Click here to read the English Version
प्रभु येसु मसीह में मेरे प्यारे दोस्तों, चालीसा काल में जैसे-जैसे हम आगे बढ़ रहे हैं, वैसे-वैसे प्रभु हम सबको एक 'U-Turn' लेने के लिए अपनी पवित्र आत्मा द्वारा बार-बार प्रेरित कर रहे हैं। यह 'U-Turn' कुछ और नहीं, बल्कि एक सच्चा पश्चाताप है—वह पश्चाताप जो हमारे जीवन को पूरी तरह से बदलने और हम सबको ईश्वर से जोड़ने की पूरी ताकत रखता है। लेकिन हमारे जीवन में इस बदलाव का आना और हमारा ईश्वर से फिर मिलना, एक बहुत गहरी और चोट देने वाली मांग रखता है। यह हम सबसे वह कीमत मांगता है जिसे चुकाने से हम सब कहीं न कहीं डरते हैं, और वह कीमत है—हमारी ईमानदारी; या अन्य शब्दों में कहें, हमारी वफादारी। पवित्र वचन इस ईमानदारी के बहुत सारे अच्छे उदाहरण हमारे सामने प्रस्तुत करता है। पवित्र ग्रंथ के पुराने विधान में हम हाबिल, नूह, इब्राहिम, इसहाक, याकूब, याकूब के बेटे यूसुफ, मूसा, योशुआ, दबोरा, गिदओन, कई नबियों और ईश्वर के मार्ग पर चलने वाले कई राजाओं का उल्लेख पाते हैं, जो ईश्वर के प्रति ईमानदार रहे। ईश्वर ने उनके हर कार्य में उन्हें आशीष दी और उनके प्रति की गई अपनी प्रतिज्ञा का स्मरण कर उन्हें सदैव अपने से जोड़े रखा। पवित्र ग्रंथ के नए विधान में, पुराने विधान के इन सब व्यक्तियों से परे, हम एक विशेष व्यक्तित्व का विवरण पाते हैं और वह हैं हमारे प्रभु येसु मसीह।
मेरे प्यारे दोस्तों, मेरा मानना है कि ईमानदारी सबसे श्रेष्ठतम गुण है। बहुत से लोग अपने संदर्भानुसार अन्य कई सद्गुणों को श्रेष्ठ मानते होंगे, लेकिन जब मैंने पवित्र ग्रंथ का अध्ययन किया और उसके संदर्भ पर मनन-चिंतन कर अपने आप को टटोल कर देखा, तो मैं अपने आत्म-अवलोकन में इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि पूरे ग्रंथ में प्रभु ईश्वर—चाहे वह शुरुआत में आदम और हेवा हों, या उनके बाद इस्रायली हों, या ईश्वर के चुने हुए नबी—वे सबको अपने प्रति ईमानदार रहने का आदेश देते हैं। विधि-विवरण ग्रंथ (6:5) में प्रभु का वचन कहता है: "तुम अपने प्रभु ईश्वर को अपने सारे हृदय, अपनी सारी आत्मा और अपनी सारी शक्ति से प्यार करो।" आमतौर पर अगर हम देखें, तो कोई व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को ऐसा प्यार तभी कर सकता है जब वह उसके प्रति ईमानदार हो या ईमानदार रहने का वादा करता हो। यहाँ ईमानदारी का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि हम इस वफादारी के चलते अपने आप को दूसरों से ऊँचा समझें कि—"देखो भाई, मैं तो ईश्वर के प्रति पूरी तरह समर्पित और ईमानदार हूँ, और तुम सब पापी हो; चलो-चलो, दूर हो जाओ मुझसे।" ऐसे लोगों से हमारे प्रभु येसु यह कहते हैं कि तुम लोग मुख से तो मेरा