
जो कुछ हम उस से माँगेंगे, वह हमें वही प्रदान करेगा; क्योंकि हम उसकी आज्ञाओं का पालन करते हैं और वही करते हैं, जो उसे पसन्द है। और उसकी आज्ञा यह है कि हम उसके पुत्र येसु मसीह के नाम में विश्वास करें और एक दूसरे को प्यार करें, जैसा कि उसने हमें आदेश दिया है। जो ईश्वर की आज्ञाओं का पालन करता है, वह ईश्वर में निवास करता है और ईश्वर उस में। और हम जानते हैं कि वह हम में निवास करता है, क्योंकि उसने हम को अपना आत्मा प्रदान किया है। प्रिय भाइयों ! प्रत्येक आत्मा पर विश्वास मत करो। आत्माओं की परीक्षा कर देखो कि वे ईश्वर के हैं या नहीं; क्योंकि जो आत्मा संसार में आये हैं, उन में बहुत-से झूठे नबी हैं। इंश्वर की आत्मा की पहचान इस में है - प्रत्येक आत्मा, जो यह स्वीकार करता है कि येसु मसीह सचमुच मनुष्य बन गये हैं, वह ईश्वर का है। और प्रत्येक आत्मा जो इस प्रकार येसु को नहीं स्वीकार करता, वह ईश्वर का नहीं है और वहीं मसीह-विरोधी है। तुमने सुना है कि वह संसार में आने वाला है और अब तो वह संसार में आ चुका है। बच्चो ! तुम ईश्वर के हो और तुम ने उन लोगों पर विजय पायी है; क्योंकि जो तुम में है, वह उस से महान् है, जो संसार में है। वे संसार के हैं और इसलिए वे संसार की बात करते हैं और संसार उनकी सुनता है। किन्तु हम ईश्वर के हैं और जो ईश्वर को पहचानता है, वह हमारी सुनता है। जो ईश्वर का नहीं है, वह हमारी बात सुनना नहीं चाहता। हम इसके द्वारा सच्चाई के आत्मा और भ्रांति के आत्मा की पहचान कर सकते हैं।
प्रभु की वाणी।
अनुवाक्य : मैं तुम्हें सभी राष्ट्रों का अधिपति बना दूँगा।
1. मैं ईश्वर की राजाज्ञा घोषित करूँगा। प्रभु ने मुझ से कहा, “तुम मेरा पुत्र हो, आज मैंने तुम को उत्पन्न किया है। मुझ से माँगो और मैं तुम्हें सभी राष्ट्रों का अधिपति तथा समस्त पृथ्वी का स्वामी बना दूँगा।”
2. हे राजाओ ! अब भी समझो ! हे पृथ्वी के शासकों ! शिक्षा ग्रहण करो ! डरते-काँपते हुए प्रभु की सेवा करो और उसकी आज्ञाओं का पालन करो।
अल्लेलूया ! येसु राज्य के सुसमाचार का प्रचार करते और लोगों की हर तरह की बीमारी दूर करते थे। अल्लेलूया !
येसु ने जब यह सुना कि योहन गिरफ़्तार हो गया है, तो वह गलीलिया चले गये। वह नाज़रेत नगर छोड़ कर, ज़बुलोन और नेफ़ताली के प्रान्त में, समुद्र के किनारे पर बसे हुए कफ़रनाहूम नगर में रहने लगे। इस तरह नबी इसायस का यह कथन पूरा हुआ - ज़बुलोन प्रान्त ! नेफ़ताली प्रान्त ! समुद्र के पथ पर, यर्दन के उस पार, ग़ैरयहूदियों की गलीलिया ! अंधकार में - रहने वाले लोगों ने एक महती ज्योति देखी है। मृत्यु के अंधकारमय प्रदेश में रहने वालों पर ज्योति का उदय हुआ है। उस समय से येसु यह कह कर उपदेश देने लगे, “पश्चात्ताप करो। स्वर्ग का राज्य निकट आ गया है।” येसु उनके सभायृहों में शिक्षा देते, राज्य के सुसमाचार का प्रचार करते और लोगों की हर तरह की बीमारी और निर्बलता दूर करते, सारी गलीलिया में घूमते रहते थे। उनका नाम सारी सीरिया में फैल गया। लोग मिरगी, लकवा आदि नाना प्रकार की बीमारियों और कष्टों से पीड़ित सब रोगियों को और अपदूतग्रस्तों को येसु के पास ले आते थे और वह उन्हें चंगा करते थे। गलीलिया, देकापोलिस, येरुसालेम, यहूदिया और यर्दन के उस पार से आया हुआ एक विशाल जनसमूह उनके पीछे-पीछे चलता था।
प्रभु का सुसमाचार।
योहन बपतिस्ता के शत्रुओं ने उसे चुप कराने की कोशिश की थी, लेकिन ईश्वर की मुक्ति के राज्य के सुसमाचार को चुप नहीं कराया जा सकता। जैसे ही योहन ने अपनी गवाही समाप्त की, येसु ने गलीली में अपना साक्ष्य शुरू कर दिया। सुसमाचार की घोषणा करते हुए, यीशु दो माँगें करते हैं: पश्चाताप करें और विश्वास करें! पश्चाताप के लिए बदलाव की आवश्यकता होती है - पाप और अवज्ञा से दूर होना और विश्वास के साथ प्रभु की ओर मुड़ना और सत्य और धार्मिकता के उनके वचन के प्रति समर्पण (ईश्वर की सच्चाई और नैतिक अच्छाई के अनुसार सही जीवन जीना)। पवित्र आत्मा हमें पश्चाताप करने वाला