📖 - उत्पत्ति ग्रन्थ

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अध्याय - 19

1) वे दो स्वर्गदूत सन्ध्या के समय सोदोम पहुँचे। इस समय लोट सोदोम के फाटक पर बैठा था। उन्हें देखते ही लोट उन से मिलने के लिए खड़ा हो गया और भूमि पर झुक कर उन्हें प्रणाम करते हुए

2) बोला, ''महानुभावों, आप अपने दास के घर पधारें, यहीं रात बितायें अपने पैर धोयें। फिर प्रातःकाल उठ कर प्रस्थान करें।'' उन्होंने कहा, ''नहीं, हम चौक में रात बितायेंगे''।

3) परन्तु जब उसने बहुत आग्रह किया, तब वे उसके साथ उसके घर गये। उसने उनके लिए भोजन तैयार किया, बेख़मीरी रोटियाँ बनायीं और उन्होंने खाना खाया।

4) उनके शयन करने के पहले ही नगर के लोगों, सोदोम के सब पुरुषों, क्या छोटे क्या बड़े, सब ने उसका घर घेर लिया।

5) वे लोट को पुकार कर उस से पूछने लगे, ''आज रात को जो लोग तुम्हारे पास आये थे, वे कहाँ है? उन्हें हमारे पास बाहर लाओ कि हम उनका भोग करें।''

6) लोट ने अपने पीछे दरवाजा बन्द कर दिया। उसने बाहर निकल कर उन लोगों से

7) कहा, ''भाइयों, मैं तुम लोगों से प्रार्थना करता हूँ कि तुम ऐसा कुकर्म न करो।

8) मेरी दो कुँवारी बेटियाँ हैं। मैं उन्हें तुम्हारे पास ला देता हूँ और तुम उनके साथ जैसा चाहो, कर लो। किन्तु इन आदमियों के साथ कोई कुकर्म मत करना, क्योंकि ये मेरे यहाँ आये हुए अतिथि है।''

9) इस पर उन्होंने उत्तर दिया, ''हट जाओ'' और बोले, ''देखो, यह प्रवासी हो कर यहाँ आ बसा है, फिर भी हम को उचित-अनुचित की शिक्षा देने लगा! हम उन से भी ज्यादा बुरा व्यवहार तुम्हारे साथ करेंगे!''

10) वे लोट पर टूट पड़े और किवाड़ तोड़ने के लिए पहुँचे ही थे कि उन दो व्यक्तियों ने अपने हाथ बढ़ा कर लोट को घर के भीतर अपने पास खींच लिया और किवाड़ बन्द कर लिया।

11) फिर उन्होंने घर के दरवाजे पर खड़े हुए छोटे-बड़े, सब-लोगों को अन्धा बना दिया, जिससे वे दरवाजे का पता नहीं लगा पा रहे थे।

12) उन व्यक्तियों ने लोट से पूछा, ''क्या यहाँ आपका कोई और भी है? दामाद, पुत्र, पुत्रियाँ अथवा नगर का आपका कोई और हो, तो उन्हें ले कर यहाँ से निकल जाइए।

13) हम इस स्थान का विनाश करने वाले हैं, क्योंकि प्रभु के पास यहाँ के लोगों के विरुद्ध बड़ी-बड़ी दुहाइयाँ पहुँच चुकी है। इसलिए प्रभु ने हमें इसका विनाश करने के लिए भेजा है।''

14) तब लोट बाहर गया और उसने अपने भावी दामादों से कहा, ''उठो, यहाँ से बाहर निकल चलो, क्योंकि प्रभु इस नगर का विनाश करने ही वाला है''। परन्तु दामादों को लगा कि वह उन से मज़ाक कर रहा है।

15) स्वर्गदूतों ने यह कहते हुए लोट से अनुरोध किया, ''जल्दी कीजिए! अपनी पत्नी और अपनी दोनों पुत्रियों को ले जाइए। नहीं तो आप भी नगर के दण्ड के लपेट में नष्ट हो जायेंगे।''

16) वह हिचकता रहा, इसलिए स्वर्गदूत उसका, उसकी पत्नी और उसकी दोनों पुत्रियों का हाथ पकड़ कर नगर के बाहर ले चले, क्योंकि प्रभु लोट को बचाना चाहता था।

17) नगर के बाहर पहुँच कर एक स्वर्गदूत ने कहा, ''जान बचा कर भाग जाइए। पीछे मुड़ कर मत देखिएगा और घाटी में कहीं भी नहीं रूकिएगा। पहाड़ पर भाग जाइए, नहीं तो आप नष्ट हो जायेंगे।''

