
योब ने अपने मित्रों से यह कहा, "मैं निश्चित रूप से जानता हूँ कि तुम लोगों का कहना सच है। मनुष्य अपने को ईश्वर के सामने निर्दोष प्रमाणित नहीं कर सकता । यदि वह ईश्वर के साथ बहस करना चाहेगा, तो ईश्वर हजार प्रश्नों में से एक का भी उत्तर नहीं देगा। ईश्वर सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान् है- कौन मनुष्य उसका सामना करने के बाद जीवित रहा? ईश्वर पर्वतों को अचानक हटा देता और अपने क्रोध में उलटा देता है। वह पृथ्वी को उसके स्थान से खिसकाता और उसके खंभों को हिला देता है। वह नक्षत्रों को ढाँकता और उसके आदेश पर सूर्य दिखाई नहीं देता। वह अकेला ही आकाश फैलाता और समुद्र की लहरों पर चलता है। उसने सप्तर्षि, मृग, कृत्तिका, और दक्षिण नक्षत्रों की सृष्टि की है। वह महान् एवं रहस्यमय कार्य सम्पन्न करता और असंख्य चमत्कार दिखाता है।" वह मेरे पास आता है और मैं उसे नहीं देखता; वह आगे बढ़ता है और मुझे इसका पता नहीं चलता। जब वह कुछ ले जाता है, तो कौन उसे रोकेगा; कौन उस से कहेगा- "तू यह क्या कर रहा है?" मैं उस को जवाब कैसे दे सकता हूँ? उस से बहस करने के लिए मुझे कहाँ से शब्द मिलेंगे? यदि मेरा पक्ष न्यायसंगत है और मैं न्यायकर्त्ता से दया-याचना करता हूँ; तब भी मुझे उत्तर 'नहीं मिलता। यदि वह मेरी दुहाई का उत्तर देता, तो मुझे विश्वास नहीं होता कि वह मेरी प्रार्थना पर ध्यान देता है।
प्रभु की वाणी।
अनुवाक्य : हे प्रभु ! मेरी प्रार्थना तेरे पास पहुँचे ।
1. मैं दिन भर तेरी दुहाई देता हूँ, मैं तुझे हाथ जोड़ता हूँ। क्या तू मृतकों के लिए चमत्कार दिखाता है? क्या मृतक उठ कर तेरी स्तुति करते हैं?
2. क्या कब्र में तेरे प्रेम की चरचा होती है? क्या अधोलोक में तेरी सत्यप्रतिज्ञता का बखान होता है? क्या लोग मृत्यु की छाया में तेरे चमत्कार और विस्मृति के गर्भ में तेरी न्यायप्रियता जानते हैं?
3. हे प्रभु! मैं तेरी दुहाई देता हूँ, मैं प्रतिदिन प्रातःकाल तुझ से प्रार्थना करता हूँ। तू मुझे क्यों त्याग देता है? तू मुझ से क्यों मुँह फेर लेता है?
अल्लेलूया ! मैंने सब कुछ छोड़ दिया है और उसे कूड़ा समझता हूँ, जिससे मैं मसीह को प्राप्त करूँ और उनके साथ सम्पूर्ण रूप से एक हो जाऊँ । अल्लेलूया !
येसु अपने शिष्यों के साथ यात्रा कर रहे थे कि रास्ते में ही किसी ने उन से कहा, "आप जहाँ कहीं भी जायेंगे, मैं आपके पीछे-पीछे चलूँगा ।" येसु ने उसे उत्तर दिया, "लोमड़ियों की अपनी माँदें हैं और आकाश के पक्षियों के अपने घोसले, परन्तु मानव पुत्र के लिए सिर रखने को भी अपनी जगह नहीं है।" उन्होंने किसी दूसरे से कहा, "मेरे पीछे चले आओ।" परन्तु उसने उत्तर दिया, "प्रभु ! मुझे पहले अपने पिता को दफनाने के लिए जाने दीजिए।" येसु ने उस से कहा, "मुरदों को अपने मुरदे दफनाने दो। तुम जा कर ईश्वर के राज्य का प्रचार करो।" फिर कोई दूसरा बोला, "प्रभु ! मैं आपका अनुसरण करूँगा, परन्तु मुझे अपने घर वालों से विदा लेने दीजिए।" येसु ने उस से कहा, "हल की मूठ पकड़ने के बाद जो मुड़ कर पीछे देखता है, वह ईश्वर के राज्य के योग्य नहीं।"
प्रभु का सुसमाचार।
हमारा समय, ध्यान और दिल किन बातो के बारे में सबसे ज्यादा सोचता है? लाजरूस और अमीर आदमी के दृष्टांत में येसु ने जीवन के दर्दनाक, नाटकीय पहलुओं और इसके विरोधाभासों को इंगित किया है - धन और गरीबी, स्वर्ग और नरक, करुणा और उदासीनता, समावेश और बहिष्कार।
इन दोनों के जीवन में अचानक और नाटकीय उलटफेर भी होता है। लाजरूस न केवल गरीब था बल्कि अक्षम भी था। ऐसा कहा जाता है कि उन्हें अमीर आदमी के घर के द्वार पर "लेटा" दिया जाता था। जो कुत्ते उसके घावों को चाटते थे, वे शायद अपने लिए मिली छोटी-सी रोटी भी उससे छीन कर खा लेते थे। वह बहुत ही दयनीय जीवन व्यतीत कर रहा था। अमीर आदमी का भिखारी के प्रति रवैया तब तक उदासीन रहा जब तक कि उसने अपनी किस्मत को उलट नहीं पाया! दुर्भाग्य और पीड़ा के जीवन के बावजूद, लाजरूस ने परमेश्वर में आशा नहीं खोई। उसकी नज़र स्वर्ग में उसके लिए जमा किए गए ख़ज़ाने पर टिकी थी। हालाँकि, धनी व्यक्ति अपने सांसारिक खजाने से आगे नहीं देख सकता था। उसके पास न केवल वह सब कुछ था जिसकी उसे आवश्यकता थी, बल्कि वह अपने एशो आराम में भी लिप्त था। वह अपनी विलासिता की पार्टियों में इतना अधिक व्यस्त था कि उसने अपने आसपास के लोगों की जरूरतों पर कभी ध्यान नहीं दिया। उसने ईश्वर और स्वर्ग के खजाने पर से अपनी दृष्टि खो दी क्योंकि वह भौतिक चीजों में खुशी तलाशने में व्यस्त था। उसने ईश्वर के बजाय धन की सेवा की। आखिर में अमीर भिखारी बन गया ! क्या हम ईश्वर को अपने एकमात्र खजाने के रूप में रखने के आनंद और स्वतंत्रता को जानते हैं? भला प्रभु उनके लिए और उनकी खुशी के तरीकों के लिए हमारी भूख को बढ़ाए। वह हमें स्वर्ग की वस्तुओं में धनी बना दे और हमें एक उदार हृदय प्रदान करे कि हम उस खजाने को दूसरों के साथ स्वतंत्र रूप से साझा कर सकें जो उसने हमें दिया है।
