
अब्राम ने एक दिव्य दर्शन में ईश्वर की वाणी को यह कहते हुए सुना, “अब्राम ! मत डरो ! मैं तुम्हारी ढाल हूँ। तुम्हारा पुरस्कार महान् होगा। ” अब्राम ने कहा, “हे प्रभु-ईश्वर ! तू मुझे क्या दे सकता है? मैं निस्सन्तान हूँ और मेरे घर का उत्तराघिकारी दमिश्क.का एलिआज़ार है। ” अब्राम ने फिर कहा, “तूने मुझे कोई सन्तान नहीं दी, मेरा नौकर मेरा उत्तराधिकारी होगा।” तब प्रभु ने उस से यह कहा, “वह तुम्हारा उत्तराधिकारी नहीं होगा। तुम्हारा औरस पुंत्र ही तुम्हारा उत्तराधिकारी होगा।” ईश्वर ने अब्राम को बाहर ले जा कर कहा, “आकाश की ओर दृष्टि लगाओ और संभव हो, तो तारों की गिनती करो।” उसने उस से यह भी कहा, “तुम्हारी संतति इतनी ही बड़ी होगी। ” अब्राम ने ईश्वर में विश्वास किया और इस कारण प्रभु ने उसे धार्मिक माना। प्रभु ने अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार सारा पर कृपादृष्टि की। प्रभु ने सारा के प्रति अपना वचन पूरा किया। सारा गर्भवती हुई और ईश्वर द्वारा निश्चित समय पर उसे इब्राहीम से उसकी वृद्धावस्था में एक पुत्र पैदा हुआ। इब्राहीम ने सारा से उत्पन्न अपने पुत्र का नाम इसाहक रखा।
प्रभु की वाणी।
अनुवाक्य : प्रभु ही हमारा ईश्वर है। प्रभु को अपना विधान सदा स्मरण रहता है।
प्रभु की स्तुति करो, उसका नाम धन्य कहो; राष्ट्रों में उसके महान् कार्यों का बखान करो। उसके आदर में गीत गाओ और बाजा बजाओ; उसके सब: चमत्कारों को घोषित करो।
उसके पवित्र नाम पर गौरव करो। प्रभु को खोजने वालों का हदय आनन्दित हो। प्रभु और उसके सामर्थ्य का मनन करो। उसके दर्शनों के लिए लालायित रहो।
उसके चमत्कार, उसके अपूर्व कार्य और उसके निर्णय याद रखो। प्रभु-भक्त इब्राहीम की सन्तति ! याकूब के पुत्रो ! प्रभु की चुनी हुई प्रजा !
प्रभु को अपना विधान सदा स्मरण रहता है, हज़ारों पीढ़ियों के लिए अपनी प्रतिज्ञाएँ, इब्राहीम के लिए निर्धारित विधान, इसहाक के सामने खायी हुई शपथ।
विश्वास के कारण इब्राहीम ने ईश्वर का बुलावा स्वीकार किया और यह न जानते हुए भी कि वह कहाँ जा रहा है, उसने उस देश के लिए प्रस्थान किया, जिसका वह उत्तराधिकारी बनने वाला था। विश्वास के कारण उमर ढल जाने पर भी सारा गर्भवती हो सकी; क्योंकि उसका विचार यह था कि जिसने प्रतिज्ञा की है, वह सच्चा है और इसलिए एक मरणासत्न व्यक्ति से वह सन्तति उत्पन्न हुई, जो आकाश के तारों की तरह असंख्य है और सागर-तट के बालू के कणों की तरह अगणित। जब ईश्वर इब्राहीम की परीक्षा ले रहा था, तब विश्वास के कारण उसने इसहाक को अर्पित किया। वह अपने एकलौते पुत्र को बलि चढ़ाने तैयार हों गया था, यद्यपि उस से यह प्रतिज्ञा की गयी थी कि इसहाक से तेरा वंश चलेगा। इब्राहीम का विचार यह था कि ईश्वर मृतकों को भी जिला सकता है, इसलिए उसने अपने पुत्र को फिर प्राप्त किया। यह भविष्य के लिए प्रतीक था।
प्रभु की वाणी।
अल्लेलूया, अल्लेलूया ! मसीह की शांति आपके हदयों में राज्य करे; मसीह की शिक्षा अपनी परिपूर्णता में आप लोगों में निवास करे। अल्लेलूया !
