प्रभु-प्रकाश के बाद का बृहस्पतिवार

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📕पहला पाठ

सन्त योहन का पहला पत्र 4:19-5:4

“जो ईश्वर को प्यार करता है, उसे अपने भाई को भी प्यार करना चाहिए।''

हम प्यार करते हैं क्योंकि उसने पहले हमें प्यार किया। यदि कोई यह कहे कि मैं ईश्वर को प्यार करता हूँ और वह अपने भाई से बैर करे, तो वह झूठा है। यदि वह अपने भाई को, जिसे वह देखता है, प्यार नहीं करता, तो वह ईश्वर को, जिसे उसने कभी देखा नहीं, प्यार नहीं कर सकता। इसलिए हमें मसीह से यह आदेश मिला है कि जो ईश्वर को प्यार करता है, उसे अपने भाई को भी प्यार करना चाहिए। जो यह विश्वास करता कि येसु ही मसीह हैं, वह ईश्वर की सन्तान है और जो जन्मदाता को प्यार करता है, वह उसकी सन्तान को भी प्यार करता है। इसलिए यदि हम ईश्वर को प्यार करते हैं और उसकी आज्ञाओं का पालन करते हैं, तो हमें ईश्वर की सन्तान को भी प्यार करना चाहिए। ईश्वर की आज्ञाओं का पालन करना - यही ईश्वर का प्रेम है। उसकी आज्ञाएँ भारी नहीं हैं, क्योंकि ईश्वर की हर सन्तान संसार पर विजयी हो जाती है। वह विजय, जो संसार को परास्त कर देती है, हमारा विश्वास ही है।

प्रभु की वाणी।

📖भजन : स्तोत्र 71:2,14-15,17

अनुवाक्य : हे प्रभु ! सभी राष्ट्र तुझे दण्डवत्‌ करेंगे।

1. हे ईश्वर ! राजा को अपना न्याय-अधिकार, राजपुत्र को अपनी न्यायशीलता प्रदान कर, जिससे वह तेरी प्रजा का न्यायपूर्वक शासन करें और पद्दलितों की रक्षा करें।

2. वह उन्हें अन्याय और अत्याचार से बचायेंगे, क्योंकि वह उनके प्राणों का मूल्य समझते हैं। लोग उनके लिए निरन्तर प्रार्थना करेंगे और उन्हें सदा धन्य कहेंगे।

3. उनका नाम सदा-सर्वदा धन्य हो और सूर्य की तरह बना रहे। वह पृथ्वी के सब निवासियों का कल्याण करेंगे और समस्त राष्ट्र उन्हें धन्य कहेंगे।

📒जयघोष : लूकस 4:18-19

अल्लेलूया ! प्रभु ने मुझे दरिद्रों को सुसमाचार सुनाने और बंदियों को मुक्ति का संदेश देने भेजा है। अल्लेलूया !

📙सुसमाचार

सन्त लूकस के अनुसार प्रवित्र सुसमाचार 4:14-22

“धर्मग्रन्य का यह कथन आज पूरा हो गया है।”

आत्मा के सामर्थ्य से सम्पन्न हो कर येसु गलीलिया लौटे और उनकी ख्याति सारे प्रदेश में फैल गयी। वह उनके सभागृहों में शिक्षा दिया करते थे और सब उनकी प्रशंसा करते थे। येसु नाज़रेत आये, जहाँ उनका. पालन-पोषण हुआ था। विश्राम के दिन वह अपनी आदत के अनुसार सभागृह गये। वह पढ़ने के लिए उठ खड़े हुए और उन्हें नबी इसायस की पुस्तक दी गयी। पुस्तक खोल कर येसु ने वह- स्थान निकाला जहाँ लिखा है; प्रभु का आत्मा मुझ पर छाया रहता है, क्योंकि उसने मेरा अभिषेक किया है। उसने मुझे भेजा है जिससे मैं दरिद्रों को सुसमाचार सुनाऊँ, बंदियों को मुक्ति का और अंधों को दृष्टिदान का संदेश दूँ, दलितों को स्वतंत्रता प्रदान करूँ और प्रभु के अनुग्रह का वर्ष घोषित करूँ। येसु ने पुस्तक बंद कर दी और उसे सेवक को दे कर वह बैठ गये। सभागृह के सब लोगों की आँखें उन पर लगी हुई थीं। तब वह उन से कहने लगे, “धर्मग्रन्थ का यह कथन आज तुम लोगों के सामने पूरा हो गया है।” सबों ने उनकी प्रशंसा की। वे उनके मनोहर शब्द सुन कर अचंभे में पड़ गये।