हृदय, पाप और उसके बुरे परिणामों के लिए सच्चा दुःख और घृणा देता है "पाप की मजदूरी मृत्यु है" (रोमियों 6:23), और जो कुछ भी हमें पाप में ले जाता है उससे दूर रहने का दृढ़ संकल्प। पवित्र आत्मा हमें अपने पाप को देखने की कृपा देता है - जोकि वास्तव में विद्रोह और ईश्वर के प्रेम को अस्वीकार करना है । ईश्वर की कृपा हमें उन सभी चीजों से दूर होने में मदद करती है जो हमें उसके प्रेम से दूर रखती हैं। सुसमाचार ईश्वर की शक्ति और प्रज्ञा है - हमारे जीवन को बदलने और रूपांतरित करने की शक्ति और हमें स्वर्ग में हमारे पिता के पुत्र और पुत्रियों के रूप में जीने का तरीका दिखाने की प्रज्ञा। पवित्र आत्मा के उपहार के माध्यम से प्रभु हमारे लिए विश्वास के साथ उनके वचन को प्राप्त करना और उस पर भरोसा और आज्ञाकारिता के साथ कार्य करना संभव बनाता है।
✍ -फादर रोनाल्ड वॉन (भोपाल महाधर्मप्रान्त)
John the Baptist's enemies had sought to silence him, but the good news of God's kingdom of salvation cannot be silenced. As soon as John had finished his testimony Jesus began his in Galilee. In announcing the good news, Jesus makes two demands: repent and believe! Repentance requires a change of course - a turning away from sin and disobedience and a turning towards the Lord with faith and submission to his word of truth and righteousness (right living according to God's truth and moral goodness). The Holy Spirit gives us a repentant heart, a true sorrow and hatred for sin and its bad consequences “the wages of sin is death” (Romans 6:23), and a firm resolution to avoid whatever would lead us into sin. The Holy Spirit gives us grace to see our sin for what it is - rebellion and a rejection of the love of God. God's grace helps us to turn away from all that would keep us from his love. The Gospel is the power and the wisdom of God - both power to change and transform our lives and wisdom to show us how to live as sons and daughters of our Father in heaven. Through the gift of the Holy Spirit the Lord makes it possible for us to receive his word with faith and to act upon it with trust and obedience.
✍ -Fr. Ronald Vaughan(Bhopal Archdiocese)
सुसमाचार लेखकों के अनुसार, योहन बपतिस्ता के रंगभूमि से ओझल होने के बाद ही प्रभु येसु ने सुसमाचार प्रचार करने का अपना कार्य शुरू किया। येसु ने ईश्वर के राज्य का उद्घाटन किया जिसके बारे में योहन बपतिस्ता ने घोषणा की थी। सुसमाचार में हम योहन बपतिस्ता तथा येसु द्वारा बड़ी पारस्परिक समझ के साथ ईश्वर की अनोखी योजना को आगे बढ़ाते हुए देख सकते हैं। येसु के प्रचार का विषय ईश्वर का राज्य था। ईश्वर का राज्य एक स्थिर वास्तविकता नहीं है बल्कि वह गतिशील है। वह प्रभु का शासन है जिसके अन्तर्गत प्रभु की इच्छा सर्वोच्च मानी जाती है और प्रभु का नाम पवित्र माना जाता है। आइए हम अपने जीवन में ईश्वर की इच्छा को बनाए रखते हुए स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करना सीखें।
✍ - फादर फ्रांसिस स्करिया
According to the Evangelists, Jesus began his ministry of preaching the Gospel after John the Baptist disappeared from the scene. Jesus inaugurated the Kingdom of God which John the Baptist spoke about. We can see the perfect plan of God being carried by John the Baptist and Jesus with great mutual understanding. The theme of the preaching of Jesus was the Kingdom of God. The kingdom of God is not a static reality but a dynamic one. It is the reign of God where the will of God is supreme and the name of God is held holy. Let us learn to usher in the kingdom of God by upholding the will of God in our own lives.