[जब मूसा की संहिता के अनुसार शुद्धीकरण का दिन आया, तब वे बालक को प्रभु को अर्पित करने के लिए येरुसालेम ले गये; जैसा कि प्रभु की संहिता में लिखा है : हर पहलौठा बेटा प्रभु को अर्पित किया जाये और इसलिए भी कि वे प्रभु की संहिता के अनुसार पंडुकों का एक जोड़ा या कपोत के दों बच्चे बलिदान में चढ़ायें।]
उस समय येरुसालेम में सिमेयोन नामक एक धर्मी तथा भक्त पुरुष रहता था। वह इस्राएल की सान्त्वना की प्रतीक्षा में था और पवित्र आत्मा उस पर छाया रहता था। उसे पवित्र आत्मा से यह सूचना मिली थी कि वह प्रभु के मसीह को देखे बिना नहीं मरेगा। वह पवित्र आत्मा की प्रेरणा से मंदिर आया। माता-पिता शिशु येसु के लिए संहिता की रीतियाँ पूरी करने जब उसे भीतर लाये, तो सिमेयोन ने येसु को अपनी गोद में ले लिया और ईश्वर की स्तुति करते हुए कहा, “हे प्रभु, अब तू अपने वचन के अनुसार अपने दास को शांति के साथ विदा कर; क्योंकि मेरी आँखों ने उस मुक्ति को देखा है जिसे तूने सब राष्ट्रों के लिए प्रस्तुत किया है। यह ग़ैर-यहूदियों के प्रबोधन के लिए ज्योति है और तेरी प्रजा इस्राएल का गौरव''। बालक के सम्बन्ध में ये बातें सुन कर उसके माता-पिता अचम्भे में पड़ गये। सिमेयोन ने उन्हें आशीर्वाद दिया और उसकी माता मरियम से यह कहा,’‘देखिए, इस बालक के कारण इस्राएल में बहुतों का पतन और उत्थान होगा। यह एक चिह्न है जिसका विरोध किया जायेगा, जिससे बहुत-से हृदयों के विचार प्रकट हो जाये; और एक तलवार आपके हृदय को आर-पार बेधेगी’‘। अन्ना नामक एक नबिया थी, जो असेर-वंशी फनुएल की बेटी थी। वह बहुत बूढ़ी हो चली थी। वह विवाह के बाद केवल सात बरस अपने पति के साथ रह कर विधवा हो गयी थी और अब चौरासी बरस की थी। वह मंदिर से बाहर नहीं जाती थी और उपवास तथा प्रार्थना करते हुए रात-दिन ईश्वर.की उपासना में लगी रहती थी। वह उसी घड़ी आ कर प्रभु की स्तुति करने लगी और जो लोग येरुसालेम की मुक्ति की प्रतीक्षा में थे, वह उन सबों को उस बालक के विषय में बताया करती थी।
[प्रभु की संहिता के अनुसार सब कुछ पूरा कर लेने के बाद वे गलीलिया - अपनी नगरी नाजरेत - लौट गये। वह बालक बढ़ता गया। उस में बल तथा बुद्धि का विकास होता गया और उस पर ईश्वर का अनुग्रह बना रहा। ]
प्रभु का सुसमाचार।
हमारे सुसमाचार में सिमोन नाम का एक पवित्र व्यक्ति है जिसकी मरने से पहले एक इच्छा थी और वह येसु को देखे। और सिमोन बालक येसु को देखकर और उसे गोद में उठाकर बहुत धन्य हुआ। क्या यह शुद्ध भाग्य था कि वह येसु और उसके माता-पिता के साथ निकट और व्यक्तिगत रूप से रह सका? नहीं, सिमोन की पवित्र परिवार से मुलाकात से भाग्य का कोई लेना-देना नहीं है। जैसा कि हमारे सुसमाचार में कहा गया है, सिमोन एक धर्मी और धर्मनिष्ठ व्यक्ति था। वह एक अच्छा आदमी था; वह एक ऐसा व्यक्ति था जो पूरे दिल से अपने विश्वास की शिक्षाओं का पालन करने का प्रयास करता था। इसीलिए परमेश्वर ने पवित्र आत्मा के माध्यम से सिमोन को मरने से पहले मंदिर में बालक येसु के साथ रहने का बहुत ही दुर्लभ अवसर प्रदान किया। मरने का यह कैसा तरीका! क्या मरने से पहले हमारी भी यही इच्छा नहीं है? हम येसु को देखना चाहेंगे और जब हम अपनी आखिरी सांस लेंगे तो हम येसु का हाथ पकड़ना चाहेंगे? सिमोन के जीवन से, अब हम इस रहस्य को जानते हैं कि इस दुनिया से चले जाने पर हम येसु को कैसे देख पाएंगे। हमें धर्मी बनना होगा और हमें येसु के वफादार अनुयायी बनना होगा।
