सामान्य काल का छठा सप्ताह, बृहस्पतिवार– वर्ष 2

🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥

पहला पाठ

सन्त याकूब का पत्र 2:1-9

“ईश्वर ने दरिद्रों को चुना और आपने दरिद्र का तिरस्कार किया।”

भाइयो ! आप लोग हमारे महिमान्वित प्रभु येसु मसीह में विश्वास करते हैं, इसलिए भेदभाव और चापलूसी से दूर रहिए। मान लीजिए कि आप लोगों की सभा में सोने की अंगूठी और कीमती वस्त्र पहने कोई व्यक्ति प्रवेश करे और साथ 'फटे-पुराने कपड़े पहने कोई कंगाल। यदि आप कीमती वस्त्र पहने वाले का विशेष ध्यान रख कर उस से कहें, “आप यहाँ इस आसन पर विराजिए'' और कंगाल से कहें, “तुम वहाँ खड़े रहो” अथवा “मेरे पाँवदान के पास बैठ जाओ'', तो क्या आपने अपने मन में भेदभाव नहीं आने दिया और गलत विचार के अनुसार निर्णय किया है? प्यारे भाइयो ! सुन लीजिए - क्या ईश्वर ने उन लोगों को नहीं चुना, जो संसार की दृष्टि में दरिद्र हैं, ताकि वे विश्वास के धनी हो जायें और उस राज्य के अधिकारी बनें, जिसे उसने अपने भक्तों को प्रदान करने की प्रतिज्ञा की है? फिर भी आपने दरिद्र का तिरस्कार किया। क्या धनी आप लोगों का शोषण नहीं करते और आप को अदालतों में घसीट कर नहीं ले जाते? क्या वे उस सुन्दर नाम की निन्दा नहीं करते, जिससे आप पुकारे जाते हैं? धर्मग्रन्थ कहता है - तुम अपने पड़ोसी को अपने समान प्यार करो। यदि आप इसके अनुसार राज्य की संहिता पूरी करते हैं, तो अच्छा ही करते हैं। किन्तु यदि आप पक्षपात करते हैं, तो पाप करते हैं और संहिता के अनुसार दोषी हैं।

प्रभु की वाणी।

भजन : स्तोत्र 33:2-7

अनुवाक्य : दीन-हीन ने प्रभु की दुहाई दी और प्रभु ने उसकी सुनी।

मैं सदा ही प्रभु को धन्य कहूँगा, मेरा कंठ निरन्तर उसकी स्तुति करता रहेगा। मेरी आत्मा प्रभु पर गौरव करेगी। विनम्र सुन कर, आनन्दित हो उठेंगे।

मेरे साथ प्रभु की महिमा गाओ, हम मिल कर उसके नाम की स्तुति करें। मैंने प्रभु को पुकारा। उसने मेरी सुनी और मुझे हर प्रकार के भय से मुक्त कर दिया।

जो प्रभु की ओर दृष्टि लगाता है, वह आनन्दित होगा - उसे कभी लज्जित नहीं होना पड़ेगा। दीन-हीन ने प्रभु की दुहाई दी। प्रभु ने उसकी सुनी और उसे हर प्रकार की विपत्ति से बचा लिया।

जयघोष : योहन 6:64,69

अल्लेलूया ! हे प्रभु ! तेरी शिक्षा आत्मा और जीवन है। तेरे ही शब्दों में अनन्त जीवन का सन्देश है। अल्लेलूया !

सुसमाचार

मारकुस के अनुसार पवित्र सुसमाचार 8:27-33

“आप मसीह हैं”। “मानव पुत्र को बहुत दुःख उठाना होगा”।

येसु अपने शिष्यों के साथ कैसरिया फिलिपी के गाँवों की ओर चलें गये। रास्ते में उन्होंने अपने शिष्यों से पूछा, “मैं कौन हूँ, इसके विषय में लोग क्या कहते हैं?” उन्होंने उत्तर दिया, “योहन बपतिस्ता; कुछ लोग कहते हैं - एलियस और कुछ लोग कहते हैं - नबियों में से कोई।” इस पर येसु ने पूछा, “और तुम क्या कहते हो कि मैं कौन हूँ?” पेत्रुस ने उत्तर दिया, “आप मसीह हैं।” इस पर उन्होंने अपने शिष्यों को कड़ी चेतावनी दी कि तुम लोग मेरे विषय में किसी को भी नहीं बताना। उस समय से येसु अपने शिष्यों को स्पष्ट शब्दों में यह समझाने लगे कि मानव पुत्र को बहुत दुःख उठाना होगा; नेताओं, महायाजकों और शास्त्रियों द्वारा ठुकराया जाना, मार डाला जाना और तीन दिन के बाद जी उठना होगा। पेत्रुस येसु को अलग ले जा कर समझाने लगा, किन्तु येसु ने मुड कर अपने शिष्यों की ओर देखा और पेत्रुस को डाँटते हुए कहा, “हट जाओ, शैतान! तुम ईश्वर की बातें नहीं, बल्कि मनुष्यों की बातें सोचते हो।”

