
वसन्त के समय, जब राजा लोग युद्ध के लिए प्रस्थान किया करते हैं, दाऊद ने अपने अंगरक्षकों और समस्त इस्राएली सेना के साथ योआब को भेजा। उन्होंने अम्मोनियों को तलवार के घाट उतारा और रब्बा नामक नगर को घेर लिया। दाऊद येरुसालेम में रह गया। दाऊद सन्ध्या समय अपनी शय्या से उठ कर महल की छत पर टहल ही रहा था कि उसने छत पर से एक स्त्री को स्नान करते देखा। वह स्त्री अत्यन्त रूपवती थी। दाऊद ने उस स्त्री के विषय में पूछताछ की और लोगों ने उस से कहा, “यह तो एलीआम की पुत्री और हित्ती ऊरीया की पत्नी बतशेबा है।” तब दाऊद ने उस स्त्री को ले आने के लिए दूतों को भेजा। वह उसके पास आयी और दाऊद ने उसके साथ रमण किया। इसके बाद वह अपने घर लौट गयी। उस स्त्री को गर्भ रह गया और उसने दाऊद को कहला भेजा कि “मैं गर्भवती हूँ”। तब दाऊद ने योआब को यह आदेश दिया, “हिती ऊरीया को मेरे पास भेज दो”। योआब ने ऊरीया को दाऊद के पास भेजा। जब ऊरीया उसके पास आया, तो दाऊद ने उस से योआब, सेना और युद्ध का समाचार पूछा। उसके बाद उसने ऊरीया से कहा, “अपने घर जा कर स्नान करो।” ऊरीया महल से चला गया और राजा ने उनके पास अपनी मेज का भोजन भेज दिया। किन्तु ऊरीया ने अपने स्वामी के सेवकों के पास महल के द्वार-मण्डप में रात बितायी और वह अपने घर नहीं गया। लोगों ने दाऊद से कहा कि ऊरीया अपने घर नहीं गया। तब दाऊद ने उसे अपने साथ खाने और पीने का निमंत्रण दिया और इतना पिलाया कि वह मतवाला हो गया। किन्तु ऊरीया फिर अपने प्रभु के सेवकों के पास अपने पलंग पर सोया और वह अपने घर नहीं गया। दूसरे दिन प्रात: दाऊद ने योआब के नाम पत्र लिख कर ऊरीया के हाथ भेजा। उसने पत्र में यह लिखा, “जहाँ घमासान युद्ध हो रहा है, वहीं ऊरीया को सब से आगे रखना और तब उसके पीछे से हट जाना, जिससे वह मारा जाये और खेत रहे।” इसलिए योआब ने नगर के घेराव में ऊरीया को एक ऐसे स्थान पर रखा, जिसके विषय में वह जानता था कि वहाँ शूरवीर योद्धा तैनात थे। नगर के निवासी योआब पर आक्रमण करने निकले। सेना और दाऊद के अंगरक्षकों में से कुछ लोग मारे गये और हिती ऊरीया भी मर गया।
प्रभु की वाणी।
अनुवाक्य : हे प्रभु! हम पर दया कर क्योंकि हमने पाप किया है।
1. हे ईश्वर ! तू दयालु है, मुझ पर दया कर। तू दया-सागर है, मेरा अपराध क्षमा कर। मेरी दुष्टता पूर्ण रूप से धो डाल, मुझ पापी को शुद्ध कर।
2. मैं अपना अपराध स्वीकार करता हूँ। मेरा पाप निरन्तर मेरे सामने है। मैंने तेरे विरुद्ध पाप किया है, जो काम तेरी दृष्टि में बुरा है, वही मैंने किया है।
3. इसलिए तेरा न्याय मुझे दोषी ठहराता है और तेरी दण्डाज्ञा उचित ही है। मैं तो जन्म से ही अपराधी हूँ, अपनी माता के गर्भ से ही पापी।
4. तू मुझे आनन्द का संदेश सुना और तुम से रौंदी हुई हड्डियाँ फिर खिल उठेंगी। तू मेरे पापों पर दृष्टि न डाल, तू मेरा अपराध मिटा देने की कृपा कर।
अल्लेलूया ! हे पिता ! हे स्वर्ग और पृथ्वी के प्रभु ! मैं तेरी स्तुति करता हूँ, क्योंकि तूने राज्य के रहस्यों को निरे बच्चों के लिए प्रकट किया है। अल्लेलूया !
