोगों में निवास करे। अल्लेलूया !

📙सुसमाचार

यहूदी लोग किसी समय मित्र देश में दास बन कर रहते थे। मसीह को भी मिस्र देश में रहना पड़ा। समय आने पर ईश्वर ने उन्हें वापस बुलाया और वह अपने माता-पिता के साथ नाजरेत में बस गये।

मत्ती के अनुसार पवित्र सुसमाचार 2:13-15,19-23

"मिस्र में पवित्र परिवार।"

ज्योतिषियों के जाने के बाद प्रभु का दूत यूसुफ़ को स्वप्न में दिखाई दिया और बोला, "उठिए ! बालक और उसकी माता को लेकर मिस्र देश को भाग जाइए। जब तक मैं आप से न कहूँ, वहीं रहिए; क्योंकि हेरोद मरवा डालने के लिए बालक को ढूँढ़ने वाला है"। यूसुफ़ उठा और उसी रात बालक और उसकी माता को ले कर मिस्र देश चल दिया। वह हेरोद के मरने तक वहीं रहा जिससे नबी के मुख से जो प्रभु ने कहा था, वह पूरा हो जाये - "मित्र देश से मैंने अपने पुत्र को बुलाया। " हेरोद के मरने के बाद प्रभु का दूत मिस्र देश में यूसुफ़ को स्वप्न में दिखाई दिया और उसने उस से कहा, "उठिए ! बालक और उसकी माता को ले कर इस्राएल देश चले जाइए, क्योंकि जो बालक के प्राण लेना चाहते थे, वे मर गये हैं"। यूसुफ़ उठा और बालक तथा उसकी माता को ले कर इस्राएल देश चला आया। उसने यह सुना कि अरखेलौस अपने पिता के स्थान पर यहूदिया में राज्य करता है; इसलिए वह वहाँ जाने से डर गया और स्वप्न में चेतावनी पा कर गलीलिया चला गया। वहाँ वह नाजरेत नामक नगर में जा बसा; इस प्रकार नबियों का यह कथन पूरा हुआ "यह नाज़री कहलायेगा "।

प्रभु का सुसमाचार।


मनन-चिंतन

अभी चार दिन पहले हमारा पूरा ध्यान बेथलेहेम की चरनी के बच्चे पर था। आज हमारा ध्यान येसु, मरियम और यूसुफ़ के पूरे परिवार पर है। येसु एक परिवार में पैदा हुए थे, बढ़ई यूसुफ़ और उसकी पत्नी मरियम के परिवार में। वे समाज के निचले तबके से ताल्लुक रखते थे। उन्हें धरती के हर दूसरे गरीब परिवार की तरह अपनी समस्याओं और चुनौतियों का सामना करना पड़ा। मरियम की ईमानदारी और बफ़ादारी के बारे में यूसुफ के मन में संदेह था। समाज ने उन्हें संदेह की नजर से देखा। बालक येसु को बालकपन की प्रारंभिक अवस्था में ही जीवन के लिए खतरे का सामना करना पडा था। परिवार को मिस्र में पलायन करना पड़ा और रिश्तेदारों और पड़ोसियों से दूर रहना पड़ा। लेकिन उनके दिलों में शांति और आनंद था क्योंकि स्थायी आनंद और अनन्त शांति का स्रोत उनके बीच था। यह सभी मनुष्यों के लिए एक आदर्श परिवार है। संभवत: आज किसी भी मानव परिवार के सामने कोई ऐसी समस्या नहीं है जिसे नाज़रेथ के पवित्र परिवार ने न झेला हो। नाज़रेथ के पवित्र परिवार में तीन विनम्र व्यक्ति शामिल थे जो हमेशा ईश्वर की इच्छा को स्वीकार करते रहते थे। इस परिवार की महानता का रहस्य उनकी ईश्वर की इच्छा के प्रति निरंतर विनम्र व्यवहार था। प्रत्येक मानव परिवार के लिए नाज़रेथ के पवित्र परिवार का सबसे बड़ा संदेश यह है कि वह ईश्वर के डिजाइन के अनुसार अपनी पूर्ण अनुभूति के लिए खुद को ईश्वर की इच्छा के समक्ष समर्पित करें।

