स्तोत्र

अध्याय 81

2(1-2) हमारे शक्तिशाली ईश्वर के लिए आनन्द का गीत गाओ। याकूब के ईश्वर का जयकार करो। 3गीत गाओ, डफली बजाओ, सुरीली वीणा और तानपूरा सुनाओ। 4पूर्णिमा के दिन, हमारे उत्सव के दिन, नये मास की तुरही बजाओ। 5यही इस्राएल का विधान है, याकूब के ईश्वर का आदेश है। 6जब वह मिस्र के विरुद्ध उठ खड़ा हुआ, तो उसने यूसुफ़ के लिए यह नियम बनाया। उसने एक अपरिचित वाणी को यह कहते सुना, 7मैंने उनके कन्धों पर से भार उतारा और उनके हाथ टोकरों से मुक्त हो गये। 8तुमने संकट में मेरी दुहाई दी और मैंने तुम को छुड़ाया। मैंने अदृश्य रह कर तुम को मेघ के गर्जन में से उत्तर दिया। मैंने मरीबा के जलाशय के पास तुम्हारी परीक्षा ली। 9"मेरी प्रजा! मेरी चेतावनी पर ध्यान दो! इस्राएल! मेरी बात सुनो! 10तुम्हारे बीच कोई पराया देवता नहीं रहेगा, तुम किसी अन्य देवता की आराधना नहीं करोगे। 11मैं ही तुम्हारा प्रभु-ईश्वर हूँ। मैं तुम्हें मिस्र देश से निकाल लाया। अपना मुँह पूरा-पूरा खोलो और मैं उसे भर दूँगा। 12"मेरी प्रजा ने मेरी वाणी पर ध्यान नहीं दिया, इस्राएल ने मेरी एक भी नहीं मानी। 13इसलिए मैंने उस हठधर्मी प्रजा का परित्याग किया और वह मनमाना आचरण करने लगी। 14ओह! यदि मेरी प्रजा मेरी बात सुनती, यदि इस्राएल मेरे पथ पर चलता, 15तो मैं तुरन्त ही उनके शत्रुओं को नीचा दिखाता और उनके अत्याचारियों पर अपना हाथ उठाता। 16तब ईश्वर के बैरी मेरी प्रजा की चाटुकारी करते और उनकी यह स्थिति सदा के लिए बनी रहती, 17जब मैं इस्राएल को उत्तम गेहूँ खिलाता और उसे चट्टान के मधु से तृप्त करता।"