📖 - एस्तेर का ग्रन्थ

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अध्याय 03

1) कुछ दिनों बाद अर्तज़र्कसीस ने हम्मदाता के पुत्र अगागी हामान को उच्च पद पर नियुक्त किया और अपने यहाँ के समस्त क्षत्रपों में उसे ऊँचा स्थान दिया।

2) राजा के सब सेवक, जो राजद्वार पर नियुक्त थे, हामान को दण्डवत् प्रणाम किया करते थे; क्योंकि इसके विषय में राजा की आज्ञा यही थी। लेकिन मोरदकय ने इस प्रकार दण्डवत् प्रणाम नहीं किया।

3) राजा के सेवकों ने, जो राजद्वार पर नियुक्त थे, मोरदकय से कहा, "तुम राजा की आज्ञा क्यों भंग करते हो?"

4) वे प्रतिदिन उस से यही कहते रहे। तब भी उसने उनकी नहीं मानी। तब उन्होंने यह बात हामान को बतायी; क्योंकि वे देखना चाहते थे कि मोरदकय अपनी बात पर दृढ़ रहेगा या नहीं। उसने उन्हें बताया था कि वह यहूदी है।

5) जब हामान ने देखा कि मोरदकय दण्डवत् प्रणाम नहीं करता, तो वह क्रुद्ध हो उठा।

6) उसने मोरदकय पर ही हाथ उठाना नहीं चाहा, बल्कि असूरी राज्य में रहने वाली समस्त यहूदी जाति का सर्वनाश करना चाहा; क्योंकि उसने सुना था कि मोरदकय यहूदी है।

7) राजा अर्तज़र्कसीस के बारहवें वर्ष के नीसान नामक पहले महीने में हामान के सामने ’पूर’, अर्थात् चिट्ठी डाली गयी कि किस दिन और किस महीने यहूदी जाति का सर्वनाश किया जाये और अदार नामक महीने का तेरहवाँ दिन निकला।

8 )8-9) इसके बाद हामान ने राजा अर्तज़र्कसीस से कहा, "आपके राज्य के सारे प्रदेशों के लोगों के बीच एक ऐसी जाति फैल गयी है, जिसके विधि-विधान अन्य सब लोगों से भिन्न हैं और जो राजाज्ञाएँ नहीं मानती। अतः यह राजा के हित में उचित नहीं है कि उसे शान्ति से रहने दिया जाये। यदि राजा उचित समझें, तो उसके विनाश की लिखित आज्ञा दी जाये और मैं राजा के पदाधिकारियों के हाथ दस हजार मन चाँदी दूँगा, जिसे वे राजकीय कोष में रखेंगे।''

10) तब राजा ने अपने हाथ की मुहर-लगी अँगूठी उतार कर हम्मदाता के पुत्र यहूदी-शत्रु अगागी हामान को दे दी।

11) राजा ने हामान से कहा, "वह चाँदी तुम्हारे पास रहे और उस जाति के साथ तुम जो चाहो, वही करो।"

12) पहले महीने के तेरहवें दिन राजा के सचिव बुलाये गये और हामान के आदेशानुसार राजा के क्षत्रपों, सभी प्रदेशों के राज्यपालों और सभी जातियों के शासकों को, प्रत्येक प्रदेश की लिपि तथा प्रत्येक जाति की भाषा में लिखित आज्ञा दी गयी। वह आज्ञा राजा अर्तजर्कसीस के नाम से लिखी गयी और उस पर राजा की अँगूठी की मुहर लगा दी गयी।

13 (ए) राजाज्ञा की प्रतिलिपि इस प्रकार है: "भारतवर्ष की सीमा से ले कर इथोपिया की सीमा तक एक सौ सत्ताईस प्रदेशों के क्षत्रपों और उनके अधीनस्थ पदाधिकारियों को महाराजा अर्तज़र्कसीस यह लिखते हैं:

13 (बी) बहुत-सी जातियों पर शासन और सारी पृथ्वी का अधिकार प्राप्त होन भयरहित हो कर जीवन बिताये और राज्य के सीमान्तों तक सुरक्षित यात्रा कर सके और मैं वह शान्ति पुनः स्थापित कर सकूँ , जो सबों को प्रिय है।