✍फादर अल्फ्रेड डिसूजा (भोपाल महाधर्मप्रांत)We have in our gospel a Holy man named Simeon who had one wish before he dies and that is to see Jesus. And Simeon was very blessed to see and hold in his arms the child Jesus. Was it pure luck that he was able to be with Jesus and His parents up close and personal? No, luck has nothing to do with Simeon’s meeting with the Holy family. Simeon as stated in our gospel was a righteous and devout man. He was a good man; he was a man who wholeheartedly strived to follow the teachings of his faith. That’s why God through the Holy Spirit gifted Simeon the very rare opportunity to be with the child Jesus in the temple before he dies. What a way to die! Is not this our wish also before we die? We would want to see Jesus and we would want to hold the hand of Jesus as we take our last breath? By the life of Simeon, we now know the secret as to how we would be able to see Jesus as we fade out of this world. We have to be righteous and we have to be devout followers of Jesus.
✍ -Fr. Alfred D’Souza (Bhopal Archdiocese)
क्रिसमस के दिन हम एक बच्चे को चरनी में देख रहे थे। आज हमें उन तीन सरल व्यक्तियों पर दृष्टि डालने के लिए कहा जाता है जो नजारेथ की एक छोटी सी झोंपड़ी में रह कर पूरी मानवता के लिए मुक्ति का काम कर रहे थे। नाज़रेथ के बढ़ई का परिवार मानव इतिहास के केंद्र में है, जिसमें ईश्वर के चुने हुए तीन लोग वीरतापूर्ण रूप से अपनी भूमिकाएं निभा रहे थे। वे अपने जीवन की सरलता और विश्वास की गहराई में ईश्वरीय योजना को पूरा करने के लिए प्रयत्न कर रहे थे। संत लूकस लिखते हैं, " बालक बढ़ता गया। उस में बल तथा बुद्धि का विकास होता गया और उसपर ईश्वर का अनुग्रह बना रहा” (लूकस 2:40)। इस दुनिया में आने वाले हर बच्चे को विकसित होने के लिए उचित वातावरण की आवश्यकता होती है। एक आदर्श वातावरण मिलने पर हर बच्चा विकसित हो सकता है और मजबूत बन सकता है, ज्ञान से भर सकता है और प्रभु को प्रसन्न कर सकता है। नाज़रेथ का पवित्र परिवार सभी मानव परिवारों के लिए एक आदर्श है। यूसुफ और मरियम अपने बेटे येसु के लिए पूरी तरह से समर्पित थे। उनके छोटे परिवार में भौतिक आराम और सुविधाओं का अभाव था, लेकिन वे एक दूसरे के प्रति अनुग्रह और उदारता के धनी थे। वर्तमान समाज में हम देखते हैं कि कई लोग स्वार्थी बन कर अपनी खुशी और आराम की तलाश करते हैं और असंतोष और निराशा ही पाते हैं। देने से ही हम प्राप्त करते हैं। दूसरों को दिलासा देने से ही हमें आराम मिलता है। हम सभी को दूसरों के लिए खुशखबरी बनने के लिए बुलाया जाता है।
✍ -फादर फ्रांसिस स्करिया
