
प्रभु की वाणी यह कहते हुए सुनाई दी जाओ और येरुसालेम को यह संदेश सुनाओ। प्रभु यह कहता है : मुझे तेरी जवानी की भक्ति याद है, जब तुम मुझे नववधू की तरह प्यार करती थी। तू मरुभूमि में, बंजर भूखंड में, मेरे पीछे-पीछे चलती थी। उस समय इस्राएल प्रभु की अपनी पवित्र वस्तु था, उसकी फसल के प्रथम फल। जो उस में से कुछ लेने का साहस करते थे, उन्हें दण्ड दिया जाता था, उन पर विपत्ति आ पड़ती थी। मैं तुम लोगों को एक उपजाऊ भूमि में ले आया। मैंने तुम्हें उसके उत्तम फलों से तृप्त किया। किन्तु तुम लोगों ने उस में प्रवेश करते हुए अपवित्र कर दिया, जिससे मुझे अपनी विरासत से घृणा हो गयी है। याजकों को प्रभु की कोई चिन्ता नहीं थी। संहिता के शास्त्री मेरी कोई परवाह नहीं करते थे। शासक मेरे विरुद्ध विद्रोह करते थे। नबी बाल के नबी बन कर ऐसे देवताओं के अनुयायी हो जाते थे, जिन से कोई लाभ नहीं। सोलहवाँ सप्ताह - शुक्रवार 507 यह प्रभु की वाणी है - आकाश इस पर आश्चर्य करे और विस्मित हो कर काँप उठे। मेरी प्रजा ने दो अपराध कर डाले : उसने मुझे, संजीवन जल के स्रोत को त्याग दिया और अपने लिए ऐसे कुण्ड बनाये, जिन में दरारें हैं और जिन में पानी नहीं ठहरता।
प्रभु की वाणी।
अनुवाक्य : हे प्रभु ! तू ही हमारे जीवन का स्त्रोत है।
1. हे प्रभु ! तेरा प्रेम स्वर्ग तक फैला हुआ है, आकाश की तरह ऊँची है तेरी सत्यप्रतिज्ञता। ऊँचे पर्वतों के सदृश है तेरा न्याय, अथाह समुद्र के सदृश तेरे निर्णय।
2. हे ईश्वर ! कितना अपार है तेरा प्रेम ! मनुष्यों को तेरे पंखों की छाया में शरण मिलती है। तू उन्हें अपने घर की सम्पत्ति से तृप्त करता और अपने आनन्द की नदी का जल पिलाता है।
3. तू ही हमारे जीवन का स्रोत है, तेरी ही ज्योति हमें आलोकित करती है। तू अपने भक्तों के प्रति अपना प्रेम और धर्मियों पर अपनी कृपा बनाये रख।
अल्लेलूया ! हे पिता ! हे स्वर्ग और पृथ्वी के प्रभु! मैं तेरी स्तुति करता हूँ, क्योंकि तूने राज्य के रहस्यों को निरे बच्चों के लिए प्रकट किया है। अल्लेलूया !
शिष्यों ने आ कर येसु से कहा, "आप क्यों लोगों को दृष्टान्तों में शिक्षा देते हैं?" उन्होंने उत्तर दिया, "यह इसलिए है कि स्वर्गराज्य का भेद जानने का वरदान तुम्हें दिया गया है, उन लोगों को नहीं। क्योंकि जिसके पास कुछ है, उसी को और दिया जायेगा और उसके पास बहुत हो जायेगा। लेकिन जिसके पास कुछ नहीं है, उस से वह भी ले लिया जायेगा, जो उसके पास है। मैं उन्हें दृष्टान्तों में शिक्षा देता हूँ, क्योंकि वे देखते हुए भी नहीं देखते और सुनते हुए भी न तो सुनते और न समझते हैं। इसायस की यह भविष्यवाणी उन लोगों पर पूरी उतरती है - तुम सुनते रहोगे, परन्तु नहीं समझोगे। तुम देखते रहोगे, परन्तु तुम्हें नहीं दीखेगा। क्योंकि इन लोगों की बुद्धि मारी गई है। ये कानों से सुनना नहीं चाहते; इन्होंने अपनी आँखों को बन्द कर लिया है। कहीं ऐसा न हो कि ये आँखों से देख लें, कानों से सुन लें, बुद्धि से समझ लें, मेरी ओर लौट आयें और मैं इन्हें भला-चूँगा कर दूँ। "परन्तु धन्य हैं तुम्हारी आँखें, क्योंकि वे देखती हैं और धन्य हैं तुम्हारे कान, क्योंकि वे सुनते हैं ! मैं तुम लोगों से कहे देता हूँ - तुम जो बातें देख रहे हो, उन्हें कितने ही नबी और धर्मात्मा देखना चाहते थे; परन्तु उन्होंने उन को देखा नहीं और तुम जो बातें सुन रहे हो, वे उन को सुनना चाहते थे, परन्तु उन्होंने उनको सुना नहीं।"
प्रभु का सुसमाचार।
स्वर्ग के रहस्य
हम देखते है कि, सर्वप्रथम येसु ने भीड़ के साथ दृष्टान्तों में बात की, इसके बाद अपने शिष्यों से स्पष्ट और सीधे रूप से बात की। दृष्टांत का एक लक्ष्य है किसी को सोचने के लिए मजबूर करना। यह उन्हें आकर्षित करने का एक माध्यम है ताकि वे अपने मन को उस वचन के साथ जोड़ सकें जो बोला गया था। दृष्टांतों के मुख्य रूप से दो उद्देश्य हो सकते है- सुनने वाले के दिल को उजागर करना और भविष्यवाणी को पूर्ण करना। जब कोई सत्य के लिए खुला होता है, जैसे की शिष्यगण, तब येसु स्वर्ग राज्य के रहस्यों का ज्ञान हमें विश्वास की एक अद्भुत यात्रा शुरू करने में अवश्य मदद करेगी। ईश्वर के वचनों के प्रति मेरा क्या मनोभाव हैं?