आदर करते हो, लेकिन तुम्हारा हृदय मुझसे बहुत-बहुत ज़्यादा दूर है। उस धनी युवक के सामने भी प्रभु येसु ने अंतिम शर्त यही रखी थी कि वह अपना सब कुछ बेच दे और फिर उनके पीछे चले, लेकिन वह उदास हो गया और फिर कभी नहीं मुड़ा। प्रभु येसु हम सबसे, जो उनके नक्शे-कदम पर चलने वाले लोग होने का दावा करते हैं, आज ईमानदारी की मांग करते हुए यह कहते हैं—"जो मेरा अनुसरण करना चाहता है, वह अपने आप को त्यागे और प्रतिदिन अपना क्रूस उठाकर मेरे पीछे हो ले।"
प्यारे दोस्तों, यही वह ईमानदारी है जो हमारे प्रभु हमसे चाहते हैं। यही वह पश्चाताप है जिसकी आशा वे हमसे करते हैं। अपने आप को त्यागने का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि आप अपने आप को खत्म कर दें या खुद को चोट पहुँचाएँ, बल्कि प्रभु इससे यह कहना चाहते हैं कि तुम अपने घमंड, अपनी जलन, अपने लालच, अपनी अनैतिक इच्छाओं, अपनी आसक्ति और इस स्वार्थी जीवन का—जिसमें सब कुछ 'मैं' और 'मेरा' के इर्द-गिर्द घूमता रहता है—त्याग करो। इसे अपनी सोच और ज़िंदगी से खत्म करने के लिए पूरी तरह प्रभु पर निर्भर रहो और उनकी दी गई शिक्षा का अनुपालन करो। रहा सवाल 'प्रतिदिन के क्रूस' का, तो कुछ लोगों के मन में यह सवाल उठ रहा होगा कि—"अगर मैं प्रभु के प्रति पूरी तरह ईमानदार हूँ और उसकी दी गई आज्ञा का पालन करता हूँ, तो मुझे रोज़-रोज़ इसे ढोने की क्या ज़रूरत है? क्यों प्रभु एक ही बार में मेरे सारे पापों का बोझ हर नहीं लेते? क्यों मुझे बार-बार पश्चाताप करने की ज़रूरत पड़ती है? क्या सच्चा पश्चाताप कभी संभव भी है?" आपके इन्हीं सवालों के आधार पर मैं आपको पवित्र बाइबल की ओर मोड़ना चाहूंगा और आपका ध्यान इस्राइलियों के जीवन की ओर आकर्षित करना चाहूंगा। मेरे मित्रों, जब-जब उन्होंने पाप किया, तब-तब ईश्वर ने अपने नबियों द्वारा उन्हें सुधारा और कभी-कभी तो उन्हें दंड भी दिया, जिससे जो प्रतिज्ञा ईश्वर ने उनसे की थी, वे उसे न भूलें और उसके दिए गए नियमों का पालन करते हुए उसके प्रति ईमानदार रहें। लेकिन अगर यह ईमानदारी या वफादारी एक बार का 'सबब' होती, तो सिनाई पर्वत पर मूसा द्वारा ईश्वर ने जो विधान स्थापित किया था, उसके अनुसार तो फिर इस्राइलियों को दोबारा पाप करने की कोई इच्छा होनी ही नहीं चाहिए थी? फिर वे क्यों बार-बार पाप करते थे? क्यों बार-बार ईश्वर की आज्ञाओं का उल्लंघन करते थे और क्यों अपने आप को ईश्वर से इतना दूर ले जाते थे कि उन्हें उनके जीवन में आकर उन्हें सुधारने का अवसर खोजना पड़ता था? प्यारे भाइयों और बहनों, पवित्र बाइबल में हम पाते हैं कि ईश्वर उसे पुकारने वालों पर दया करता और उन्हें उनके पश्चाताप का उचित फल प्रदान करता है। उत्पत्ति ग्रंथ 8:21 में यह बताया