✍ - फादर रोनाल्ड वाँन
What most occupies our time, attention, and our heart? In the parable of Lazarus and the rich man Jesus points out painful yet dramatic aspects of life and its contrasts -- riches and poverty, heaven and hell, compassion and indifference, inclusion and exclusion.
There also comes an abrupt and dramatic reversal of fortune. Lazarus was not only poor but incapacitated. It is said that he was "laid" at the gates of the rich man's house. The dogs which licked his sores probably also stole the little bread he got for himself. He was living in a very miserable state of life. The rich man’s attitude towards the beggar was indifferent until he found his fortunes reversed! Despite a life of misfortune and suffering, Lazarus did not lose hope in God. His eyes were set on a treasure stored up for him in heaven. The rich man, however, could not see beyond his material treasure. He not only had everything he needed, but he also indulged in his wealth. He was too much preoccupied with his pleasure parties that he never noticed the needs of those around him. He lost sight of God and the treasure of heaven because he was preoccupied with seeking happiness in material things. He served wealth rather than God. In the end, the rich man became a beggar! Do we know the joy and freedom of possessing God as our only treasure? May the good Lord increase our hunger for him and for his ways of happiness. May he make us rich in the things of heaven and give us a generous heart that we may freely share with others the treasure he has given to us
✍ -Fr. Ronald Vaughan
आज के सुसमाचार में, येसु घोषणा करते हैं कि एक बार उनका अनुसरण करने के लिए हाँ कहने के बाद जो पीछे मुड़कर देखता है वह उनके लिए, ईश्वर के राज्य के लिए उपयुक्त है। किसान का हल चलाते समय पीछे मुड़कर देखना याने यह चेक करना कि उसकी लाईन सीधी है या नहीं अथवा हल कितना गहरा जा रहा है आदि। बुलाहट के सन्दर्भ में पीछे मुड़कर देखने का आशय सबसे पहले तो अपने लक्ष्य याने येसु के अनुसरण से निगाहें हटाकर अपने पुराने सांसारिक जीवन की और लौटना होगा। इसके अलावा इसका आशय, अपने अतीत को देखना या फिर अपनी क्षमता को आंकना होगा। किसान का हल सीधी लाईन में तब चलेगा जब वह आगे देखकर हल चलाएगा पीछे देखकर नहीं। जो भी पीछे छूटजाना है। गया है उसके ख्यालों में रहने से येसु का अनुसरण नहीं होता। येसु जिसे अपना शिष्य हैं उसके अतीत को, अतीत की कड़वी यादों को, बुराई की राहों को वे ठीक करते हैं। हमें उसकी चिंता करने की ज़रूरत नहीं। हमें तो अपनी निगाहे येसु पर लगाकर उनकी राहों पर चलते जाना है। वो जैसा दिशा निर्देश अपने वचनों द्वारा हमें देते हैं उनका पालन करते हुए नित आगे बढ़ते रहना है। तभी हम सच्चे अर्थों में उनके शिष्य कहलायेंगे।
✍ - फादर प्रीतम वसुनिया (इन्दौर धर्मप्रांत)
In today's gospel, Jesus tells us he who decides to follow Him and looks back is not fit for Him, and the kingdom of God. While ploughing the farmer, looks back and checks whether his line is straight or not, or how deep the plow is going. In the context of the call, the intention of looking back, first of all, will be to return to one’s old worldly life and not focusing his eyes on Christ. Apart from this, it means to look at your past or to evaluate your own potential. The plow of the farmer will run in a straight line only when he sees the plow by looking forward and not by looking back. Jesus does not call us by looking at our past. In the Bible we see a God who calls the weak, the sinners and the incapables and He heals their past; He transforms them and makes them capable. So in following Jesus we don’t need to look back and brood over our past. We need to look at Jesus and keep marching with Him on the way of Salvation. Only then will we be called his disciples in a true sense.
✍ -Fr. Preetam Vasuniya (Indore Diocese)