येसु ने लोगों से कहा, “ईश्वर का राज्य उस मनुष्य के सदृश्य है, जो भूमि में बीज बोता है। वह रात को सोने जाता और सुबह उठता है। बीज उगता है और बढ़ता जाता है, हालाँकि उसे यह पता नहीं कि यह कैसे हो रहा है। भूमि अपने आप 'फसल पैंदा करती है - पहले अंकुर, फिर बाल और बाद में पूरा दाना। फसल तैयार होते ही वह हँसिया चलाने लगता है, क्योंकि कटनी का समय आ गया है।” येसु ने कहा, “हम ईश्वर के राज्य की तुलना किस से करें? हम किस दृष्टान्त द्वारा उसका निरूपण करें? वह राई के दाने के सदृश है। मिट्टी में बोया जाते समय वह दुनिया भर का सब से छोटा दाना है; परन्तु बाद में बढ़ते-बढ़ते वह सब पौधों से बड़ा हो जाता है और उस में इतनी बड़ी-बड़ी डालियाँ निकल आती हैं कि आकाश के पंछी उसकी छाया में बसेरा कर सकते हैं।” वह इस प्रकार के बहुत-से दृष्टान्तों द्वारा लोगों को उनकी समझ के अनुसार सुसमाचार सुनाते थे। वह बिना दृष्टान्त के लोगों से कुछ नहीं कहते थे, लेकिन एकान्त में अपने शिष्यों को सब बातें समझाते थे।
प्रभु का सुसमाचार।
येसु आज के बाइबिल पाठ में ईश्वर के राज्य के रहस्यों के बारे में और अधिक खुलासा करते हैं। हमारे मानवीय प्रयासों के बिना ईश्वर का राज्य हम में विकसित होता है। ईश्वर ही हम में अपना भला कार्य शुरू करते हैं और फिर उसे पूरा करने के लिए आगे बढ़ते हैं। स्तोत्रकार कहता है, “यदि प्रभु ही घर नहीं बनाये, तो राजमिस्त्रियों का श्रम व्यर्थ है। यदि प्रभु ही नगर की रक्षा नहीं करे, तो पहरेदार व्यर्थ जागते हैं।” (स्तोत्र 127:1) हमें ईश्वर के प्रति विनम्र होकर इस कार्य में सहयोग करना चाहिए। येसु ने ईश्वर के राज्य की तुलना बोए गए राई के बीज से भी की जो अकाश के पक्षियों के लिए आश्रय प्रदान करने वाले एक बड़े पेड़ के रूप में विकसित होता है। ईश्वर का राज्य एक निष्क्रिय वास्तविकता नहीं है, बल्कि गतिशील है। इसकी वृद्धि रहस्यमय है। विकास प्रभु द्वारा किया जाता है। केवल ईश्वर की सहायता से ही हम भलाई और पवित्रता में बढ़ सकते हैं। अपनी मानवीय इच्छा को ईश्वरीय इच्छा के अधीन कर हम उनके राज्य के प्रसार में ईश्वर के साथ सहयोग कर सकते हैं।
✍ - फादर फ्रांसिस स्करिया
Jesus reveals further about the mystery of the Kingdom of God in today’s biblical passage. The Kingdom of God grows in us without our human efforts. It is God who begins his good work in us and then proceeds to its completion. The Psalmist says, “Unless the Lord builds the house, those who build it labor in vain. Unless the Lord guards the city, the guard keeps watch in vain.” (Ps 127:1) We need to co-operate with God in this work by being docile to him. Jesus also compares the Kingdom of God to the mustard seed sown which grows into a large tree providing shelter for birds of the air. The Kingdom of God is not a passive reality, but a dynamic one. Its growth is mysterious. The growth is effected by God. It is only with the help of God that we can grow in goodness and holiness. By making our human will submissive to the divine will we can collaborate with God in the spreading of his kingdom.
✍ -Fr. Francis Scaria
ईश्वर के राज्य की शुरुआत छोटी है, लेकिन यह एक बड़े फलदायी उद्यम के रूप में विकसित होता है। सुसमाचार एक ऐसे व्यक्ति के बारे में बताता है, जिसने भूमि पर बीज बिखेर दिए और उसके बारे में चिंता किये बिना अपने दैनिक क्रियाकलापों में व्यस्त हो जाता है। उसके दिन चिंताजनक नहीं होते और न ही रातों की नींद से वह वंचित रहता। बीज अंकुरित होता है, बढ़ता है और उसके हस्तक्षेप के बिना अनाज पैदा करता है। सुसमाचार भी राई के बीज के बारे में हमें बताता है जिसकी लगाये जाते समय एक छोटी शुरुआत होती है, लेकिन बढ़ता है और आकाश के पक्षियों को आश्रय देने वाला एक बड़ा पेड़ बन जाता है। ईश्वर का राज्य मुख्य रूप से इश्वर का काम है। हम स्वर्गराज्य के साधन बने हैं। हमें बस इतना करना है कि ईश्वर की आत्मा के प्रति विनम्र रहें और प्रतिबद्धता के साथ अपनी सरल भूमिका निभाएं। ईश्वर वही करेंगे जो वे चाहते हैं। प्रभु कहते हैं, " जिस तरह पानी और बर्फ़ आकाश से उतर कर भूमि सींचे बिना, उसे उपजाऊ बनाये और हरियाली से ढके बिना वहाँ नहीं लौटते, जिससे भूमि बीज बोने वाले को बीज और खाने वाले को अनाज दे सके, उसी तरह मेरी वाणी मेरे मुख से निकल कर व्यर्थ ही मेरे पास नहीं लौटती। मैं जो चाहता था, वह उसे कर देती है और मेरा उद्देश्य पूरा करने के बाद ही वह मेरे पास लौट आती है।“ (इसायाह 55: 10-11)।
✍ -फादर फ्रांसिस स्करिया
The kingdom of God has small beginnings, but it grows into a large fruitful enterprise. The Gospel speaks about a man who scattered seed on the land and went about his daily activites without worrying about what would happen. He does not go through worrying days and sleepless nights. The seed sprouts, grows and produces grains without his intervention. The Gospel speaks also about the mustard seed which has a small beginning at the sowing, but grows and becomes a large tree giving shelter to the birds of the air. Kindgom of God is primarily God’s work. We are made instruments of the Kingdom. All that we need to do is to be docile to the Spirit of God and play our simple roles with commitment. God will accomplish what he intends. The Lord says, “For as the rain and the snow come down from heaven, and do not return there until they have watered the earth, making it bring forth and sprout, giving seed to the sower and bread to the eater, so shall my word be that goes out from my mouth; it shall not return to me empty, but it shall accomplish that which I purpose, and succeed in the thing for which I sent it.” (Is 55:10-11).
✍ -Fr. Francis Scaria