
इसके बाद मैं-योहन-ने देखा कि सिंहासन पर विराजमान के दाहिने हाथ में एक लपेटी हुई पुस्तक है, जिस पर दोनों ओर लिखा हुआ है और जिसे सात मोहरें लगा कर बन्द कर दिया गया है। और मैंने एक शक्तिशाली स्वर्गदूत को देखा, जो ऊँचे स्वर से पुकार रहा है, "पुस्तक खोलने और उसकी मोहरें तोड़ने योग्य कौन है? " किन्तु स्वर्ग में पृथ्वी पर या पृथ्वी के नीचे कोई ऐसा व्यक्ति नहीं मिला, जो पुस्तक खोलने या पढ़ने में समर्थ हो। मैं फूट-फूट कर रोने लगा, क्योंकि पुस्तक खोलने या पढ़ने योग्य कोई नहीं मिला। इस पर वयोवृद्धों में से एक ने मुझ से कहा, "मत रोओ! देखो यूदा-वंशी सिंह, दाऊद की सन्तति ने विजय पायी है। वह पुस्तक और उसकी मोहरें खोलने योग्य है।" तब मैंने सिंहासन के पास के चार प्राणियों और वयोवृद्धों के बीच खड़े एक मेमने को देखा। वह मानो वध किया हुआ था। उसके सात सींग और सात नेत्र थे ये ईश्वर के सात आत्मा हैं, जिन्हें ईश्वर ने सारी पृथ्वी पर भेजा है। तब मेमने ने पास आ कर सिंहासन पर बैठने वाले के दाहिने हाथ से पुस्तक ले ली। जब मेमना पुस्तक ले चुका, तो चार प्राणी तथा चौबीस वयोवृद्ध मेमने के सामने गिर पड़े। प्रत्येक वयोवृद्ध के हाथ में वीणा थी और धूप से भरे स्वर्ण पात्र भी ये सन्तों की प्रार्थनाएँ हैं। वे यह कहते हुए एक नया गीत गा रहे थे, "तू पुस्तक ग्रहण कर उसकी मोहरें खोलने योग्य है; क्योंकि तेरा वध किया गया है। तूने अपना रक्त बहा कर ईश्वर के लिए प्रत्येक वंश, भाषा, प्रजा और राष्ट्र के मनुष्यों को खरीद लिया है। तूने उन्हें हमारे ईश्वर की दृष्टि में याजकों का राजवंश बना दिया है और वे पृथ्वी पर राज्य करेंगे।"
प्रभु की वाणी।
अनुवाक्य : तूने हमें ईश्वर की दृष्टि में याजकों का राजवंश बना दिया है। (अथवा : अल्लेलूया!)
प्रभु के आदर में नया गीत गाओ, भक्तों की मण्डली में उसकी स्तुति करो। इस्राएल अपने सृष्टिकर्ता में आनन्द मनाये। सियोन के पुत्र अपने राजा की जयकार करें।
वे नृत्य करते हुए उसका नाम धन्य कहें, डफलीं और सितार बजाते हुए उसकी स्तुति करें; क्योंकि प्रभु अपनी प्रजा को प्यार करता और पददलितों का उद्धार करता है।
प्रभु के भक्त विजय के गीत सुनायें और अपने यहाँ आनन्द मनायें। वे ईश्वर की स्तुति करते रहें। इस में सभी सन्तों का गौरव है।
अल्लेलूया! आज अपना हृदय कठोर न बनाओ, प्रभु की वाणी पर ध्यान दो। अल्लेलूया!