प्रभु का सुसमाचार।


📚 मनन-चिंतन

येसु में हम स्वतंत्रता का प्रतिज्ञा और ईश्वर के चंगाई दायक प्रेम और दया की शक्ति को क्रियान्वित होते हुए देखते हैं। येसु जहाँ भी गए, लोग स्वर्ग के राज्य और ईश्वर की प्रतिज्ञाओं के बारे में उनकी बात सुनने के लिए एकत्रित हुए, जो उन लोगों को, जो ईश्वर पर भरोसा रखते हैं, स्वतंत्रता और चंगाई प्रदान करेगा । उनके शब्दों ने उन लोगों को आशा, आनंद और अनुग्रह प्रदान किया जो उन्हें स्वीकार करने के लिए तैयार थे। येसु ने अपने गृह नगर गलीली में अपना सार्वजनिक कार्य शुरू किया। नबी इसायाह की मसीहाई भविष्यवाणी की के पूरे होने की उनकी घोषणा ने लोगों को आश्चर्यचकित कर दिया। इसायाह ने भविष्यवाणी की थी कि मसीह पवित्र आत्मा की शक्ति में आएगा और पाप और बुराई से पीड़ित लोगो को स्वतंत्रता प्रदान करेगा (इसायाह 61:1-2 देखें)। येसु ने ईश्वर की प्रतिज्ञाओं में उनकी आशा को जगाया। बदले में लोगो ने उनके शब्दों को ग्रहण किया और आश्चर्य किया कि यूसुफ के इस बेटे का क्या भविष्य होगा। उनके हृदय जीवन के वचन के लिए भूखे थे और उन्होंने बड़ी उम्मीद और आश्चर्य के साथ येसु की ओर देखा। इससे हम ईश्वर के वचन में ईश्वर के सभी वादों की पूर्ति में विश्वास और आशा के साथ येसु की ओर देखना सीखते हैं।

-फादर रोनाल्ड वॉन (भोपाल महाधर्मप्रान्त)


📚 REFLECTION

In Jesus we see the promise of freedom and the healing power of God's love and mercy in action. Wherever Jesus went, people gathered to hear him speak about the kingdom of heaven and God's promise to bring freedom and healing to those who put their trust in God. His words brought hope, joy, and favour to those who were willing to receive him. Jesus began his public ministry in his own home town Galilee. His proclamation of the fulfillment of the Messianic prophecy of Isaiah brought wonder to the people. Isaiah had prophesied that the Messiah would come in the power of the Holy Spirit to bring freedom to those oppressed by sin and evil (see Isaiah 61:1-2). Jesus awakened their hope in the promises of God. They, in turn, received his words favorably and wondered what would become of this son of Joseph. Their hearts were hungry for the word of life and they looked to Jesus with great expectation and wonder. From this we learn to look to Jesus with confidence and hope in the fulfillment of all God's promises in the Word of God.

-Fr. Ronald Vaughan(Bhopal Archdiocese)

📚 मनन-चिंतन - 2

आज के सुसमाचार में हम प्रभु येसु को अपनी परिकल्पना तथा मिशन वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए पाते हैं। वह स्वयं को ईश्वर का अभिषिक्त घोषित करते हैं जिसको उत्पीड़ितों की मुक्ति और सुसमाचार की घोषणा करने का कार्य सौंपा गया है। प्रभु येसु के लिए तो स्पष्ट था कि पिता उनसे क्या अपेक्षा करते हैं। उन्होंने कलवारी के क्रूस के माध्यम से मानवता के उद्धार के अपने लक्ष्य को हमेशा अपनी आंखों के सामने रखा और बड़े दृढ़ संकल्प के साथ वे उसकी ओर बढ़े। यह लक्ष्य उनका खुद का बनाया हुआ नहीं था, बल्कि पिता द्वारा दिया गया था। हम में से प्रत्येक के लिए यह महत्वपूर्ण है कि हम अपने आप को ठीक से पहचानें और ईश्वर की इच्छा को समझें और दृढ़ संकल्प के साथ उसका पालन करें।