13 (सी) जब मैंने अपने मन्त्रियों से पूछा कि यह उद्देश्य किस प्रकार पूरा किया जा सकता है, तो हामान ने, जो समझदारी, राजभक्ति और ईमानदारी में दूसरों से श्रेष्ठ है और जो राज्य में राजा के बाद सर्वोच्च पद पर हैं।

13 (डी) हमें यह बताया कि पृथ्वी पर रहने वाली सब जातियों में एक जाति ऐसी भी है, जो दूष्ठ है, जिसके विधि विधान अन्य सभी जातियों से भिन्न है और जो सदा राजाओं के आदेशों का तिरस्कार करती हैं। इससे हम अपने राज्य में जातियों का जो मेल स्थापित करना चाहते है, वह नहीं हो पाता हैं।

13 (ई) हमें मालूम हो गया है कि मात्र वही जाति सब अन्य जातियों के प्रतिकूल है, दुष्ट विधि-विधान का अनुसरण करती, हमारे उद्देश्य का विरोध करती, अपराध करती रहती और राज्य की शान्ति में बाधा डालती है।

13 (एफ) इसलिए हमारा आदेश है कि हमारे प्रशासक और पितृतुल्य हामान अपने पत्र में जिन लोगों का उल्लेख करते हैं, उनका, उनकी पत्नियों और बच्चों के साथ, किसी पर दया दिखलाये बिना, इस वर्ष के अदार महीने के चैदहवें दिन, शत्रुओं की तलवार से सर्वनार्श किया जाये।

13 (जी) इस प्रकार ये दुष्ट लोग सब-के-सब एक ही दिन बलपूर्वक अधोलोक उतारे जायेंगे, जिससे भविष्य में हमारे राज्य में सुरक्षा और शान्ति रहे।

13 (एच) जो व्यक्ति इन लोगों को छिपा रखेगा, उसे न तो मनुष्यों के बीच और न पक्षियों के बीच रहने दिया जायेगा। वह पवित्र आग में जलाया जायेगा और राज्य उसकी धन-सम्पत्ति ज़ब्त करेगा। अलविदा।

14) "इस पत्र की प्रतिलिपि प्रत्येक प्रदेश में राजाज्ञा के रूप में घोषित करने का आदेश है, जिससे सभी लोग इसे जान जायें और उस दिन के लिए तैयार रहें।"

15) भेजे हुए हरकारों ने राजा के आदेश का तुरन्त पालन किया और राजाज्ञा की घोषणा राजधानी सूसा में हो गयी। राजा और हामान मदिरा पीने बैठे, परन्तु सूसा नगर में आतंक छाया हुआ था।

15 (ए) सब जातियों ने उत्सव मनाया। राजा और हामान राजभवन में प्रवेश कर मित्रों के साथ भोग विलास करते रहें।

15 (बी) जहाँ कहीं भी पत्र की प्रतिलिपि प्रदर्शित की जाती, वहाँ सभी यहूदी रोते हुए भारी शोक मनाते।

15 (सी) वे यह कहते हुए अपने पूर्वजों के ईश्वर से प्रार्थना करते थे:-

15 (डि) प्रभु ईश्वर! तू ऊपर, स्वर्ग में एकमात्र ईश्वर है। तेरे सिवा और कोई ईश्वर नहीं।

15 (ई) यदि हमने तेरी संहिता और तेरे आदेशों का पालन किया होता, तो हम जीवन भर सुरक्षा और शान्ति में निवास करते।

15 (एफ) अब यह सारी विपत्ति हम पर इसलिए आ पड़ी हैं कि हमने तेरे आदेशों का पालन नहीं किया।

15 (जी) प्रभु! तू न्यायी, दयालु, सर्वोच्य और महान् हैं। तेरे सभी मार्ग न्यायपूर्ण हैं।

15 (एच) प्रभु तू बन्दी गृह से अपनी पुत्रों की बलात्कार और सर्वनाश से हमारी पत्नियों की रक्षा करः क्योंकि तू मिस्र की दासता के समय से अब तक हम पर कृपा करता रहा ।

15 (आई) अपनी प्रिय प्रजा पर दया कर, अपनी विरासत को कलंकित न होने दे, हमारे शत्रु हम पर हावी न हों।



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