On the day of Christmas we gazed at the little child in the manger. Today we are called upon to gaze at three simple individuals who were working out salvation for the entire humanity in a little hut in Nazareth, a good for nothing town. The carpenter’s family at Nazareth stands at the centre of human history with persons carrying out the heroic roles of God’s chosen ones working out the divine plan in their simplicity and depth of faith. St. Luke concludes, “The child grew and became strong, filled with wisdom; and the favor of God was upon him” (Lk 2:40). Every child that comes into this world needs a proper atmosphere to grow. Given an ideal atmosphere every child can grow and become strong, filled with wisdom and find favour with God. The Holy Family of Nazareth is a model for all human families. Joseph and Mary were completely dedicated to their child, Jesus. They must have lacked material comfort and facilities in that little family, but they were rich in graciousness and generosity towards one another. In the present society we find selfish individuals seeking their own happiness and pleasure and ending up with dissatisfaction and frustration. It is in giving that we receive. It is by comforting others that we are comforted. We are all called upon to be good news for others.
✍ -Fr. Francis Scaria
आज हम पवित्र परिवार का महान पर्व मनाते हैं। कल हमने इस पवित्र परिवार के आध्यात्मिक और धार्मिक जीवन की एक झलक देखी थी। आज हम मनन-चिंतन करेंगे कि यह पवित्र परिवार दुनिया के सभी परिवारों के लिए एक आदर्श कैसे कहलाता है। आज का पहला पाठ हमें एक माता-पिता की अपने बच्चों के प्रति जिम्मेदारी को और बच्चों की माता-पिता के प्रति जिम्मेदारी को दर्शाता है। जब बच्चे अपने बुजुर्गों का आदर-सम्मान करते हैं तो ईश्वर उनके हर कार्य में आशीष और बरकत देता है। जीवन में जब ईश्वर की आशीष है तो सफलता कदम चूमेगी और जीवन सार्थक हो जाएगा।
इसी तरह जब माता-पिता अपने बच्चों के प्रति अपनी ज़िम्मेदारियाँ निभाते हैं, अपने कर्तव्य पूरे करते हैं तो उनका जीवन सफल होगा और उन्हें एक सम्मानजनक बुढ़ापा नसीब होगा। नज़रेथ का यह परिवार आदर्श परिवार है क्योंकि वे ईश्वर को अपने जीवन का केंद्र मानते थे। सन्त योसेफ़ भले ही बालक येसु के सांसारिक पिता थे, लेकिन उन्होंने बड़े समर्पण के साथ माता मरियम और बालक येसु के प्रति अपने कर्तव्य का पालन किया। उसी तरह से माता मरियम ने भी अपना कर्तव्य पूरा करते हुए बालक येसु का बड़े प्यार, धार्मिकता एवं बुद्धिमत्ता से लालन-पालन किया। आज यदि हम नज़रेथ के इस परिवार के उदाहरण पर चलेंगे तो हमारे परिवार भी इसी की तरह पवित्र परिवार बन जाएंगे।
✍ -फ़ादर जॉन्सन बी. मरिया (ग्वालियर धर्मप्रान्त)
Today we celebrate the feast of the holy family. Yesterday we reflected about the spiritual and religious life of this family. Today we reflect, how this family becomes the model of all the families of the world. The first reading talks about the responsibilities and obligations of children towards the parents and vice versa. When the children honour their parents, God's blessings come upon all things that they do. When there are blessings of God, they will prosper in everything and their life will be meaningful.
