
प्रिय भाइयो ! आप मूर्तिपूजा से दूर रहें। मैं आप लोगों को समझदार समझ कर यह कह रहा हूँ, आप स्वयं मेरी बातों पर विचार करें। क्या आशिष का वह प्याला, जिस पर हम आशिष की प्रार्थना पढ़ते हैं, हमें मसीह के रक्त के सहभागी नहीं बनाता? क्या वह रोटी, जिसे हम तोड़ते हैं, हमें मसीह के शरीर के सहभागी नहीं बनाती? रोटी तो एक ही है, इसलिए अनेक होने पर भी हम एक हैं; क्योंकि हम सब एक ही रोटी के सहभागी हैं। इस्राएलियों को देखिए ! क्या बलि खाने वाले वेदी के सहभागी नहीं हैं? मैं यह नहीं कहता कि देवता को चढ़ाये हुए मांस की कोई विशेषता है अथवा यह कि देवमूर्ति का कुछ महत्त्व है। किन्तु धर्मग्रन्थ के अनुसार गैरयहूदियों के बलिदान ईश्वर को नहीं, बल्कि अपदूतों को चढ़ाये जाते हैं। मैं यह नहीं चाहता कि आप लोग अपदूतों के सहभागी बनें। आप प्रभु का प्याला और अपदूतों का प्याला, दोनों नहीं पी सकते । आप प्रभु की मेज और अपदूतों की मेज, दोनों के सहभागी नहीं बन सकते । क्या हम प्रभु को चुनौती देना चाहते हैं? क्या हम उस से बलवान् हैं?
प्रभु की वाणी।
अनुवाक्य : हे प्रभु ! मैं तुझे धन्यवाद का बलिदान चढ़ाऊँगा । (अथवा : अल्लेलूया !)
1. प्रभु के सब उपकारों के लिए मैं उसे क्या दे सकता हूँ? मैं मुक्ति का प्याला उठा कर प्रभु का नाम लूँगा।
2. मैं प्रभु का नाम लेते हुए धन्यवाद का बलिदान चढाऊँगा, प्रभु की सारी प्रजा के सामने प्रभु के लिए अपनी मन्नतें पूरी करूँगा ।
अल्लेलूया ! यदि कोई मुझे प्यार करेगा, तो वह मेरी शिक्षा पर चलेगा। मेरा पिता उसे प्यार करेगा और हम उसके पास आ कर उस में निवास करेंगे। अल्लेलूया !
प्रभु का सुसमाचार।
येसु ने अच्छे जीवन के बारे में अपनी सीख पर जोर देने के लिए सही एवं मजबूत नींव पर निर्माण के महत्व के बारे में बताया। हमारे लिए कहानी का क्या महत्व है? जिस तरह की नींव पर हम अपने जीवन का निर्माण करते हैं, वह निर्धारित करेगा कि हम आने वाले तूफानों से बच सकते हैं या नहीं। बिल्डर्स आमतौर पर अपनी नींव तब रखते हैं जब मौसम और मिट्टी की स्थिति सबसे अच्छी होती है। यह जानने के लिए दूरदर्शिता की जरूरत है कि प्रतिकूल परिस्थितियों के खिलाफ एक नींव कैसे खड़ी होगी। बाढ़ की आशंका वाले क्षेत्र में घर बनाना एक आपदा के लिए एक निश्चित निमंत्रण है! हालाँकि, ईश्वर के वचन पर एक घर बनाना तूफान-मुक्त जीवन की गारंटी नहीं देता है, बल्कि एक ठोस जीवन की गारंटी देता है जो तूफान के दबाव और विनाश का सामना करेगा। नीतिवचन 10:25 हमें याद दिलाता है, "तूफान के आने से दुष्ट चले जाते हैं, परन्तु धर्मी सदा स्थिर रहते हैं।"
हम प्रार्थना करे कि प्रभु हमारे लिए निश्चित आधार और जीवन और शक्ति का स्रोत बनें। हमारे पास उसकी सच्चाई के अनुसार जीने और हर झूठे रास्ते को अस्वीकार करने की बुद्धि और ताकत हो। हम उसके वचन पर चलने वाले बनें, केवल सुनने वाले नहीं?
✍ - फादर रोनाल्ड वाँन
Jesus told the story about the importance of building on the right foundation to emphasize his lesson about sound living. What's the significance of the story for us? The kind of foundation we build our lives upon will determine whether we can survive the storms that are sure to come. Builders usually lay their foundations when the weather and soil conditions are at their best. It takes foresight to know how a foundation will stand up against adverse conditions. Building a house on a flood prone area, is a sure invitation to a disaster! However, building house on the word of God does not guarantee storm free life but a solid life that will withstand the pressure and destruction of a storm. Proverbs 10:25 reminds us, “When the storm has swept by, the wicked are gone, but the righteous stand firm for ever.”
Let our prayer be that the Lord be the sure foundation and source of life and strength for us. We may have the wisdom and strength to live according to his truth and to reject every false way. May we be the doer of his word and not a hearer only."
✍ -Fr. Ronald Vaughan