📖 - समूएल का पहला ग्रन्थ

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अध्याय 06

1) प्रभु की मंजूषा सात महीने तक फ़िलिस्तियों के देश में रही।

2) तब फ़िलिस्तियों ने पुजारियों और शकुन विचारने वालों को बुला कर पूछा, "हम प्रभु की मंजूषा का क्या करें? हमें बताओ कि हम उसे उसके अपने स्थान पर कैसे पहुँचाये।"

3) उन्होंने उत्तर दिया, "जब तुम इस्राएल के ईश्वर की मंजूषा उसके अपने स्थान पर पहुँचाओगे, तब उसे वहाँ यों ही नहीं पहुँचाना, बल्कि उसके साथ प्रायश्चित के रूप में बढ़ावा भी अर्पित करना। तब तुम्हारी बीमारियाँ दूर हो जायेंगी और तुम यह जान जाओगे कि उसका हाथ

4) उन्होंने पूछा, "हम उसे प्रायश्चित के रूप में क्या चढ़ाये?" उन्होंने उत्तर दिया, "फ़िलिस्तियों के शासकों की संख्या के अनुसार सोने की पाँच गिल्टियाँ और सोने के पाँच चूहे, क्योंकि एक ही महामारी ने सब को, तुम को और तुम्हारे शासकों को, मारा है।

5) इसलिए अपनी गिल्टियों और देश को उजाड़ने वाले चूहों की प्रतिमाएँ बनवाओ और इस्राएल के ईश्वर की महिमा करो। हो सकता है कि वह तुम पर, तुम्हारे देवताओं और तुम्हारे देश पर अपने हाथ का दबाव कम कर दे।

6) तुम क्यों मिस्रियों और फ़िराउन की तरह अपना हृदय कठोर कर लेते हो? जब ईश्वर ने उन्हें कठोर दण्ड दिया था, तो क्या उन्होंने इस्राएलियों को नहीं जाने दिया?

7) इसलिए अब एक नयी गाड़ी तैयार करो और दूध पिलाने वाली गायें लो, जो जोती नहीं गयी हो। इन गायों को गाड़ी में जोतो, पर इनके बछड़ों को इन से अलग कर गोशाला में ले जाओ।

8) प्रभु की मंजूषा उठा कर उस गाड़ी पर रख दो। फिर उन सोने की वस्तुओं को, जिन्हें तुम प्रायश्चित के रूप में अर्पित करना चाहते हो, एक पेटी में बन्द कर मंजूषा के पास रखों और गाड़ी भेज दो।

9) तब तुम ध्यान दो। यदि गाड़ी इस्राएलियों के देश में मार्ग पर बेत-षेमेष की ओर जाये, तो समझ लो कि प्रभु ने हम पर यही बड़ी विपत्ति ढाही है। यदि वह उधर नहीं जाये, तो हम जान जायेंगे कि प्रभु के हाथ ने हम को नहीं मारा और हम पर जो बीता, वह संयोग की बात लो थी।

10) लोगों ने ऐसा ही किया। उन्होंने दूध पिलाने वाली दो गायें ले कर उन्हें गाड़ी में जोता और उनके बछड़ों को गोशाला में बाँध रखा।

11) उन्होंने प्रभु की मंजूषा गाड़ी पर रख दी और उसके पास पेटी में सोने के चूहे और अपनी गिल्टियों की प्रतिमाएँ।

12) गायें सीधे बेत-षेमेष के मार्ग पर आगे बढ़ी। वे रम्भाती हुई चली गयीं और न दायें मुड़ीं और न बायें। फ़िलिस्तियों के शासक बेत-षेमेष की सीमा तक उनके पीछे-पीछे गये।

13) उधर बेत-षेमेष के निवासी मैदान में गेहूँ काट रहे थे। उन्होंने आँखें उठायीं, तो मंजूषा देखी और उसे देख कर वे प्रसन्न हुए।

14) गाड़ी बेत-षेमेष के योशुआ के खेत में आ पहुँची और वहीं रूक गयी। वहाँ एक बड़ा पत्थर पड़ा था। लोगों ने गाड़ी की लकड़ी के टुकड़े कर डाले और गायें प्रभु को होम-बलि में चढ़ा दी।

15) लेवियों ने प्रभु की मंजूषा और उसके पास की वह पेटी, जिस में सोने की वस्तुएँ रखी थी, नीचे उतारी और उन्हें उस बड़े पत्थर पर रख दिया। उस दिन बेत-षेमेष के निवासियों ने प्रभु को होम-बलियाँ और अन्य बलियाँ चढ़ायीं।

16) फ़िलिस्तियों के पाँचों शासक यह सब देख कर उसी दिन एक्रोन लौट गये।

17) सोने की गिल्टियाँ, जिन्हें फ़िलिस्तियों ने प्रायश्चित के रूप में चढ़ाया था, इस प्रकार थीं: अषदोद के लिए एक, गाज़ा के लिए एक, अषकलोन के लिए एक, गत के लिए एक और एक्रोन के लिए एक

18) और इनके अतिरिक्त फ़िलिस्तियों के उन -नगरों उन क़िलाबन्द नगरों और उनके आसपास के गाँवों - की संख्या के अनुसार, जो उन पाँच शासकों के अधीन थे, सोने के चूहे भी। वह बड़ा पत्थर, जिस पर उन्होंने प्रभु की मंजूषा रखी थी, आज तक बेत-शेमेश के योशुआ के खेत में इन घटनाओं के साक्षी के रूप में विध्यमान है।

19) बेत-षेमेश के कुछ निवासियों ने प्रभु की मंजूषा खोल कर उसके अन्दर झाँका, इसलिए प्रभु ने लोगों में सत्तर मनुष्यों को मार डाला। लोगों ने शोक मनाया, क्योंकि प्रभु ने उन्हें कठोर दण्ड दिया था।

20) बेत-षेमेश के लोगों ने कहा, "प्रभु इस परमपावन ईश्वर के सामने कौन टिक सकता है? मंजूषा हमारे यहाँ से चल कर कहाँ जायेगी?"

21) उन्होंने दूतों द्वारा किर्यत-यआरीम के निवासियों को यह कहला भेजा, "फ़िलिस्तियों ने हमें प्रभु की मंजूषा वापस कर दी है। अब तुम यहाँ आ कर उसे अपने यहाँ ले जाओ।"



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