Similarly, when parents fulfil their obligations and responsibilities towards their children, their life will be meaningful, their old age will be graceful. The holy family of Nazareth is a model for all families because they were God-fearing. Saint Joseph, even though only a foster father, yet he was ready to suffer in order to take care of the newborn baby and the mother. Likewise mother Mary also took care of baby Jesus and brought him up with love and goodness and faith. Today all our families can become exemplary families when we follow the holy family of Nazareth.
✍ -Fr. Johnson B. Maria (Gwalior Diocese)
अभी चार दिन पहले हमारा पूरा ध्यान बेथलेहेम की चरनी के बच्चे पर था। आज हमारा ध्यान येसु, मरियम और यूसुफ़ के पूरे परिवार पर है। येसु एक परिवार में पैदा हुए थे, बढ़ई यूसुफ़ और उसकी पत्नी मरियम के परिवार में। वे समाज के निचले तबके से ताल्लुक रखते थे। उन्हें धरती के हर दूसरे गरीब परिवार की तरह अपनी समस्याओं और चुनौतियों का सामना करना पड़ा। मरियम की ईमानदारी और बफ़ादारी के बारे में यूसुफ के मन में संदेह था। समाज ने उन्हें संदेह की नजर से देखा। बालक येसु को बालकपन की प्रारंभिक अवस्था में ही जीवन के लिए खतरे का सामना करना पडा था। परिवार को मिस्र में पलायन करना पड़ा और रिश्तेदारों और पड़ोसियों से दूर रहना पड़ा। लेकिन उनके दिलों में शांति और आनंद था क्योंकि स्थायी आनंद और अनन्त शांति का स्रोत उनके बीच था। यह सभी मनुष्यों के लिए एक आदर्श परिवार है। संभवत: आज किसी भी मानव परिवार के सामने कोई ऐसी समस्या नहीं है जिसे नाज़रेथ के पवित्र परिवार ने न झेला हो। नाज़रेथ के पवित्र परिवार में तीन विनम्र व्यक्ति शामिल थे जो हमेशा ईश्वर की इच्छा को स्वीकार करते रहते थे। इस परिवार की महानता का रहस्य उनकी ईश्वर की इच्छा के प्रति निरंतर विनम्र व्यवहार था। प्रत्येक मानव परिवार के लिए नाज़रेथ के पवित्र परिवार का सबसे बड़ा संदेश यह है कि वह ईश्वर के डिजाइन के अनुसार अपनी पूर्ण अनुभूति के लिए खुद को ईश्वर की इच्छा के समक्ष समर्पित करें।
✍ -फादर फ्रांसिस स्करिया
Just four days ago our whole attention was on the child in the manger. Today our attention is on the whole family of Jesus, Mary and Joseph. Jesus was born into a family, into the family of Joseph the carpenter and his wife Mary. They belonged to the lower strata of the society. They had to face life with its problems and challenges like every other poor family on the face of the earth. There were doubts in the mind of Joseph about Mary’s sincerity and faithfulness. The society looked at them with suspicion. Child Jesus faced threat to life in his early infancy. The family had to migrate to Egypt and stay away from relatives and neighbours. But they enjoyed peace and joy in their hearts because the source of lasting joy and peace was in their midst. This is a model family for all human beings. Probably there is no problem faced by any human family today which has not been a reality also in the Holy Family of Nazareth. The Holy Family of Nazareth consisted of three humble individuals who always submitted to the Will of God. The secret of the greatness of this family was their constant humble submission to the Will of God. The greatest message of the Holy Family of Nazareth to every human family is to submit themselves to the Will of God for their own full realisation according to the design of God.