- फादर फ्रांसिस स्करिया


📚 REFLECTION

In today’s Gospel we find the vision and mission statement of Jesus. He declares himself as the anointed one of God who has the task of liberation of the oppressed and proclamation of the good news. Jesus was clear about what the Father expected from him. He kept his task of redemption of humanity through the cross of Calvary before his eyes always and moved towards it with great determination. This goal was not of his own making, but one given by the Father. It is important for each one of us to know our own identity and discern the will of God and follow it with determination.

-Fr. Francis Scaria

📚 मनन-चिंतन -3

आज के सुसमाचार में हम देखते हैं कि प्रभु येसु अपने गृह नगर नाज़रेथ जाते हैं और वहाँ के सभागृह में जाकर नबी इसायस के ग्रंथ में से पाठ पढ़ते हैं। वह अपने इस दुनिया में आने के मक़सद की घोषणा करते हैं। वह घोषणा करते हैं कि स्वर्गीय पिता ने उन्हें दरिद्रों को सुसमाचार सुनाने के लिए भेजा है। दरिद्रों के लिए शुभ संदेश क्या है? यही कि उनकी दरिद्रता अब समाप्त होने वाली है। उनका उद्देश्य बंदियों को मुक्ति का संदेश देने, अंधों को दृष्टिदान और पददलितों का उद्धार करने के लिए आए हैं। उनकी प्राथमिकता की सूची में यही लोग हैं - अंधे, दरिद्र, पद दलित और बंदी। वह ऐसे ही लोगों के लिए इस दुनिया में आए हैं, उनके लिए अपना जीवन क़ुर्बान करने के और अपना प्रेम और मुक्ति उन्हें प्रदान करने के लिए आए हैं। उनके सेवाकार्य और मिशन का केंद्रबिंदु यही लोग हैं।

आज जब हम अपने चारों ओर नज़रें दौड़ाते हैं, तो आज भी हम अनेकों अंधे लोगों को देख सकते हैं, ऐसे लोग जो अन्यायपूर्ण तरीक़े से सलाख़ों के पीछे हैं, और ऐसे कमजोर लोग जो बलवानों के अत्याचार का शिकार बन जाते हैं। आज की दुनिया में लोग ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ के सिद्धांत का पालन करते हैं। जो शक्तिशाली है वह कुछ भी कर सकता है; कोई उनके विरुद्ध आवाज़ उठाने वाला नहीं है। कोई भी दरिद्रों, बंदियों या पद दलितों का साथ देने वाला नहीं है। ईश्वर का मुक्तिकार्य आज भी जारी है। आज ईश्वर हम में से प्रत्येक व्यक्ति को अपने लिए काम करने के लिए पुकारते हैं, उस मिशन कार्य को जारी रखने के लिए जिसके लिए वो इस दुनिया में आए। प्रभु का मिशन हमारे जीवन का मिशन बन जाये। आमेन।

-फादर जॉन्सन बी. मरिया (ग्वालियर धर्मप्रान्त)


📚 REFLECTION

Today we see Jesus goes to his hometown Nazareth and goes to the synagogue and reads from the scroll of prophet Isiah. He proclaims his purpose of coming into this world. He proclaims that God the father has sent him to bring good news to the poor. What is good news for the poor? That their poverty is to end. He is also called to proclaim release to the captives, sight to the blind and freedom for the oppressed. These are the people who are in his top priority list - the blind, the poor, the oppressed and the captives. He has come for such people, to give his life for them, his love and redemption for them. The focus of his ministry is these oppressed people.

Today as we look around us, we still can see lots of blind people, the people unjustly put behind that bars, weak people exploited by the powerful. Today we see a world where people follow the principal of might is right. Those who are powerful, they can do anything; nobody is there to question them. Nobody is there to take side of the captives, the poor and the downtrodden. God’s salvation work still continues. Today he wants each one of us to come forward and work for him and continue his work for which he came to the world. Let his mission be our mission. Amen.

-Fr. Johnson B.Maria (Gwalior)