गया है कि मनुष्य अपनी युवावस्था से ही बुराई की ओर प्रवृत्त होता है। हालांकि उत्पत्ति ग्रंथ 1:26-27 के अनुसार मनुष्य ईश्वर के प्रतिरूप बनाया गया है, लेकिन मनुष्य कई बार इस बात का एहसास करने से रह जाता है और एक आम जिंदगी जी कर मर जाता है। लेकिन वे लोग जो इसकी गंभीरता और महत्व को समझ कर अपने हृदय से ईश्वर की ओर मुड़ते और उस पर आश्रित रहते हुए उसकी आज्ञाओं का ईमानदारी से पालन करते हैं, वे लोग ही पश्चाताप के उचित फल उत्पन्न करने योग्य पाए जाते हैं और ईश्वर द्वारा प्रकट मुक्ति—जो हमें प्रभु येसु मसीह के ज़रिए प्राप्त होती है—उसके अधिकारी बनते हैं। हम सबको आज इस विषय पर मनन-चिंतन करने की आवश्यकता है कि हम क्यों बार-बार पाप करते हैं? क्यों हम इतने कमज़ोर हैं कि शैतान हम पर बार-बार हावी हो जाता है और हम बार-बार उसी दलदल में गिर जाते हैं जिससे हम कभी निकल ही नहीं पाते? इन प्रश्नों का जवाब हम फिर उत्पत्ति ग्रंथ 4:7 में पाते हैं, जब ईश्वर काइन से कहते हैं कि, "जब तुम भला करोगे तो तुम प्रसन्न होगे; यदि तुम भला नहीं करोगे, तो पाप हिंसक पशु की तरह तुम पर झपटने के लिए तुम्हारे द्वार पर घात लगाकर बैठेगा।" यहाँ भला करने का अर्थ है—ईश्वर की आज्ञाओं का प्रतिपल स्मरण कर उनका पालन करना। इसका एक जीता-जागता उदाहरण हम मत्ती 4:4, 6, 10 में पाते हैं कि किस प्रकार येसु को नित्य ईश्वर की आज्ञाओं का स्मरण था और वे किस प्रकार शैतान पर विजय पाते हैं। 1 पेत्रुस 5:8 में लिखा है कि, "आप संयम रखें और जागते रहें! आपका शत्रु शैतान, दहाड़ते हुए सिंह की तरह विचरता है और ढूँढता रहता है कि किसे फाड़ खाए।"
अपने अनुभवों के आधार पर मेरा यह मानना है कि पाप हमारे मन की ऐसी स्थिति है जिसमे हम एक ऐसे गड्ढे में , जो कीचड़ से भरा हुआ है, में रहने के लिए बिल्कुल आतुर रहते हैं। हमें उस दलदल और पानी के स्रोत के बीच कोई फर्क ही नज़र नहीं आता। हम वहां ऐसी बेहोशी में होते हैं कि हमें समझ में ही नहीं आता कि यह कीचड़ हमें दाग-धब्बों से भर रहा है, हमें गंदा कर रहा है और हमारे कपड़ों को मैला कर रहा है। उस समय हमें मज़ा आ रहा होता है क्योंकि हम बेहोश होते हैं। लेकिन जब वह दलदल हमें धीरे-धीरे अंदर की ओर खींचना शुरू करता है, तब हमें होश आता है कि अरे! हम तो गलत जगह पर हैं। तब हम अपनी आत्मा की आवाज़ सुनते हैं। ऐसे में अगर हम जल्द से जल्द ठोस कदम न उठाएं और उस कीचड़ से बाहर निकलने का प्रयास ही न करें, तो हम उसमें धँसते चले जाएंगे और फिर उसमें विलीन हो जाएंगे; और वह स्थिति पहली स्थिति से और भयावह और अशोभनीय होगी। यहां मुझे संत अगस्टिन के बहुत ही सुंदर शब्दों की याद हो आती है। वे अपनी आत्मा की मन:स्थिति को दर्शाते हुए कहते हैं - "हे प्रभु, आपने हमें अपने लिए बनाया है, और हमारी आत्मा तब तक बेचैन रहती है जब तक वह आप में विश्राम नहीं पाती"। लूकस 15 में हम उड़ाऊ पुत्र का एक बहुत ही विचित्र विवरण पाते हैं, जहां वह अपनी सारी संपत्ति पापमय जीवन जी कर उड़ा देता है और फिर जब उसकी स्थिति दयनीय हो जाती है, तब वह इस बात का एहसास करता है कि उसने कितना गलत किया। पवित्र ग्रंथ में हम राजा दाऊद, राजा हिज़किया, नीनेवे के लोग, नाकेदार ज़क्कई, पापिनी स्त्री, पेत्रुस, पौलुस, क्रूस पर लटका अपराधी और ऐसे बहुत से व्यक्तियों का उदाहरण पाते हैं, जिन्होंने सच्चा और ईमानदार पश्चाताप किया और अपने पूरे दिल और आत्मा से अपने पापी जीवन से मुड़कर फिर कभी उस गहरे गर्त की ओर मुड़ने की जुर्रत नहीं की। ऐसा क्यों? क्योंकि उन्होंने ईश्वर की दया का अनुभव कर पश्चाताप के उचित फल उत्पन्न किए। उन्होंने अपने दिल, मन और आत्मा को पूरी तरह उस ईश्वर को समर्पित कर दिया जो उन्हें मुक्ति दिला सकता था।
स्तोत्र 42 में स्तोत्रकार इस स्थिति को मृगतृष्णा के रूप में दर्शाते हैं। इसका भावार्थ है कि जैसे हरनी जल-धारा को तरसती है, वैसे एक पश्चातापी मनुष्य की आत्मा ईश्वर के लिए नित्य तरसती है। सच्चा और ईमानदार पश्चाताप एक नित्य प्रक्रिया है जिसमें सघनता आने पर व्यक्ति अपनी आत्मा की प्यास को जानने लगता है। वह अपने शरीर की दुर्बलताओं से अब काफी ऊपर उठ चुका होता है और उसके लिए अब ईश्वर की आज्ञाओं का नित्य अनुपालन ही एकमात्र कर्तव्य और धर्म बन जाता है। वह इस बात का सदा स्मरण रखना चाहता है कि अब उसका जीवन पूर्णतः ईश्वर को समर्पित है और वह अपने रास्ते से कभी भटकता नहीं है। संत मदर तेरेसा के अनुसार, "सच्चा पश्चाताप केवल शब्दों में नहीं, बल्कि कार्यों में प्रेम और क्षमा के माध्यम से प्रकट होता है।" उनका मानना था कि सच्चा पश्चाताप हमें ईश्वर के करीब लाता है और क्रूस पर हमारे प्रभु येसु मसीह के कष्टों के प्रति सहानुभूति रखने और दूसरों की पीड़ा को अपनाकर उनकी सेवा करने के रूप में व्यक्त होता है। पोप बेनेडिक्ट XVI के 15 अप्रैल 2007 को दिए गए प्रवचन के अनुसार, "सच्चा पश्चाताप केवल पाप का एहसास ही नहीं, बल्कि ईश्वर के प्रेम को पहचानकर स्वयं को बदलने का एक ईमानदार निर्णय है।" उन्होंने कहा कि यह हमारी आत्मा को पवित्र करता है, जो हमें ईश्वर के नज़रिए से दुनिया को देखने और पाप से छुड़ाकर हमें माफी और दिल के बदलाव की ओर ले जाता है। यह एक निरंतर प्रक्रिया है। पोप फ्रांसिस ने अपनी परिपत्र "मिसेरिकोर्दीया एत मिसेरा" में बताया है कि "सच्चा पश्चाताप केवल पापों की गिनती करना नहीं, बल्कि ईश्वर के असीम प्रेम और दया को महसूस करना है।" वे कहते हैं कि पश्चाताप दिल का बदलाव है, जो हमें ईश्वर के क्षमादान को स्वीकार करने और जीवन बदलने की शक्ति देता है। उनके अनुसार, ईश्वर क्षमा करने से कभी नहीं थकते।
