
कौन संसार पर विजयी है? केवल वही जो यह विश्वास करता है कि येसु ईश्वर के पुत्र हैं। येसु मसीह जल और रक्त से आये हैं - न केवल जल से, बल्कि जल और रक्त से। आत्मा इसके विषय में साक्ष्य देता है, क्योंकि आत्मा सच्चाई है। इस प्रकार ये तीन साक्ष्य देते हैं - आत्मा, जल और रक्त; और तीनों एक ही बात कहते हैं। हम मनुष्यों का साक्ष्य स्वीकार करते हैं, किन्तु ईश्वर का साक्ष्य निश्चय ही कहीं अधिक प्रामाणिक है। ईश्वर ने अपने पुत्र के विषय में साक्ष्य दिया है। जो ईश्वर के पुत्र में विश्वास करता है, उसके हृदय में ईश्वर का वह साक्ष्य विद्यमान है। जो ईश्वर में विश्वास नहीं करता, वह उसे झूठा समझता है; क्योंकि वह पुत्र के विषय में ईश्वर का साक्ष्य स्वीकार नहीं करता। और वह साक्ष्य यह है - ईश्वर ने अपने पुत्र के द्वारा हमें अनन्त जीवन प्रदान किया है। जिसे पुत्र प्राप्त है, उसे वह जीवन प्राप्त है और जिसे पुत्र प्राप्त नहीं है, उसे वह जीवन प्राप्त नहीं। तुम लोग सब ईश्वर के पुत्र के नाम में विश्वास करते हो। मैं तुम्हें यह पत्र लिख रहा हूँ, जिससे तुम यह जान जाओ कि तुम्हें अनन्त जीवन प्राप्त है।
प्रभु की वाणी।अनुवाक्य : हें येरुसालेम ! प्रभु की स्तुति कर। (अथवा : अल्लेलूया !)
1. हे येरुसालेम ! प्रभु की स्तुति कर। हे सियोन ! अपने ईश्वर का गुणगान कर। उसने तेरे फाटकों के छड़ दृढ़ बना दिये, उसने तेरे यहाँ के बच्चों को आशीर्वाद दिया।
2. वह तेरे प्रान्तों में शांति बनाये रखता और तुझे उत्तम गेहूँ से तृप्त करता है। वह पृथ्वी को अपना आदेश देता है। उसकी वाणी शीघ्र ही फैल जाती है।
3. वह याकूब को अपना आदेश देता और इस्राएल को अपना विधान और नियम बताता है, उसने किसी अन्य राष्ट्र के साथ ऐसा नहीं किया; उसने किसी को अपना नियम नहीं सिखाया।
अल्लेलूया ! येसु राज्य के सुसमाचार का प्रचार करते और लोगों की हर तरह की बीमारी दूर करते थे। अल्लेलूया !
किसी नगर में येसु के पास एक मनुष्य आया, जिसका शरीर कोढ़ से भरा हुआ था। वह येसु को देख कर मुँह के बल गिर पड़ा और विनय करते हुए यह बोला, “'प्रभु ! आप चाहें तो मुझे शुद्ध कर सकते हैं।” येसु ने हाथ बढ़ा कर यह कहते हुए उसका स्पर्श किया, “मैं यही चाहता हूँ - शुद्ध हो जाओ'”। उसी क्षण उसका कोढ़ दूर हो गया। येसु ने उसे किसी से कुछ न कहने का आदेश दिया और कहा, “जा कर अपने को याजक को दिखाओ और अपने शुद्धीकरण के लिए मूसा द्वारा निर्धारित भेंट चढ़ाओ, जिससे तुम्हारा स्वास्थ्यलाभ प्रमाणित हो जाये।” येसु की ख्याति बढ़ती जा रही थी। भीड़ की भीड़ उनका उपदेश सुनने के लिए और अपने रोगों से छुटकारा पाने के लिए उनके पास आती थी। परन्तु वह अलग जा कर एकांत स्थानों में प्रार्थना किया करते थे।
प्रभु का सुसमाचार।
येसु को पुकारने वाले किसी भी व्यक्ति को येसु ने उनकी मदद से मना नहीं किया। यहाँ तक कि अछूत और समाज से बहिष्कृत लोगों को भी उनसे सहायता मिली। आज के सुसमाचार में कोढ़ी ने कुछ उल्लेखनीय किया। वह कोढ़ी होने के बावजूद भी आत्मविश्वास और विनम्रता के साथ येसु के पास गया, यह उम्मीद करते हुए कि येसु उसे ठीक कर सकते हैं और करेंगे। आम तौर पर अगर कोई कोढ़ी किसी के पास जाने की कोशिश करता है तो उसे पत्थर मार दिया जाता है या कम से कम भगा दिया जाता है। येसु न केवल उस व्यक्ति की प्रार्थना स्वीकार करते हैं, बल्कि वे अपने शारीरिक स्पर्श में ईश्वर के व्यक्तिगत प्रेम, करुणा और कोमलता को भी दिखाते हैं। कोढ़ी को छूना संक्रमण के गंभीर जोखिम के रूप में माना जाता है। येसु ने उस व्यक्ति के दुख को करुणा और दयालुता के साथ देखा। उन्होंने ईश्वर के प्रेम और दया को एक ऐसे संकेत में व्यक्त किया जो शब्दों से ज़्यादा ज़ोर से बोलता था। उन्होंने उस व्यक्ति को छुआ और उसे शुद्ध किया - न केवल शारीरिक रूप से बल्कि आध्यात्मिक रूप से भी।
✍ -फादर रोनाल्ड वॉन (भोपाल महाधर्मप्रान्त)
No one who sought Jesus out was refused his help. Even the untouchables and the outcasts of the society found help in him. The leper in today’s gospel passage did something remarkable. He approached Jesus confidently and humbly, expecting that Jesus could and would heal him. Normally a leper would be stoned or at least warded off if he tried to come near a rabbi. Jesus not only grants the man his request, but he shows the personal love, compassion, and tenderness of God in his physical touch. Touching a leper would be regarded as a grave risk for incurring infection. Jesus met the man's misery with compassion and tender kindness. He communicated the love and mercy of God in a sign that spoke more loudly than words. He touched the man and made him clean - not only physically but spiritually as well.