येरुसालेम के निकट पहुँचने पर येसु ने शहर को देखा। वह उस पर रो पड़े और बोले, "हाय! कितना अच्छा होता यदि तू भी इस शुभ दिन यह समझ पाता कि किन बातों में तेरी शांति है। परन्तु अभी वे बातें तेरी आँखों में छिपी हुई हैं। तुझ पर वे दिन आयेंगे जब तेरे शत्रु तेरे चारों ओर मोरचा बांधकर तुझे घेर लेंगे, चारों ओर से तुझ पर दबाव डालेंगे, तुझे और तेरे अन्दर रहने वाली तेरी प्रजा को मटियामेट कर देंगे और तुझ में एक पत्थर पर दूसरा पत्थर पड़ा नहीं रहने देंगे, क्योंकि तूने अपने प्रभु के आगमन की, शुभ घड़ी को नहीं पहचाना।”
प्रभु का सुसमाचार।
प्रिय भाइयों और बहनों, आज का सुसमाचार प्रभु येसु के जीवन का एक बहुत मार्मिक दृश्य हमारे सामने रखता है। जब प्रभु येसु यरूसलेम के निकट पहुँचते हैं, तो वे उस नगर को देखकर रोते हैं। उनके आँसू मानवता के प्रति ईश्वर के गहरे प्रेम को प्रकट करते हैं। प्रभु जानते हैं कि लोगों ने ईश्वर के आने के समय को नहीं पहचाना और इसी कारण वे आने वाली पीड़ा से दुखी हैं। प्रभु येसु लोगों को शांति देना चाहते हैं, लेकिन लोगों ने उन्हें पहचानने से इनकार कर दिया। यह सुसमाचार हमें याद दिलाता है कि ईश्वर लगातार हमारे जीवन में आते हैं। वे पवित्र वचन, प्रार्थना, किसी व्यक्ति, किसी कठिन परिस्थिति, किसी सलाह या किसी छोटी-सी घटना के द्वारा हमसे बात कर सकते हैं। प्रश्न यह है कि क्या हम उनकी उपस्थिति को पहचानते हैं। कई बार हमारा हृदय अपनी योजनाओं, चिंताओं और इच्छाओं से इतना भरा रहता है कि हम ईश्वर की कोमल आवाज को सुन नहीं पाते। आज प्रभु हमें कुछ समय रुककर अपने जीवन को देखने के लिए बुलाते हैं। ईश्वर मुझे किस दिशा में ले जाना चाहते हैं? वे मुझसे क्या बदलने के लिए कह रहे हैं? क्या कोई ऐसी बात है जिसका मैं विरोध कर रहा हूँ? शायद प्रभु हमें किसी को क्षमा करने, प्रार्थना में लौटने, अधिक उदार बनने या किसी के साथ मेल-मिलाप करने के लिए बुला रहे हैं। आइए, जीवन की व्यस्तता में ईश्वर की उपस्थिति को न खोएँ। हमारा हृदय उनकी आवाज सुनने वाला और उनके बुलावे का उत्तर देने वाला बने।
-✍फादर कपिल देव (ग्वालियर धर्मप्रान्त)Dear brothers and sisters, today’s Gospel presents us with a very touching moment in the life of Jesus. As He approaches Jerusalem, Jesus looks at the city and weeps over it. His tears reveal the depth of God’s love for humanity. Jesus knows the suffering and destruction that will come because the people have failed to recognize the time of God’s visitation. He desires to bring them peace, but they have not recognized Him. This Gospel reminds us that God continually comes into our lives. He may speak to us through Scripture, prayer, another person, a difficult experience, a word of advice or even through an unexpected situation. The question is whether we recognize His presence. Sometimes our hearts are so occupied with our own plans, worries and desires that we fail to hear God’s gentle voice. We may know many things about God but still fail to recognize Him working in our daily lives. Today Jesus invites us to stop for a moment and look at our lives with faith. Where is God trying to lead me? What is He asking me to change? Is there something I have been resisting? Perhaps God is inviting us to forgive someone, return to prayer, become more generous or make peace with another person. Let us not allow the busyness of life to make us miss the presence of God. May our hearts become attentive to His voice and ready to respond whenever He visits us.