मेरे प्यारे दोस्तों, अपने पापों से माफी माँगना और केवल एक बार की तौबा काफी नहीं है। अगर हम सच्चे मायने में अपने अंदर बदलाव देखना चाहते हैं, तो हमें अपनी सुख-सुविधाओं से ऊपर उठकर, अपनी कमज़ोरियों को पहचान कर और ईश्वर की दया की चाहत रखकर इन सब रास्तों पर दोबारा न चलने की एक सच्ची प्रतिज्ञा करनी होगी। अगर हम सच में अपने अंदर यह बदलाव देखना चाहते हैं, तो आज और अभी से हम यह विश्वास करें कि प्रभु ने हमें इस वचन द्वारा छू लिया है। उसने अपने शब्दों द्वारा हमें अपनी आत्मा से अनुप्राणित किया है। उसने हम पर अपनी दया दिखाई है। उसने हमारे दिल को जाँच कर और हमारी ईमानदारी को भाँप कर हमें माफ कर दिया है। उसने हमें अपना बना लिया है, और वह यह बिल्कुल नहीं चाहेगा कि हम उसके प्यार और उसकी दया से फिर दोबारा कभी दूर हों।
“एक बार एक व्यक्ति राह चलते हुए एक सुंदर पत्थर देखता है। वह उसका मूल्य तो नहीं जानता था, पर उसे वह पत्थर देखने में बहुत सुंदर लगा क्योंकि वह बहुत चमक रहा था। उसने उस पत्थर को उठाया, अपनी जेब में डाला और आगे बढ़ने लगा। रास्ते में उसे उसका मित्र दिखाई दिया। वह मित्र एक हीरा तराशने वाला था; अगर वह दूर से ही हीरे को देखता तो उसकी परख कर लेता। इस व्यक्ति ने अपने दोस्त को वह पत्थर दिखाया और उसकी सुंदरता का वर्णन करते हुए बोला—"अरे भाई! ज़रा इसे देखो तो, तुम्हें यह पत्थर कैसा लग रहा है? मुझे तो यह बहुत सुंदर लग रहा है।" उस व्यक्ति ने उस पत्थर को झट से पहचान लिया क्योंकि वह कोई मामूली पत्थर नहीं, बल्कि एक हीरा था। लेकिन उसने मन में सोचा—"यदि मैं इसे इसका मूल्य बता दूँगा, तो यह मुझे यह पत्थर कभी नहीं देगा।" इसलिए उसने उससे झूठ कहा कि वह एक साधारण सा पत्थर है और उसमें ऐसा कुछ खास नहीं है जिससे उसकी चंद पैसों के लिए भी बिक्री हो जाए। उसने अपने मन में सोचा कि यह सुनते ही वह पत्थर फेंक देगा और बाद में वह जाकर उस हीरे को उठा लेगा। और कुछ ऐसा ही हुआ; जैसे ही उस व्यक्ति को पता चला कि यह पत्थर किसी काम का नहीं है, उसने उस पत्थर को सड़क के किनारे फेंक दिया और अपनी राह चल दिया।“
मेरे प्यारे दोस्तों, ईश्वर हमें इसी तरह मिलते हैं। हमें उनकी दया, उनके प्रेम और उनके अमूल्य बलिदान से मिली मुक्ति का सदैव स्मरण रहना चाहिए। शैतान हमारी राह पर आकर हमें ईश्वर के मुक्ति-रहस्य और उसकी क्षमता का मूल्य पहचानने से भटकाने का पूरा प्रयास करता है। वह यह चाहता है कि ईश्वर द्वारा मिले इन वरदानों को हम बिल्कुल न पहचानें और न ही उसके अनुरूप अपने जीवन में फल उत्पन्न करें। वह चाहता है कि