✍ -Fr. Francis Scaria
आज हम पवित्र परिवार का त्योहार मना रहे है। आज के दिन माता कलीसिया नाजरेथ के येसु, युसूफ और मरियम के परिवार को आदर्श परिवार के रूप में प्रस्तुत करती है। इस परिवार की विशेषता येसु का होना है। जहॉ भी ईश्वर की उपस्थिति होती है वहॉ धार्मिकता नदी के समान बहती है। ईश्वर की दृष्टि एवं योजना में परिवार एक महत्वपूर्ण ईकाई है। जब ईश्वर ने अपने पुत्र को संसार में भेजा तो उन्हें यूसुफ और मरियम का परिवार प्रदान किया।
परिवार समाज की धुरी है। परिवारों की स्थिति ही समाज की दिशा निरधारित करती है। ईश्वर भी परिवारों को मनुष्य के कल्याण तथा मुक्ति का साधन बनाते हैं। वे परिवारों को आशिष देना एवं बचाना चाहते हैं। परिवार के एक सदस्य के द्वारा भी ईश्वर सारे परिवार को मुक्ति प्रदान करते हैं। परिवार का यदि एक सदस्य भी धार्मिक हो तो वह अपने विश्वास की अभिव्यक्ति जैसे प्रार्थना, सदाचरण, त्याग, मधुर विचार आदि के द्वारा परिवार के अन्य सदस्यों को प्रभावित करता तथा उनके लिये ईश्वर की कृपा की द्वार खोल देता है।
’’प्रभु को इस बात का खेद हुआ कि उसने पृथ्वी पर मनुष्य को बनाया था। इसलिए वह बहुत दुःखी था।प्रभु ने कहा, ’’मैं उस मानवजाति को, जिसकी मैंने सृष्टि की है, पृथ्वी पर से मिटा दूँगा...क्योंकि मुझे खेद है कि मैंने उन को बनाया है’’। नूह को ही प्रभु की कृपादृष्टि प्राप्त हुई।.... नूह सदाचारी और अपने समय के लोगों में निर्दोष व्यक्ति था। वह ईश्वर के मार्ग पर चलता था।’’ (उत्पति 6:6-8) चूंकि नूह ईश्वर की दृष्टि में कृपापात्र था ईश्वर उसे पोत बनाने का निर्देश देते हैं। ईश्वर नूह के साथ-साथ उसके परिवार को भी बचाने के उद्देश्य से पोत में ले जाने का आदेश देते हैं। ’’तुम अपने सारे परिवार के साथ पोत पर चढो, क्योंकि इस पीढी में केवल तुम्हीं मेरी दृष्टि में धार्मिक हो।’’ (उत्पति 7:1) इस प्रकार नूह की धार्मिकता उसके परिवार के कल्याण का कारण बनती है। धर्मग्रंथ उसके परिवार को धार्मिक कहकर नहीं बुलाता है बल्कि केवल नूह को। नूह के परिवार में भी पाप की छाया को हम कालांतर में देखते हैं जब उसका बेटा हाम अपने पिता नूह की नग्नता को देखता है जिसके कारण नूह उसे अभिशाप देता है। ’’कनान को अभिशाप! वह अपने भाइयों का दास बने।’’ (उत्पति 9:25) इससे हम निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि नूह का परिवार शायद नहीं बल्कि केवल नूह ईश्वर की दृष्टि में धार्मिक था।
निर्गमन ग्रन्थ का अध्याय 12 बताता है कि जब ईश्वर ने मिस्रियों को दण्ड दिया था तो उसने इस्राएलियों के परिवारों की रक्षा की थी। ’’जब प्रभु ने मिस्रियों को मारा था, तो वह मिस्र में रहने वाले इस्राएलियों के घरों के सामने से आगे निकल गया था और उसने हमारे घरों को छोड दिया था।’’ (निर्गमन 12:27)