✍ -Fr. Ronald Vaughan(Bhopal Archdiocese)
आज के सुसमाचार के कोढ़ी की प्रार्थना मानव इतिहास की सब से प्रभावशाली प्रार्थनाओं में से एक है। "आप चाहें तो मुझे शुद्ध कर सकते हैं"। यद्यपि वह अत्यधिक आवश्यकता महसूस करता है, वह ईश्वरीय इच्छा के प्रति अपने आप को समर्पित करता है। ईश्वर की इच्छा की तलाश करना और उसे स्वीकार करना सबसे अच्छा कार्य है जो एक इंसान कर सकता है। हमारी इच्छाएँ और अभिलाषाएं अपूर्ण हैं, परन्तु ईश्वर की इच्छा परिपूर्ण है। प्रभु जानते हैं कि हमारे लिए सबसे अच्छा क्या है। इसलिए, हमारे लिए ईश्वर की इच्छा के सामने आत्मसमर्पण करना सबसे अच्छा है। गतसमनी की वाटिका में येसु ने प्रार्थना की, “मेरे पिता! यदि हो सके, तो यह प्याला मुझ से टल जाये। फिर भी मेरी नही, बल्कि तेरी ही इच्छा पूरी हो।" (मत्ती 26:39)। कोढ़ी की प्रार्थना येसु की इस प्रार्थना के बहुत करीब आती है। आइए हम उनकी तरह प्रार्थना करना सीखें।
✍ - फादर फ्रांसिस स्करिया
The leper who meets Jesus makes one of the best prayers a human being can utter. “If you wish, you can make me clean”. Although he is in utter need, he surrenders to the divine will. Seeking and accepting the will of God is the best a human being can do. Our desires and wishes are imperfect, but God’s will is perfect. The Lord knows what is best for us. Therefore, it is best for us to surrender to the will of God. In the garden of Gethsemane Jesus prayed, “My Father, if it is possible, let this cup pass from me; yet not what I want but what you want.” (Mt 26:39). The prayer of this leper comes very close to this prayer of Jesus. Let us learn to pray like him.
✍ -Fr. Francis Scaria
हमारे आज के मनन-चिंतन में प्रभु येसु आज एक कोढ़ी को चंगा करते हैं। पुराने ज़माने में कोढ़ एक भयंकर बीमारी के रूप में जाना जाता था। जिन लोगों को यह रोग हो जाता तो वे ना केवल शारीरिक रूप से कष्ट उठाते क्योंकि उनकी शरीर गलकर सड़ने लगता, बल्कि वे समाज और धर्म से बहिष्कृत किए जाने का दर्द भी सहते थे। उन्हें शापित मानकर समाज और लोगों से दूर निकाल दिया जाता था। वे एक मारे हुए इंसान से भी बदतर थे, ना उनके पास स्वास्थ्य था, ना समाज में कोई स्थान, ना इंसान जैसी गरिमा और ना ही आरामदायक या सम्माजनक मृत्यु ही उन्हें नसीब होती थी। वह कोढ़ी प्रभु येसु से आग्रह करता है, “यदि आप चाहें तो मुझे चंगा कर सकते हैं।” वह ईश्वर जो मानवजाति को बचाने के लिए धरती पर आए, वह इस कोढ़ी को बचना नहीं चाहेंगे? आप उनसे आग्रह करके देखिए, वह आपके लिए जो उत्तम है वही करेंगे।
उस कोढ़ी को चंगा कर प्रभु ना केवल उसे अच्छा स्वास्थ्य प्रदान करते हैं बल्कि उसके सामाजिक जीवन को चंगा करते हैं। वह उसके अंदर ईश्वर की संतान होने की गरिमा को पुनः स्थापित करते हैं। इस दुनिया में उनके आने का यही मक़सद है, संसार की मुरझायी हुई मानवता को पुनर्जीवित करने और प्रत्येक मनुष्य में ईश्वर के प्रतिरूप को पुनर्स्थापित करने के लिए। आज भी वह अथक इसी काम में लगे रहते हैं। हे प्रभु इस दुनिया में आकर हमें पुनः चंगा करने और मानवीय गरिमा प्रदान करने के लिए आपको धन्यवाद। आमेन।
✍ -फादर जॉन्सन बी. मरिया (ग्वालियर धर्मप्रान्त)
Jesus heals a leper in today’s reflection for us. Leprosy was a horrible disease in olden days. People who had this disease suffered not only physically as their skin got rotten and their wounds would not heal. They also suffered alienation from the society and religion. They were considered outcast and sent away from the people and society. They were worse than a dead person, they had no health, no place in the society, no dignity as human beings not even a peaceful death. This leper asks Jesus, “If you choose, you can make me clean.” How God, who came to save humanity wouldn’t choose to save this leper? You ask him and he will always choose what is best for you.
By healing the leper Jesus not only restores his health but restores his social status, making him acceptable in society again. He restores his human dignity as image of God and child of God. This is the very purpose of his coming to heal the broken humanity and restore the image of God in each and every child of his. He continues to work tirelessly. Thank you Jesus for coming into this world and giving us new life and restoring our dignity. Amen.
✍ -Fr. Johnson B.Maria (Gwalior)