हम ईश्वर की दया से सदैव वंचित रहें; वह चाहता है कि हमें मुक्ति न मिले; वह चाहता है कि ईश्वर और हमारे बीच सदैव दरार बनी रहे। ऐसे में हमारा क्या कर्तव्य बनता है? क्या हमें शैतान को अपने ऊपर सदैव हावी होने देना चाहिए? क्या हमें अपने प्रलोभनों से दबकर ईश्वर की दया से वंचित रह जाना चाहिए? क्या हमारा विश्वास इतना कमज़ोर है कि शैतान हमें बार-बार हरा देता है? हम क्यों बार-बार पाप करते हैं? हम क्यों बार-बार उन चुनिंदा पापों के लिए क्षमा माँगते हैं जिन्हें करने से हम हमेशा कतराते हैं, लेकिन तब भी उन्हें करते हैं? क्या हमने पवित्र आत्मा को अपने जीवन में कार्य करने दिया है? क्या हमने अपने आप को ईश्वर को समर्पित किया है? क्या हमने ईश्वर को हमसे हमारे पाप दूर करने का अधिकार दिया है? क्या हमने ईश्वर के इकलौते पुत्र, हमारे प्रभु येसु मसीह के बलिदान का मूल्य समझा है? प्रभु येसु ने समस्त मानव जाति के पापों के लिए अपने आप को क्रूस पर कुर्बान कर दिया। यहूदी परंपरा में मंदिर का मुख्य पुरोहित, प्रथा के अनुसार हर वर्ष पास्का के समय एक मेमना लेकर उस पर अपने हाथ रखता था, जिससे उस मेमने के ऊपर सारे संसार के दोष मढ़ दिए जाते थे—ऐसा यहूदियों का विश्वास था। और उस मेमने को मंदिर में बलि चढ़ा दिया जाता था जिससे कि सबके गुनाहों की माफी इस मेमने के बलिदान द्वारा संपन्न हो जाए। प्रभु येसु मसीह हम सबके लिए वही मेमना बनकर अपने आप को क्रूस पर कुर्बान कर देते हैं। वे पुरोहित भी थे और वध किए जाने वाले मेमने भी। क्रूस वह वेदी थी जिस पर उन्होंने अपनी कुर्बानी दी, जिससे कि संसार भर के लोगों को उनके बलिदान द्वारा उनके पापों से मुक्ति मिले (इब्रानियों 4-5)।
उन्होंने सबके लिए एक ही बार अपनी जान कुर्बान कर हमारे लिए एक नमूना साबित किया कि जो कोई उनके इस बलिदान के अर्थ को समझकर उन पर विश्वास लाए और उनकी शिक्षाओं के अनुसार अपने जीवन को चलाए, केवल वही मनुष्य उनका सच्चा सेवक कहलाने योग्य है। लेकिन प्रभु येसु की मुक्ति योजना उनके बलिदान तक ही सीमित नहीं रह जाती; वह बलिदान उनके पुनरुत्थान का रास्ता तैयार करता है। यह वह लक्ष्य था जिसे उन्होंने समस्त मानव जाति के लिए निर्धारित किया। उन्होंने हम सबको यह समझाया कि जैसे वे मृत्यु के क्षण तक अपने पिता के प्रति आज्ञाकारी रहे और उनकी इच्छा को पूरा करते हुए अपने प्राण न्योछावर कर दिए, इसी प्रकार हम भी, जो उनमें विश्वास करते और मृत्यु तक उनकी शिक्षाओं पर चलने की चाहत रखते हैं, उनके पुनरुत्थान के सहभागी होंगे और ईश्वर के राज्य में स्थान पाएंगे।
