वर्ष का प्रथम सप्ताह – सोमवार, वर्ष 1

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📕पहला पाठ

इब्रानियों के नाम पत्र 1:1-6“ईंश्वर हम से पुत्र द्वारा बोला है। ''

प्राचीन काल से ईश्वर बारम्बार और विविध रूपों में हमारे पुरखों से नबियों द्वारा बोला था। अब अन्त में वह हम से पुत्र द्वारा बोला है। उसने उस पुत्र के द्वारा समस्त विश्व की सृष्टि की और उसी को सब कुछ का उत्तराधिकारी नियुक्त किया है। वह पुत्र अपने पिता की महिमा का प्रतिबिम्ब और उसके तत्त्व का पूरा प्रतिरूप है। वह पुत्र अपने शक्तिशाली शब्द द्वारा समस्त सृष्टि की रक्षा करता है। उसने हमारे पापों का प्रायश्चित किया और अब वह सर्वशक्तिमान्‌ ईश्वर के दाहिने विराजमान है। उसका स्थान स्वर्गदूतों से ऊँचा है, क्योंकि जो नाम उसे उत्तराधिकार में मिला है, वह उनके नाम से कहीं अधिक श्रेष्ठ है। क्या ईश्वर ने कभी किसी स्वर्गदूत से यह कहा, “तुम मेरे पुत्र हो, आज मैंने तुम्हें उत्पन्न किया है” और “मैं उसके लिए पिता बन जाऊँगा और वह मेरा पुत्र होगा?” फिर वह अपने पहलौठे को संसार के सामने प्रस्तुत करते हुए कहता है, “ईश्वर के सभी स्वर्गतूत उसकी आराधना करें।”

प्रभु की वाणी।

📖भजन : स्तोत्र 96:1-2,6-7,9

अनुवाक्य :- सभी देवता उसे दण्डवत्‌ करें।

1. प्रभु राज्य करता है। पृथ्वी प्रफुल्लित हो जाये, असंख्य द्वीप आनन्द मनायें। उसका सिंहासन सत्य और न्याय पर आधारित है।

2. आकाश प्रभु का न्याय घोषित करता है। सभी राष्ट्र उसकी महिमा देखते हैं, सभी देवता उसे दण्डवत्‌ करें।

3. क्योंकि तू ही प्रभु है। तू ही समस्त पृथ्वी पर सर्वोच्च है, तू ही सभी देवमूर्तियों से महान है।

📒जयघोष : मारकुस 1:15

अल्लेलूया ! प्रभु कहते हैं, “ईश्वर का राज्य निकट आया है। पश्चात्ताप करो और सुसमाचार में विश्वास करो।” अल्लेलूया !

📙सुसमाचार

मारकुस के अनुसार पवित्र सुसमाचार

“'पश्चात्ताप करो और सुसमाचार में विश्वास करो।”

योहन के गिरफ्तार हो जाने के बाद येसु गलीलिया आये और यह कहते हुए ईश्वर के सुसमाचार का प्रचार करने लगे, “समय पूरा हो चुका है। ईश्वर का राज्य निकट आ गया है। पश्चात्ताप करो और सुसमाचार में विश्वास करो।” गलीलिया के समुद्र के किनारे से हो कर जाते हुए येसु ने सिमोन और उसके भाई अंद्रेयस को देखा। वे समुद्र में जाल डाल रहे थे, क्योंकि वे मछुए थे। येसु ने उन से कहा, “मेरे पीछे चलें आओ। मैं तुम्हें मनुष्यों के मछुए बनाऊँगा।” और वे तुरन्त अपने जाल छोड़ कर उनके पीछे हो लिये। कुछ आगे बढ़ने पर येसु ने जेबेदी के पुत्र याकूब और उसके भाई योहन को देखा। वे भी नाव में अपने जाल मरम्मत कर रहे थे। येसु ने उन्हें उसी समय बुलाया। वे अपने पिता जेबेदी को मजदूरों के साथ नाव में छोड़ कर उनके पीछे हो लिये।

प्रभु का सुसमाचार।

सूचना - जिस वर्ष में प्रभु के बपतिस्मा का पर्व इस सोमवार दिन मनाया जाता है, उसी वर्ष में सोमवार के पाठ मंगलवार के पाठों से जोड़े जा सकते हें।

📚 मनन-चिंतन

जब ईश्वर हमें सेवा करने के लिए बुलाता है, तो हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि हमारे पास देने के लिए कुछ भी नहीं है। ईश्वर को जो कुछ हम देते हैं, चाहे वह कितना छोटा क्यों न लगे, वे उसे स्वीकार लेते है और अपने राज्य में महान कार्यों के लिए उसका उपयोग करते है। जब येसु ने सुसमाचार का प्रचार किया, तो उसने लोगों को अपने शिष्यों के रूप में उसका अनुसरण करने के लिए बुलाया और उन्हें एक मिशन दिया: "लोगों को ईश्वर के राज्य में लाना।" येसु आज हमें वही कार्य सौपते है। वे चाहते है कि हम अपने माध्यम से उनकी ज्योति को चमकने दे तथा दूसरों को उसके पास लाएँ। यह तब होता है जब हम अपने दैनिक जीवन में सुसमाचार का आनंद जीते हैं, बोलते हैं और बाँटते हैं। जैसा कि संत पौलुस कहते हैं: 14) ईश्वर को धन्यवाद, जो हमें निरन्तर मसीह की विजय-यात्रा में ले चलता और हमारे द्वारा सर्वत्र अपने नाम के ज्ञान की सुगन्ध फैलाता है! (2 कुरिन्थियों 2:15)। क्या हम अपने आस-पास के लोगों को सुसमाचार का आनंद दिखाते हैं? क्या हम अपने पड़ोसियों, सहकर्मियों, छात्रों और परिवार के सदस्यों के लिए प्रार्थना करते हैं, ईश्वर से उनके प्रेम को जानने और उनके करीब आने में मदद करने के लिए कहते हैं?