-✍ Fr. Kapil Dev (Gwalior Diocese)
संत लूकस के सुसमाचार में जब येसु येरुसालेम की यात्रा पर थे, वहॉं पर जैतून पहाड़ पर रुककर येसु ने पूरा शहर को देखा और रो पड़े। वे रो पड़े क्योंकि येरुसालेम के लोंगों यह नहीं समझ पायें कि किस प्रकार उनको और उनके बच्चों को शांति प्राप्त हो सकती थी। वे रोते हैं क्योंकि अगर वे पहचान जाते कि वह कौन हैं, और उनकी शिक्षाओं पर चलते तो येसु उन्हें शांति की प्राप्त करते।
येसु यह पहचानकर कि वेे अपने ह्दय में अहिंसा को ही अपनायेंगे, येरुसालेम शहर के सर्वनाश की भविष्यवाणी करते है। और यह भविष्यवाणी सन् 70 में पूरी होती है जब रोमी साम्राज्य येरुसालेम शहर को तबाह कर देते हैं। ये सब उनका हिंसात्मक प्रतिक्रिया के कारण हुआ। परंतु उन्होने अगर शांति का मार्ग अपनाया होता तो वे अपना शहर एवं मंदिर को सर्वनाश होने से बचा सकते थे।
येसु येरुसालेम पर विलाप करते हैं क्योकि उन्होंने उनसे मिलने वाली शांति को छोड़ हिंसा का मार्ग को चुना। ठीक उसी प्रकार येसु हमारे लिए भी विलाप करते है जब हम भी उसी प्रकार का मार्ग चुनते हैं। प्रभु का रुदन हमें यह बताना चाहता हैं कि येसु कितना चाहते है कि हम उनके शांति में जीवन बिताये। प्रभु येसु किस प्रकार की शांति के विषय में बताना चाहते है? यह शांति का मतलब केवल युद्ध का न होना ही नहीं, परंतु हर और किसी प्रकार का हिंसा का न होना है। यह है शालोम, जो सामाजिक, रिश्तेदारी तथा आध्यात्मिकता में पूर्ण भलाई है। यह शांति सब समझ से परे है- वह शांति जो संसार कभी नहीं दे सकता। यह प्रेम और न्याय का शांति हैं जहॉं पर सभी लोग बिना डर, बिना तिरस्कार और बिना किसी प्रकार के हिंसा के साथ जी सकते हैं। और यह शांति केवल शांति के राजकुमार येसु से ही मिल सकती है। आईये हम उस शांति को पाने के लिए प्रभु येसु से प्रार्थना करें। आमेन!
- - फादर डेन्नीस तिग्गा (भोपाल महाधर्मप्रान्त)
In Luke’s Gospel, as Jesus processes towards Jerusalem, he stops on the Mount of Olives and overlooks the city and he weeps. He weeps because they do not understand what would bring peace to them and their children. He weeps because, if they had just recognized who he was, and followed his teachings; he could have led them to peace.
Jesus recognizing that they will follow the violence in their hearts, Jesus prophesies about the destruction of the city. This prophecy fulfills in 70 AD when Roman Empire destroyed the Jerusalem city. But, if they had embraced the way of peace, they would have saved the city and the temple from destruction.
Jesus wept over Jerusalem because they refused to receive this peace from him, and they chose, instead, the way of violence. Similarly Jesus still weeps over us when we do the same. The weeping God tells us that how much Jesus longs for us to live in his peace. What is this way of peace that Jesus speaks about? It’s not just the absence of war. It’s the absence of any and all violence. It’s shalom – a word that speaks of well-being, of wholeness socially, relationally, and spiritually. It is the peace that passes understanding – a peace that is not given by the world. It is the peace of love and justice in which all people can live without fear, without rejection, and without any form of violence of all. And it is a peace that can only be received from Jesus, the Prince of Peace. Let’s pray to Jesus that we can receive that peace. Amen!
