📖 - योशुआ का ग्रन्थ

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अध्याय 04

1) जब सारा जनसमूह यर्दन पार कर चुका, तब प्रभु ने योशुआ से कहा,

2) "लोगों में से बारह पुरुष चुन लो -प्रत्येक वंश से एक

3) और उन्हें यह आज्ञा दो: यर्दन के मध्य से जहाँ याजकों के पाँव थे बारह पत्थर उठा कर अपने साथ ले जाओ और उन्हें उस स्थान पर रख दो जहाँ तुम आज रात ठहरोगे"।

4) इस पर योशुआ ने उन बारह पुरुषों केा बुला भेजा जिन्हें उसने इस्राएलियों के प्रत्येक वंश से चुना था।

5) योशुआ ने उन से कहा, "प्रभु अपने ईश्वर की मंजूषा के सामने यर्दन के बीच चले जाओ और इस्राएलियों के वंशो की संख्या के अनुसार तुम में से प्रत्येक एक-एक पत्थर अपने कन्धे पर उठा लाये।

6) वह तुम्हारे लिए एक स्मारक बन जायेगा। जब कभी भविष्य में तुम्हारी सन्तान तुम से पूछेगी कि इन पत्थरों का अर्थ क्या है,

7) तो तुम यह उत्तर दोगे ’जब प्रभु के विधान की मंजूषा यर्दन में उतरी तो यर्दन की जलधारा उसके सामने थम गयी - ये पत्थर इस्राएलियों के लिए इस घटना के चिरस्थायी स्मारक है।"

8) इस्राएलियों ने योशुआ की आज्ञा का पालन किया। जैसा कि प्रभु ने योशुआ को आदेश दिया उन्होंने इस्राएल के वंशो की संख्या के अनुसार यर्दन के बीच से बारह पत्थर उठाये। उन्होंने उन को अपने साथ शिविर ले जा कर वहीं रख दिया।

9) और जिस स्थान पर विधान की मंजूषा ढोने वाले याजको ने पाँव रखे थे योशुआ ने वहाँ यर्दन के बीच में बारह पत्थर स्थापित किये। वे आज तक वहाँ विद्यमान है।

10) जब तक वह सब कुछ पूरा नहीं हो पाया था जिसका प्रभु ने योशुआ द्वारा लोगों को आदेश दिया था और जो मूसा ने योशुआ से कहा था तब तक मंजूषा ढोने वाले याजक यर्दन के बीच खडे़ रहे। लोग जल्दी-जल्दी नदी पार करते गये।

11) जब सब लोग पार कर चुके, तब दूसरे तट पर खडे़ लोगों के देखते याजकों ने मंजूषा के साथ नदी पार किया।

12) जैसी मूसा ने उन्हें आज्ञा दी थी रूबेन, गाद और मनस्से के आधे कुल के सषस्त्र योद्धा इस्राएलियों के आगे-आगे चलते हुए पार उतरे।

13) लगभग चालीस हजार सशस्त्र योद्धा प्रभु के सामने युद्ध के लिए येरीखो के मैदान की ओर आगे बढे़।

14) उस दिन प्रभु ने योशुआ को समस्त इस्राएल की दृष्टि में इतना महान बनाया कि वे उसके जीवन भर उस पर इस प्रकार श्रद्धा रखते थे जिस प्रकार उन्होंने मूसा पर श्रद्धा रखी थी।

15) (15-16) प्रभु ने योशुआ से कहा, "विधान की मंजूषा ढोने वाले याजकों की आज्ञा दो कि वे यर्दन बाहर आयें"।

17) इसलिए योशुआ ने याजकों को आज्ञा दी, "यर्दन से बाहर आओ"।

18) जैसे ही प्रभु के विधान की मंजूषा ढोने वाले याजक यर्दन के बीच से निकल कर बाहर आये और याजको के पाँव के तलवे तट पर पडे़ वैसे ही यर्दन का पानी फिर अपने स्थान पर आ गया और पहले की तरह सर्वत्र अपने तट के ऊपर तक बहने लगा।

19) पहले महीने के दसवें दिन लोगों ने यर्दन से चलकर गिलगाल में पडाव डाला जो येरीख़ो की पूर्वी सीमा पर है।

20) योशुआ ने गिलगाल में वे बारह पत्थर स्थापित किये जिन्हें वे यर्दन से निकाल कर ले गये थे।

21) उसने इस्राएल के लोगों से कहा, "जब कभी भविष्य मे तुम्हारी सन्तान अपने पिताओं से पूछेगी कि इन पत्थरों का क्या अर्थ है,

22) तो अपने पुत्रो को इस प्रकार समझाओगे, ’इस्राएल ने यहीं सूखे पाँव यर्दन पार किया है।

23) जब तक तुमने उसे पार नहीं किया तब तक प्रभु तुम्हारे ईश्वर ने तुम्हारे लिए इस प्रकार यर्दन को सुखा दिया जिस प्रकार उसने लाल समुद्र को तब तक हमारे लिए सुखाया था जब तक हमने उसे पार नहीं किया था।

24) उसने यह इसलिए किया कि पृथ्वी के समस्त राष्ट्र जान जाए कि प्रभु का सामर्थ्य कितना महान है और तुम सदा प्रभु अपने ईश्वर पर श्रद्धा रखो’।"



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