प्रभु का सुसमाचार।


मनन-चिंतन

सुसमाचार अनुग्रह और दुर्बलता का एक अजीब मिश्रण प्रस्तुत करता है जो एक सच्चे ख्रीस्तीय के हृदय में पाया जाता है। पेत्रुस, जिसने अभी-अभी येसु को मसीह के रूप में अंगीकार किया था, अब अपने स्वामी को डांटने की कल्पना कर रहा है। यहाँ पेत्रुस की अज्ञानता थी। वह येसु की पीड़ा और मृत्यु की आवश्यकता को नहीं समझता था। वह येसु में एक पीड़ित मसीह को देखने में असफल रहा।। पेत्रुस ने सोचा, वह मसीह को अधिक उत्कृष्ट मार्ग दिखाने के लिए बेहतर स्थिति में था। वह यह सब अच्छे इरादों के साथ किया। उनके इरादे शुद्ध थे। लेकिन जोश और ईमानदारी, गलती के लिए कोई बहाना नहीं है। एक ब्यक्ति की सोच अच्छी हो सकती है फिर भी वह जबरदस्त गलतियों में गिर सकता है। पेत्रुस ने एक इंसान के रूप में सिखाया, लेकिन येसु ने ईश्वर की तरह सोचने को कहा।

- - फादर संजय कुजूर एस.वी.डी


REFLECTION

The gospel presents a strange mixture of grace and infirmity which may be found in the heart of a true Christian. Peter, who had just confessed Jesus as the Christ, is now presuming to rebuke his master. Here was ignorance in Peter. He did not understand the necessity of the suffering and death of Jesus. He failed to see a suffering messiah in Jesus. Peter thought, he was in a better position to show the messiah a more excellent way. He did it all with the best intentions. His motives were pure. But zeal and earnestness are no excuse for error. A person may mean well and yet fall into tremendous mistakes. Peter taught as a human, but Jesus said think as God does.

- Fr. Sanjay Kujur SVD

मनन-चिंतन - 2

कैसरिया फिलिप्पी राजनीतिक, ऐतिहासिक और धार्मिक रूप से महत्वपूर्ण शहर था। शहर का नाम ही हमंभ महान राजनीतिक हस्तियों की याद दिलाता है। ऐतिहासिक रूप से भी कैसरिया फिलिप्पी एक महत्वपूर्ण स्थान था। यह कई मंदिरों और वेदियों का शहर था। येसु चाहते हैं कि इस प्रकार की जगह पर उनके शिष्य यह व्यक्त करें कि वे उनके लिए कौन हैं; यानि उनके बारे में वे क्या समझते हैं। कुछ लोगों का यह मानना था योहन बपतिस्ता, जिनका सिर काट दिया गया था, वापस आ गए। कुछ लोग यह सोच रहे थे इ नबी एलिय्याह, जो आग के रथ में उठा लिये गए थे, जीवन में वापस आ गए हैं। कुछ लोग येसु को नबी मानते थे। लेकिन संत पेत्रुस ने पवित्र आत्मा के प्रभाव से कहा, "आप मसीह हैं"। येसु चाहते थे कि शिष्य आगे यह भी समझ लें कि मसीह के लिए दुख और मृत्यु आवश्यक है। शैतान येसु को अपने क्रूस से हटाने की हर संभव कोशिश कर रहा था। इस प्रकार वह स्वर्गिक पिता की योजना को बिगाड़ना चाहता था। प्रभु येसु चाहते है कि पेत्रुस और उसके साथी बुराई के संकेतों के बारे में सतर्क रहें और जहां भी शैतान खुद को प्रस्तुत करता है, वहाँ वे उसका विरोध करें।

- -फादर फ्रांसिस स्करिया


REFLECTION

Caesarea Philippi was a politically, historically and religiously important town. The name of the town itself reminds us of great political figures. Historically too Caesarea Philippi was an important place. It was a town of a number of temples and shrines. It is in this place that Jesus wanted his disciples to express what they had understood about him. Some people thought that John the Baptist who had been beheaded had come back to life. Some thought that Elijah the Prophet who had been taken up in the fiery chariot had come back to life. Some believed Jesus to be a prophet. But under the influence of the Spirit of the Living God Peter proclaimed, “You are the Christ”. Jesus wanted the disciples to understand further that suffering and death were essential for the Christ. The devil would have liked to divert Jesus from his cross, and thereby spoil the plan of the Heavenly Father to redeem humanity. Jesus wants Peter and his companions to be alert about the promptings of the evil one and resist him wherever he presents himself.

- Fr. Francis Scaria