📖 - उत्पत्ति ग्रन्थ

अध्याय ➤ 01- 02- 03- 04- 05- 06- 07- 08- 09- 10- 11- 12- 13- 14- 15- 16- 17- 18- 19- 20- 21- 22- 23- 24- 25- 26- 27- 28- 29- 30- 31- 32- 33- 34- 35- 36- 37- 38- 39- 40- 41- 42- 43- 44- 45- 46- 47- 48- 49- 50- मुख्य पृष्ठ

अध्याय - 09

1) ईश्वर ने यह कहते हुए नूह और उसके पुत्रों को आशीर्वाद दिया, फलो-फूलो और पृथ्वी पर फैल जाओ।

2) पृथ्वी के सभी पशु, आकाश के सभी पक्षी, भूमि पर रेंगने वाले सभी जीव-जन्तु और समुद्र की सभी मछलियाँ - इन सब पर तुम्हारा भय और आतंक छाया रहेगा। ये तुम्हारे अधिकार में है।

3) हर विचरने वाला प्राणी तुम्हारे भोजन के काम आ जायेगा। मैं हरी वनस्पतियों के साथ ये सब तुम्हें दिये देता हूँ;

4) किन्तु तुम वह माँस नहीं खाना, जिस में प्राण अर्थात् रक्त रह गया हो। मैं तुम लोगों के रक्त और जीवन का बदला चुकाऊँगा।

5) मैं प्रत्येक पशु को उसका बदला चुकाऊँगा और प्रत्येक मनुष्य को उसके भाई के जीवन का बदला चुकाऊँगा।

6) जो मनुष्य का रक्त बहाता है, उसी का रक्त भी मनुष्य द्वारा बहाया जायेगा; क्योंकि ईश्वर ने मनुष्य को अपना प्रतिरूप बनाया है।

7) ''तुम लोग फलो-फूलो, पृथ्वी पर फैल जाओ और उसे अपने अधिकार में कर लो।''

8) ईश्वर ने नूह और उसके पुत्रों से यह भी कहा,

9) ''देखो! मैं तुम्हारे और तुम्हारे वंशजों के लिए अपना विधान ठहराता हूँ!

10) और जो प्राणी तुम्हारे चारों ओर विद्यमान है, अर्थात पक्षी, चौपाये और सब जंगली जानवर, जो कुछ जहाज से निकला है और पृथ्वी भर के सब पशु-उन प्राणियों के लिए भी।

11) मैं तुम्हारे लिए यह विधान ठहराता हूँ-कोई भी प्राणी जलप्रलय से फिर नष्ट नहीं होगा और फिर कभी कोई जलप्रलय पृथ्वी को उजाड़ नहीं बनायेगा।''

12) ईश्वर ने यह भी कहा, ''मैं तुम्हारे लिए, तुम्हारे साथ रहने वाले सभी प्राणीयों के लिए और आने वाली पीढ़ियों के लिए जो विधान ठहराता हूँ, उसका चिन्ह यह होगा-

13) मैं बादलों के बीच अपना इन्द्र धनुष रख देता हूँ; वह पृथ्वी के लिए ठहराये हुए मेरे विधान का चिन्ह होगा।

14) जब मैं पृथ्वी के ऊपर बादल एकत्र कर लूँगा और बादलों में वह धनुष दिखाई पड़ेगा,

15) तब मैं तुम्हारे लिए और सब प्राणियों के लिए ठहराये अपने विधान को याद करूँगा और फिर कभी जलप्रलय सभी शरीरधारियों का विनाश नहीं करेगा।

16) जब इन्द्रधनुष बादलों में दिखाई पड़ेगा, तो उसे देख कर मैं उस चिरस्थायी विधान का स्मरण करूँगा, जिसे मैंने पृथ्वी के समस्त शरीरधारियों के लिए निर्धारित किया है।''

17) ईश्वर ने नूह से कहा, ''यही उस संविधान का चिन्ह है, जिसे मैंने पृथ्वी के सब शरीरधारियों के लिए निर्धारित किया है।

18) नूह के पुत्र, जो पोत से बाहर आये थे, सेम, हाम और याफेत थे। हाम कनान का पिता था।

19) ये तीनों नूह के पुत्र थे और इन से सारी पृथ्वी मनुष्यों से भर गयी।

20) नूह पहला किसान था। इसने दाखबारी लगायी।

21) उसकी अंगूरी पीने के बाद वह नशे में आ कर अपने तम्बू में नग्न हो कर पड़ा रहा।

22) जब कनान के पिता, हाम ने अपने पिता को नंगा देखा, तो उसने बाहर आ कर अपने दो भाइयों को यह बात बतायी।

23) इस पर सेम और याकेत ने एक वस्त्र ले कर अपने कन्धों पर रखा और वे पीठ की ओर से चल कर भीतर गये। फिर वस्त्र डाल कर उन्होंने अपने पिता के नग्न शरीर को ढक दिया। उन्होंने अपने मुँह फेर लिये, जिससे वे अपने पिता को नंगा न देख पायें।

24) (२४-२५) नशा दूर होने पर जब नूह होश में आया और उसे अपने छोटे पुत्र की यह बात मालूम हुई, तो उसने कहा, ''कनान को अभिशाप! वह अपने भाइयों का दास बने।''

26) उसने यह भी कहा, ''प्रभु, सेम का ईश्वर धन्य है। कनान उसका दास हो!

27) ईश्वर याफेत की भूमि का विस्तार करे, वह सेम के तम्बुओं मे रहे और कनान उसका दास हो।''

28) जलप्रलय के बाद नूह तीन सौ पचास वर्ष और जीता रहा। इस प्रकार नूह कुल मिला कर नौ सौ पचास वर्ष जीवित रहने के बाद मरा।



Copyright © www.jayesu.com