लेकिन इस मुक्ति को पाने के लिए हम सबके सामने एक बहुत ही वास्तविक शर्त है—वह शर्त है 'सच्चे पश्चाताप' की। हमने इस लेख में यह जाना है कि किस प्रकार सच्चा पश्चाताप प्रभु और हमारे बीच के टूटे रिश्ते को जोड़ता है। और एक बार जब यह रिश्ता जुड़ जाता है, तब यह पूर्ण रूप से हमारा दायित्व है कि हम किस प्रकार उस रिश्ते को बनाए रखने के लिए अपने आप को प्रभु के आत्मा द्वारा संचारित रखते हैं। मैं अपने चिंतन में यह पाता हूँ कि प्रभु येसु बाहें फैलाकर हमारा इंतज़ार कर रहे हैं। वे चाहते हैं कि हम शीघ्रातीशीघ्र अपने पापों पर पछतावा कर उनके पास लौट आएं और उनसे कभी जुदा न हों। इस समय हम सबके मन में कुछ प्रश्न उठ रहे होंगे, जैसे: "मैं किस प्रकार सच्चा पश्चाताप कर सकता हूँ/सकती हूँ? मैं ऐसा क्या करूँ जिससे कि मेरे और प्रभु के रिश्ते में कभी दरार न आए? हे प्रभु, मैं कैसे तुझसे जुड़ा रहूँ/जुड़ी रहूँ? हे प्रभु, मैं तेरा होना चाहता हूँ/होना चाहती हूँ। हे प्रभु, मैं तेरे प्रेम का अनुभव करना चाहता हूँ/चाहती हूँ। हे प्रभु, मैं तुझसे संयुक्त रहकर उन लोगों को तेरे प्रेम का एहसास कराना चाहता हूँ/चाहती हूँ जो तेरे प्रेम से अब तक वंचित हैं। हे प्रभु, बोल मैं क्या करूँ?" ऐसी स्थिति में पवित्र माता कलीसिया हम सबके समक्ष कुछ ऐसे बिंदु रखती है जिससे कि हम प्रभु से नज़दीकियाँ बढ़ा सकते हैं और पापमय जीवन को छोड़ अपने को पूर्णतः प्रभु में संलग्न कर सकते हैं:
1. हम प्रार्थना में अधिक समय बिताएं और पाप स्वीकार संस्कार द्वारा अपने अंतर्तम को शुद्ध रखें।
2. पवित्र ग्रंथ का पाठ करें और उसमें दी गई आज्ञाओं को आत्मसात कर अपने जीवन में लागू करें।
3. प्रभु येसु के नक्शेकदम पर चलकर उनसे विनम्रता और सादगी का वरदान मांगें।
4. अपने पड़ोसियों से प्यार करें और अपने मन, तन एवं आत्मा को शुद्ध रखें।
5. विलासिता की उपेक्षा करें और प्रभु येसु के प्रेम के संदेश को अपने जीवन का आधार बनाएं।
6. अपने आप को पूर्णतः प्रभु को समर्पित कर पवित्र आत्मा को अपने जीवन में कार्य करने दें, जिससे कि वह हमें नित्य हमारी कमियों का बोध कराता रहे और हमें प्रभु से जुदा न होने दे।
मैं भी इस बात में विश्वास करता हूँ कि अगर हम सब इन बिंदुओं का आत्मा की गहराई से पालन करेंगे, तो सही मायने में हम प्रभु के सच्चे शिष्य बन सकते हैं—ऐसे शिष्य जिनका प्रभु से दिली जुड़ाव है। आइए प्यारे मित्रों हम निरंतर प्रार्थना करें कि ईश्वर हमें अपने पवित्र आत्मा द्वारा प्रेरित करे और हमें सच्चा और ईमानदार पश्चाताप करने का वरदान दे, जिससे कि हम प्रभु के मुक्तिप्रद दुःखभोग, मरण एवं पुनरुत्थान के रहस्य को समझकर अपनी आत्मा को उसे समर्पित करें और उसके शुभ संदेश को अपने अच्छे जीवन द्वारा संसार के कोने-कोने तक फैलाने के लिए सक्रिय रूप से कार्य करते रहें।
✍ - ब्रदर क्रैस्टसन गिल (आइ.एम.एस, दिल्ली प्रोविन्स)