- Fr. Dennis Tigga (Bhopal Archdiocese)
संत लूकस के सुसमाचार में जब येसु येरुसालेम की यात्रा पर थे, वहॉं पर जैतून पहाड़ पर रुककर येसु ने पूरा शहर को देखा और रो पड़े। वे रो पड़े क्योंकि येरुसालेम के लोंगों यह नहीं समझ पायें कि किस प्रकार उनको और उनके बच्चों को शांति प्राप्त हो सकती थी। वे रोते हैं क्योंकि अगर वे पहचान जाते कि वह कौन हैं, और उनकी शिक्षाओं पर चलते तो येसु उन्हें शांति की प्राप्त करते।
येसु यह पहचानकर कि वेे अपने ह्दय में अहिंसा को ही अपनायेंगे, येरुसालेम शहर के सर्वनाश की भविष्यवाणी करते है। और यह भविष्यवाणी सन् 70 में पूरी होती है जब रोमी साम्राज्य येरुसालेम शहर को तबाह कर देते हैं। ये सब उनका हिंसात्मक प्रतिक्रिया के कारण हुआ। परंतु उन्होने अगर शांति का मार्ग अपनाया होता तो वे अपना शहर एवं मंदिर को सर्वनाश होने से बचा सकते थे।
येसु येरुसालेम पर विलाप करते हैं क्योकि उन्होंने उनसे मिलने वाली शांति को छोड़ हिंसा का मार्ग को चुना। ठीक उसी प्रकार येसु हमारे लिए भी विलाप करते है जब हम भी उसी प्रकार का मार्ग चुनते हैं। प्रभु का रुदन हमें यह बताना चाहता हैं कि येसु कितना चाहते है कि हम उनके शांति में जीवन बिताये। प्रभु येसु किस प्रकार की शांति के विषय में बताना चाहते है? यह शांति का मतलब केवल युद्ध का न होना ही नहीं, परंतु हर और किसी प्रकार का हिंसा का न होना है। यह है शालोम, जोे सामाजिक, रिश्तेदारी तथा आध्यात्मिकता में पूर्ण भलाई है। यह शांति सब समझ से परे है- वह शांति जो संसार कभी नहीं दे सकता। यह प्रेम और न्याय का शांति हैं जहॉं पर सभी लोग बिना डर, बिना तिरस्कार और बिना किसी प्रकार के हिंसा के साथ जी सकते हैं। और यह शांति केवल शांति के राजकुमार येसु से ही मिल सकती है। आईये हम उस शांति को पाने के लिए प्रभु येसु से प्रार्थना करें। आमेन!
- - फादर डेन्नीस तिग्गा
In Luke’s Gospel, as Jesus processes towards Jerusalem, he stops on the Mount of Olives and overlooks the city and he weeps. He weeps because they do not understand what would bring peace to them and their children. He weeps because, if they had just recognized who he was, and followed his teachings; he could have led them to peace.
Jesus recognizing that they will follow the violence in their hearts, Jesus prophesies about the destruction of the city. This prophecy fulfills in 70 AD when Roman Empire destroyed the Jerusalem city. But, if they had embraced the way of peace, they would have saved the city and the temple from destruction.
Jesus wept over Jerusalem because they refused to receive this peace from him, and they chose, instead, the way of violence. Similarly Jesus still weeps over us when we do the same. The weeping God tells us that how much Jesus longs for us to live in his peace. What is this way of peace that Jesus speaks about? It’s not just the absence of war. It’s the absence of any and all violence. It’s shalom – a word that speaks of well-being, of wholeness socially, relationally, and spiritually. It is the peace that passes understanding – a peace that is not given by the world. It is the peace of love and justice in which all people can live without fear, without rejection, and without any form of violence of all. And it is a peace that can only be received from Jesus, the Prince of Peace. Let’s pray to Jesus that we can receive that peace. Amen!
- Fr. Dennis Tigga