1जो सदा जीवित रहता है, उसने सब कुछ की सृष्टि की है। वहीं न्यायी है और सदा ही अजेय राजा बना रहता है। 2कौन उसके कार्यो का पूरा वर्णन कर सकता है? 3कौन उसकी महिमा का अनुसन्धान कर सकता है? 4कौन उसके महिमामय सामर्थ्य को घोषित करेगा? कौन उसकी दयालुता का बखान करेगा? 5उन में न तो कुछ घटाया और न कुछ बढ़ाया जा सकता है। प्रभु के चमत्कारों की थाह कोई नहीं ले सकता। 6जहाँ मनुष्य उनके वर्णन का अन्त करता है, वहाँ उनका प्रारम्भ मात्र है। जब वह रूकता है, तो असमंजस में पड़ा रहता है। 7मनुष्य क्या है? वह किस काम का है? उसके अच्छे और बुरे कामों का क्या अर्थ है? 8यदि मनुष्य की आयु एक सौ वर्ष है, तो वह बहुत मानी जाती है; किन्तु अनन्त काल की तुलना में ये थोड़े वर्ष समुद्र में बूँद की तरह, रेतकण की तरह हैं। 9इसलिए प्रभु मनुष्यों के प्रति सहिष्णु है और उन पर अपनी दया बरसाता है। 10वह उनके हृदय के बुरे झुकाव देखता और उनका दुष्ट विरोध जानता है। 11वह उन्हे क्षमा प्रदान करता और धर्ममार्ग दिखाता है। 12मनुष्य अपने पड़ोसी पर ही दया दिखा सकता, किन्तु प्रभु की दया सब शरीरधारियों पर प्रकट होती है। 13जिस तरह चरवाहा अपने झुण्ड का पथ-प्रदर्शन करता, उसी तरह वह मनुष्यों को डाँटता, दण्डित करता और शिक्षा देता है। 14वह उन लोगों पर दया करता है, जो उसकी शिक्षा ग्रहण करते और उसकी आज्ञाओें को उत्सुकता से पालन करते हैं। 15पुत्र! भलाई करते समय किसी को दोष मत दो और दान देते समय कटु शब्द मत बोलो। 16क्या ओस शीतल नहीं करती? इसी प्रकार उपहार से भी अच्छा एक शब्द हो सकता है। 17एक मधुर शब्द महँगे उपहार से अच्छा है। स्नेही मनुष्य एक साथ दोनों को देता है। 18मूर्ख कटु शब्दों से डाँटता है और क्रोधी मनुष्य का उपहार दुःखदायी है। 19निर्णय से पहले वकील का प्रबन्ध करो और बोलने से पहले जानकार बनो। 20बीमारी से पहले दवा का सेवन करो, निर्णय से पहले अपनी ही जाँच करो और जाँच के समय तुम को क्षमा मिलेगी। 21बीमारी से पहले विनम्र बनो और समय रहते अपने पापों पर पश्चात्ताप करो। 22मन्नत पूरी करने में विलम्ब मत करो। मृत्यु तक यह काम मत टालते रहो; क्योंकि ईश्वर का पुरस्कार सदा बना रहेगा। 23मन्नत मानने से पहले सोच-विचार करो। उस मनुष्य के समान मत बनो, जो प्रभु की परीक्षा लेता है। 24अन्तिम समय भड़कने वाला क्रोध और दण्ड याद रखो, जब प्रभु अपना प्रभु मुँह फेर लेता है। 25बहुतायत के दिनों में भुखमरी ओर समृद्धि के दिनों में दरिद्रता और अभाव याद रखो। 26सुबह से शाम तक मौसम बदलता है, प्रभु की दृष्टि में यह सब क्षणभंगुर है। 27बुद्धिमान् सब समय सावधान रहता है और जब पाप का बोलबाला हो, तो वह अपराध से बचता है। 28हर विवेकशील व्यक्ति प्रज्ञा पहचानता और प्रज्ञासम्पन्न मनुष्य की प्रशंसा करता है। 29नीति-वचन जानने वाले अपनी प्रज्ञा का प्रमाण देते हैं और वर्षा की तरह सूक्तियाँ बरसाते है। 30अपनी वासनाओं का दास मत बनो और अपनी लालसाओें पर संयम रखो। 31यदि तुम अपनी वासनाओें का दास बनोगे, तो तुम्हारे शत्रु तुम्हारा उपहास करेंगे। 32दावतों में रुचि मत लो, इस से दुगुनी दरिद्रता आ जाती है। 33यदि तुम्हारे पास धन न हो, तो न पेटू बनो और न मद्यप। कहीं ऐसा न हो कि तुम अपनी हानि कर बैठो।