-फादर फ्रांसिस स्करिया


REFLECTION

Just four days ago our whole attention was on the child in the manger. Today our attention is on the whole family of Jesus, Mary and Joseph. Jesus was born into a family, into the family of Joseph the carpenter and his wife Mary. They belonged to the lower strata of the society. They had to face life with its problems and challenges like every other poor family on the face of the earth. There were doubts in the mind of Joseph about Mary’s sincerity and faithfulness. The society looked at them with suspicion. Child Jesus faced threat to life in his early infancy. The family had to migrate to Egypt and stay away from relatives and neighbours. But they enjoyed peace and joy in their hearts because the source of lasting joy and peace was in their midst. This is a model family for all human beings. Probably there is no problem faced by any human family today which has not been a reality also in the Holy Family of Nazareth. The Holy Family of Nazareth consisted of three humble individuals who always submitted to the Will of God. The secret of the greatness of this family was their constant humble submission to the Will of God. The greatest message of the Holy Family of Nazareth to every human family is to submit themselves to the Will of God for their own full realisation according to the design of God.

-Fr. Francis Scaria

प्रवचन

आज हम पवित्र परिवार का त्योहार मना रहे है। आज के दिन माता कलीसिया नाजरेथ के येसु, युसूफ और मरियम के परिवार को आदर्श परिवार के रूप में प्रस्तुत करती है। इस परिवार की विशेषता येसु का होना है। जहॉ भी ईश्वर की उपस्थिति होती है वहॉ धार्मिकता नदी के समान बहती है। ईश्वर की दृष्टि एवं योजना में परिवार एक महत्वपूर्ण ईकाई है। जब ईश्वर ने अपने पुत्र को संसार में भेजा तो उन्हें यूसुफ और मरियम का परिवार प्रदान किया।

परिवार समाज की धुरी है। परिवारों की स्थिति ही समाज की दिशा निरधारित करती है। ईश्वर भी परिवारों को मनुष्य के कल्याण तथा मुक्ति का साधन बनाते हैं। वे परिवारों को आशिष देना एवं बचाना चाहते हैं। परिवार के एक सदस्य के द्वारा भी ईश्वर सारे परिवार को मुक्ति प्रदान करते हैं। परिवार का यदि एक सदस्य भी धार्मिक हो तो वह अपने विश्वास की अभिव्यक्ति जैसे प्रार्थना, सदाचरण, त्याग, मधुर विचार आदि के द्वारा परिवार के अन्य सदस्यों को प्रभावित करता तथा उनके लिये ईश्वर की कृपा की द्वार खोल देता है।

’’प्रभु को इस बात का खेद हुआ कि उसने पृथ्वी पर मनुष्य को बनाया था। इसलिए वह बहुत दुःखी था।प्रभु ने कहा, ’’मैं उस मानवजाति को, जिसकी मैंने सृष्टि की है, पृथ्वी पर से मिटा दूँगा...क्योंकि मुझे खेद है कि मैंने उन को बनाया है’’। नूह को ही प्रभु की कृपादृष्टि प्राप्त हुई।.... नूह सदाचारी और अपने समय के लोगों में निर्दोष व्यक्ति था। वह ईश्वर के मार्ग पर चलता था।’’ (उत्पति 6:6-8) चूंकि नूह ईश्वर की दृष्टि में कृपापात्र था ईश्वर उसे पोत बनाने का निर्देश देते हैं। ईश्वर नूह के साथ-साथ उसके परिवार को भी बचाने के उद्देश्य से पोत में ले जाने का आदेश देते हैं। ’’तुम अपने सारे परिवार के साथ पोत पर चढो, क्योंकि इस पीढी में केवल तुम्हीं मेरी दृष्टि में धार्मिक हो।’’ (उत्पति 7:1) इस प्रकार नूह की धार्मिकता उसके परिवार के कल्याण का कारण बनती है। धर्मग्रंथ उसके परिवार को धार्मिक कहकर नहीं बुलाता है बल्कि केवल नूह को। नूह के परिवार में भी पाप की छाया को हम कालांतर में देखते हैं जब उसका बेटा हाम अपने पिता नूह की नग्नता को देखता है जिसके कारण नूह उसे अभिशाप देता है। ’’कनान को अभिशाप! वह अपने भाइयों का दास बने।’’ (उत्पति 9:25) इससे हम निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि नूह का परिवार शायद नहीं बल्कि केवल नूह ईश्वर की दृष्टि में धार्मिक था।

निर्गमन ग्रन्थ का अध्याय 12 बताता है कि जब ईश्वर ने मिस्रियों को दण्ड दिया था तो उसने इस्राएलियों के परिवारों की रक्षा की थी। ’’जब प्रभु ने मिस्रियों को मारा था, तो वह मिस्र में रहने वाले इस्राएलियों के घरों के सामने से आगे निकल गया था और उसने हमारे घरों को छोड दिया था।’’ (निर्गमन 12:27)