-फादर रोनाल्ड वॉन (भोपाल महाधर्मप्रान्त)


📚 REFLECTION

When God calls us to serve, we should not think we have nothing to give. God takes what we offer, even if it seems small, and uses it for great things in His kingdom. When Jesus preached, He invited people to follow Him as His disciples and gave them a mission: "to bring people into God’s kingdom." Jesus gives us the same mission today. He wants us to bring others to Him by letting His light shine through us. This happens when we live, speak, and share the joy of the gospel in our daily lives. As St. Paul says: But thanks be to God, who in Christ Jesus always leads us in triumph, and through us spreads the fragrance of the knowledge of him everywhere. For we are the aroma of Christ to God among those who are being saved and among those who are perishing (2 Corinthians 2:15). Do we show the joy of the gospel to those around us? Do we pray for our neighbours, co-workers, students, and family members, asking God to help them know His love and grow closer to Him?

-Fr. Ronald Vaughan(Bhopal Archdiocese)

📚 मनन-चिंतन-2

संसार के मुक्तिदाता का जन्मदिन धूम-धाम से मनाने के बाद हम अब पूजन विधि के सामान्यकाल में प्रवेश करते हैं। आज हम प्रभु येसु द्वारा सुसमाचार की घोषणा का आरम्भ और अपने पहले शिष्यों का बुलावा देखते हैं। सुसमाचार दरिद्रों, अंधों, पद दलितों एवं पीड़ितों के लिए आशा का संदेश है, जैसा कि प्रभु येसु ने नाज़रेथ के सभागृह में घोषित किया था (लूकस ४:१८)। इस सुसमाचार को उचित रीति से ग्रहण करने के लिए और प्रभु के वचन को सुनने के लिए अपने पापों के लिए पश्चाताप करना होगा। प्रभु येसु अपने इस मिशन में सहयोग के लिए कुछ शिष्यों को बुलाते हैं।

हम अंदरियस और सिमोन दो भाइयों को देखते हैं जो प्रभु के बुलाने पर अपने जाल छोड़ कर उनके पीछे हो लेते हैं। भाइयों की यह जोड़ियाँ हमें प्रभु येसु के शिष्य बनने के लिए कुछ ज़रूरतों को समझाते हैं। सिमोन और अंदरियस अपने जाल छोड़कर प्रभु के पीछे हो लेते हैं, उनके जान उनकी जीविका थे, उनकी सम्पत्ति, उनके कमाई और जीवन-यापन का साधन थे। वह सब कुछ छोड़कर प्रभु येसु को ही अपना जीवन बना लेते हैं। इसी तरह याकूब और योहन ना केवल अपने जाल छोड़ देते हैं बल्कि अपने पिता को भी छोड़ देते हैं, जिसका अर्थ है कि हमें प्रभु के शिष्य बनने के लिए अपने सगे-सम्बन्धियों को भी त्यागना पड़ेगा, क्योंकि ईश्वर ही हमारा परिवार बन जाते और अन्य शिष्य उनके सगे-सम्बन्धी बन जाते हैं। क्या मैं प्रभु येसु के मिशन कार्य में सहयोग देने के लिए उनके शिष्य बनने की क़ीमत पहचानता हूँ?

-फादर जॉन्सन बी. मरिया (ग्वालियर धर्मप्रान्त)


📚 REFLECTION

We now enter into ordinary season after celebrating birth of the saviour of the world. Today we see the beginning of proclamation of the good news by Jesus and calling of his first disciples. The good news is the news of hope for the poor, the blind, the downtrodden and the exploited, as stated by Jesus in the synagogue of Nazareth (Luke 4:18). In order to receive this good news and the kingdom of God, we need to prepare ourselves by repentance and paying heed to God’s word. Jesus calls his first disciples to help him in his mission.

We see two brothers Andrew and Simon when called by Jesus, leave their nets and follow Jesus. We also see two more brothers James and John, both sons of Zebedee, they leave their father and start following Jesus. These both pairs of brothers symbolise something needed for being true disciples of Jesus. Andrew and Simon left their nets, which were their living, their property, their source of earning and survival. They leave it behind and centre their life on Jesus. Similarly James and John not only leave behind their nets but also their father, symbolising the family and the relatives, God becomes their family, and followers become their brothers and sisters. Do I realise the cost of being Jesus’ disciple to contribute in his mission?

-Fr. Johnson B.Maria (Gwalior)