18) लोट ने उत्तर दिया ''महोदय! यह नहीं होगा।

19) आपने मुझ पर दया दृष्टि की और मेरी जान बचा कर मेरे बड़ा उपकार किया। यदि मैं पहाड़ पर भाग जाऊँ, तो मैं विपत्ति से नहीं बच सकूँगा और निश्चय ही मर जाऊँगा।

20) देखिए, सामने की नगरी अधिक दूर नहीं है। मैं वहाँ शीघ्र ही पहुँच सकता हूँ। मुझे वहाँ शरण लेने दीजिए। वह एक छोटी-सी जगह है। मैं वहाँ सुरक्षित होऊँगा।''

21) स्वर्गदूत ने उत्तर दिया, ''आपका यह निवेदन मुझे स्वीकार है। मैं उस नगरी का विनाश नहीं करूँगा।

22) शीघ्र ही वहाँ भाग जाइए। जब तक आप वहाँ नहीं पहुँचेंगे, तब तक मैं कुछ नहीं करूँगा।'' इस कारण वह नगरी सोअर कहलाती है।

23) जिस समय पृथ्वी पर सूर्य का उदय हुआ और लोट सोअर पहुँचा,

24) उस समय प्रभु ने सोदोम और गोमोरा पर आकाश से गन्धक और आग बरसायी।

25) उसने उन नगरों को, सारी घाटी को, उसके समस्त निवासियों को और उसके सभी पेड़-पौधों को नष्ट कर दिया।

26) लोट की पत्नी ने, जो उसके पीछे चल रही थी, मुड़ कर देखा और वह नमक का खम्भा बन गयी।

27) दूसरे दिन सबेरे ही इब्राहीम उस जगह पहुँचा, जहाँ वह प्रभु के साथ खड़ा हुआ था।

28) उसने सोदोम, गोमोरा और सारी घाटी पर दृष्टि दौड़ा कर देखा कि भट्ठी के धुएँ की तरह भूमि पर से धुआँ ऊपर उठ रहा है।

29) इस प्रकार जब ईश्वर ने घाटी के नगरों का विनाश किया, तो उसने इब्राहीम का ध्यान रखा और लोट की रक्षा की, तब उसने उन नगरों को विनाश किया, जहाँ वह रहता था।

30) लोट सोअर में रहने से डरता था; इसलिए वह सोअर से आगे बढ़ा और अपनी दो पुत्रियों के साथ पहाड़ियों पर बस गया। वहाँ वह अपनी दोनों पुत्रियों के साथ एक गुफा में रहने लगा।

31) तब बड़ी बेटी ने छोटी से कहा, ''हमारे पिता अब बूढ़े हो गये हैं। इस प्रदेश में ऐसा कोई भी नहीं है, जो संसार के लोगों की परम्परा के अनुसार हमारे साथ विवाह करे।

32) आओ, हम अपने पिता को शराब पिला दें और उसी के साथ लेट जायें, जिससे हम अपने पिता के द्वारा ही अपना वंश बनाये रखें।''

33) तब उन्होंने उस रात को अपने पिता को शराब पिलायी और बड़ी पुत्री अपने पिता के पास जाकर उसके साथ लेट गयी। उसे यह नहीं मालूम हो पाया कि वह कब उसके साथ लेटी और कब उठ कर चली गयी।

34) दूसरे दिन बड़ी ने छोटी से कहा, ''देखो, पिछली रात मैं अपने पिता के साथ लेट गयी। आज रात को भी हम उसे शराब पिला दें: तब तुम जा कर उसके साथ लेट जाओ जिससे हम अपने पिता के द्वारा अपना वंश बनाये रखें।''

35) इसलिए उन्होंने उस रात को भी अपने पिता को शराब पिलायी। तब छोटी गयी और उसके साथ लेट गयी। उसे यह मालूम नहीं हो पाया कि वह कब उसके साथ लेटी ओर कब उठ कर चली गयी।

36) इस तरह लोट की दोनों पुत्रियाँ अपने पिता से गर्भवती हुईं।

37) बड़ी पुत्री को एक पुत्र पैदा हुआ, जिसका नाम उसने मोआब रखा। वह आजकल के मोआबियों का मूलपुरुष है।

38) छोटी पुत्री के भी एक पुत्र पैदा हुआ, जिसका नाम उसने बेन-अम्मी रखा। वह आजकल के अम्मोनियों का मूलपुरुष है।



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