✍ - फादर अल्फ्रेड डिसूजा
The Mysteries of Heaven
First of all, we see that Jesus spoke in parables to the crowds but spoke clearly and directly to his disciples. To speak plainly here, what Jesus is saying is that some people are simply more open to the truth than others. When someone is not open, Jesus is limited and, thus, he must speak in parables. One of the goals of a parable is to get someone thinking. It’s a way of drawing them so that they can engage their minds with the Word that was spoken. The two purposes of the parables could be - To expose the heart of the hearer and to fulfill prophecy. When someone is open to the Truth, such as the disciples, Jesus is able to lift the veil and speak clearly, deeply and beautifully about the mysteries of the Kingdom of Heaven. This must be our goal. Proper understanding of the mysteries of Heaven will help us begin a wonderful journey of faith. What is my disposition to the Word of God?
✍ -Fr. Alfred D’Souza
प्रभु येसु ने स्वर्गिक रहस्यों को स्पष्ट करने के लिए साधारण सांसारिक जीवन की कहानियों और घटनाओं का उपयोग किया। उन्होंने मछली पकड़ने, खेती, चरवाहे, निर्माण-कार्य और शासन के बारे में बात की। उन्होंने बीज, फूल, पक्षी, रोटी, दाखबारी, भोज, यात्रा आदि का जिक्र किया। जो लोग गहराई में जाने की जहमत नहीं उठाते थे, उनके लिए ये बातें सामान्य कहानियाँ और घटनाएँ थीं। लेकिन जो लोग छिपे हुए रहस्यों को सीखने में रुचि रखते थे, उनके लिए वे साधारण कहानियों में प्रस्तुत किए गए शाश्वत सत्य थे। रहस्यों को समझने के लिए कई परतें हैं। केवल उन लोगों के लिए जो इन रहस्यों को गहराई से समझने में रुचि रखते हैं, स्पष्टीकरण सार्थक होंगे। येसु द्वारा सुनाये गये दृष्टान्त और उनके स्पष्टीकरणों को सुनने वाले शिष्य भाग्यशाली थे। ईश्वरीय रहस्य अक्षय हैं। जितना अधिक आप ध्यान-मनन् करते हैं, उतना ही आप समझ पाते हैं। आप जितना गहराई में जाते हैं, आपको हर बार अधिक ज्ञान मिलता है। हर बार आप सीखते हैं, तो आप महसूस करते हैं कि आपके पास सीखने के लिए बहुत कुछ है। पुराने विधान में नये विधान की घटनाओं की छाया है। नये विधान में पुराना विधान पूरा हो गया है। इसलिए येसु ने अपने शिष्यों से कहा, “धन्य हैं तुम्हारी आँखें, क्योंकि वे देखती हैं और धन्य हैं तुम्हारे कान, क्योंकि वे सुनते हैं! मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ - तुम जो बातें देख रहे हो, उन्हें कितने ही नबी और धर्मात्मा देखना चाहते थे; परन्तु उन्होंने उन्हें नहीं देखा और तुम जो बातें सुन रहे हो, वे उन्हें सुनना चाहते थे, परन्तु उन्होंने उन्हें नहीं सुना।” (मत्ती 13: 16-17)। ईश्वर का देहधारण इतिहास की सबसे महान तथा अनोखी घटना थी। स्वाभाविक रूप से, जिन्होंने उस घटना को देखा और महसूस किया, वे सौभाग्यशाली हैं। यह रहस्य हमारे सामने है। यह सदा के लिए महत्व रखता है। हम इस रहस्य के सामने निष्क्रिय नहीं हो सकते हैं।
✍ -फादर फ्रांसिस स्करिया
Jesus used stories and events from ordinary earthly life to elucidate heavenly mysteries. He spoke about fishing, farming, shepherding, building and governing. He referred to seeds, flowers, birds, bread, vineyards, banquets, journey and so forth. For those who did not bother to go deeper, they were ordinary stories and events. But for those who were interested in learning the hidden mysteries, they were eternal truths presented in ordinary stories. Mysteries have many layers to understand. Only for those who are interested in delving deep into these mysteries, the explanations will be meaningful. The disciples were fortunate to listen to the parables narrated by Jesus and their explanations. The divine mysteries are inexhaustible. The more you meditate, the more you grasp. The deeper you go, you find greater wisdom every time. Every time you learn, you realise that you have much more to learn. In the Old Testament we have shadows of many New Testament events. Hence the Old Testament is fulfilled in the New. That is why Jesus told his disciples, “But blessed are your eyes, for they see, and your ears, for they hear. Truly I tell you, many prophets and righteous people longed to see what you see, but did not see it, and to hear what you hear, but did not hear it.” (Mt 13:16-17). Incarnation was a unique event in history and the greatest. Naturally, those who witnessed that event and realized its significance were fortunate. We have this mystery revealed to us in history with the testimony of those who heard, saw and touched the Incarnate Word or the Word made flesh or God in human form. It has implications for all times to come. We cannot be inactive in the face of this mystery.
✍ -Fr. Francis Scaria