ईश्वर की परिवारों को बचाने की इच्छा हम इब्राहीम और ईश्वर के वार्तालाप में भी पाते हैं। जब ईश्वर ने सोदोम और गोमोरा को नष्ट करने की योजना इब्राहीम को जाहिर की तो इब्राहीम उन नगरों को बचाने की गुहार लगाते हैं। इब्राहीम के ईश्वर से इस प्रकार प्रार्थना का एक कारण यह भी था कि उन नगरों में उसका भतीजा लोट रहता था। ईश्वर लोट को बचाने के साथ-साथ उसके परिवार को बचाते हैं। यह बात और है कि लोट की पत्नी अपनी अवज्ञा के कारण ’नमक का खम्भा’ बन गयी। (देखिये उत्पति 19) इस प्रकार इब्राहीम के कारण लोट और लोट के कारण उसका परिवार ईश्वर की कृपा प्राप्त करता है।

जकेयुस की घटना इस मतको और अधिक दृढता प्रदान करती है कि ईश्वर एक की धार्मिकता के कारण पूरे परिवार की मुक्ति का द्वार खोलते हैं। जकेयुस येसु से मिलकर एक नया जीवन पाता है तथा इस उमंग और उल्लास में वह प्रभु से कहता है, ’’प्रभु! देखिये, मैं अपनी आधी सम्पत्ति गरीबों को दूँगा और मैंने जिन लोगों के साथ बेईमानी की है, उन्हें उसका चौगुना लौटा दूॅगा’’। प्रभु जकेयुस के इस कथन के प्रतिउत्तर में कहते हैं, ’’आज इस घर में मुक्ति का आगमन हुआ है,...’’ (देखिये लूकस 19:1-10) केवल जकेयुस के हृदय परिवर्तन के कारण येसु उसके सारे परिवार को मुक्ति के पथ पर पहुॅचा देते हैं।

ईश्वर का दूत रोमन शतपति करनेलियुस को इन शब्दों से संबोधित करते हुये कहता है, ’’आपकी प्रार्थनायें और आपके भिक्षादान ऊपर चढकर ईश्वर के सामने पहुँचे और उसने आप को याद किया।’’ (प्रेरित चरित 10:4) इस संबोधन के द्वारा ईश्वर करनेलियुस को धार्मिक ठहराता है तथा उसे पेत्रुस को बुलाने का निर्देश देते हुये उसे तथा उसके परिवार को मुक्ति का वरदान देते हैं, ’’वह जो शिक्षा सुनायेंगे, उसके द्वारा आप को और आपके सारे परिवार को मुक्ति प्राप्त होगी।’’(प्रेरित चरित 11:14) इस प्रकार जब कारापाल आत्महत्या की कोशिश कर रहा था तो जो पौलुस उसे बताते हैं, ’’आप प्रभु ईसा में विश्वास कीजिए, तो आप को और आपके परिवार को मुक्ति प्राप्त होगी।’’ (प्रेरित चरित 16ः31)

इसी परिपेक्ष्य में संत पौलुस कहते हैं, ’’विश्वास नहीं करने वाला पति अपनी पत्नी द्वारा पवित्र किया गया है और विश्वास नहीं करने वाली पत्नी अपने मसीही पति द्वारा पवित्र की गयी है। नहीं तो आपकी संतति दूषित होती, किन्तु अब वह पवित्र ही है। (1 कुरि. 7:14) संत पौलुस के अनुसार किसी एक का विश्वासी होना भी दूसरे तथा बच्चों के लिये विश्वास का मार्ग खोल देता है।

ईश्वर के पुत्र के जन्म के पूर्व ईश्वर ने उसके लिये परिवार को तैयार किया जिसमें वह जन्म ले तथा उसका पालन-पोषण हो सके। येुस, मरियम और यूसुफ के नाजरेत का परिवार के सदस्यों की विशेषता यह है कि वे एक-दूसरे की ईश्वर की योजना पूरी करने में मदद करते हैं। धर्मग्रंथ में ऐसे अनेक उदाहरण है जो हमें सिखलाते हैं कि ईश्वर की दृष्टि में परिवार एक महत्वपूर्ण इकाई हैं तथा परिवार की मुक्ति हरेक सदस्य की जिम्मेदारी है। हमें भी अपने परिवार के प्रति गंभीर रहना चाहिये क्योंकि हरेक का व्यक्तिगत आचारण उनके परिवार को भी प्रभावित करता है।

-फादर रोनाल्ड वाँन