📖 - यूदीत का ग्रन्थ

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अध्याय 16

1) यूदीत ने कहाः डफली बजाते हुये मेरे ईश्वर के आदर में भजन गाओ, झाँझ बजाते हुए ईश्वर के आदर में गीत गाओ, उसके लिए स्तुति के भजन की रचना करो, उसका नाम लेते हुए यशोगान करो।

2) तू वही ईश्वर है, जो युद्ध समाप्त करने वाला है, जो अपनी प्रजा के बीच में अपना पड़ाव डालता है, जिससे वह मेरा पीछा करने वालों के हाथ से मुझे छुड़ाये।

3) उत्तर के पर्वतों की ओर से अस्सूर आया, वह लाखों की संख्या में सैन्य दल ले कर आया। उनके समूह ने नदियों का प्रवाह रोका, उनकी घुड़सवार सेना ने पहाड़ों को ढक दिया।

4) उसने कहा कि वह मेरा देश जला कर उजाड़ेगा, मेरे यहाँ के युवकों को तलवार के घाट उतारेगा, मेरे दुधमुँहे बच्चों को भूमि पर पटकेगा, मेरे शिशुओं को चुरा कर ले जायेगा और मेरी कन्याओं का अपहरण करेगा।

5) सर्वशक्तिमान् प्रभु ने उनका तिरस्कार किया, उसने एक स्त्री के हाथ से उन को पराजित किया।

6) उनका अध्यक्ष युवकों से नहीं मारा गया, उस पर दानव के पुत्रों ने प्रहार नहीं किया, उस पर दैत्याकार वीर विजयी नहीं हुए, बल्कि मरारी की पुत्री यूदीत ने अपने सौन्दर्य द्वारा उसे पराजित किया।

7) इस्राएल के पीड़ितों की रक्षा के लिए उसने अपने वैधव्य के वस्त्र उतारे, सुगन्धित तेल से अपने मुख का विलेपन किया,

8) अपने केशों में पट्टी बाँधी और उसे लुभाने के लिए छालटी के वस्त्र धारण किये।

9) उसकी चप्पल ने उसकी आँखें ललचायीं, उसके सौन्दर्य ने उसका मन मुग्ध किया और तलवार ने उसका सिर काट दिया।

10) फ़ारसी उसकी निर्भीकता पर चकित हो गये, मेदी उसका साहस देख कर घबरा गये।

11) मेरे दीन-हीन और निर्बल देशभाई ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगे और शत्रु भयभीत हो उठे। वे ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगे और शत्रु भयभीत हो उठे। वे ज़ोर-ज़ोर से ललकारने लगे और शत्रु भाग खड़े हुए।

12) वे दासी-पुत्रों की तरह छेदे गये, वे कायरों की तरह मारे गये, मेरे ईश्वर के युद्ध में उनका विनाश हुआ।

13) मैं अपने ईश्वर के आदर में नया गीत गाऊँगी। प्रभु! तू महान् और महिमान्वित है, तेरा सामर्थ्य आश्चर्यजनक और अविजेय है।

14) समस्त सृष्टि तेरी सेवा करे, क्योंकि तेरे शब्द-मात्र से सब कुछ अस्तित्व में आया है। तूने अपना आत्मा भेजा है और सब कुछ बन गया है। तेरी वाणी का विरोध कोई भी नहीं कर सकता।

15) समुद्र और पर्वतों के आधार हिल जायेंगे, तेरे आगमन पर चट्टानें मोम की तरह पिघल जायेंगी, परन्तु जो तुझ पर श्रद्धा रखते हैं, तू उन पर दया करेगा।

16) तेरी दृष्टि में हर सुगन्धयुक्त बलि तुच्छ है और होम-बलि की सारी चरबी नगण्य। परन्तु जो प्रभु पर श्रद्धा रखता है, वह उसकी दृष्टि में महान् है।

17) धिक्कार मेरी जाति पर आक्रमण करने वाले राष्ट्रों को! सर्वशक्तिमान् प्रभु उन से बदला चुकायेगा, वह न्याय के दिन उन्हें दण्डित करेगा, वह उनके शरीर में आग और कीड़े भर देगा और वे अनन्त काल तक जलते और दुःख भोगते रहेंगे।

18) येरुसालेम पहुँच कर उन्होंने ईश्वर की आराधना की। लोगों ने अपने को शुद्ध किया और प्रभु को होम-बलियाँ, स्वेच्छित बलियाँ और चढ़ावे अर्पित किये।

19) यूदीत ने लोगों द्वारा अपने को दिये होलोफ़ेरनिस के सब पात्र चढ़ाये और उस मसहरी को प्रभु को पूर्णतः अर्पित किया, जिसे उसने होलोफ़ेरनिस के शयन-कक्ष से ले लिया था।

20) लोग येरुसालेम में, पवित्र स्थान पर, तीन महीने तक आनन्द मनाते रहे और यूदीत उनके साथ रही।

21) इसके बाद सब अपने-अपने दायभाग की भूमि पर लौट गये। यूदीत भी बेतूलिया लौटी और अपनी भूमि पर रहने लगी। वह जीवन भर पूरे संसार में प्रसिद्ध रही।

22) कई पुरुषों ने उस से विवाह करना चाहा, किन्तु जब से उसके पति मनस्से की मृत्यु हुई और वह अपने पूर्वजों से जा मिला, तब से उसका किसी पुरुष से संसर्ग नहीं हुआ।

23) उसकी प्रसिद्धि बढ़ती गयी और वह अपने पति मनस्से के घर में एक सौ पाँच वर्ष तक जीती रही। उसने अपनी दासी को मुक्त किया। बेतूलिया में उसका देहान्त हुआ और वह एक गुफा में दफ़नायी गयी।

24) इस्राएलियों ने सात दिन तक उसके लिए शोक मनाया। अपनी मृत्यु के पूर्व उसने अपने पति मनस्से के और अपने कुल के सम्बन्धियों के बीच अपनी सम्पत्ति बाँट दी।

25) यूदीत के जीवनकाल में और उसकी मृत्यु के बाद भी ऐसा कोई नहीं रहा, जिसने इस्राएलियों को संत्रस्त किया हो।



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