ईश्वर की परिवारों को बचाने की इच्छा हम इब्राहीम और ईश्वर के वार्तालाप में भी पाते हैं। जब ईश्वर ने सोदोम और गोमोरा को नष्ट करने की योजना इब्राहीम को जाहिर की तो इब्राहीम उन नगरों को बचाने की गुहार लगाते हैं। इब्राहीम के ईश्वर से इस प्रकार प्रार्थना का एक कारण यह भी था कि उन नगरों में उसका भतीजा लोट रहता था। ईश्वर लोट को बचाने के साथ-साथ उसके परिवार को बचाते हैं। यह बात और है कि लोट की पत्नी अपनी अवज्ञा के कारण ’नमक का खम्भा’ बन गयी। (देखिये उत्पति 19) इस प्रकार इब्राहीम के कारण लोट और लोट के कारण उसका परिवार ईश्वर की कृपा प्राप्त करता है।
जकेयुस की घटना इस मतको और अधिक दृढता प्रदान करती है कि ईश्वर एक की धार्मिकता के कारण पूरे परिवार की मुक्ति का द्वार खोलते हैं। जकेयुस येसु से मिलकर एक नया जीवन पाता है तथा इस उमंग और उल्लास में वह प्रभु से कहता है, ’’प्रभु! देखिये, मैं अपनी आधी सम्पत्ति गरीबों को दूँगा और मैंने जिन लोगों के साथ बेईमानी की है, उन्हें उसका चौगुना लौटा दूॅगा’’। प्रभु जकेयुस के इस कथन के प्रतिउत्तर में कहते हैं, ’’आज इस घर में मुक्ति का आगमन हुआ है,...’’ (देखिये लूकस 19:1-10) केवल जकेयुस के हृदय परिवर्तन के कारण येसु उसके सारे परिवार को मुक्ति के पथ पर पहुॅचा देते हैं।
ईश्वर का दूत रोमन शतपति करनेलियुस को इन शब्दों से संबोधित करते हुये कहता है, ’’आपकी प्रार्थनायें और आपके भिक्षादान ऊपर चढकर ईश्वर के सामने पहुँचे और उसने आप को याद किया।’’ (प्रेरित चरित 10:4) इस संबोधन के द्वारा ईश्वर करनेलियुस को धार्मिक ठहराता है तथा उसे पेत्रुस को बुलाने का निर्देश देते हुये उसे तथा उसके परिवार को मुक्ति का वरदान देते हैं, ’’वह जो शिक्षा सुनायेंगे, उसके द्वारा आप को और आपके सारे परिवार को मुक्ति प्राप्त होगी।’’(प्रेरित चरित 11:14) इस प्रकार जब कारापाल आत्महत्या की कोशिश कर रहा था तो जो पौलुस उसे बताते हैं, ’’आप प्रभु ईसा में विश्वास कीजिए, तो आप को और आपके परिवार को मुक्ति प्राप्त होगी।’’ (प्रेरित चरित 16ः31)
इसी परिपेक्ष्य में संत पौलुस कहते हैं, ’’विश्वास नहीं करने वाला पति अपनी पत्नी द्वारा पवित्र किया गया है और विश्वास नहीं करने वाली पत्नी अपने मसीही पति द्वारा पवित्र की गयी है। नहीं तो आपकी संतति दूषित होती, किन्तु अब वह पवित्र ही है। (1 कुरि. 7:14) संत पौलुस के अनुसार किसी एक का विश्वासी होना भी दूसरे तथा बच्चों के लिये विश्वास का मार्ग खोल देता है।
ईश्वर के पुत्र के जन्म के पूर्व ईश्वर ने उसके लिये परिवार को तैयार किया जिसमें वह जन्म ले तथा उसका पालन-पोषण हो सके। येुस, मरियम और यूसुफ के नाजरेत का परिवार के सदस्यों की विशेषता यह है कि वे एक-दूसरे की ईश्वर की योजना पूरी करने में मदद करते हैं। धर्मग्रंथ में ऐसे अनेक उदाहरण है जो हमें सिखलाते हैं कि ईश्वर की दृष्टि में परिवार एक महत्वपूर्ण इकाई हैं तथा परिवार की मुक्ति हरेक सदस्य की जिम्मेदारी है। हमें भी अपने परिवार के प्रति गंभीर रहना चाहिये क्योंकि हरेक का व्यक्तिगत आचारण उनके परिवार को भी प्रभावित करता है।
✍ -फादर रोनाल्ड वाँन