✍ -Fr. Francis Scaria
हेरोद के द्वारा संत योहन बप्तिस्ता को गिरफ़्तार किए जाने के बाद प्रभु येसु अपना मिशन कार्य प्रारम्भ करते हैं। नफ़ताली और ज़ेबुलोन के इस क्षेत्र को जहां से प्रभु येसु अपना मिशन कार्य प्रारम्भ करते हैं, सन्त मत्ती इसे ग़ैर-यहूदियों की गलिली कहते हैं। पुराने व्यवस्थान में गलिली को राष्ट्रों की गलिली कहकर पुकारा जाता था (इसायस ९:१-३) क्योंकि यही प्रतिज्ञात देश में प्रवेश करने का द्वार था। इस स्थान का सम्पर्क निरंतर नए लोगों और नयी-नयी संस्कृतियों से होता रहता था। यह प्रतिज्ञात देश का भाग होते हुए भी भ्रष्ट एवं अंधकारमय प्रदेश के रूप में जाना जाता था। यहाँ के लोग चुनी हुई प्रजा में नहीं गिने जाते थे, और उन्हें हेय दृष्टि से देखा जाता था। वे प्रभु के प्रेम की अज्ञानता के अंधकार में भटकते थे। शायद वही ऐसे लोग थे जिन्हें मुक्तिदाता की सबसे अधिक ज़रूरत थी।
इसलिए हम देखते हैं कि प्रभु येसु इसी स्थान पर अपना निवास बनाते और अपना मिशन कार्य प्रारम्भ करते हैं। जो स्थान नगण्य और तुच्छ समझा जाता था वही महान और ईश्वर के मिशन कार्य को प्रारम्भ करने का स्थान बन जाता है। प्रभु उनका अंधकार दूर करने आए हैं, और ईश्वरीय प्रेम की ज्योति जलाने आए हैं। गलिली से अपना मुक्तिकार्य प्रारम्भ करते हुए ईश्वर यह दर्शाते हैं कि धर्मियों से अधिक वह अधर्मियों को बुलाने आए हैं, क्योंकि धर्मियों से अधिक पापियों को ईश्वर की ईश्वर की आवश्यकता है (मत्ती ९:१३)। आज प्रत्येक वह स्थान जहाँ ईश्वर का प्रेम नहीं पहुँचा है, वह गलिली है। आइए हम ईश्वर के उस अनंत प्रेम को सब जनों तक पहुँचाएँ।आज भी अनेक लोग हैं जो अंधकार में और जो जीवन की ज्योति की खोज में हैं। प्रभु ही वह जीवन की ज्योति हैं। (योहन ८:१२)।
✍ -फादर जॉन्सन बी. मरिया (ग्वालियर धर्मप्रान्त)
Today we see Jesus beginning his public ministry after the arrest of John the Baptist by Herod. St. Matthew calls this area Naphtali and Zebulon where Jesus begins his ministry, as new Galilee of the Gentiles. In Old Testament times Galilee was called the Galilee of the nations (Is 9:1-3) because it was the entry point in the geographical territory of Israel, the promised land. This place constantly came in contact with different nations and cultures. Even it was part of the promised land but it was considered as corrupt and place of darkness. People here were not considered as especially chosen, but like they were treated with low esteem and like outsiders. They lived in the darkness of the ignorance of the Lord. In fact they were the people who needed a saviour more than anybody else.
Therefore we see Jesus making his dwelling and beginning his saving ministry from this place. The place which was discarded as the most insignificant place becomes very prominent place and starting point of God’s saving mission. He has come to dispel the darkness of sin and ignorance of God’s love for them. By starting his ministry from Galilee, God shows that more than righteous, he has come for sinners, because sinners need God more than the righteous (Mt. 9:13). Today every place where this good news of God’s love has not reached, is a Galilee. Let us make known God’s love to all, the love he has shown in his son Jesus our saviour. There are great number of people who still remain in dark, who still need to see the light of the world (John 8:12).
✍ -Fr. Johnson B.Maria (Gwalior)